श्रीवल्लभाचार्य षष्ठपीठ - ShriVallabhacharya Shashthapeeth

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श्रीवल्लभाचार्य षष्ठपीठ - ShriVallabhacharya Shashthapeeth Balakrishnalalji Mota Mandir is very well known religious center for Vaishnavas in Surat.

01/08/2026

"बहुरी एक समय श्रीगुसांईजी आप यशोदाघाट पर संध्यावंदन करत हुते..." आज प्रातः काल षष्ठपीठ प्रांगण में प्रवेश करते ही आपश्री के दर्शन हुए और वार्ता प्रसंग की यह पंक्तियों का स्मरण हुआ🙏🏻

શ્રીવિઠ્ઠલ કલ્પદ્રુમ ફળ્યો તેની શાખા પ્રસરી અનેક રે રસના....
નિત્ય પ્રતિ ક્ષણુ ક્ષણુ સમરીએ શ્રીવલ્લભનો પરિવાર રે રસના...

રે રસના....રે રસના....

29/07/2026
29/07/2026

सब धरती कागद करूँ
लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ
गुरु गुण लिखा न जाय॥

हमारे श्रीगुरु के गुणगान श्रवण कर भाग्यवान वैष्णव जन धन्य होवें।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर के निज वैष्णव जनों को आपश्री द्वारा श्रीमहाप्रभुजी के शुभाशीर्वाद।

श्रीगुरु के दिव्य अचिन्त्य माहात्म्य वर्णन सुनने का दुर्लभ अवसर। गुरु पूर्णिमा के दिन सायं ४:३० बजे से @षष्ठपीठ सूरत
28/07/2026

श्रीगुरु के दिव्य अचिन्त्य माहात्म्य वर्णन सुनने का दुर्लभ अवसर। गुरु पूर्णिमा के दिन सायं ४:३० बजे से @षष्ठपीठ सूरत

गायन सौं रति
16/06/2026

गायन सौं रति

गोधन पूजें गोधन गावें गोधन ही को माथों नावें। अधिक मास में आपश्री के तत्वावधान में गो पूजन।
15/06/2026

गोधन पूजें गोधन गावें गोधन ही को माथों नावें। अधिक मास में आपश्री के तत्वावधान में गो पूजन।

रचना: षष्ठपीठाधीश्वर सोमयाजी गो. श्रीवल्लभरायजी महाराजश्री, सूरतअधिक ज्येष्ठ शु. १, रविवार, वि. सं २०८३ राग-देवगंधार / ब...
04/06/2026

रचना: षष्ठपीठाधीश्वर सोमयाजी गो. श्रीवल्लभरायजी महाराजश्री, सूरत

अधिक ज्येष्ठ शु. १, रविवार, वि. सं २०८३
राग-देवगंधार / बिलावल / सारंग / कन्हरा

अधिक की अधिक बधाई निजनकों
अधिक की अधिक बधाई ।।
अधिक प्रसन्न स्वयं पुरुषोत्तम
अधिक - भक्तजन मन हरखाई ।।१।।

श्रीकृष्णवल्लभ - यह मास कहावत
द्वादशमासनतें अधिकाई ॥
सकल वर्ष की सब निजलीला
अधिकमास में करत सदाई ॥२॥

अधिकमास की जो हरिलीला
युगलगीत में सो व्रजवधु गाई ।।
अधिक त्रयोदश युगल सों-बने-
आदि अन्त को जो श्लोक मिलाई ।।३।।

अधिकमास की आस करत जन
तीन बरस जे तप्त रहाई ।।
भक्त मनोरथपूरक हरि की हू
तिन हित आस रहत अधिकाई ।।४।।

भक्तनकों सुख दे सुख मानत
परम उदार गोवर्धनराई
भक्त हु सेवा सुख समर्पिके
सुख मानत - जय प्रेम सगाई ।।५।।

सेवा रीति प्रीति ब्रजजन की
अधिकमनोरथ में हू समाई ।।
‘विकृतबुद्धि’ विपरीत भावना
ग्रस्त रहत निंदत खिसियाई ।।६।।

भक्तिमारग में भगवद्विषयक
यदि न मनोरथ होत सदाई ।।
केसो भक्त? सो तो - ज्ञानी, योगी,
कर्मी, लौकिक, वा आसुरी कहाई ।।७।।

श्रुति सुमनोरथ संग रमणको
हरि, अनुमोदित सत्य कराई ।।
अविकृत सकल मनोरथ पूरत
निजसम्मत भक्तन प्रति घाई ।।८।।

श्रीमहाप्रभु श्रीगुसांई स्वगुरुकी
काऽनी तें सेवा करवाई ।।
हम सम तुच्छ जीवन प्रति हू प्रभु
भए देव दुर्लभ फलदाई ।।९।।

हरि की कृपातें हू अधिक गुरुकृपा
वल्लभ विठ्ठल सदा सहाई ।।
‘श्रीगोविन्ददयित वल्लभ’ मन
रहो चरण अधिकमें अधिकाई ।।१०।।

रचना: षष्ठपीठाधधीश्वर सोमयाजी गो. श्रीवल्लभरायजी महाराजश्री, सूरत...

Address

10/137, Balakrishnalalji Mota Mandir, Chouta Bazar
Surat
395003

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