19/09/2026
✅ श्री क्षेत्र त्र्यंबकेश्वर में होने वाली पितृदोष पूजा की पात्रता और नियम
१) माता-पिता:- जिन जातकों के माता-पिता हयात(जीवित) हैं, वे भी यह कर्म विधिवत पूर्ण कर सकते हैं।
२) मुंज(यज्ञोपवीत) धारण करने के बाद अविवाहित पुरुष व्यक्ति भी यह कर्म अकेले संपन्न कर सकता है।
३)संतति प्राप्ति:-संतति प्राप्ति और वंशवृद्धि के लिए यह कर्म सपत्नीक(पत्नीके साथ)किया जाना चाहिए। यदि पत्नी हयात न हो तो कुलके उद्धारके लिए पत्नी के बिना अकेला पुरुष भी यह कर्म कर सकता है।
४) गर्भावस्थाका नियम:- यदि किसी पुरूषकी पत्नी गर्भवती हो,तो गर्भधारणके पांचवें महीने तक यह कर्म किया जा सकता है।
५) अधिकांशतः-हमसे यह प्रश्न भी पूछा जाता है कि,यदि हम दो या तीन सगे भाई हैं तो क्या किसी एक द्वारा त्रिदिवसीय पितृदोष विधि करनेपर सभी भाइयोंको उसका फल प्राप्त होता है क्या? लेकिन यह शत-प्रतिशत मुर्ख तथा पाखंडी लोगों द्वारा अकारण झूठा प्रचार करकेकी जानेवाली दिशाभूल है।यदि प्रत्येक व्यक्तिका शरीर,श्वास,स्वास्थ्य,शिक्षा,विवाह, संतति,संपत्ति और आप मेरी बातका बुरा ना मानो तो भविष्यमें मृत्युभी भिन्न ही होती है.तो फिर आपका क्या एक यह बताये.तो उसी नियमानुसार प्रत्येक धार्मिक पूजाविधि भी स्वतंत्र रूपसे ही होना अपेक्षित है।
प्रतिबंध(निषेध)
१) घर में कोई भी मांगलिक शुभ कार्य संपन्न हुआ हो,तो यह कर्म एक वर्ष तक नहीं किया जाता।
२) घर में दादा-दादी,माता या पिता अथवा सगे चाचा-चाची का निधन हुआ हो, तो एक वर्ष तक यह कर्म करना वर्ज्य(निषिद्ध) माना गया है।
३) यह त्रिदिवसीय पितृदोष श्राद्धकर्म यदि आप संतति प्राप्ति अथवा विवाह कार्य में आ रही बाधाओं के निवारण हेतु कर रहे हैं,तो गुरु या शुक्र का अस्त होने पर, तथा अधिक मास(पुरुषोत्तम महिना) में यह नहीं किया जाता और करना भी नहीं चाहिए।
४) योग्य और गुणवान मुहूर्त पर की गई प्रत्येक धार्मिक पूजा-विधि का आपको निश्चित रूप से शत-प्रतिशत फल प्राप्त होगा।