18/01/2026
यह बात उन दिनों की है जब मैं(श्री टिकराम जी ) बाबा के सान्निध्य में समय बिता रहा था। बाबा कोई साधारण संत नहीं थे। वे न तो कभी प्रवचन देते थे, न ही कोई औपचारिक शिक्षा। उनकी बातें सीधी नहीं होती थीं, बल्कि संकेतों और प्रतीकों में लिपटी होती थीं। उन्हें समझना आसान नहीं था, लेकिन जो भी उनके पास जाता, कुछ न कुछ सीखकर ही लौटता।
एक दिन की बात है। मैं पदमपुरी आश्रम में था। बाबा ने मुझे दो नारियल दिए और बोले, “इन्हें कस दो।” मैंने सोचा, बस दो ही नारियल हैं, जल्दी ही काम खत्म हो जाएगा। मैंने कद्दूकस उठाया और काम में लग गया।
जैसे ही मैंने पहला नारियल कसना शुरू किया, तभी कुछ मेहमान आश्रम में आने लगे। हर कोई अपने साथ दो-दो नारियल लेकर आता। मैंने सोचा, “अरे! ये क्या हो रहा है?” लेकिन बाबा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुरा रहे थे। मैं चुपचाप नारियल कसता रहा।
थोड़ी ही देर में नारियलों का ढेर लग गया। एक के बाद एक लोग आते गए और हर कोई दो नारियल देता गया। मैं लगातार कसता रहा, लेकिन ढेर कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। दोपहर हो गई, हाथ थक गए, पीठ दुखने लगी, लेकिन काम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।
तभी बाबा ने आवाज़ दी, “अब भी दो नारियल ही कस रहे हो? उठो अब, थक गए होगे।” उनकी मुस्कान में एक रहस्य छिपा था, जैसे वे पहले से जानते थे कि क्या होने वाला है।
उस दिन मैंने समझा कि संतों की लीला कितनी गूढ़ होती है। बाबा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उस अनुभव ने मुझे सिखा दिया कि सेवा में थकान नहीं होती, और जो कार्य छोटा लगता है, उसमें भी गहराई छिपी हो सकती है।
बाबा की बातें सीधे नहीं होती थीं, लेकिन जो उन्हें समझ ले, उसके जीवन में बदलाव आना तय था।
अति विशाल हृदय
अति करुणाधारि
जीवन्मुक्त प्रभु परोपकारी ,
जय हो बाबा सोमबारि
आगे क़ी कथा फिर सोमबारी बाबा क़े आश्रीवाद से फिर कभी।