Sombari Baba- सोमवारी बाबा महाराज

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Sombari Baba- सोमवारी बाबा महाराज अति विशाल हृदय अति करुणाधारि ,जीवन्मुक्त प्रभु परोपकारी , जय हो बाबा सोमबारि

यह बात उन दिनों की है जब मैं(श्री टिकराम जी ) बाबा के सान्निध्य में समय बिता रहा था। बाबा कोई साधारण संत नहीं थे। वे न त...
18/01/2026

यह बात उन दिनों की है जब मैं(श्री टिकराम जी ) बाबा के सान्निध्य में समय बिता रहा था। बाबा कोई साधारण संत नहीं थे। वे न तो कभी प्रवचन देते थे, न ही कोई औपचारिक शिक्षा। उनकी बातें सीधी नहीं होती थीं, बल्कि संकेतों और प्रतीकों में लिपटी होती थीं। उन्हें समझना आसान नहीं था, लेकिन जो भी उनके पास जाता, कुछ न कुछ सीखकर ही लौटता।
एक दिन की बात है। मैं पदमपुरी आश्रम में था। बाबा ने मुझे दो नारियल दिए और बोले, “इन्हें कस दो।” मैंने सोचा, बस दो ही नारियल हैं, जल्दी ही काम खत्म हो जाएगा। मैंने कद्दूकस उठाया और काम में लग गया।
जैसे ही मैंने पहला नारियल कसना शुरू किया, तभी कुछ मेहमान आश्रम में आने लगे। हर कोई अपने साथ दो-दो नारियल लेकर आता। मैंने सोचा, “अरे! ये क्या हो रहा है?” लेकिन बाबा ने कुछ नहीं कहा, बस मुस्कुरा रहे थे। मैं चुपचाप नारियल कसता रहा।
थोड़ी ही देर में नारियलों का ढेर लग गया। एक के बाद एक लोग आते गए और हर कोई दो नारियल देता गया। मैं लगातार कसता रहा, लेकिन ढेर कम होने की बजाय बढ़ता ही गया। दोपहर हो गई, हाथ थक गए, पीठ दुखने लगी, लेकिन काम खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।
तभी बाबा ने आवाज़ दी, “अब भी दो नारियल ही कस रहे हो? उठो अब, थक गए होगे।” उनकी मुस्कान में एक रहस्य छिपा था, जैसे वे पहले से जानते थे कि क्या होने वाला है।
उस दिन मैंने समझा कि संतों की लीला कितनी गूढ़ होती है। बाबा ने कुछ नहीं कहा, लेकिन उस अनुभव ने मुझे सिखा दिया कि सेवा में थकान नहीं होती, और जो कार्य छोटा लगता है, उसमें भी गहराई छिपी हो सकती है।
बाबा की बातें सीधे नहीं होती थीं, लेकिन जो उन्हें समझ ले, उसके जीवन में बदलाव आना तय था।

अति विशाल हृदय
अति करुणाधारि
जीवन्मुक्त प्रभु परोपकारी ,
जय हो बाबा सोमबारि
आगे क़ी कथा फिर सोमबारी बाबा क़े आश्रीवाद से फिर कभी।

**Buying Firewood Worth 100 Rupees**In the autumn of 1918, a wealthy local man named Jaiyalal Sah visited Baba’s ashram ...
30/12/2025

**Buying Firewood Worth 100 Rupees**

In the autumn of 1918, a wealthy local man named Jaiyalal Sah visited Baba’s ashram in Padampuri. There, he offered Baba 100 rupees, which was considered a very large amount in those days.

Baba called Shri Bageshwari and said,
“Bageshwari, look, someone has offered this money. What use do I have for it? I feel that this winter will be very severe, so why don’t you go to the market and buy firewood with this money?”

It was a huge amount of firewood! The ashram normally did not need so much wood. Even so, Bageshwari ji followed Baba’s instruction and bought high-quality *banj* (oak) firewood. There was so much wood that the entire storeroom of the ashram was filled.

That same year, in the bitter cold of January, when Baba left his physical body, Shri Bageshwari understood the true meaning of Baba’s action. Baba had already arranged the firewood needed for his own funeral rites, so that his devotees would not have to face any difficulty in finding wood in the freezing winter.

100 रुपये की लकड़ी खरीदनासन 1918 की शरद ऋतु में, जैयलाल साह नाम के एक धनी स्थानीय व्यक्ति बाबा के पदमपुरी स्थित आश्रम मे...
30/12/2025

100 रुपये की लकड़ी खरीदना

सन 1918 की शरद ऋतु में, जैयलाल साह नाम के एक धनी स्थानीय व्यक्ति बाबा के पदमपुरी स्थित आश्रम में गए। वहाँ उन्होंने बाबा को 100 रुपये अर्पित किए, जो उन दिनों बहुत बड़ी राशि मानी जाती थी।

बाबा ने श्री बागेश्वरी को बुलाकर कहा,
“बागेश्वरी, देखो, किसी ने यह धन अर्पित किया है। मैं धन का क्या करूँ? मुझे लगता है कि इस बार सर्दी बहुत कड़ी पड़ेगी, तो क्यों न तुम बाज़ार जाकर इस पैसे से लकड़ी खरीद लाओ।”

यह बहुत अधिक लकड़ी थी! आश्रम को आमतौर पर इतनी लकड़ी की आवश्यकता नहीं होती थी। फिर भी, बागेश्वरी जी ने बाबा के आदेश का पालन किया और अच्छी गुणवत्ता वाली बाँज (ओक) की लकड़ी खरीदकर ले आए। लकड़ी इतनी अधिक थी कि आश्रम का पूरा भंडारघर भर गया।

उसी वर्ष, जनवरी की कड़ाके की सर्दी में जब बाबा ने अपना शरीर त्याग दिया, तब श्री बागेश्वरी को समझ आया कि बाबा ने अपने अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक लकड़ी पहले से ही जुटवा दी थी, ताकि ठिठुरती सर्दी में उनके भक्तों को लकड़ी ढूँढने में कोई कष्ट न उठाना पड़े।

01/11/2025
शराब लेकर आने वाला व्यक्तिएक दिन बाबा अपने आसन पर बैठे थे। अचानक वे बोलने लगे —"साले! वह मेरे आश्रम की ओर आ रहा है, जेब ...
05/10/2025

शराब लेकर आने वाला व्यक्ति

एक दिन बाबा अपने आसन पर बैठे थे। अचानक वे बोलने लगे —
"साले! वह मेरे आश्रम की ओर आ रहा है, जेब में बुरी चीज़ है। वह अपनी पत्नी को यह पिलाने की सोच रहा है।”

वे शब्द सुनकर आसपास बैठे लोग चौक पड़े। सभी ने इधर-उधर देखा, पर नज़रों में कोई नहीं आया। कुछ खामोशी के बाद, दूर से किसी की परछाई दिखी — एक अनजान आदमी लगभग दो सौ गज की दूरी पर चलकर आश्रम की ओर आ रहा था। उसका चलना अनमना-सा था, जेब से कुछ उभरा हुआ प्रतीत हो रहा था।

उस आदमी ने अपनी जेब से शराब की बोतल निकाली और ज़मीन पर फेंकने ही वाला था कि बाबा बोले —
"यहाँ नहीं! दूर फेंको, नहीं तो शीशा किसी को लग सकता है।"

बाबा ने ठण्डे लहजे में कहा, “अब नदी में जाकर नहा लो।” आदमी चुपचाप नदी की ओर गया। पानी में डुबकी लेकर जब वह वापस आया, तो उसने शांत हो कर बाबा के समीप बैठना स्वीकार कर लिया। उसके चेहरे पर कुछ पछतावे की लकीरें थीं—ऐसी लकीरें जो बताती थीं कि वह अंदर से परेशान है।

तब बाबा ने कहा —
"बुरे आदमी! औरत को शराब पिलाता है! लो, यह विभूति लो और उसकी माथे पर लगाओ, वह ठीक हो जाएगी।"

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ...तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।यह जानकर सुखद ...
23/07/2025

एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ...तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।

यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे 🙏 मात्र तुलसी पत्र लेते थे।जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।

अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे।डोंगरे जी महाराज कलयुग के दानवीर कर्ण थे।

उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे।-स्वंय कुछ नहीं लिया|

डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम-रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था-'देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ 108 भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।

इसके बाद जहाँ -जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।108 भागवत पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए।तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले-' अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम ग्रहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।
इस पर उनकी पत्नी ने कहा,'आपके श्रीमुख से 108 भागवत श्रवण करने के बाद मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है,इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है'।धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।

डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत रस बरसाते थे।
पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला।वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे- रतिभाई पटेल जी |
उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ?फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल- पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।

सेठ रतिभाईपटेल ने रोते हुए बताया था....
जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था किपत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं।

हम उसी समय मर क्यों न गए l
फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था

*ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटि-कोटि नमन भी कम है ।।

Baba Sombari was a very calm, simple, and deeply meditative saint. His face, his way of speaking, and his ashram – every...
01/06/2025

Baba Sombari was a very calm, simple, and deeply meditative saint. His face, his way of speaking, and his ashram – everything felt peaceful and full of serenity. He looked like a sage from ancient times.

Every day, Baba would wake up early and do his spiritual practice. Around 8 AM, he would come out of his small hut. At that time, devotees and villagers would start coming to meet him. Baba would give each visitor some sweet and tulsi (holy basil) leaves as prasad (blessed offering). Then, everyone was served tea. Sometimes, the tea had herbs in it, chosen by Baba himself.

After that, Baba would go to the dhuni (a sacred fire that kept burning) near the river. There too, he would distribute fruits, sweets, and prasad. If someone was coming from far away, Baba would already know and would keep special prasad aside for them.

Baba used to say, “Someone brings a pumpkin, someone brings sweets – mix everything and make prasad out of it.”
He believed that whatever someone brings with devotion is equally pure and beautiful in God’s eyes.

By 10 or 11 AM, Baba would ask people to start cooking lunch. While the food was being prepared, he would sit by the river and chant God’s name. Then, he would go to Lord Shiva’s temple, the dhuni, and to the samadhi (shrine) of Gudariya Baba to perform aarti (ritual prayer).

Everyone would eat lunch together – but Baba never ate anything himself, not even water.
Around 2:30 PM, Baba would meditate for a while and then drink some herbal tea. At this time, others would rest, take a walk, or help with chores around the ashram.

In the evening, everyone would gather for prayers. Baba would again perform aarti, sit by the dhuni, talk a little with people, and then give out prasad.
He often applied vibhuti (sacred ash from the dhuni) on his devotees’ foreheads. Baba believed that this ash would protect them from trouble and help them return home safely. He said that if someone came to see him, it was his duty to ensure they returned home safely.

After 8 PM, no one was allowed to stay at the ashram – not even other saints. Baba used to say that he met some divine souls at night, and they did not like the presence of others.

What Baba did after that, no one knew. How much he meditated or slept was a mystery.
Each morning, the same daily routine would begin again at 8 AM.

When Baba first came to a place called Padampuri, there was nothing there. He used to sit under a Peepal tree, covered by two tin sheets. He never fully covered his hut. During rain, he would sleep under the roof.
Padampuri was a very cold place, yet Baba lived there in winter. During the hot months, he would go to Kakrighat – a very hot place. This was his unique nature – he always did the opposite of what was usual.

During the festival of Holi, Baba would spend a week in a cave in a place called Khairna, as per his devotees’ wishes. The day after Holi, Baba would return to his Kakrighat ashram and stay there until the Margashirsha month (between October and November).
As winter increased, Baba would return to his Padampuri ashram.

The rest of the story will be told another time, with Baba Sombari’s blessings.

सोमवारी बाबा महाराज बहुत ही शांत, सरल और ध्यान में डूबे रहने वाले संत थे। उनका चेहरा, बात करने का तरीका और उनका आश्रम – ...
01/06/2025

सोमवारी बाबा महाराज बहुत ही शांत, सरल और ध्यान में डूबे रहने वाले संत थे। उनका चेहरा, बात करने का तरीका और उनका आश्रम – सब कुछ बहुत ही शांति और सुकून से भरा हुआ था। वो ऐसे लगते थे जैसे पुराने ज़माने के किसी ऋषि का रूप हो।

बाबा हर दिन सुबह जल्दी उठकर अपनी साधना करते थे। फिर सुबह 8 बजे अपनी छोटी-सी कुटिया से बाहर आते थे। उसी समय भक्त और गाँव के लोग उनसे मिलने आने लगते थे। बाबा हर आने वाले को मिठाई और तुलसी के पत्ते मिलाकर प्रसाद देते थे। फिर सबको चाय पिलाई जाती थी। कई बार चाय में जड़ी-बूटियाँ भी होती थीं, जो बाबा खुद तय करते थे।

इसके बाद बाबा नदी के पास वाले धूनी (धूनी = अग्नि जलती रहती थी जहाँ) पर जाते थे। वहाँ भी वो फल, मिठाई और प्रसाद सबको बाँटते थे। अगर कोई दूर से रास्ते में आ रहा होता, तो बाबा को पहले से पता होता और वो उसके लिए अलग से प्रसाद रख देते थे।
बाबा कहते थे, "कोई कद्दू लाएगा, कोई मिठाई – सब कुछ मिला कर प्रसाद बना दो।"
उनका मानना था कि जो जो भी अपनी श्रद्धा से कुछ लाता है, वह भगवान के लिए एक जैसा होता है – पवित्र और सुंदर।

दस-ग्यारह बजे तक बाबा लोगों से कहते कि दोपहर का खाना बनाओ। जब खाना बन रहा होता, तब बाबा नदी किनारे बैठकर भगवान का नाम जपते थे। फिर वो भगवान शिव के मंदिर, धूनी और गुदरिया बाबा की समाधि पर जाकर आरती करते थे।

इसके बाद सब मिलकर खाना खाते थे – लेकिन बाबा खुद कभी नहीं खाते थे, पानी तक नहीं पीते थे।
दोपहर ढाई बजे के आसपास बाबा थोड़ी देर साधना करते और फिर कुछ हर्बल चाय पीते थे। इस समय पर बाकी लोग आराम करते, टहलते या आश्रम के कामों में हाथ बँटाते।

शाम के समय सब मिलकर प्रार्थना करते थे। बाबा फिर से आरती करते थे और धूनी पर बैठकर लोगों से थोड़ा-बहुत बातें करते, और फिर प्रसाद बाँटते थे।
अक्सर बाबा अपने भक्तों के माथे पर धूनी की राख (विभूति) से तिलक लगाते थे। बाबा कहते थे कि यह तिलक उन्हें हर मुसीबत से बचाएगा और वे सकुशल अपने घर पहुँचेंगे। वे मानते थे कि अगर कोई भक्त उनके दर्शन को आता है, तो उसका सुरक्षित लौटना उनकी ज़िम्मेदारी है।

रात 8 बजे के बाद किसी को भी आश्रम में रुकने की इजाज़त नहीं थी – यहाँ तक कि दूसरे साधु भी नहीं रुक सकते थे। बाबा कहते थे कि वो रात में कुछ खास दिव्य आत्माओं से मिलते हैं, जिन्हें और लोगों की उपस्थिति पसंद नहीं होती।

इसके बाद बाबा क्या करते थे, यह कोई नहीं जानता। वे कितना ध्यान करते, कितना सोते – सब रहस्य ही था।
हर सुबह फिर वही दिनचर्या 8 बजे से शुरू हो जाती थी।

जब बाबा पहली बार पदमपुरी नाम की जगह आए, तो वहाँ कुछ भी नहीं था। वे एक पीपल के पेड़ के नीचे दो टिन की चादरों के नीचे बैठते थे। उन्होंने कभी अपनी कुटिया को पूरी तरह से नहीं ढका। बारिश में ही वे छत के नीचे सोते थे।
पदमपुरी बहुत ठंडी जगह थी, तो बाबा वहाँ ठंड में रहते थे। गर्मी के दिनों में वो काकड़ीघाट चले जाते थे – जो बहुत गर्म जगह थी। ये उनके स्वभाव की खासियत थी – वो हमेशा सामान्य के विपरीत चलते थे।

होली के समय, बाबा एक हफ्ते के लिए खैरना नाम की जगह पर एक गुफा में रहते थे। यह उनके भक्तों की इच्छा पर होता था। होली के अगले दिन बाबा फिर अपने आश्रम काकड़ीघाट लौट जाते और वहीं मार्गशीर्ष महीने तक रुकते थे (यह महीना अक्टूबर-नवंबर के बीच आता है)।
सर्दी बढ़ते ही बाबा फिर से अपने पदमपुरी वाले आश्रम चले जाते थे।

अति विशाल हृदय
अति करुणाधारि
जीवन्मुक्त प्रभु परोपकारी ,
जय हो बाबा सोमबारि
आगे क़ी कथा फिर सोमबारी बाबा क़े आश्रीवाद से फिर कभी

Jai Sombari Baba
12/04/2025

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