03/09/2024
भारत और नेपाल की तथाकथित हिन्दू धार्मिक पहचान की आयु यद्यपि बहुत नहीं है लेकिन इस धर्म के आधार में मौजूद ब्राह्मणवाद बहुत पुरानी चीज है आर्य ब्राह्मणों के रूढ़िवादी आध्यात्मिक तंत्र को हिन्दू पहचान देने का श्रेय मुस्लिम विद्वानों ,और उनमें भी खास कर अल - बेरूनी को जाता है,उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ' अल - हिन्द ' लिखी जिसमें इस शब्द को गढ़ा और जिसे हिन्दू राजाओं और आध्यात्मिक ताकतों ने न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि अपना बना लिया, ‘ हिन्दू ' पद की उत्पत्ति भी धर्म के किसी पैगम्बर या उसकी किसी धार्मिक रचना से नहीं हुई जैसा कि हम ईसाई धर्म , बौद्ध या इस्लाम धर्म में देखते हैं ईसाई और बौद्ध धर्मों के नाम उनके महान पैगम्बरों ,ईसा मसीह और बुद्ध के नाम पर पड़े,इस्लाम का शाब्दिक अर्थ होता है ‘ ईश्वर की दुनिया 'मुस्लिमों को ' मोहमडन ' शब्द के माध्यम से भी जाना जाता है जो पुनः उनके पैगम्बर के नाम से सम्बद्ध है लेकिन ‘ हिन्दू धर्म ' नाम इस धर्म के अनुयायियों ने बाहर से ग्रहण किया,और इसका कारण रहा ब्राह्मण चिंतको की गैर - रचनात्मकता, यह मध्यकालीन मुस्लिम विद्वानों द्वारा दिया गया नाम है जो सिंध ( हिन्द ) के निवासियों को आदिकालीन बर्बरों के रूप में देखते थे और मानते थे कि उनमें सामाजिक -धार्मिक वयस्कता और सांगठनिकता का भारी अभाव है, मुस्लिम चिंतकों की यह सोच गलत नहीं थी क्योंकि ब्राह्मणों - विषयों की धार्मिक तथा बाजार ताकतों ने इस धर्म का निर्माण ही एक जाति - बोझिल ,रूढ़िवादी , अन्धविश्वासी और बर्बर धर्म के रूप में किया था, इसी कारण उन्होंने इसे नाम भी नकारात्मक भाव के साथ दिया,बावजूद इसके कि आर्य ब्राह्मण - चिंतकों ने इस नाम को सकारात्मक मान कर ग्रहण किया ,तो भी उन्होंने वर्ण
धार्मिक व्यवस्था के विज्ञानविरोधी तथा समानता - विरोधी तत्वों को बदलने की कभी कोशिस नहीं की ,जिसकी रचना खुद उनके अपने हाथों हुई थी,यहाँ तक कि आधुनिक समय में भी उनकी इच्छा इसी राह पर चलते रहने की है.
यह सच्चाई है कि अगर हिन्दू धर्म ने अपनी पहचान को भारतीय -उपमहाद्वीप की दलित बहुजन जनसंख्या के साथ नहीं जोड़े रखा होता तो अफगानिस्तान ,पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह यहाँ भी लोग सामूहिक रूप में इस्लाम की शरण में जा चुके होते, ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में जमने से बहुत पहले आये होते तो भारत में इवेंजेलिकल ईसाई ( जो धार्मिक कर्मकांडों से ज्यादा ईसा या बाइबिल पर विश्वास करते हैं ) मिशनरियों के आगमन के भी पहले यह हो गया होता ,इस्लाम की शरण में जाकर दलित - बहुजन समाज को तो सुकून ही मिलता ,क्योंकि न तो वहां मस्जिद में उनके साथ भेदभाव होता , न ही धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने से उन्हें रोका जाता लेकिन सन 1792 में विलियम केरे के भारत आगमन ने देश के इस्लामीकरण की प्रक्रिया को रोक दिया.
भारत के धार्मिक इतिहास में दूसरी बड़ी घटना इसके 150 वर्ष बाद घटित हुई जब डा. बी .आर . अम्बेडकर ने सन 1956 में नवयान बौद्ध धर्म की स्थापना की अफगानिस्तान ,पाकिस्तान और बांग्लादेश के इस्लामीकरण के बाद ,और केरे के ईसाईकरण और अम्बेडकर के बौद्ध हो जाने के बाद भी ,जो बड़ी जनसंख्या अभी भी हिन्दू धर्म के चंगुल में फंसी थी , वह शूद्रों और अन्य पिछड़े तबकों की थी, वे पिछड़े इसलिए थे क्योंकि वे किसी और लोकतांत्रिक धर्म के साथ नहीं गए थे,इसके चलते हुआ यह कि दूसरी सहस्राब्दी की सांध्य वेला में जब नयी सदी दुनिया के भूमंडलीकरण के साथ शुरू हो रही थी ,अपनी संख्या के आधार पर भारत का बहुमत - प्राप्त दलित - बहुजन समाज धार्मिक प्रतियोगिता के एक चौराहे पर खड़ा था ,यह वह युग है जो आध्यात्मिक संस्कृतियों के वैश्वीकरण के माध्यम से अध्यात्म के दरवाजों को भी खोलता है जिसमें भारत के दलित -बहुजन की मुक्ति की वास्तविक संभावनाएं भी निहित है,वह समुदाय जो अभी तक हिन्दू धर्म के जाति - संकुल कुँए में कैद पड़ा था,वे जाति के छोटे कुँए के मेढकों की तरह थे ,और यह कुआं हिन्दू धर्म के एक बड़े कुँए का हिस्सा था,अपनी आध्यात्मिक संस्कृति के अनुसार हिन्दु धर्म न तो अपने इस कुँए का पानी किसी के साथ बांटता था और न ही दूसरी जातियों को अपने साथ बैठने की अनुमति देता था ,लोगों को उनकी जातियों के कुओं में कैद जरूर रखता था.
भूमंडलीकरण की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया दलित - बहुजनों को अब इस कुँए से बाहर निकालने जा रही है,इससे या तो समाज के रूपांतरण की एक अहिंसक प्रक्रिया आरम्भ होगी या फिर कुछ समय बाद बाकायदा गृहयुद्ध होगा,भारतीय गृह युद्ध में जाति और धर्मों की भूमिका उससे बिलकुल अलग होगी जैसी अब तक के मानव - इतिहास में हमने देखी है-
हिंदुत्व मुक्त भारत-
कांचा इलैय्या
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