19/09/2026
#संत_श्रीराम_नौटियाल_जी_की_जीवन_गाथा*
*भक्ति, त्याग और सेवा की एक अमर कहानी*
*“जिस जीवन में प्रभु की भक्ति बस जाए, वह जीवन साधारण नहीं रहता; वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है।”*
उत्तराखंड की देवभूमि अपनी हिमालयी चोटियों, पावन नदियों और सुरम्य वादियों के साथ-साथ अपनी गहरी धार्मिक आस्था और लोक-परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। टिहरी गढ़वाल की इसी पवित्र धरती पर ग्राम गाफर में विराजमान *सिद्धपीठ भगवान श्री नागराजा* का धाम वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है। इसी पावन धाम की भक्ति-परंपरा में एक ऐसा नाम सदैव श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता रहेगा—संत श्रीराम नौटियाल जी।
उनका जीवन त्याग की कहानी है, उनकी साधना भक्ति की कहानी है, उनकी सेवा मानवता की कहानी है और उनका सम्पूर्ण जीवन भगवान श्री नागराजा के चरणों में समर्पण की एक ऐसी गाथा है, जिसे स्मरण करते हुए आज भी मन श्रद्धा से भर उठता है।
#संत_श्रीराम_नौटियाल_जी_गाफर_नागराजा_की_भक्ति_
ज्योति*
“जहाँ सच्ची श्रद्धा होती है, वहाँ भगवान की अनुभूति स्वयं होने लगती है।”
टिहरी गढ़वाल की पवित्र धरती सदियों से देवभूमि की आस्था, लोकविश्वास और साधना की परंपराओं को अपने हृदय में संजोए हुए है। इसी पावन भूमि के ग्राम गाफर में स्थित सिद्धपीठ भगवान श्री नागराजा का मंदिर 14 गावों के असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस पवित्र धाम की भक्ति-परंपरा को अपने जीवन से सींचने वाले एक ऐसे महान भक्त हुए—संत श्रीराम नौटियाल जी, जिनका जीवन त्याग, सेवा, साधना और भगवान श्री नागराजा के प्रति अटूट समर्पण की अनुपम गाथा है।
*जन्म से ही संस्कारों की नींव*
संत श्रीराम नौटियाल जी का जन्म वर्ष 1920 में ग्राम बन्स्यूल में हुआ था। उनके पिता श्री जगतराम नौटियाल तथा माता श्रीमती कलावती थीं। एक सामान्य ग्रामीण परिवार में जन्म लेने वाले श्रीराम जी ने जीवन के प्रारंभिक वर्षों में माता-पिता की सेवा और परिवार के प्रति अपने दायित्वों को पूरी निष्ठा से निभाया। उनके संस्कारों में सेवा, सरलता, विनम्रता और धार्मिक आस्था का गहरा प्रभाव था। युवावस्था में जब संसार अपने सुख और भविष्य की चिंता में व्यस्त रहता है, तब श्रीराम जी ने अपने माता-पिता की सेवा को ही जीवन का सबसे बड़ा धर्म माना। माता-पिता उनके लिए केवल जन्मदाता नहीं थे, बल्कि भगवान का दिया हुआ वह स्वरूप थे, जिसकी सेवा करना उनके लिए पूजा के समान था।
*गृहस्थ जीवन से वैराग्य की ओर*
समय बीतता गया। जीवन के एक पड़ाव पर उनके माता-पिता का स्वर्गवास हो गया। माता-पिता के जाने के बाद उनके जीवन में एक गहरा खालीपन आया। संसार के मोह-माया से उनका मन धीरे-धीरे विरक्त होने लगा। उन्होंने अपने जीवन को एक नई दिशा देने का निर्णय लिया। उन्होंने गृहस्थ जीवन का त्याग किया और भगवान की शरण में जाने का संकल्प लेकर ग्राम गाफर की ओर प्रस्थान किया। गाफर पहुँचकर उन्होंने स्वयं को सिद्धपीठ भगवान श्री नागराजा की भक्ति और सेवा में पूर्णतः समर्पित कर दिया, शायद यह केवल उनका गाफर पहुँचना नहीं था—यह उनके सांसारिक जीवन से आध्यात्मिक जीवन की ओर एक नई यात्रा का आरंभ था।
*गाफर में बनी छोटी-सी कुटिया, बन गई साधना की कुटिया*
उस समय गाफर तक पहुँचना आज की तरह सरल नहीं था। यातायात की सुविधाएँ नगण्य थीं, और मंदिर तक पहुँचने के लिए कठिन पहाड़ी रास्तों से होकर जाना पड़ता था। मंदिर परिसर में श्रीराम जी के रहने के लिए गाफर गाँव के निवासियों के सहयोग से एक छोटी-सी कुटिया बनाई गई। गाफर के नौटियाल, उनियाल और भट्ट परिवारों सहित अनेक ग्रामीणों ने उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखा। किसी ने वस्त्र दिए, किसी ने दैनिक उपयोग की वस्तुएँ, तो किसी ने भोजन की व्यवस्था में सहयोग किया। वह छोटी-सी कुटिया धीरे-धीरे केवल उनके रहने का स्थान नहीं रही। वह भक्ति का केंद्र बन गई। वहाँ से निकलने वाले भजनों के स्वर, मंदिर की घंटियों की ध्वनि और पूजा-पाठ की पवित्रता ने गाफर की पहाड़ियों को एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण प्रदान कर दिया।
*सेवा से शुरू होता था हर दिन*
संत श्रीराम जी की दिनचर्या अत्यंत सरल, अनुशासित और भगवान की सेवा को समर्पित थी। प्रातःकाल उठकर वे सबसे पहले मंदिर और मंदिर परिसर की सफाई करते। उसके बाद स्नान-ध्यान कर भगवान श्री नागराजा की पूजा-अर्चना में लीन हो जाते। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के साथ पूजा-पाठ, भजन और धार्मिक चर्चा करते। उनके लिए मंदिर की सफाई भी पूजा थी, दीप जलाना भी पूजा था, भजन गाना भी पूजा था और भक्तों की सेवा करना भी पूजा ही था। उनका जीवन जैसे एक ही उद्देश्य में समाहित हो गया था— “हर सांस भगवान के नाम और हर कर्म भगवान की सेवा।”
*दूर-दूर तक फैलने लगी भक्ति की ज्योति*
गाफर तक पहुँचने की कठिनाई के बावजूद संत श्रीराम जी ने कभी भक्तों की संख्या को अपनी साधना का आधार नहीं बनाया। वे दूर-दराज के ग्रामीणों तक संदेश पहुँचाते। लोगों को भगवान श्री नागराजा की पूजा-अर्चना, भजन, हवन और गीता पाठ के लिए प्रेरित करते। हर माह संक्रांति के अवसर पर तथा अन्य धार्मिक पर्वों पर धार्मिक आयोजन होने लगे। धीरे-धीरे आसपास के गाँवों के लोगों में गाफर नागराजा के प्रति आस्था का भाव बढ़ने लगा। खेती-बाड़ी और दैनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच ग्रामीण समय निकालकर गाफर पहुँचने लगे। किसी के पास साधन नहीं था, किसी के पास समय कम था, किसी के लिए रास्ता कठिन था—लेकिन श्रद्धा जब मन में होती है तो रास्तों की कठिनाई छोटी लगने लगती है, और यही हुआ। गाफर की कठिन चढ़ाई श्रद्धालुओं की आस्था के आगे छोटी पड़ने लगी।
*भक्तों में बस गए “संत जी”*
धीरे-धीरे भक्तों को संत श्रीराम जी की पूजा, भजन और धार्मिक कथाओं में आत्मीयता मिलने लगी। उनकी वाणी में सरलता थी, व्यवहार में अपनापन था और जीवन में दिखावा नहीं था। वे किसी भक्त से भेदभाव नहीं करते थे। दूर से आने वाला प्रत्येक व्यक्ति उनके लिए सम्मान का पात्र था। वे जानते थे कि कोई भक्त कई किलोमीटर की कठिन चढ़ाई चढ़कर भगवान के दर्शन के लिए आया है। इसलिए वे उससे प्रेमपूर्वक मिलते, उसकी थकान समझते और उसे आत्मीयता का अनुभव कराते। यही सरल व्यवहार भक्तों के हृदय में उनके लिए विशेष स्थान बनाने लगा। लोग उन्हें धीरे-धीरे “संत जी” कहकर पुकारने लगे। यह संबोधन किसी पद या उपाधि से नहीं मिला था। यह भक्तों के हृदय से निकला सम्मान था।
*भक्तों की सेवा में भगवान की अनुभूति*
समय के साथ धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ने लगी। भक्तजन अपने साथ भगवान के लिए भोग तथा अन्य श्रद्धालुओं के लिए भोजन सामग्री लेकर आने लगे। दूर-दराज से आने वाले थके-हारे भक्तों के लिए भोजन वितरण की व्यवस्था होने लगी। गाफर गाँव के निवासियों ने भी इस सेवा परंपरा में अपना योगदान दिया। स्थानीय ग्रामीण संत श्रीराम जी को कभी अकेला महसूस नहीं होने देते थे। आवश्यकता के अनुसार वस्त्र और अन्य उपयोगी सामग्री भेंट करते रहते। यह संबंध केवल संत और ग्रामीणों का नहीं था। यह एक परिवार जैसा संबंध बन चुका था। संत श्रीराम जी ने भी इस आत्मीयता का सम्मान किया और अपना जीवन भक्तों के बीच बिताया।
*अगाध भक्ति और नागराजा के दर्शन की लोकमान्यता*
संत श्रीराम जी की भक्ति दिन-प्रतिदिन गहरी होती गई, उनका मन संसार से हटकर पूर्णतः भगवान श्री नागराजा के चरणों में रम गया। स्थानीय श्रद्धा और जनश्रुति के अनुसार, उनकी इसी अगाध भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान श्री नागराजा उन्हें सर्प रूप में दर्शन देते थे। भक्तों के लिए यह प्रसंग आज भी गहरी आस्था और श्रद्धा का विषय है। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि जब मनुष्य की भक्ति निष्काम और अटूट हो जाती है, तो उसे अपने आराध्य की अनुभूति अपने ही भीतर होने लगती है।संत श्रीराम जी का जीवन इसी विश्वास का जीवंत उदाहरण माना जाता है।
*संत श्रीराम जी का मौन संदेश*
संत श्रीराम जी ने शायद कभी बड़े-बड़े उपदेश नहीं दिए होंगे, लेकिन उनका पूरा जीवन स्वयं एक उपदेश था। उन्होंने सिखाया— भक्ति करो, लेकिन अहंकार मत करो। भगवान को मानो, लेकिन भगवान के भक्तों से प्रेम करना मंदिर जाओ, तो केवल अपने लिए मत माँगो; समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रार्थना करो।कठिन रास्तों से घबराओ मत—क्योंकि आस्था के रास्ते पर उठाया गया हर कदम भगवान के और निकट ले जाता है।
*2003—एक संत का शरीर विदा हुआ* ।
वर्ष 2003 में संत श्रीराम नौटियाल जी ने अपनी अंतिम सांस ली। एक साधक की सांसें थम गईं, लेकिन उसकी साधना समाप्त नहीं हुई। एक संत की देह पंचतत्व में विलीन हो गई, लेकिन उसकी भक्ति की सुगंध गाफर की धरती पर आज भी महसूस की जाती है। उनके जाने के बाद भी भगवान श्री नागराजा की पूजा, भक्ति और सेवा की वह परंपरा चलती रही, जिसे उन्होंने अपने जीवन से मजबूत किया था। उन्होंने अपने पीछे धन-संपत्ति नहीं छोड़ी।उन्होंने छोड़ी—श्रद्धा की विरासत। सेवा की विरासत। भक्ति की विरासत और भगवान के प्रति अटूट विश्वास की विरासत।
*भव्य मंदिर निर्माण की ओर बढ़ते कदम*
समय के साथ भगवान श्री नागराजा के प्रति लोगों की आस्था और अधिक मजबूत होती गई। लगभग एक दशक पूर्व प्राथमिक विद्यालय लवाणी के अध्यापक एवं ग्राम जसपुर निवासी श्री शिवप्रकाश नौटियाल के प्रयासों तथा अनेक भक्तजनों के सहयोग से गाफर में भगवान श्री नागराजा के भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। इस पावन कार्य में गाफर, बन्स्यूल, मंजकोट, कस्तल, सैनसारी मल्ला एवं तल्ला, रमोल, खांड, नवागाँव, लवाणी, कांडासारी , पलेथ जसपुर , जौनपुर से भुईयांसारी और सिला भट्ट बेड़ी सहित अनेक गाँवों के श्रद्धालुओं ने सहयोग किया। मंदिर का निर्माण केवल एक भवन का निर्माण नहीं था। यह उन असंख्य लोगों की श्रद्धा का निर्माण था, जिन्होंने अपनी मेहनत, समय, संसाधन और भावनाएँ भगवान के चरणों में अर्पित कीं।
*नई पीढ़ी ने संभाली संत की विरासत*
संत श्रीराम जी की भक्ति और सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाने का दायित्व अब नई पीढ़ी ने अपने कंधों पर लिया।अक्टूबर 2023 में गाफर नागराजा मंदिर विकास समिति का गठन किया गया। समिति ने संत श्रीराम जी द्वारा छोड़े गए संदेशों और धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए संक्रांति भोग, पूजा-अर्चना, हवन, हरकुरू (भोग), पावन देवडोली की दिव्य यात्रा सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों को सुव्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने का प्रयास किया। मंदिर परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है, जिससे धार्मिक आस्था के साथ क्षेत्र की लोक-संस्कृति और परंपराओं को भी संरक्षण और नई पीढ़ी से जुड़ने का अवसर मिलता है।यह संत श्रीराम जी के उस सपने और संदेश की निरंतरता है, जिसमें भगवान की सेवा के साथ समाज को जोड़ने की भावना थी।
*आज भी जारी है गाफर की कठिन लेकिन पावन यात्रा*
आज समय बदल चुका है। गाँव में बिजली आ गई, पेयजल की सुविधाएँ बढ़ गई हैं। भले ही सड़क निर्माण की आस में 14 गांवों की जनता आज भी 4 किलोमीटर की खड़ी चढाई पार करने के बाद अपने आराध्य सिधपीठ भगवान् श्री गाफर नागराजा के मंदिर में पद यात्रा कर पहुँचते है, नई पीढ़ी आधुनिक जीवन की ओर बढ़ रही है। लेकिन भगवान श्री नागराजा के प्रति आस्था आज भी उतनी ही जीवंत दिखाई देती है, किसी के हाथ में पूजा की थाली होती है। किसी के कंधे पर भोग की सामग्री।किसी के मन में अपनी मनोकामना। और किसी के हृदय में केवल भगवान के दर्शन की इच्छा कठिन चढ़ाई के बीच जब मंदिर की घंटियों की आवाज सुनाई देने लगती है, तो मानो थके हुए कदमों में फिर से ऊर्जा आ जाती है। और मंदिर के दर्शन होते ही मन से एक ही स्वर निकलता है—“जय श्री नागराजा!”
*संत श्रीराम जी आज भी जीवित हैं* —अपनी भक्ति में
` , #11अंतिम_प्रार्थना11*
हे सिद्धपीठ भगवान श्री नागराजा! जिस पावन धरा पर संत श्रीराम नौटियाल जी ने अपना जीवन आपकी सेवा में समर्पित किया, उस धरा की पवित्रता सदैव बनी रहे। उनकी भक्ति की ज्योति कभी मंद न पड़े। उनके द्वारा स्थापित सेवा और श्रद्धा की परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचती रहे। गाफर नागराजा धाम श्रद्धालुओं की आस्था, प्रेम और एकता का केंद्र बना रहे। हर भक्त के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आए। हर परिवार में प्रेम बना रहे। हमारी नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, अपनी परंपराओं और अपनी देवभूमि की आस्था से जुड़ी रहे। और संत श्रीराम जी का वह सरल संदेश हमारे हृदय में सदैव जीवित रहे—.
“भगवान की सेवा से जुड़े रहो, भक्तों से प्रेम करो और श्रद्धा की राह पर चलते रहो।”
संत श्रीराम नौटियाल जी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए भक्ति, त्याग, सेवा और समर्पण की प्रेरणा बना रहे—इसी मंगलकामना के साथ उन्हें कोटि-कोटि नमन। जय सिद्धपीठ भगवान श्री नागराजा। संत श्रीराम नौटियाल जी को शत-शत नमन। गाफर नागराजा धाम की जय।
*शूरवीर कृति सिंह पंवार*
एवं प्रबंधक समिति
#गाफर_नागराजा_मंदिर_विकास_समिति (रजि.)*
कार्यालय : ग्राम गाफर, पोस्ट ऑफिस लवाणी, पट्टी नगुण,
जिला टिहरी गढ़वाल (उत्तराखंड) पिन कोड 249132
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