04/06/2026
रचना: षष्ठपीठाधीश्वर सोमयाजी गो. श्रीवल्लभरायजी महाराजश्री, सूरत
अधिक ज्येष्ठ शु. १, रविवार, वि. सं २०८३
राग-देवगंधार / बिलावल / सारंग / कन्हरा
अधिक की अधिक बधाई निजनकों
अधिक की अधिक बधाई ।।
अधिक प्रसन्न स्वयं पुरुषोत्तम
अधिक - भक्तजन मन हरखाई ।।१।।
श्रीकृष्णवल्लभ - यह मास कहावत
द्वादशमासनतें अधिकाई ॥
सकल वर्ष की सब निजलीला
अधिकमास में करत सदाई ॥२॥
अधिकमास की जो हरिलीला
युगलगीत में सो व्रजवधु गाई ।।
अधिक त्रयोदश युगल सों-बने-
आदि अन्त को जो श्लोक मिलाई ।।३।।
अधिकमास की आस करत जन
तीन बरस जे तप्त रहाई ।।
भक्त मनोरथपूरक हरि की हू
तिन हित आस रहत अधिकाई ।।४।।
भक्तनकों सुख दे सुख मानत
परम उदार गोवर्धनराई
भक्त हु सेवा सुख समर्पिके
सुख मानत - जय प्रेम सगाई ।।५।।
सेवा रीति प्रीति ब्रजजन की
अधिकमनोरथ में हू समाई ।।
‘विकृतबुद्धि’ विपरीत भावना
ग्रस्त रहत निंदत खिसियाई ।।६।।
भक्तिमारग में भगवद्विषयक
यदि न मनोरथ होत सदाई ।।
केसो भक्त? सो तो - ज्ञानी, योगी,
कर्मी, लौकिक, वा आसुरी कहाई ।।७।।
श्रुति सुमनोरथ संग रमणको
हरि, अनुमोदित सत्य कराई ।।
अविकृत सकल मनोरथ पूरत
निजसम्मत भक्तन प्रति घाई ।।८।।
श्रीमहाप्रभु श्रीगुसांई स्वगुरुकी
काऽनी तें सेवा करवाई ।।
हम सम तुच्छ जीवन प्रति हू प्रभु
भए देव दुर्लभ फलदाई ।।९।।
हरि की कृपातें हू अधिक गुरुकृपा
वल्लभ विठ्ठल सदा सहाई ।।
‘श्रीगोविन्ददयित वल्लभ’ मन
रहो चरण अधिकमें अधिकाई ।।१०।।
रचना: षष्ठपीठाधधीश्वर सोमयाजी गो. श्रीवल्लभरायजी महाराजश्री, सूरत...