10/01/2026
🕉️ नंदा राजजात यात्रा का इतिहास
नंदा राजजात उत्तराखंड की सबसे प्राचीन, कठिन और पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक है। यह यात्रा देवी नंदा (पार्वती) को समर्पित है, जिन्हें कुमाऊँ–गढ़वाल क्षेत्र में हिमालय की लोकदेवी और कुलदेवी माना जाता है। यह यात्रा लगभग 12 वर्षों में एक बार आयोजित होती है और इसे हिमालय का कुम्भ भी कहा जाता है।
📜 पौराणिक पृष्ठभूमि
पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी नंदा को उनके मायके गढ़वाल से ससुराल (कैलाश पर्वत) विदा करने की परंपरा से नंदा राजजात जुड़ी है।
देवी नंदा को राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी माना जाता है।
लोकमान्यता है कि हर 12 वर्ष में देवी नंदा अपने मायके आती हैं और फिर भव्य यात्रा के साथ उन्हें कैलाश की ओर विदा किया जाता है।
इसी विदाई की स्मृति में यह कठिन पदयात्रा आयोजित होती है।
🏔️ ऐतिहासिक परंपरा और राजजात
“राजजात” शब्द का अर्थ है राजकीय यात्रा।
मान्यता है कि इस यात्रा की शुरुआत गढ़वाल के कत्यूरी राजाओं के काल में हुई।
बाद में चंद वंश और गढ़वाल नरेशों ने इस यात्रा को संरक्षण दिया।
यात्रा की परंपरा लगभग 1000 वर्षों से अधिक पुरानी मानी जाती है।
🐏 चार सींग वाला मेढ़ा (चौंसिंगा)
नंदा राजजात की सबसे अनोखी विशेषता है—
यात्रा के साथ चलने वाला चार सींग वाला मेढ़ा (चौंसिंगा)।
यह मेढ़ा देवी नंदा का प्रतीक माना जाता है।
यात्रा के अंत में यह मेढ़ा रूपकुंड के निकट अदृश्य हो जाता है, जिसे देवी की कैलाश-विदाई का संकेत माना जाता है।
🚶♂️ यात्रा मार्ग
नंदा राजजात यात्रा का प्रमुख मार्ग इस प्रकार है—
नौटी गाँव (चमोली) → कांसुवा → सेम → पातर नचौनी → रूपकुंड → होमकुंड
यह यात्रा लगभग 280–300 किलोमीटर लंबी होती है।
दुर्गम हिमालयी दर्रे, ग्लेशियर और ऊँचे पहाड़ी रास्ते इस यात्रा को अत्यंत कठिन बनाते हैं।
🧿 धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
यह यात्रा गढ़वाल और कुमाऊँ की साझा सांस्कृतिक विरासत है।
इसमें लोकनृत्य, लोकगीत, जागर, ढोल-दमाऊ और धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
हजारों श्रद्धालु, साधु-संत और ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सम्मिलित होते हैं।
🕰️ प्रमुख नंदा राजजात यात्राएँ
ऐतिहासिक रूप से प्रमुख यात्राएँ: 1905, 1929, 1953, 1976, 1987, 2000, 2014
अगली पूर्ण नंदा राजजात यात्रा अपेक्षानुसार 2026–2027 के आसपास मानी जाती है (पंचांग गणना पर निर्भर)।
🌸 निष्कर्ष
नंदा राजजात केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि हिमालयी समाज की आस्था, परंपरा और प्रकृति-पूजन का जीवंत प्रतीक है। यह यात्रा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, इतिहास और देवी-भक्ति की अद्भुत मिसाल है।