09/06/2026
महापूजा - ९.६.२०२६
किशोर आयु में ही भगवान श्री रमण महर्षि ने अरुणाचल की मौन पुकार सुनकर घर छोड़ दिया। उनका घर छोड़ना, उनकी मांँ के लिए एक गहरा आघात था। जब वह पवलकुन्नरू में उनसे मिलीं तो वापस चलने के लिए कहा तथा रोईं। भगवान अविचलित रहे तथा मौन में लीन थे। उन्होंने एक कागज पर लिखा- " नियंता कर्मानुसार भाग्य का निर्धारण प्रारब्ध के रूप में करता है। जिसका नहीं होना निश्चित है, वह नहीं होगा। तुम चाहे उसके लिए कितना भी प्रयत्न कर लो । जिसका होना तय है, वह अवश्य होगा । उसे रोकने के लिए तुम चाहे कुछ भी प्रयत्न करो । यह निश्चित है। इसलिए सर्वोत्तम है- मौन रहना" । समय गुजरता गया । माँ अलगम्माल तिरुवण्णामलै आती जाती रहीं । बाद में जब वह बीमार पड़ीं तो भगवान ने उनकी बड़ी सेवा की तथा उनके आरोग्य के लिए प्रार्थना स्वरूप अरुणाचल पर एक छंद की रचना की । उनकी देखभाल एवं प्रार्थना से माँ निरोग हो गईं। १९१६ में वह स्थाई रूप से भगवान के साथ रहने आ गईं। वह आश्रम के रसोई घर में भक्तों के लिए भोजन बनाने लगीं। उनके अंतिम दिनों में भगवान ने उनकी दिन-रात सेवा की । १९२२ में वैकसी कृष्ण नवमी को भगवान ने उन्हें मुक्ति प्रदान की । पूछने पर भगवान ने कहा -" वह मरीं नहीं आत्मलीन हो गई हैं " । उन्हें आश्रम परिसर में ही दफनाया गया तथा एक शिवलिंग की स्थापना की गई । मातृ भूतेश्वर मंदिर उसी का रूप है। यह दिन हर वर्ष महापूजा के रूप में मनाया जाता है। आज रूद्रम पूजा तथा अभिषेक के साथ भव्य रूप में पूजा हुई । लगभग १०.३० पर दीप आराधना संपन्न हुई । भक्तों ने भोज ग्रहण किया । यूट्यूब पर प्रसारित इस कार्यक्रम को हजारों लोगों ने देखा। आज इस पावन अवसर पर आश्रम, सभी भक्तों पर मां के अनुग्रह की प्रार्थना करता है।