16/08/2026
🌹🌼ब्रह्मा और विष्णु की कथा🌼🌹
सूत जी बोले, हे मुनिजन! शिव जी का लिंग और मूर्ति, ये दोनों ही रूप पूजनीय और वांछित फल देने वाले हैं। मंदार पर्वत पर जब सनत्कुमारों ने नंदिकेश्वर से पूछा कि शिवलिंग का प्राकट्य कैसे हुआ, तब उन्होंने यह कथा सुनाई।
भगवान विष्णु जब जलक्रीड़ा कर रहे थे, उस समय उनकी नाभि से एक सुंदर और विशाल कमल निकला और उस कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। उस समय चारों ओर जल ही जल होने के कारण ब्रह्मा जी अपनी उत्पत्ति का कारण नहीं समझ सके। तभी आकाशवाणी हुई कि तपस्या करो। बारह वर्ष की तपस्या के बाद भगवान विष्णु ने उन्हें चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए और कहा कि मैंने तुम्हें अपने सत्व गुण से उत्पन्न किया है। परंतु ब्रह्मा जी ने विष्णु जी को न पहचानकर उनसे युद्ध शुरू कर दिया। उस समय उनके युद्ध को शांत करने के लिए भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना तथा विष्णु जी को सृष्टि के पालन-पोषण का दायित्व सौंपा।
इसके बाद एक बार श्रीहरि शेषनाग पर विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनकी सेवा कर रही थीं। तभी वहां ब्रह्मा जी का आगमन हुआ। वे श्रीहरि से बोले, पुत्र उठो! मैं तुम्हारा ईश्वर हूँ, मुझे प्रणाम करो। यह सुनकर विष्णु जी क्रोधित हुए, लेकिन स्वयं को संभालते हुए शांत भाव से बोले, पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो! आज इस पिता के पास कैसे आना हुआ? ब्रह्मा जी को इस उत्तर की अपेक्षा नहीं थी, वे गुस्से में बोले, श्रीहरि यह तुम क्या कह रहे हो? मैं तुम्हारा रक्षक हूँ, संपूर्ण जगत का पितामह हूँ और पूरा विश्व मुझमें ही समाया हुआ है। यह सुनकर क्रुद्ध विष्णु जी बोले, अरे ठहरो! कितनी डींगें मारोगे? तुम मेरी नाभि-कमल से उत्पन्न हुए हो, शायद यह भूल गए हो! मैं ही तुम्हारा स्वामी हूँ, जगत का ईश्वर हूँ और सर्वश्रेष्ठ हूँ।
श्रेष्ठता की बात पर दोनों बहस करने लगे और कोई किसी की बात सुनने को तैयार नहीं हुआ। बात बढ़कर हिंसा तक पहुँच गई और वे एक-दूसरे का वध करने पर उतारू हो गए। ब्रह्मा जी हंस पर और श्रीहरि गरुड़ पर सवार होकर युद्ध करने लगे। दोनों एक-दूसरे पर प्राणघातक अस्त्रों का प्रहार करने लगे। उनका युद्ध देखकर देवता भयभीत हो गए और सृष्टि में हलचल मच गई। युद्ध रुकवाने के लिए सभी देवता कैलाश गए और भगवान शिव की शरण में जाकर अपनी व्यथा बताई।
भगवान महादेव ने मुस्कुराकर कहा, आप चिंता न करें, मैं आपके साथ चलता हूँ। नंदी पर सवार होकर भगवान शिव युद्धभूमि में आए और एक स्थान पर खड़े होकर दोनों का युद्ध देखने लगे। जब उन दोनों ने एक-दूसरे का नाश करने के लिए माहेश्वर और पाशुपत अस्त्रों का प्रयोग करने का निर्णय लिया, तो भगवान शिव युद्ध रोकने के लिए अचानक उन दोनों के बीच महाअग्नि के समान प्रखर स्तंभ के रूप में प्रकट हो गए। उनके प्रभाव से वे दोनों अस्त्र स्वतः शांत हो गए, जिसे देखकर दोनों को बड़ा आश्चर्य हुआ।
तब वे दोनों अत्यंत आश्चर्य से उस स्तंभ को देखने लगे। उसका स्वरूप जानने के लिए ब्रह्मा जी राजहंस का रूप धारण करके आकाश की ओर उड़े कि अग्निस्तंभ कितना ऊंचा है, और विष्णु जी वराह रूप धारण करके नीचे पाताल की ओर गए कि स्तंभ कितना गहरा है। दोनों में होड़ लग गई कि जो इस स्तंभ का आदि या अंत जान लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ होगा। विष्णु जी ने पाताल में बहुत गहराई तक जाकर अंत खोजने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। ब्रह्मा जी ने भी इक्कीस स्वर्गों तक उड़कर आरंभ खोजने की कोशिश की, पर वे भी असफल रहे।
श्रीहरि अंत खोजकर लौट आए। ब्रह्मा जी ने सोचा कि यदि वे अंत खोज लेंगे तो उन्हें ही सर्वश्रेष्ठ और जगत का स्वामी मानना पड़ेगा, इसलिए कोई युक्ति करनी होगी। तब स्वर्ग में उन्हें केतकी (केवड़ा) का फूल दिखाई दिया। उन्होंने अपने पक्ष में झूठी गवाही देने के लिए उसे मना लिया और उसे लेकर युद्धस्थल पर आए। वे प्रसन्न होकर श्रीहरि से बोले, हे श्रीहरि! मैं इस अग्निस्तंभ का आरंभ देखकर आया हूँ। विश्वास न हो तो इस केतकी के फूल से पूछ लो। श्रीहरि ने फूल की ओर देखा, तो फूल ने कहा, नारायण! ब्रह्मा जी सत्य कह रहे हैं, ये आरंभ देखकर आए हैं, मैं इसका साक्षी हूँ। श्रीहरि ने उस पर विश्वास कर लिया और ब्रह्मा जी के पैर छूकर कहा, हे विधाता! आप ही मुझसे श्रेष्ठ हैं और आप ही इस जगत के ईश्वर हैं।
इस कपट को सहन न कर पाने के कारण भगवान शिव तुरंत वहां प्रकट हुए और बोले, रमापति! विधाता झूठ बोल रहे हैं। यह स्तंभ का आरंभ खोजने बहुत ऊपर गए, पर इनके हाथ कुछ नहीं लगा। नीचा न देखना पड़े, इसलिए इन्होंने तुम्हारे साथ छल किया है। वास्तविकता यही है कि तुम्हें भी अंत का पता नहीं चला, इसलिए मैं तुम्हें अपने सभी अधिकार सम्मानपूर्वक सौंपता हूँ। आज से तुम और मैं समान ही हैं। भगवान शिव की यह वरदवाणी सुनकर श्रीविष्णु परम आनंदित हुए। ब्रह्मा जी लज्जित होकर सिर झुकाए खड़े रहे और केतकी का फूल भय से कांपने लगा।
ब्रह्मा जी का असत्य देखकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपने तीसरे नेत्र से कालभैरव को प्रकट किया और उन्हें ब्रह्मा जी को दंड देने की आज्ञा दी। कालभैरव ने अपनी तलवार से ब्रह्मा जी का पांचवां सिर धड़ से अलग कर दिया। ब्रह्मा जी प्राणों के भय से व्याकुल होकर कांपने लगे और क्षमा मांगने लगे। उनकी यह दशा देखकर श्रीविष्णु का हृदय पसीज गया और वे शिव जी से बोले, आप अत्यंत दयालु हैं, विधाता के अपराध को भूलकर उन्हें क्षमा कर दीजिए, यह मेरी प्रार्थना है। श्रीहरि की विनती स्वीकार कर भगवान शिव ने कालभैरव को उन्हें छोड़ने का आदेश दिया।
इसके बाद शिव जी ने कहा, ब्रह्मा! मैंने ईश्वर हूँ यह सिद्ध करने के लिए तुमने छल किया, इसलिए संसार में कोई भी तुम्हारी पूजा नहीं करेगा, तुम्हारा मंदिर नहीं बनाएगा और कहीं तुम्हारा आदर-सत्कार नहीं होगा। यह शाप सुनकर ब्रह्मा जी को अपने किए पर पछतावा हुआ। उन्होंने शिव जी से पुनः क्षमा मांगकर अपना पांचवां सिर वापस देने की प्रार्थना की। तब शिव जी ने कहा, विधाता! दुष्टों के विपरीत आचरण से सृष्टि के कार्यों में बड़ा विघ्न पड़ता है। पापियों को दंड देना ही पड़ता है, तभी लोग मर्यादा में रहते हैं। मैं तुम्हें पांचवां सिर तो नहीं दे सकता, लेकिन तुमने क्षमा मांगी है, इसलिए मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम यज्ञ के आचार्य बनोगे और तुम्हारे स्मरण के बिना कोई भी यज्ञ पूरा नहीं होगा। फिर भगवान ने केतकी के फूल से कहा, दुष्ट! तू यहाँ से चला जा, मैंने तुझे अपनी पूजा से वर्जित कर दिया है। आज के बाद मैं तुझे कभी स्वीकार नहीं करूंगा। यह सुनकर फूल को बहुत दुख हुआ। वह शिव जी के चरणों में सिर रखकर क्षमा मांगने लगा और बोला, मैं अज्ञानी हूँ, आपके दर्शन से मेरे दोष नष्ट हो गए हैं, मुझ पर कृपा करें। इस पर शिव जी बोले, यद्यपि मैं तुम्हें कभी धारण नहीं करूंगा, फिर भी विष्णु और सभी देवता मेरे भक्त हैं, वे तुम्हारा स्वीकार करेंगे।
नंदिकेश्वर ने आगे कहा, इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और केतकी के फूल पर अनुग्रह करके भगवान शिव कैलाश लौट गए। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु सहित सभी देवताओं ने महादेव को सम्मानपूर्वक श्रेष्ठ आसन पर बैठाकर षोडशोपचार से उनका पूजन किया। इस पर प्रसन्न होकर शिव जी ने कहा, विधाता और श्रीहरि! तुम दोनों मेरे ही पुत्र हो, तुम्हारी पूजा से मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ हूँ। इसी कारण आज की तिथि परम पवित्र मानी जाएगी और शिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध होगी।
इस दिन जो मनुष्य निराहार रहकर भक्तिभाव से मेरी पूजा करेगा, वह मुझे अत्यंत प्रिय होगा। आपके युद्धस्थल पर प्रकट हुआ यह अग्निमय स्तंभ भूलोक में अत्यंत छोटा रूप धारण करेगा, जिसे लोग लिंगस्थान या ज्योतिर्मय स्वरूप होने के कारण ज्योतिर्लिंग के नाम से जानेंगे। ज्योतिर्लिंग की आराधना करने से मनुष्य को भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होगी। मेरे ब्रह्मरूप का बोध कराने के लिए ही मैं अग्निमय स्तंभ लिंगरूप में प्रकट हुआ था। लिंगस्वरूप मेरे निर्गुण निराकार ब्रह्मरूप का बोध कराता है और मेरा मूर्ति स्वरूप मेरे सगुण साकार महेश्वर भाव का बोध कराता है।
॥ श्री सांबसदाशिवार्पणमस्तु ॥