19/04/2026
🔔🎋अक्षय तृतीया एवं🎋🔔
❣️🎉वर्षीतप का इतिहास🎉❣️
🌿प्रथम युगादिदेव परमात्मा श्री ऋषभदेव प्रभु (आदिनाथ) का जन्म क्रोडा-क्रोड़ी वर्ष पूर्व अवसर्पिणी काल यानी तीसरे आरे के समय में हुआ था ! प्रभु की आयु ८४
लाख वर्ष पूर्व, देह की ऊंचाई ५०० धनुष थी, एवं वर्ण स्वर्णमयी था।
संसार के समग्र प्राणियों एवं मानव को सभी प्रकार का
ज्ञान, जीवन जीने की कला, सही-गलत कार्य के द्वारा
कर्मो का बंधन एवं उससे मुक्ति के उपाय भी प्रभु ने ही
मार्गदर्शित किये थे।
स्वयं प्रभु के द्वारा पिछले जन्म में एक बैल का मुँह बांधने
की सलाह दी थी क्योकिं वह बैल खेतों की फसल को
खा रहा था, खेत के मालिक द्वारा बैल को निर्दयता से
मारता देख, प्रभु ने करुणावश यह सलाह दे दी कि इससे बैल
को मार भी न पड़ेगी, और किसान को फसल का नुकसान
भी नही होगा !
बैल ३६० पलोपल तक तडपता रहा, उसे वेदना हुई, प्रभु के
करुणामय भाव होते हुए...भी अंतरायकर्म का बंध हुआ,
इसी कर्म के निवारणार्थ प्रभुजी को ४०० दिन तक
भिक्षा में आहार नही मिला..उपवास से रहना पड़ा।
यही से तप के द्वारा... कर्म-बंधन की मुक्ति का विधान
शुरू हुआ ।
युगादिदेव दादा श्री आदिनाथ भगवान दीक्षा पशचात
निर्जल व् निराहार विचरण करते हुए ४०० दिनों के बाद
वैशाख शुक्ला ३ के शुभ दिन इस पावन भूमि पर पधारे।
भोली भाली जनता दर्शनाथ उमड़ पड़ी।
कोई प्रभु को हाथी तो कोई सोना तो कोई क्या,
अपनी इच्छा से भेट कर रहा हे। लेकिन प्रभु को तो पारने
में काल्पिक आहार चाहिए था। जिसे हर कोई समझ नहीं
पा रहा था ।
राज कुमार श्री श्रेयांसकुमार कुमार को अपने प्रपितामह
के दर्शन पाते ही जाती - समरण ज्ञान हुवा जिस से
आहार देने की विधि को जानकर इक्षु रस को ग्रहण करने
के लिए भक्ति भाव पूर्वक प्रभु से आग्रह करने लगा।
प्रभु ने काल्पिक आहार समजकर श्री श्रेयांस कुमार के
हाथो पारना किया। देवदुंदुभिया बजने लगी ।जनता में
हर्ष का पार ना रहा । उसी दिन से यहाँ से वर्षितप के
पारने की प्रथा चालू हुई । कहा जाता हे की भगवान के
इक्षु रस से पारना होने के कारण उस दिन को पुरे शासन में
अक्षय तृतीया के नाम से जाना लगा। जो आज तक प्रचलित हैं।
#जैन_बधु_समूह