Shri 1008 Neminath Digamber Jain Temple, Tri Nagar, Delhi

Shri 1008 Neminath Digamber Jain Temple, Tri Nagar, Delhi A religious & social page. All Jains & other religious people are welcome to share their day to day religious and social activities.

15/12/2025

*सोमवार - 15 दिसम्बर 2025 को पौष कृष्ण की एकादशी , जब 8वें तीर्थंकर श्री चन्द्रप्रभ और 23वें तीर्थंकर श्री पारसनाथ जी का जन्म तप कल्याणक।*
*साल में यही एक दिन होता है, जब चार कल्याणक आते हैं।*
*वैसे तो सभी तीर्थंकरों के गुण एक समान होते हैं, पर व्यवहारिक रूप में कुछ अंतर भी दिखाई देते हैं :-*
1. चन्द्रप्रभ श्वेत रंग के, तो पार्श्वनाथ श्याम रंग के।
2. जहां चन्द्रप्रभ की आयु 10 लाख वर्ष पूर्व और एक पूर्व होता है 84 लाख पूर्वांग और एक पूर्वांग 84 लाख वर्ष का यानि आयु इतनी कि आपका केलकुलेटर भी जवाब दे दे। वहीं पारस प्रभु की आयु सिर्फ 100 वर्ष।
3. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का कद 150 धनुष या कहें 900 फुट का था, वहीं पारस प्रभु की ऊंचाई 9 हाथ यानि साढ़े तेरह फीट की।
4. जहां चंद्रप्रभ ने साढ़े 6 लाख वर्ष पूर्व 24 पूर्वांग तक राजपाट किया वहीं पारसप्रभु ने नहीं संभाला अपने पिता विश्वसेन का राज।
5. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ ने विवाह किया, वहीं पारस प्रभु बाल ब्रह्मचारी रहे।
6. चन्द्रप्रभ को अध्रुवादि भावनाओं का चिंतवन करने से वैराग्य हुआ, वहीं पारस प्रभु को जाति स्मरण से।
7. जहां चन्द्रप्रभ के साथ एक हजार राजाओं ने भी दीक्षा ली, वहीं पारस प्रभु के साथ 300 ने।
8. चन्द्रप्रभ के तीन माह के तप के बाद केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, वहीं पारस प्रभु को चार माह के तप के बाद।
9. चन्द्रप्रभ का समोशरण साढ़े 8 योजन विस्तृत था, वहीं पारस प्रभु का सवा योजन का। एक योजन 12 किमी विस्तृत होता है।
10. जहां चन्द्रप्रभ के समोशरण में 93 गणधर थे, वहीं पारस प्रभु के 10 गणधर थे।
11. दोनों ही तीर्थंकर श्री सम्मेदशिखरजी से मोक्ष गये, पर चन्द्रप्रभ बिल्कुल पूर्व की ललित कूट से, वहीं पारस प्रभु पश्चिम में स्वर्ण भद्रकूट से। वैसे इन दोनों कूट के लिये अब सबसे चौढ़ी सीढ़ियां हैं। केवल पारस प्रभु की स्वर्णभद्र कूट पर दो जगह चरण है।
12. तीर्थंकर चन्द्रप्रभ का तीर्थ काल 90 करोड़ सागर चार पूर्वांग का रहा, इतना लम्बा, वहीं पारस प्रभु का तीर्थकाल सबसे कम 278 वर्ष का रहा।

*ऐसा पावन दिन है पौष कृष्ण एकादशी, 23वें तीर्थंकर का 2703वां जन्म कल्याणक है। ऐसे पावन दिवस की सभी को हार्दिक मंगल शुभ कामनाएँ

🛑 गिरनार की सीढ़ियाँ सच में बहुत मुश्किल हैं, इन सवालों के जवाब और इतना मुश्किल कंस्ट्रक्शन कैसे हुआ और किसने और कैसे सी...
20/11/2025

🛑 गिरनार की सीढ़ियाँ सच में बहुत मुश्किल हैं, इन सवालों के जवाब और इतना मुश्किल कंस्ट्रक्शन कैसे हुआ और किसने और कैसे सीढ़ियाँ बनाईं, इसका इतिहास आप सभी के लिए यहाँ दिया गया है।

👉 गुजरात के जूनागढ़ की एक दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी कि एक मुस्लिम शासक के समय हिंदुओं को अपने धार्मिक स्थल की मरम्मत करने या वहाँ जाने के लिए क्या करना पड़ता था:

♦️ AD 1889, जगह जूनागढ़। 1857 की क्रांति को 32 साल हो चुके थे। उस समय, अंग्रेजों ने लगभग पूरे भारत पर कब्ज़ा कर लिया था और कई रियासतें अंग्रेजों के अधिकार क्षेत्र में आ गई थीं। उन्हीं रियासतों में से एक गुजरात का जूनागढ़ था, जिसके नवाब बहादुर खान थे।

जूनागढ़ में ही ऊँचा गिरनार पहाड़ है, जहाँ जैन धर्म के भी कई मंदिर और तीर्थस्थल हैं।

♦️ आज, गिरनार पर चढ़ने के लिए रोपवे और सीढ़ियाँ हैं। लेकिन पहले, भक्तों को सीधे पहाड़ पर चढ़ना पड़ता था। इसमें कई महीने लगते थे। बहुत से लोग मर गए या जंगली जानवरों ने उन्हें मार डाला।

👉 एक दिन, नवाब के दीवान हरिदास बिहारीदास देसाई और नवाब के पर्सनल असिस्टेंट पुरुषोत्तमराज झाला ने सही समय देखकर नवाब से रिक्वेस्ट की कि—
“ जैन भक्तों के लिए गिरनार जाना बहुत मुश्किल है। लोग मर रहे हैं। तो क्या ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जा सकती हैं?”

♦️ फिर नवाब ने अहमदाबाद से एक ब्रिटिश इंजीनियर को बुलाया। उसने इंस्पेक्शन किया और कहा कि गिरनार तक सीढ़ियाँ बनाने का खर्च 1 लाख 30 हज़ार रुपये होगा।

👉 1889 में, 1,30,000 रुपये। यह बहुत बड़ी रकम थी। यह सुनकर नवाब हैरान रह गए और उन्होंने मना कर दिया।

♦️ तब हरिदास देसाई और पुरुषोत्तमराज ज़ाला ने कहा—
“हम सरकारी खजाने से पैसे नहीं देंगे। हम लॉटरी निकालेंगे। लोग 1 रुपये के लॉटरी टिकट खरीदेंगे। हम आकर्षक इनाम रखेंगे। और हम लॉटरी गजट में साफ-साफ लिख देंगे कि इस पैसे का इस्तेमाल गिरनार के लिए सीढ़ियां बनाने में किया जाएगा, ताकि हिंदू-जैन लोग बड़ी संख्या में लॉटरी टिकट खरीदें।”
यह सुनकर नवाब ने इजाज़त दे दी।

इसके बाद, बेचारदास बिहारीदास की अध्यक्षता में 12 सदस्यों की एक कमेटी बनाई गई।

👉 1 अक्टूबर 1889 को 1 रुपये की लॉटरी की घोषणा की गई। पहला इनाम 40,000 रखा गया था, बाद में इसे बढ़ाकर 10,000 कर दिया गया। सबसे कम इनाम 5 रुपये था। लॉटरी का विज्ञापन जूनागढ़ के राज्य गजट “दस्तूर-उल-अमल सरकार” में छपा था।

लॉटरी स्कीम आकर्षक थी—

12 टिकट खरीदें, 1 मुफ़्त पाएं

100 टिकट बेचने वालों को 15% कमीशन

बिना बिके टिकट वापस करने की सुविधा

यह देखकर हिंदू, मुस्लिम, सिख और यहां तक ​​कि अंग्रेजों ने भी बड़ी संख्या में लॉटरी खरीदी।

♦️ रविवार, 15 मई, 1892—लॉटरी के नतीजे घोषित होने थे। पूरे भारत से हजारों लोग जूनागढ़ में इकट्ठा हुए। टिकट फ़राज़खान के घर में रखे गए थे। कमेटी ने पूरी पारदर्शिता के साथ ड्रॉ निकाला।

कुल 1,28,663 टिकट बिके।

👉 10,000 रुपये का पहला इनाम मुंबई की सविताबेन दह्याभाई खंडवाला को मिला। उन्होंने पूरी रकम गिरनार की सीढ़ियां बनाने के लिए दान कर दी। (1892 में 10,000 रुपये = आज लगभग 100 करोड़ रुपये)

10,000 रुपये का दूसरा इनाम 2,500 रुपये पंजाब के खुदाबक्श और लालचंद को मिले।

तीसरा इनाम 1,500 रुपये का नवसारी के बलवंत राय को मिला।

👉 लॉटरी से करीब 1 लाख 30 हजार रुपये जमा हुए और एक ब्रिटिश इंजीनियर की देखरेख में सीढ़ियां बनाने का काम शुरू हुआ।

सीढ़ियां बनाने में 19 साल लगे।

♦️ आज हम सीढ़ियों से आसानी से गिरनार चढ़ जाते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि हमारे पुरखों ने इसके लिए कितनी मेहनत, भागदौड़ और ऑर्गनाइज़ेशन किया था।

👉 दिखाई गई फोटो पुरानी गिरनार लॉटरी का टिकट है, जिस पर लिखा है कि जूनागढ़ के नवाब ने इस लॉटरी के लिए खास परमिशन दी है। बाईं ओर लॉटरी कमेटी के सेक्रेटरी पुरुषोत्तम के. गांधी का नाम लिखा हुआ दिख रहा है।

चंदेरी मप्र की श्री पार्श्वनाथ भगवान कीइस प्रतिमा जी की ये विशेषता है कि इसमें रावण अपने दस मुखों के साथ भगवान के चरणों ...
18/10/2024

चंदेरी मप्र की श्री पार्श्वनाथ भगवान की
इस प्रतिमा जी की ये विशेषता है कि इसमें रावण अपने दस मुखों के साथ भगवान के चरणों मे है। भारत मे इस तरह की पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा शायद ओर कही देखने मे नही मिलती है ।

30/09/2023

* मेरे अहंकार से....यदि मैने किसी को नीचा दिखाया हो.
* मेरे क्रोध से यदि किसी को दुःख पहुचाया हो।
* मेरे झूठ से किसी को कोई परेशानी हुई हो।
* मेरे ना से किसी की सेवा में,दान में, बाधा आयी हो।
* मेरे हर एक कण कण से जो मैने किसी को निराश किया हो।
* मेरे शब्दों से.... जो किसी के हृदय को ठेस पहुचाई हो।
* जाने अनजाने में यदि मैं आपके कष्ट का कारण बना हूँ |
* तो मैं मेरा मस्तक झुकाकर,हाथ जोड़कर, सहृदय, आप से क्षमा मांगता हूँ🙏
*क्षमाभाव* *क्षमाभाव* *क्षमाभाव*

"आज का भाव यो है~कल का भाव हुकुमचंद जाने"इंदौर के बेताज बादशाह हुकुमचंद सेठ 14 जुलाई 1874 को जन्मे सेठ हुकुमचंद की दास्त...
23/07/2023

"आज का भाव यो है~कल का भाव हुकुमचंद जाने"
इंदौर के बेताज बादशाह हुकुमचंद सेठ

14 जुलाई 1874 को जन्मे सेठ हुकुमचंद की दास्तां🌹

इंदौर में बड़ी~बड़ी हस्तियों ने जन्म लिया है।
लेकिन लिखने वाले भूल जाते है कि इसी इंदौर की सौंधी माटी में ऐसी हस्ती भी पैदा हुई है जिसके बारे में ओशो ने तक ने लिखा है कि ये सबसे अमीर है।

जिनकी अपार दौलत इंदौर रियासत तक को टक्कर देती थी। उनका नाम ही सेठ था....हुकुमचंद सेठ!!

बेशक हुकुमचंद सेठ इंदौर की वो नामी गिरामी शख्सियत थी जिन्होंने बिना ब्याज के अंग्रेजों से लेकर इंदौर महाराजा तक को कर्जा दिया। इसी बात से खुश होकर तुकोजीराव महाराज ने उन्हें 1915 में राय बहादुर तो अंग्रेजों ने 1919 में 'सर' के खिताब से नवाजा।

सिर्फ इतना ही नहीं अफीम और कपास के किंग हुकुमचंद सेठ ने महात्मा गांधी के इंदौर आगमन पर उन्हें अपनी कोठी पर बुलाया । शानदार दावत दी । सोने के बर्तनों में खाना परोसा । सेठ की रजामंदी से सोने की थाली गांधी जी अपने साथ ले गए । उसी वक्त आपने 40 एकड़ जमीन कस्तूरबाग्राम खोलने के लिए खंडवा रोड पर दान दी।

इंदौर के महाराजा तुकोजीराव होलकर इन्हें बहुत चाहते थे। अक्सर शाम इनकी कोठी पर गुजारते और दरबार में अपने पास वाली कुर्सी पर बैठाते। इंदौर के आखरी महाराज श्रीमंत यशवंत राव होलकर से भी यही ताल्लुकात थे। पोस्ट के साथ जो फोटो लगा है उसमें सेठ जी इंदौर महाराज यशवंत राव साहिब के साथ ही बैठे हैं।

तोपखाने में आपकी आदमकद मूर्ति लगी है।
आपके नाम से इंदौर में हुकुमचंद मार्ग भी है।
इसी मार्ग पर महलनुमा कांच मंदिर जो हमें शीश महल की याद दिलाता है उन्होंने ही बनवाया। पलासिया पर एक से एक खूबसूरत जैन मंदिर आपकी ही देन है। जितना खर्चा आपने अपने रहने के लिए इंद्र भवन में किया उतना ही खर्चा जैन मंदिरों की तामीर में किया।

इसके ठाठ~बाठ भी राजाओं जैसे थे।
गले में जेवरात और कीमती मालाएं डाले रहते।
सोने की रॉयल रोल्स कार थी जनाब इनके गैराज में।
एक मर्तबा महावीर जी की रथयात्रा के लिए भी इन्होंने सोने का रथ दान कर दिया। बुजुर्ग हुए तब कुबड़ी (लाठी) इनके हाथों में होती थी।

आजादी से पहले इनकी टक्कर टाटा और बिरला सरीके बिजनेस मैन से रही।

इन्होंने ही 1917 में कलकत्ता में भारत की पहली जुट (टाट) मिल खोली। इंदौर में आपकी तीन मिले थी।
कल्याणमल , राजकुमार और हुकुमचंद मिल के मालिक थे हुकुमचंद सेठ।

इंदौर अफीम और कपास का गढ़ था।
काला सोना (अफीम), सफेद सोना (कपास) के किंग थे।
इसी का कारोबार था। बंबई , कलकत्ता से लेकर लंदन के स्टॉक एक्सचेंज में हुकुमचंद की तूती बोलती थी। दुनिया के नामी गिरामी सटोरिए (ट्रेडर) थे हुकुमचंद सेठ।

इनके इशारे से ही कॉटन के रेट ऊपर नीचे होते थे।
जिस कंपनी के शेयर खरीदते सारे सटोरिए , इन्वेस्टमेंट वही शेयर खरीद लेते। किस्मत भी ऐसी कि इनके खरीदे शेयर के भाव आसमान छू जाते।

इंदौरियो के लिए गौरव की बात है कि लंदन के स्टॉक बाजार में आपकी तस्वीर लगी है जो इस बात की निशानी है आप सिर्फ काटन किंग नहीं बल्कि शेयर किंग भी थे। तभी तो उस जमाने में ये कहावत चल पड़ी.....
"आज का भाव यो है~कल का भाव हुकुमचंद जाने"

इंदौर में जब~जब मुसीबत पड़ी।
आपने दिल खोलकर मदद की। 1899 में इंदौर में भयंकर अकाल पड़ा लोग भूख से निढ़ाल होने लगे और 1903 और 1908 के प्लेग की महामारी फैलने से जब लोग मरने लगे सेठ जी ने अपनी तिजोरी खोल दी और इंदौरियों की खूब खिदमत की।

अपने आखरी दिनों में सेठ हुकम चंद ने कीमती रत्नों से जड़े महंगे कपड़े और जेवरात पहनना कम कर दिया और आम लिबाज में रहने लगे। बहुत धार्मिक थे।

हुकुमचंद सेठ ने एक सीख दी थी।
जिस कारोबार का तजुर्बा और इल्म ना हो उसमें इन्वेस्ट ना करें। आपने ज्यादातर तजुर्बे को एहमियत दी।

बीमार पड़ने पर जब विदेश में ऑपरेशन की नौबत आई तब सेठ ने कहा मुझे इंदौर में ही मरना है। ग्वालियर महाराज के समझने पर भी नहीं माने और इंदौर में डटे रहे। ऐसी थी इंदौर से सेठजी की मोहब्बत।

हुकुमचंद सेठ की चौथी पीढ़ी अभी भी इंदौर में भव्य पैलेस इंद्र भवन में रहती है, जिसे हुकुमचंद घंटाघर के नाम से जाना जाता है।
{ फोटो में इंदौर महाराज यशवंत राव साहिब के साथ उल्टे हाथ की जानिब बैठे है हुकुमचंद सेठ}
एक इंदौरी🌹🌹

31/03/2023

* 🙏🏻जय जिनेन्द्र🙏🏻

🙇🚩*आज चैत्र शुक्ल नवमी को ग्राम माना(मणिपुर) तहसील मूर्तिजापुर जिला अकोला चतुर्थकालीन मूर्तियां भूगर्भ से प्राप्त हुई। इनमे तीसरे तीर्थंकर श्री संभवनाथ भगवान, बिसवे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत नाथ और बाईसवे तीर्थंकर श्री नेमीनाथ भगवान भूगर्भ से प्रकटे । सभी प्रतिमाएं चतुर्थकाली है। सभी मूर्तियां अखंडित है और काले पाषाण में है।* 🙇🚩*

*   🙏🏻जय जिनेन्द्र🙏🏻🙇🚩*आज चैत्र शुक्ल नवमी को ग्राम माना(मणिपुर) तहसील मूर्तिजापुर जिला अकोला चतुर्थकालीन मूर्तियां भूगर...
31/03/2023

* 🙏🏻जय जिनेन्द्र🙏🏻

🙇🚩*आज चैत्र शुक्ल नवमी को ग्राम माना(मणिपुर) तहसील मूर्तिजापुर जिला अकोला चतुर्थकालीन मूर्तियां भूगर्भ से प्राप्त हुई। इनमे तीसरे तीर्थंकर श्री संभवनाथ भगवान, बिसवे तीर्थंकर श्री मुनिसुव्रत नाथ और बाईसवे तीर्थंकर श्री नेमीनाथ भगवान भूगर्भ से प्रकटे । सभी प्रतिमाएं चतुर्थकाली है। सभी मूर्तियां अखंडित है और काले पाषाण में है।* 🙇🚩*

15/12/2022

जो न किया कभी मुगलों ने वो मोदीराज में आज हुआ।
जैन तीर्थों पर कब्जों का अब नित नया षड्यन्त्र हुआ।।
नेमी प्रभु का गढ़ गिरनार भी दत्तात्रेय में आज हुआ।
जो न किया कभी मुगलों ने वो मोदीराज में आज हुआ।।

तपोभूमि गिरनार जहां पर नेमी प्रभु निर्वाण हुआ।
मुख्य टोंक पर जाकर देखो जैनों पर क्या जुल्म हुआ।।
कब्जा करके बैठ गए दर्शन से जैन भी दूर हुआ।
जो न किया कभी मुगलों ने वो मोदीराज में आज हुआ।।

साल हजारों से जैनों पर जहां कभी न जुल्म हुआ।
वहां भी षड्यंत्रों खव देखो बारंबार प्रहार हुआ।।
सत्ता इनकीं केंद्र राज्य में पर्यटन क्षेत्र का वार हुआ।
जो न किया कभी मुगलों ने वो मोदीराज में आज हुआ।।

अपना बनाकर पीठ में देखो जैनों पर ये वार हुआ।
समझ न पाएं न समझों से धनवानों पर वार हुआ।।
मारो छापे छीनो धन सब कंगाल बनाने वार हुआ।
जो न किया कभी मुगलों ने वो मोदीराज में आज हुआ।

ऐसा मंदिर, जहां अर्धरात्रि में अपने आप बजने लगती हैं घंटियां और ढोलक जब स्वर्णमयी हो गईं थीं वेदियां, अद्भुत और अलौकिक ह...
21/09/2022

ऐसा मंदिर, जहां अर्धरात्रि में अपने आप बजने लगती हैं घंटियां और ढोलक
जब स्वर्णमयी हो गईं थीं वेदियां, अद्भुत और अलौकिक है ये मंदिर

श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर शहडोल (मध्यप्रदेश)
विराट नगरी शहडोल मध्य प्रदेश छेत्र पर पार्श्वनाथ दिगम्बर
जैन मंदिर में स्थित चतुर्थ कालीन आतिशयकरी प्रतिमा विराजमान है ..
निकटम नगर-डिंडोरी, मंडला

शहडोल- ऐसा मंदिर जहां अर्धरात्रि में अपने आप में घंटियां बजने लगती हैं, ढोलक बजने लगते हैं, अद्भुत और अलौकिक है ये मंदिर, और इस मंदिर की कई चमत्कारिक कहानियां भी हैं। ये मंदिर है शहडोल का पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर।

1952 में शहडोल में स्थापित पारसनाथ दिगम्बर जैन मंदिर अतिशयकारी है। जहां आज भी अर्धरात्रि में घण्टी व ढोलक बजते हैं। इस मंदिर से जैन समाज की विशेष आस्था जुड़ी हुई है। ऐसा मानना है कि अर्धरात्रि में देवों द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। यही वजह है कि रात में इस मंदिर के अंदर कोई भी नहीं रुक पाता है। इतना ही नहीं आप चाहकर भी मंदिर में कोई अनिष्ट कार्य नहीं कर सकते हैं।

मंदिर के संरक्षक कोमल चंद नायक की मानें तो साल 2009 में जयपुर के मिस्त्री यहां से लगभग 20 तोला सोना चोरी कर ले गया था, लेकिन इस घटना के बाद उसका पूरा परिवार अस्त व्यस्त होने लगा। जिसके बाद उसने चोरी किया हुआ सोना वापस कर दिया था।

वर्ष 1982 में आचार्य श्री विद्यासागर महराज सम्मित शिखर में शामिल होने के लिए निकले थे। उस दौरान उनका नगर आगमन हुआ था। उस वक्त वह पाश्र्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर पहुंचे जहां पहुंचने के साथ ही उनके मुख से निकला कि यहां आकर मेरी पूरी थकान मिट गई। प्रभु आप यहां विराजमान हैं, आपको तो स्वर्ण मंदिर में होना चाहिए।

उनके मुखारबिंद से इन शब्दों के निकलने के साथ ही मंदिर परिसर में स्थापित छह बेदियां स्वर्णमयी हो गईं थीं जो आज भी उसी स्थिति में हैं। जैन समाज के लोगों का यह भी कहना है कि यहां एक दीपक जलाने के साथ ही लगभग 100 दीप एक साथ जल उठते हैं। जिसका प्रमाण समाज के कई लोगों ने अपनी आंखो से देखा है। जैन समाज के लोग इसे अद्भुत और अलौकिक मानते हैं।

15/09/2022

होसंगाबाद श्री मुन्नालाल जी सन्तोष कुमार जैन जी की साइट पर खुदाई के दौरान चकर्वती श्री शान्तिनाथ भगवान की प्रतिमा मिली

15/09/2022

यह एक जैन मंदिर है...इसकी नक्काशी , कला और सुंदरता देखिए...क्या किसी ताजमहल की औकात जो इसके आगे ठहर सके...👌🏼🏳️‍🌈🏳️‍🌈🏳️‍🌈
श्री तारंगा धाम जी

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