07/07/2026
अगर कोई शख्स झूठ बोलकर, धोखा देकर ज़मीन हड़पता है और फिर पुलिस को रिश्वत (पैसे) देकर मज़लूम और उसके घरवालों पर ज़ुल्म करता है, तो इस्लाम में इसका अंजाम और भी ज़्यादा भयानक है। इस सिलसिले में इस्लामी नज़रिए से चंद अहम बातें दर्ज़-ए-ज़ैल हैं:
झूठ और धोखा (Fraud): इस्लाम में झूठ बोलकर या धोखा देकर किसी का माल हासिल करना "हराम" है। रसूल-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमाया है कि जो धोखा दे, वो हम में से नहीं है। ऐसे शख्स का ये अमल शरीयत की नज़र में शैतान का रास्ता है।
रिश्वत (Bribery): पुलिस को पैसे देकर या किसी को रिश्वत देकर ना-हक काम करवाना और किसी मज़लूम को उसके हक से महरूम करना इस्लाम में सख्त गुनाह है। रिश्वत लेने और देने, दोनों पर अल्लाह की लानत (फटकार) है।
मज़लूम पर मज़ीद ज़ुल्म: जब कोई ज़ालिम ताक़त का गलत इस्तेमाल करके (जैसे पुलिस का डर दिखा कर) मज़लूम और उसके घरवालों को सताता है, तो वो "ज़ुल्म दर ज़ुल्म" का मुर्तकिब हो रहा है। इस्लाम में ऐसी हरकत करने वाला अल्लाह के ग़ज़ब (नाराज़गी) को दावत देता है।
आखिरत की पकड़: कयामत के दिन जब अदल-ओ-इंसाफ होगा, तो ये रिश्वत और ताक़त का इस्तेमाल ज़ालिम के लिए मुसीबत बन जाएगा। वहां कोई रिश्वत या दुनिया की पहुंच काम नहीं आएगी। ज़ालिम को मज़लूम के हुकूक अदा करने होंगे।
दुनिया में इंसाफ की कोशिश: इस्लाम में मज़लूम को ये इजाज़त दी गई है कि वो अपने हक के लिए कानूनी और जायज़ रास्ते अपनाए। अगर पुलिस गलत कर रही है, तो उसके ऊपर के अधिकारियों (ऑफिसर्स) से शिकायत करना या अदालत का दरवाज़ा खटखटाना एक ज़िम्मेदाराना अमल है।
इस्लाम की नज़र में:
ऐसा शख्स जो झूठ, धोखे, और रिश्वत का सहारा लेकर किसी के घर पर ज़ुल्म करता है, वो अपने ईमान का सौदा कर रहा है। इस्लाम में ऐसी कारकर्दगी को "फसाद-फिल-अर्ज़" (ज़मीन पर फ़ितना या फ़साद फैलाना) माना जाता है, जिसकी सज़ा दुनिया और आखिरत दोनों में बहुत भयानक है।
मज़लूम को चाहिए कि वो अल्लाह पर भरोसा रखे, सब्र से काम ले, और हर मुमकिन कानूनी रास्ता इख्तियार करे, क्योंकि अल्लाह ज़ुल्म करने वालों को कभी पसंद नहीं करता।