10/05/2026
जै भवानी
जै महादेव
उदयपुर से 22 किमी दूर कैलाशपुरी में मंदिर है।
भगवान शिव का रूप - एकलिंग जी।
मेवाड़ के आराध्य।
नियम 734 ई. से है:
मेवाड़ का असली राजा एकलिंग जी हैं।
सिसोदिया वंश का हर राणा सिर्फ "दीवान" है - सेवक, मैनेजर
राजतिलक के टाइम हर राणा बोलता है:
"माई-बाप एकलिंग जी, मैं आपका दीवान प्रताप सिंह। मेवाड़ आपकी अमानत है।"
ताज, छत्र, सिंहासन सब एकलिंग जी का। राणा सिर्फ चौकीदार।
इसीलिए मेवाड़ी कभी किसी इंसान के आगे नहीं झुकते थे
बोलते थे: "हमारा राजा तो कैलाशपुरी में बैठा है। दिल्ली वाला कौन?"
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हल्दीघाटी की हार के बाद - 1576
प्रताप जंगलों में थे। चेतक शहीद हो चुका था। झाला शहीद। फौज भूखी।
अकबर ने संदेश भेजा:
"प्रताप, संधि कर ले। तुझे 5 हजारी मनसब दूंगा। आधा मेवाड़ जागीर में।
बस एक बार आगरा आकर सिर झुका दे।"
दरबारी बोले: "अन्नदाता, मान जाओ। प्रजा दुखी है। घास की रोटी खा रहे हैं।"
प्रताप की रात काली थी।नींद नहीं आती थी।
एक रात चुपचाप घोड़े पर बैठे और निकल गए - अकेले।
कहां? एकलिंग जी के मंदिर।
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आधी रात, खाली मंदिर, राजा और दीवान
रात के 2 बजे।मंदिर के कपाट बंद। पुजारी सो चुके थे।
प्रताप मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गए।हथियार रख दिए। पगड़ी उतार दी।
आंख बंद की और एकलिंग जी से बात करने लगे
बोले:
"बापजी, थक गया हूं मैं।
आपने मेवाड़ दी थी रखने को। मैं रख नहीं पाया।
हल्दीघाटी हार गया। चेतक मरा। झाला मरा।
प्रजा भूखी है। कुंवरी घास की रोटी को रोती है।
अकबर बोल रहा है झुक जा।
आप ही बताओ बापजी... दीवान क्या करे?
अमानत लौटा दूं? संधि कर लूं?
या लड़ते-लड़ते यहीं मिट जाऊं?"
हवा सन्न थी , गहरा सन्नाटा
कहते हैं तभी मंदिर के गर्भगृह से आवाज आई - पुजारी की नहीं, पत्थर की नहीं..
"प्रताप... तू दीवान है या राजा?"
प्रताप चौंक कर बोले: "दीवान हूं बापजी।"
आवाज आई: "तो दीवान का काम क्या है? अमानत की रखवाली या मालिक से पूछे बिना सौदा कर देना?"
"मेवाड़ मेरी अमानत है। तेरे बाप-दादों ने वचन दिया था - शीश कटे पर धड़ लड़े।
जा, लड़। जब तक एक भी सिसोदिया जिंदा है, मेवाड़ मेरा है।
तू हार नहीं मानेगा तो मैं तुझे हारने नहीं दूंगा।"
प्रताप की आंख खुल गई। शरीर में बिजली दौड़ गई।
दंडवत किया। पगड़ी बांधी। तलवार उठाई।
बोले: "हुकुम बापजी। दीवान मरेगा, पर अमानत नहीं सौंपेगा।"
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उसके बाद क्या हुआ?
वही रात प्रताप ने कसम खाई
पत्तल में खाऊंगा, जब तक मेवाड़ वापस ना ले लूं।
बिस्तर पर नहीं सोऊंगा, घास पर सोऊंगा।
दाढ़ी नहीं कटाऊंगा, जब तक चित्तौड़ ना देख लूं।
श6 साल बाद दिवेर जीता।32 थाने वापस लिए।
हर जीत के बाद पहला काम:
लूट का माल, हाथी-घोड़े - सब लेकर एकलिंग जी के मंदिर जाता।
माथा टेककर बोलता: "बापजी, आपकी अमानत का एक टुकड़ा वापस ले आया। जमा कर लो।"
भामाशाह का सोना मिला तो पहले एकलिंग जी के मंदिर में रखा, फिर फौज बनाई।
मरते वक्त 1597 में बेटे अमर सिंह से बोले:
बेटा, राज तू नहीं करेगा, एकलिंग जी करेंगे। तू सिर्फ दीवान बनियो
जिस दिन राणा खुद को राजा समझ लेगा, मेवाड़ डूब जाएगा।"
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आज भी वही रिवाज है
उदयपुर के महाराणा आज भी "श्रीजी हुजूर" नहीं कहलाते।
कहलाते हैं: "श्री एकलिंग जी दीवान"।
राजतिलक एकलिंग जी के मंदिर में होता है। महल में नहीं।
दस्तखत में लिखते हैं: "एकलिंग जी रे दीवान"।
अकबर जिंदगी भर नहीं समझ पाया:*
"प्रताप के पास फौज नहीं, खजाना नहीं, किला नहीं... फिर भी झुकता क्यों नहीं?"
जवाब एकलिंग जी
जिसका राजा महादेव हो, वो दिल्ली के बादशाह से क्यों डरे?
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मेवाड़ का झंडा कभी नहीं झुका।*
क्योंकि वो झंडा एकलिंग जी का था, प्रताप का नहीं।
जय मेवाड़ 🚩🚩
जय एकलिंग जी 🚩🚩