परमात्म-चिंतन

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26/05/2026

श्री गणेशाय नमः।

सभी स्नेहीजनों को पद्मिनी एकादशी       बुधवार २७ मई २०२६ की असीम एवं                हार्दिक शुभकामनाएं.....................
26/05/2026

सभी स्नेहीजनों को पद्मिनी एकादशी
बुधवार २७ मई २०२६ की असीम एवं
हार्दिक शुभकामनाएं...................!

एकादशी तिथि प्रारम्भ- २६ मई २०२६ को ०५:१० बजे।
एकादशी तिथि समाप्त- २७ मई २०२६ को ०६:२१ बजे।

अधिक मास या पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहते हैं। इसे कमला एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती की पूजा की जाती है। अन्य एकादशियों के समान ही इस वृत के विधि विधान हैं। इस वृत में दान का विशिष्ट महत्त्व है। इस दिन कांसे के पात्र में भोजन, मसूर की दाल, चना, कांदी, शहद, शाक, पराया अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस दिन नमक का प्रयोग भी न करें तथा कंदमूल फलादि का भोजन करें। अधिक मास की एकादशी अनेक पुण्यों को देने वाली है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। यह अनेक पापों को नष्ट करने वाली तथा मुक्ति और भक्ति प्रदान करने वाली है। इसके फल व गुणों को ध्यानपूर्वक सुनो-

दशमी के दिन व्रत शुरू करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: नित्यक्रिया से निवृत्त होकर पुण्य क्षेत्र में स्नान करने चले जाना चाहिए। उस समय गोबर, मृत्तिका, तिल, कुश तथा आमलकी चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। स्नान करने से पहले शरीर में मिट्टी लगाते हुए उसी से प्रार्थना करनी चाहिए- ‘हे मृत्तिके! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ। तुम्हारे स्पर्श से मेरा शरीर पवित्र हो। समस्त औषधियों से पैदा हुई और पृथ्वी को पवित्र करनेवाली, तुम मुझे शुद्ध करो। ब्रह्मा के थूक से पैदा होनेवाली! तुम मेरे शरीर को छूकर मुझे पवित्र करो। हे शंख चक्र गदाधारी देवों के देव! जगन्नाथ! आप मुझे स्नान के लिए आज्ञा दीजिये।

इसके उपरान्त वरुण मंत्र को जपकर पवित्र तीर्थों के अभाव में उनका स्मरण करते हुए किसी तालाब में स्नान करना चाहिए। स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ और सुन्दर वस्त्र धारण करके संध्या, तर्पण करके मंदिर में जाकर भगवान की धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, केसर आदि से पूजा करनी चाहिए। उसके उपरान्त भगवान के सम्मुख नृत्य गान आदि करें। भक्तजनों के साथ भगवान के सामने पुराण की कथा सुननी चाहिए। अधिक मास की शुक्लपक्ष की 'पद्मिनी एकादशी' का व्रत निर्जल करना चाहिए। यदि मनुष्य में निर्जल रहने की शक्ति न हो तो उसे जल पान या अल्पाहार से व्रत करना चाहिए। रात्रि में जागरण करके नाच और गान करके भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए। प्रति पहर मनुष्य को भगवान या महादेवजी की पूजा करनी चाहिए।

पहले पहर में भगवान को नारियल, दूसरे में बिल्वफल, तीसरे में सीताफल और चौथे में सुपारी, नारंगी अर्पण करना चाहिए । इससे पहले पहर में अग्नि होम का, दूसरे में वाजपेय यज्ञ का, तीसरे में अश्वमेध यज्ञ का और चौथे में राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। इस व्रत से बढ़कर संसार में कोई यज्ञ, तप, दान या पुण्य नहीं है। एकादशी का व्रत करने वाले मनुष्य को समस्त तीर्थों और यज्ञों का फल मिल जाता है। इस तरह से सूर्योदय तक जागरण करना चाहिए और स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए। इस प्रकार जो मनुष्य विधिपूर्वक भगवान की पूजा तथा व्रत करते हैं, उनका जन्म सफल होता है और वे इस लोक में अनेक सुखों को भोगकर अन्त में भगवान विष्णु के परम धाम को जाते हैं।

पद्मिनी एकादशी कथा-
अर्जुन ने कहा- हे भगवन् ! अब आप अधिक (लौंद/ मल/ पुरुषोत्तम) मास की शुक्लपक्ष की एकादशी के विषय में बतायें, उसका नाम क्या है तथा व्रत की विधि क्या है? इसमें किस देवता की पूजा की जाती है और इसके व्रत से क्या फल मिलता है?

श्रीकृष्ण बोले- हे पार्थ ! अधिक मास की एकादशी अनेक पुण्यों को देनेवाली है, उसका नाम ‘पद्मिनी’ है। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को जाता है। यह अनेक पापों को नष्ट करनेवाली तथा मुक्ति और भक्ति प्रदान करनेवाली है। इसके फल व गुणों को ध्यानपूर्वक सुनो-

दशमी के दिन व्रत शुरु करना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: नित्यक्रिया से निवृत्त होकर पुण्य क्षेत्र में स्नान करने चले जाना चाहिए। उस समय गोबर, मृत्तिका, तिल, कुश तथा आमलकी चूर्ण से विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए। स्नान करने से पहले शरीर में मिट्टी लगाते हुए उसीसे प्रार्थना करनी चाहिए- ‘हे मृत्तिके ! मैं तुमको नमस्कार करता हूँ। तुम्हारे स्पर्श से मेरा शरीर पवित्र हो। समस्त औषधियों से पैदा हुई और पृथ्वी को पवित्र करनेवाली, तुम मुझे शुद्ध करो । ब्रह्मा के थूक से पैदा होनेवाली ! तुम मेरे शरीर को छूकर मुझे पवित्र करो। हे शंख चक्र गदाधारी देवों के देव ! जगन्नाथ ! आप मुझे स्नान के लिए आज्ञा दीजिये।’

इसके उपरान्त वरुण मंत्र को जपकर पवित्र तीर्थों के अभाव में उनका स्मरण करते हुए किसी तालाब में स्नान करना चाहिए। स्नान करने के पश्चात् स्वच्छ और सुन्दर वस्त्र धारण करके संध्या, तर्पण करके मंदिर में जाकर भगवान की धूप, दीप, नैवेघ, पुष्प, केसर आदि से पूजा करनी चाहिए। उसके उपरान्त भगवान के सम्मुख नृत्य गान आदि करें।

भक्तजनों के साथ भगवान के सामने पुराण की कथा सुननी चाहिए। अधिक मास की शुक्लपक्ष की ‘पद्मिनी एकादशी’ का व्रत निर्जल करना चाहिए। यदि मनुष्य में निर्जल रहने की शक्ति न हो तो उसे जल पान या अल्पाहार से व्रत करना चाहिए। रात्रि में जागरण करके नाच और गान करके भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए। प्रति पहर मनुष्य को भगवान या महादेवजी की पूजा करनी चाहिए।

पहले पहर में भगवान को नारियल, दूसरे में बिल्वफल, तीसरे में सीताफल और चौथे में सुपारी, नारंगी अर्पण करना चाहिए। इससे पहले पहर में अग्नि होम का, दूसरे में वाजपेय यज्ञ का, तीसरे में अश्वमेघ यज्ञ का और चौथे में राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। इस व्रत से बढ़कर संसार में कोई यज्ञ, तप, दान या पुण्य नहीं है। एकादशी का व्रत करनेवाले मनुष्य को समस्त तीर्थों और यज्ञों का फल मिल जाता है।

इस तरह से सूर्योदय तक जागरण करना चाहिए और स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए। इस प्रकार जो मनुष्य विधिपूर्वक भगवान की पूजा तथा व्रत करते हैं, उनका जन्म सफल होता है और वे इस लोक में अनेक सुखों को भोगकर अन्त में भगवान विष्णु के परम धाम को जाते हैं। हे पार्थ ! मैंने तुम्हें एकादशी के व्रत का पूरा विधान बता दिया।

अब जो ‘पद्मिनी एकादशी’ का भक्तिपूर्वक व्रत कर चुके हैं, उनकी कथा कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। यह सुन्दर कथा पुलस्त्यजी ने नारदजी से कही थी-

एक समय कार्तवीर्य ने रावण को अपने बंदीगृह में बंद कर लिया। उसे मुनि पुलस्त्यजी ने कार्तवीर्य से विनय करके छुड़ाया। इस घटना को सुनकर नारदजी ने पुलस्त्यजी से पूछा- ‘हे महाराज ! उस मायावी रावण को, जिसने समस्त देवताओं सहित इन्द्र को जीत लिया, कार्तवीर्य ने किस प्रकार जीता, सो आप मुझे समझाइये।’

इस पर पुलस्त्यजी बोले- ‘हे नारदजी ! पहले कृतवीर्य नामक एक राजा राज्य करता था। उस राजा को सौ स्त्रियाँ थीं, उसमें से किसीको भी राज्यभार सँभालनेवाला योग्य पुत्र नहीं था। तब राजा ने आदरपूर्वक पण्डितों को बुलवाया और पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ किये, परन्तु सब असफल रहे। जिस प्रकार दु:खी मनुष्य को भोग नीरस मालूम पड़ते हैं, उसी प्रकार उसको भी अपना राज्य पुत्र बिना दुःखमय प्रतीत होता था। अन्त में वह तप के द्वारा ही सिद्धियों को प्राप्त जानकर तपस्या करने के लिए वन को चला गया। उसकी स्त्री भी (हरिश्चन्द्र की पुत्री प्रमदा) वस्त्रालंकारों को त्यागकर अपने पति के साथ गन्धमादन पर्वत पर चली गयी।

उस स्थान पर इन लोगों ने दस हजार वर्ष तक तपस्या की परन्तु सिद्धि प्राप्त न हो सकी। राजा के शरीर में केवल हड्डियाँ रह गयीं। यह देखकर प्रमदा ने विनयसहित महासती अनसूया से पूछा- मेरे पतिदेव को तपस्या करते हुए दस हजार वर्ष बीत गये, परन्तु अभी तक भगवान प्रसन्न नहीं हुए हैं, जिससे मुझे पुत्र प्राप्त हो। इसका क्या कारण है?

इस पर अनसूया बोली कि अधिक (लौंद/मल ) मास में जो कि छत्तीस महीने बाद आता है, उसमें दो एकादशी होती है। इसमें शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘पद्मिनी’ और कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘परमा’ है। उसके व्रत और जागरण करने से भगवान तुम्हें अवश्य ही पुत्र देंगे। इसके पश्चात् अनसूयाजी ने व्रत की विधि बतलायी। रानी ने अनसूया की बतलायी विधि के अनुसार एकादशी का व्रत और रात्रि में जागरण किया। इससे भगवान विष्णु उस पर बहुत प्रसन्न हुए और वरदान माँगने के लिए कहा।

रानी ने कहा- आप यह वरदान मेरे पति को दीजिये।
प्रमदा का वचन सुनकर भगवान विष्णु बोले- ‘हे प्रमदे ! मल मास (लौंद) मुझे बहुत प्रिय है। उसमें भी एकादशी तिथि मुझे सबसे अधिक प्रिय है। इस एकादशी का व्रत तथा रात्रि जागरण तुमने विधिपूर्वक किया, इसलिए मैं तुम पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’ इतना कहकर भगवान विष्णु राजा से बोले- ‘हे राजेन्द्र ! तुम अपनी इच्छा के अनुसार वर माँगो, क्योंकि तुम्हारी स्त्री ने मुझको प्रसन्न किया है।’

भगवान की मधुर वाणी सुनकर राजा बोला- ‘हे भगवन् ! आप मुझे सबसे श्रेष्ठ, सबके द्वारा पूजित तथा आपके अतिरिक्त देव दानव, मनुष्य आदि से अजेय उत्तम पुत्र दीजिये।’ भगवान तथास्तु कहकर अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वे दोनों अपने राज्य को वापस आ गये। उन्हीं के यहाँ कार्तवीर्य उत्पन्न हुए थे। वे भगवान के अतिरिक्त सबसे अजेय थे। इन्होंने रावण को जीत लिया था। यह सब ‘पद्मिनी’ के व्रत का प्रभाव था। इतना कहकर पुलस्त्यजी वहाँ से चले गये।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे पाण्डुनन्दन अर्जुन ! यह मैंने अधिक (लौंद/मल/पुरुषोत्तम) मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का व्रत कहा है। जो मनुष्य इस व्रत को करता है, वह विष्णुलोक को जाता है।

* भगवान् जगदीश जी की आरती *

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट
क्षण में दूर करे, ॐ जय...

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का
स्वामी दुख बिनसे मन का
सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का,
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी
तुम बिन और न दूजा, आश करूँ किसकी,
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतरयामी
स्वामी तुम अंतरयामी
परम ब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी,
तुम करुणा के सागर, तुम पालन करता
स्वामी तुम पालन करता
दीन दयालु कृपालु, कृपा करो भरता,
तुम हो एक अगोचर सबके प्राण पति
स्वामी सबके प्राण पति
किस विधि मिलूँ दयामी, तुमको मैं कुमति,
दीन बंधु दुख हरता, तुम रक्षक मेरे
स्वामी तुम रक्षक मेरे
करुणा हस्त बढ़ाओ, शरण पड़ूं मैं तेरे,
विषय विकार मिटावो पाप हरो देवा
स्वामी पाप हरो देवा
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ संतन की सेवा,
ॐ जय जगदीश हरे.....

।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।

।। संकटनाशन गणेश स्तोत्र ।।       (हिन्दी अर्थ सहित)संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ भगवान गणेश को अति प्रिय है। इसे करने से...
26/05/2026

।। संकटनाशन गणेश स्तोत्र ।।
(हिन्दी अर्थ सहित)

संकटनाशन गणेश स्तोत्र का पाठ भगवान गणेश को अति प्रिय है। इसे करने से सभी दु:खों का अंत होता है और बिगड़े काम भी बनने लगते हैं। यदि आप रोजाना नहीं कर सकते तो सिर्फ बुधवार के दिन ही इसे ११ बार पढ़ें। इस पाठ को पढ़ने से पूर्व भगवान गणेश जी को सिंदूर, घी का दीपक, अक्षत, पुष्प, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित करें। फिर मन में उनका ध्यान करने के बाद इस पाठ को पढ़ें। धन, पुत्र और मोक्ष की इच्छा रखने वाले को संकटनाशन गणेश स्तोत्र पाठ जरूर करना चाहिए। श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र का उल्लेख नारद पुराण में किया गया है। साथ ही गणेश पुराण में भी श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र का वर्णन मिलता है।

श्री संकटनाशन गणेश स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करने से जातक की हर मनोकामना पूर्ण होती है, मन को शांति मिलती है, आपके जीवन की सभी प्रकार के बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ धनी और समृद्ध बनाता है। इस स्तोत्र के नित्य पठन से छह महीने में मनुष्य को इच्छित फल की प्राप्ति होती है। विद्यार्थी को विद्या तथा धन की कामना रखने वाले को धन और पुत्र की कामना रखने वालों को पुत्र की प्राप्ति होती है। एक साल तक नियमित पाठ करने से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

नारद उवाच।
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये।।

पार्वती नंदन देव श्री गणेशजी को सिर झुकाकर प्रणाम करके अपनी आयु, कामना और अर्थ की सिद्धि के लिये उन भक्त निवास का नित्यप्रति स्मरण करे।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।

गणेश जी के पहला बारह नामों का जो पुरुष प्रात, मध्याह्न और सायंकाल पाठ करता है, उसे किसी प्रकार के विघ्न का भय नहीं रहता। बारह नामों का स्मरण करने से सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं। गणेश जी का नाम पहला वक्रतुण्ड (टेढ़ी सूंड वाले), दूसरा एकदन्त (एक दांत वाले), तीसरा कृष्णपिङ्गाक्ष (काली और भूरी आंखों वाले), चौथा गजवक्त्र (हाथी के समान मुख वाले), पांचवां लम्बोदर (बड़े पेट वाले), छठा विकट (विकराल), सातवां विघ्नराजेन्द्र (विघ्नों का शासन करने वाले राजाधिराज), आठवां धूम्रवर्ण (धूसर वर्ण वाले), नवाँ भालचन्द्र (जिसके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है), दसवां विनायक, ग्यारहवां गणपति और बारहवां गजानन है।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम्।।

इससे विद्या भिलाषी विद्या, धनाभिलाषी धन, पुत्रेच्छु पुत्र तथा मुमुक्षु मोक्ष गति प्राप्त कर लेता है।

जपेद् गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः।।

जो इस गणपति स्तोत्र का जाप करता है, उसे छः मास में इच्छित फल प्राप्त हो जाता है तथा एक वर्ष में पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः।।

जो पुरुष इसे लिख कर आठ ब्राह्मणों को समर्पण करता है, गणेशजी की कृपा से उसे सब प्रकार की विद्या प्राप्त हो जाती है।

।। श्री गणेशाय नमः ।।

।। भगवान गणेश का स्वरूप ।।सभी देवों में अग्रपूज्य गणेश जी का स्वरूप बड़ा ही अनुपम और अनेक सीखों से भरा है। भगवान गणेश पर...
26/05/2026

।। भगवान गणेश का स्वरूप ।।

सभी देवों में अग्रपूज्य गणेश जी का स्वरूप बड़ा ही अनुपम और अनेक सीखों से भरा है। भगवान गणेश पर हाथी का मस्तक विराजमान है। हाथी हमेशा अपने सामने वाली वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप से दुगुना बड़ा देखता है। अर्थात गणेश भगवान सबको अति सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखते हैं। भगवान गणेश के बड़े बड़े कान हमें संकेत करते हैं कि हमेशा बड़ा अथवा श्रेष्ठ सुना करो। व्यर्थ के वाद विवाद में अपने अमूल्य समय को नष्ट मत करो।

भगवान गणेश को लम्बोदर भी कहा जाता है। अर्थात जीवन के भले - बुरे, खट्टे- मीठे और अनुकूल - प्रतिकूल सभी बातों अथवा सभी अनुभवों को अपने पेट में रखने अथवा पचाना सीखो। विशाल देह होने के बाद भी गणेश जी मूषक की सवारी करते हैं। अर्थात् आप कितने भी वैभवशाली क्यों ना हो जाओ पर आपके भीतर अहमता का भार शून्य होना चाहिए।

दूसरों को सम्मान देने की कला, सदैव उच्च विचारों के चिंतन और मनन की कला, अनुकूलता - प्रतिकूलता सभी परिस्थितियों में समदृष्टि रखने की कला और अपने आप को सदैव विनम्र और शिष्ट रखने की कला मनुष्य को अग्रपूज्य बना देती है, यही तो गणेश जी महाराज के स्वरूप का संदेश है।

।। जय भगवान श्री गणेश जी ।।

।। श्री गणेश कवचम् ।।   (हिंदी अर्थ सहित)कवच एक प्रकार का अदृश्य सुरक्षा चक्र होता है जो मनुष्य को सभी प्रकार के यंत्र त...
26/05/2026

।। श्री गणेश कवचम् ।।
(हिंदी अर्थ सहित)

कवच एक प्रकार का अदृश्य सुरक्षा चक्र होता है जो मनुष्य को सभी प्रकार के यंत्र तंत्र मंत्र से सुरक्षा प्रदान करता है। कवच बनाने से यह लाभ होता है, जब हम किसी देव विशेष की पूजा और मन्त्र का जाप करते हैं तो मन में उसी देव का विचार होना चाहिए, मन विचलित नहीं होना चाहिए।

गौरी उवाच-
एषोऽतिचपलो दैत्यान्बाल्येऽपि नाशयत्यहो।
अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम।।१।।

पार्वती जी बोलीं- हे ऋषि श्रेष्ठ (मरीचि मुनि)
हमारा पुत्र गणेश अत्यधिक चप्पल हो गया है बचपन से इन्होंने दुष्ट व्यक्तियों को मारा है और आश्चर्यचकित कार्य कर दिखाए हैं इससे आगे क्या होगा मुझे मालूम नहीं है।

दैत्या नानाविधा दुष्टा: साधुदेवद्रुह: खला:।
अतोऽस्य कण्ठे किंचित्त्वं रक्षार्थं बद्धुमर्हसि।।२।।

नकारात्मक प्रवृत्तियों वाले व्यक्तियों से बचने के लिए बाल गणेश के गले में ताबीज आदि बांधने के विषय में कहो।

ऋषि उवाच-
ध्यायेत्सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहुमाद्यं युगे
त्रेतायां तु मयूरवाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम्।
द्वापरे तु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम्
तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरूचिरं सर्वार्थदं सर्वदा।।३।।

ऋषि बोले- सतयुग में दस हाथ धारण करके सिंह पर सवार होने वाले विनायक जी का ध्यान करें। त्रेता युग में छः हाथ धारण करके व मयूर की सवारी करने वाले, द्वापर युग में चार भुजावाले, नाव में अवतरित रक्तवर्ण गजानन का ध्यान करें तथा कलयुग में दो हाथ व सुंदर श्वेत स्वरूप धारण करके अवतार लेने वाले और अपने भक्तों को सभी प्रकार के सुख देने वाले गणेश जी का ध्यान करें।

विनायक: शिखां पातु परमात्मा परात्पर:।
अतिसुंदरकायस्तु मस्तकं सुमहोत्कट:।।४।।

परमात्मा विनायक आप शिखा स्थान में हमारी रक्षा करें। अतिशय सुंदर शरीर वाले अत्यंत समर्थवान गणेश जी मस्तक में रक्षा करें।

ललाटं कश्यप: पातु भ्रूयुगं तु महोदर:।
नयने भालचन्द्रस्तु गजास्यस्तवोष्ठपल्लवौ।।५।।

कश्यप के पुत्र गणेश ललाट में हमारी रक्षा करें, विशाल उधर वाले गणेश जी हमारी भोहों में रक्षा करें। भालचंद्र गणेश जी हमारी आंखों की रक्षा करें और गज बदन गणेश मुख्य की एवं दोनों होठों की रक्षा करें।

जिह्वां पातु गणाक्रीडश्रिचबुकं गिरिजासुत:।
पादं विनायक: पातु दन्तान् रक्षतु दुर्मुख:।।६।।

शिवगणों में बराबर क्रीड़ा करने वाले गणेश जी हमारे ठोडी की रक्षा करें, गिरिजेश पुत्र गणेश जी हमारे तालु की रक्षा करें, विनायक हमारी वाणी की रक्षा करें और विघ्नहर्ता गणेश जी दांतो की रक्षा करें।

श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थद:।
गणेशस्तु मुखं कंठं पातु देवो गणञज्य:।।७।।

हाथों के मध्य पाश धारण करने वाले गणेश जी दोनों कानों की रक्षा करें, मनोवांछित फल देने वाले गणेश जी नाक की रक्षा करें। गणों के अधिपति गणेश जी हमारे मुख एवं गले की रक्षा करें।

स्कंधौ पातु गजस्कन्ध: स्तनौ विघ्नविनाशन:।
ह्रदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान्।।८।।

गजस्कंध गणेश जी स्कंधों की रक्षा करें। विघ्नों के विनाशक गणेश जी हमारे स्तनों की रक्षा करें। गणनाथ गणेश हमारे हृदय की रक्षा करें और परम श्रेष्ठ हेरम्ब हमारे पेट की रक्षा करें।

धराधरऔर: पातु पाश्र्वौ पृष्ठं विघ्नहर: शुभ:।
लिंगं गुज्झं सदा पातु वक्रतुन्ड़ो महाबल:।।९।।

धरणीधर गणेश जी हमारे दोनों बांहों की रक्षा करें। सर्वमंगल व विघ्नहर्ता गणेश जी आप हमारे पीठ की रक्षा करें। वक्रतुंड और महा सामर्थवान गणेश जी हमारे लिंग व गुह्म की रक्षा करें।

गणाक्रीडो जानुजंघे ऊरू मंगलमूर्तिमान्।
एकदंतो महाबुद्धि: पादौ गुल्फौ सदाऽवतु।।१०।।

गणक्रीडा नाम धारण करने वाले गणेश जी आप हमारे दोनों घुटनों के जांघों की रक्षा करें। मंगलमूर्ति दोनों ऊरू की रक्षा करें। एकदंत गणेश जी आप हमारे दोनों पांव और महाबुद्धि वाले गणेश जी हमारे गुल्फों की रक्षा करें।

क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरक:।
अंगुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशन।।११।।

शीघ्र प्रसन्न होने वाले गणेश जी दोनों बाहुओं की रक्षा करें, भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले हमारे हाथों की रक्षा करें। हाथों में पदम धारण करने वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले गणेश जी आप हमारी उंगलियों तथा नाखूनों की रक्षा करें।

सर्वांगनि मयूरेशो विश्र्वव्यापी सदाऽवतु।
अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतु: सदाऽवतु।।१२।।

संपूर्ण विश्वव्यापी मयूरेश सर्वांगों अर्थात सभी अंगों की रक्षा करें। जो स्थान स्त्रोत में नहीं कहे गए हो उनकी रक्षा धूम्रकेतु नामक गणेश जी महाराज करें।

आमोदस्त्वग्रत: पातु प्रमोद: पृष्ठतोऽवतु।
प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायक:।।१३।।

प्रसन्नचित्त नाव में विचरण करने वाले गणेश जी बाजूओं के पीछे की रक्षा करें और बाजुओं के आगे की रक्षा करें, बुद्धि के अधिपति पूर्व दिशा में हमारी रक्षा करें तथा सिद्धिदायक आग्नेय दिशा में हमारी रक्षा करें।

दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैर्ऋत्यां तु गणेश्वर:।
प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजगर्णक:।।१४।।

उमा के पुत्र गणेश जी दक्षिण दिशा में हमारी रक्षा करें, गणों के अधिपति नेत्रत्य दिशा में हमारी रक्षा करें। विघ्नहर्ता गणेश जी पश्चिम दिशा में हमारी रक्षा करें और गजकर्ण वायव्य दिशा में हमारी रक्षा करें।

कौबेर्यां निधिप: पायादीशान्यामीशनन्दन:।
दिवोऽव्यादेलनन्दस्तु रात्रौ संध्यासु विघ्नह्रत्।।१५।।

निधि में अधिपति गणेश जी उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करें। शिवपुत्र गणेश जी ईशान दिशा में हमारी रक्षा करें, एकदंत गणेश जी आप दिन में हमारी रक्षा करें। विघ्नहर्ता रात्रि व संध्याकाल में हमारी रक्षा करें।

राक्षसासुरवेतालग्रहभूतपिशाचत:।
पाशांकुशधर: पातु रज:सत्त्वतम:स्मृति:।।१६।।

पाश अंकुश धारण करने वाले व सत रज तम तीन गुणों से जाने जाने वाले गणेश जी आप राक्षस, दैत्य, वैताल, ग्रह, भूत पिशाच आदि से हमारी रक्षा करें।

ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मीं च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम्।
वपुर्धनं च धान्यश्र्च ग्रहदारान्सुतान्सखीन्।।१७।।

ज्ञान, धर्म, लज्जा, कीर्ति, कुल, शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्रों की रक्षा करें।

सर्वायुधधर: पौत्रान्मयूरेशोऽवतात्सदा।
कपिलोऽजाबिकं पातु गजाश्रवान्विकटोऽवतु।।१८।।

सर्व आयुध धारण करने वाले गणेश जी पोत्रों की रक्षा करें। कपिल नाम गणेश बकरी, गाय आदि की रक्षा करें। हाथी घोड़ों की रक्षा विकट नाम के गणेश जी करें।

भूर्जपत्रे लिखित्वेदं य: कण्ठेधारयेत्सुधी:।
न भयं जायते तस्य यक्षरक्ष:पिशाचत:।।१९।।

जो उत्कृष्ट बुद्धिमान मनुष्य इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर गले में धारण करता है। उसके सामने कभी यक्ष राक्षस व पिशाच नहीं आते।

फलश्रुति-
त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसारतनुर्भवेत्।
यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत्।।२०।।

जो कोई प्रातः दोपहर व संध्याकाल तीनों काल में कवच स्त्रोत का पाठ करता है तथा विधि पूर्वक जब करता है उसका शरीर वज्र जैसा कठोर बन जाता है। जो कोई यात्रा के समय इसका पाठ करता है उसकी यात्रा सफल होती है, बिना विघ्न के उसे अच्छा फल मिलता है।

युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम्।
मारणोच्चटनाकर्षस्तंभमोहनकर्मणि।।२१।।

युद्ध के समय वीर पुरुष इस कवच को पढ़ने से शत्रु पर विजय पता है। मारण, उच्चाटन, आकर्षण, स्तंभन व मोहन ऐसी क्रिया करते हैं जिससे शत्रु पर विजय प्राप्त होती है।

सप्तवारं जपेदेतद्दिननामेकविशतिम।
तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशय:।।२२।।

जो कोई प्रतिदिन सात बार इसका पाठ करता है या इक्कीसवे दिन इस कवच का पाठ करने से साधक को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि य:।
काराग्रहगतं सद्यो राज्ञा वध्यं च मोचयेत्।।२३।।

जो कोई प्रतिदिन इक्कीस बार के नियम से इक्कीस दिन लगातार इसका पाठ करता है तो वह कारागृह एवं राज बंधन से मुक्त हो जाता है।

राजदर्शनवेलायां पठेदेतत्तत्त्रिवारत:।
स राजानं वशं नीत्वा प्रक्रतीश्र्च सभां जयेत्।।२४।।

राजा के दर्शन के समय जो कोई पुरुष इस कवच को तीन बार पाठ करें तो निश्चित ही वह राजा को वश में करके राज सभा में विजय व सम्मान प्राप्त करता है।

इदं गणेशकवचं कश्यपेन समीरितम्।
मुद्गलाय च तेनाथ मांडव्याय महर्षये।।२५।।

मरीच ऋषि पार्वती से बोले कि यह गणेश कवच कश्यप जी ने मुद्गल ऋषि को सुनाया तथा मुद्गल ऋषि ने मांडव्य ऋषि को सुनाया।

मज्झं स प्राह कृपया कवचं सर्वसिद्धिदम्।
न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम्।।२६।।

मांडव्य ऋषि ने सर्वसिद्धि देने वाली यह कवच पाठ मुझे पढ़ाया, हे देवी इसे भक्तिहीन मनुष्य को नहीं देना चाहिए। श्रद्धावान मनुष्य को यह कवच पाठ देना लाभदायक होता है।

अनेनास्य कृता रक्षा न बाधाऽस्य भवेत्कचित्।
राक्षसासुरवेतालदैत्यदानवसंभवा।।२७।।

हे देवी इस गणेश कवच के पाठ से बाल गणेश की रक्षा होगी। हमारे शत्रु, राक्षस, दैत्य, दानव, असुर से कोई भय नहीं रहेगा। यह सुनिश्चित समझो।

।। इति श्री गणेश पुराणे गणेशकवचं सम्पूर्णम् ।।

।। ईश्वर का स्वरूप ।।ईश्वर एक है या अनेक ! वह साकार है या निराकार ! इस विषय के क्रम में निवेदन है कि- ईश्वर एक है और वह ...
26/05/2026

।। ईश्वर का स्वरूप ।।

ईश्वर एक है या अनेक ! वह साकार है या निराकार ! इस विषय के क्रम में निवेदन है कि- ईश्वर एक है और वह निराकार है। 'एकम् ब्रह्म, द्वितीय नास्ते, नेह-नये नास्ते, नास्ते किंचन' अर्थात ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है, नहीं है, नहीं है, जरा भी नहीं है।
(ब्रह्म सूत्र)

ईश्वर के प्रतिनिधि देवी, देवता और भगवान हैं। देवताओं की मुख्‍य संख्‍या ३३ बताई गई है, लेकिन उनके गण सैकड़ों हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम और कृष्ण आदि देवता नहीं हैं, ये सभी भगवान हैं।

ईश्वर और भगवान शब्द का अर्थ अलग-अलग है। ईश्वर को परमेश्वर, ब्रह्म, परमात्मा और सच्चिदानंद कहा गया है।

ईश्वर की पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। वैसे सभी तरह की पूजा ईश्वर के निमित्त ही होती है। मंदिर, देवालय, द्वारा और शिवालय ये सभी अलग-अलग होते हैं, लेकिन आजकल सभी को मंदिर माना जाता है।

देवालय किसी देवता का, शिवालय शिव का और द्वारा ‍किसी गुरु का होता है। मंदिर तो परमेश्वर के प्रर्थना करने का स्थान है।

मंदिर में जाकर भी निराकार ईश्वर के प्रति संध्या वंदन की जाती है। संध्या वंदन के समय किसी भी स्थान पर बैठक संध्या की जा सकती है।

आठ प्रहर की संध्या में दो वक्त की संध्या महत्वपूर्ण होती है। वारों में रविवार और गुरुवार की संध्या का महत्व होता है।

ईश्वर की परिभाषा में- ईश्वर न तो भगवान है, न देवता, न दानव और न ही प्रकृति या उसकी अन्य कोई शक्ति। ‍ईश्वर एक ही है, अलग-अलग नहीं। ईश्वर अजन्मा है।

जिन्होंने जन्म लिया है और जो मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं या फिर अजर-अमर हो गए हैं, वे सभी ईश्वर नहीं हैं। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी ईश्वर नहीं है। ईश्वर या परब्रह्म को पुराणों में काल और सदाशिव के नाम से जाना गया है।

ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं- 'न तस्य प्रतिमा अस्ति' अर्थात उसकी कोई मूर्ति (पिक्चर, फोटो, छवि, मूर्ति आदि) नहीं हो सकती। 'न सम्द्रसे तिस्थति रूपम् अस्य, न कक्सुसा पश्यति कस कनैनम' अर्थात उसे कोई देख नहीं सकता, उसको किसी की भी आंखों से देखा नहीं जा सकता।
(छांदोग्य और श्वेताश्वेतारा उपनिषद। यजुर्वेद का ३२वां अध्याय)

हालांकि इसका एक अर्थ यह भी निकाला जाता है कि उसके जैसी किसी ओर की प्रतिमा नहीं। अर्थात उसकी प्रतिमा अद्वितीय है।

यजुर्वेद के ३२वें अध्याय में कहा गया है कि-

न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महाद्यश:।
हिरण्यगर्भस इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान जात: इत्येष:।।

अर्थात, जिस परमात्मा की हिरण्यगर्भ, मा मा और यस्मान जात आदि मंत्रों से महिमा की गई है उस परमात्मा (आत्मा) का कोई प्रतिमान नहीं।

निराकार है ईश्वर-
'जिसे कोई नेत्रों से भी नहीं देख सकता, परंतु जिसके द्वारा नेत्रों को दर्शन शक्ति प्राप्त होती है, तू उसे ही ईश्वर जान। नेत्रों द्वारा दिखाई देने वाले जिस तत्व की मनुष्य उपासना करते हैं, वह ईश्‍वर नहीं है।

जिनके शब्द को कानों द्वारा कोई सुन नहीं सकता किंतु जिनसे इन कानों को सुनने की क्षमता प्राप्त होती है उसी को तू ईश्वर समझ। परंतु कानों द्वारा सुने जाने वाले जिस तत्व की उपासना की जाती है, वह ईश्वर नहीं है।

जो प्राण के द्वारा प्रेरित नहीं होता किंतु जिससे प्राणशक्ति प्रेरणा प्राप्त करता है उसे तू ईश्‍वर जान। प्राणशक्ति से चेष्टावान हुए जिन तत्वों की उपासना की जाती है, वह ईश्वर नहीं है।'
(केनोपनिषद- ४, ५, ६, ७, ८)

।। नमो राघवाय ।।

।। श्री परमात्मने नमः ।।परमात्मा सब तरफ छाया है... भीतर भी वही है, बाहर भी वही है। जहां देखो, वहीं- वही है। सब तरफ उसका ...
26/05/2026

।। श्री परमात्मने नमः ।।

परमात्मा सब तरफ छाया है... भीतर भी वही है, बाहर भी वही है। जहां देखो, वहीं- वही है। सब तरफ उसका नूर है, उसकी रोशनी है। यहां कैसी उदासी है ? यहां कैसे गंभीर बने बैठे हो? थिरकने दो पैरों को, पड़ने दो थाप तबलों पर! मृदंग बजने दो। नाचो, गाओ, गुनगुनाओ।

'खाइए-पीजिए, मिलैं सो पहरिए।’

एक पादरी के पास एक तोता था और उसे बोलना सिखाने के हर संभव प्रयत्न और प्रयास के बाद भी वह तोता चुप ही रहा। इस बात का जिक्र पादरी ने एक दिन एक वृद्धा से किया, जो उससे मिलने के लिए आई थी। उस वृद्धा को कुछ दिलचस्पी हुई इस बात में और उसने तुरंत कहा- ‘मेरे पास भी एक तोता है जो कि बोलता नहीं। यह अच्छा रहेगा यदि हम इन दोनों पक्षियों को साथ-साथ रख दें और फिर देखे कि क्या होता है।

और फिर उन दोनों ने ऐसा ही किया। दोनों तोतो को एक बड़े पिंजड़े में रख दिया गया, और दोनों कुछ दूरी पर जाकर बैठ गए जहां से वह उनकी बात को सुन सकें। शुरू में तो कुछ देर शांति छाई रही, उसके बाद कुछ पंख पड़फड़ाने की आवाज आई, और फिर वृद्ध महिला के तोते को कहते सुना गया, ‘कुछ थोड़ा सा प्रेम-श्रेम के विषय में क्या इरादा है, प्रिय आपका? जिसके उत्तर में पादरी के तोते ने कहा, ‘इसी सबके लिए तो मैं वर्षों से मौन प्रतीक्षा और प्रार्थना करता आया हूं- आज मेरा सपना पूरा हुआ। आज मैं बोल सकता हूं।’

जब कोई सपना नहीं होता, तब हमारा मन स्फटिक परदर्शी होता है, हमारी आंखें निर्मल हाती है, तभी संबोधि का कमल खिलता है।

।। श्री राम परमात्मने नमः ।।

।। दरद की मारी बन बन डोलूं, बैद मिल्या नहिं कोय ।।वैद्य मिल भी नहीं सकता। यह बीमारी ऐसी नहीं कि जिसकी चिकित्सा हो जाए। य...
26/05/2026

।। दरद की मारी बन बन डोलूं, बैद मिल्या नहिं कोय ।।

वैद्य मिल भी नहीं सकता। यह बीमारी ऐसी नहीं कि जिसकी चिकित्सा हो जाए। यह तो परम वैद्य मिलेगा, तो ही बीमारी जाएगी।

दरद की मारी बन बन डोलूं…

मीरा कहती है- घूमती हूं- इस कोने से उस कोने, इस नगर से उस नगर, इस वन से उस वन। पुकारती फिरती हूं। सब तरफ आवाज देती हूं। सब द्वार खटखटाती हूं- इस मंदिर के, उस मंदिर के- लेकिन कहीं कोई वैद्य नहीं मिलता। कहीं कोई नहीं मिलता जो इस बाण को खींच ले, घाव को भर दे। नहीं कोई वैद्य मिल सकता। और अच्छा ही है कि वैद्य नहीं मिल सकता। उस वैद्य का उपाय ही नहीं किया है परमात्मा ने। जिसको भक्ति का घाव लगा, वह फिर भरने वाला नहीं है; वह बढ़ता ही चला जाता है।

भक्त एक दिन पूरा का पूरा घाव हो जाता है, पूरा प्यास हो जाता है। उस दिन मिलन है। उसके पहले मिलन नहीं। यह कीमत चुकानी पड़ती है।

मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जब बैद सांवलिया होय।

यह पीड़ा तो तभी मिटेगी जब सांवलिया खुद वैद्य होकर आएगा, खुद प्रियतम वैद्य होगा। खुद परमात्मा ही जब हाथ रखेगा इस घाव पर, तभी यह भरेगा। किसी और हाथ से भर नहीं सकता। किसी और हाथ से भरे जाने की इच्छा भी नहीं है, संभावना भी नहीं है।

भक्त कहना भी नहीं चाहता और कभी कह उठता है, तो सिर्फ भीतर की आह के कारण। दर्द ही बोलता है। इसलिए। ये गीत मीरा ने गाए, ऐसा मत समझना, अन्यथा भूल हो जाएगी। वह जो मीरा का घाव है हरा, उसने गाए हैं। अन्यथा मीरा चुप रहती। कहने को क्या था? कहना किससे था? जिससे कहना था, उससे शब्दों में कहने की कोई जरूरत नहीं। और जिनकी समझ में शब्द आते हैं, उनसे कहने का कोई सार नहीं, क्योंकि वे समझ न सकेंगे।

घायल की गति घायल जाणे।

फिर भी मीरा रो रही है। ये कहे गए हैं शब्द। ये अनायास प्रकट हुए हैं। ये गहन पीड़ा से निकले हैं। इनको मीरा रोक नहीं सकी। जैसे घाव से खून बह गया है, ऐसे ये शब्द बहे हैं।

मिलन बहुत प्यारा है! विरह बहुत खारा है! और जिसने विरह के खारेपन को न सहा, उसे मिलन की मिठास भी नहीं मिलेगी। मिलन तो सभी चाहते हैं। विरह कोई भी नहीं झेलना चाहता। इसलिए मिलन नहीं हो पाता। विरह झेलना होगा। विरह की कसौटी से गुजरना होगा। वह परीक्षा देनी ही पड़ेगी। और परीक्षा कठिन है, बहुत कठिन है! क्योंकि तोड़ती ही चली जाती है। तोड़ती ही चली जाती है। जलाती ही चली जाती है। रोज—रोज पीड़ा सघन होती चली जाती है।

जैसे-जैसे परमात्मा के करीब आते हो, पीड़ा बढ़ती है, पीड़ा मिटती है जरूर, जब मिलन हो जाता है। तब बड़ा स्वाद है, बड़ी मिठास है, बड़ा माधुर्य है, बड़ी मदिरा है! लेकिन उसके पहले बड़ा खारापन है। सागर के सागर पी लेने पड़ते हैं, तब कहीं स्वाति की एक बूंद हाथ लगती है।

।। श्री परमात्मने नमः ।।

एक आदमी ने एक बूढ़े पक्षी को एक जंगल में पकड़ लिया था। उस बूढ़े पक्षी ने कहा- मैं किसी भी काम का नहीं हूं, देह मेरी जीर्ण-ज...
26/05/2026

एक आदमी ने एक बूढ़े पक्षी को एक जंगल में पकड़ लिया था। उस बूढ़े पक्षी ने कहा- मैं किसी भी काम का नहीं हूं, देह मेरी जीर्ण-जर्जर हो गई, जीवन मेरा समाप्त होने के करीब है, न मैं गीत गा सकता हूं, न मेरी वाणी में मधुरता है, मुझे पकड़ कर करोगे भी क्या? लेकिन यदि तुम मुझे छोड़ने को राजी हो जाओ, तो मैं जीवन के संबंध में तीन सूत्र तुम्हें बता सकता हूं।

उस आदमी ने कहा- भरोसा क्या कि मैं तुम्हें छोड़ दूं और तुम सूत्र बताओ या न बताओ?

उस पक्षी ने कहा- पहला सूत्र मैं तुम्हारे हाथ में ही तुम्हें बता दूंगा। और अगर तुम्हें सौदा करने जैसा लगे, तो तुम मुझे छोड़ देना। दूसरा सूत्र मैं वृक्ष के ऊपर बैठ कर बता दूंगा। और तीसरा सूत्र तो, जब मैं आकाश में ऊपर उड़ जाऊंगा तभी बता सकता हूं।

बूढ़ा पक्षी था, सच ही उसकी आवाज में कोई मधुरता न थी, वह बाजार में बेचा भी नहीं जा सकता था। और उसके दिन भी समाप्तप्राय थे, वह ज्यादा दिन बचने को भी न था। उसे पकड़ रखने की कोई जरूरत भी न थी। उस शिकारी ने उस पक्षी को कहा- ठीक, शर्त स्वीकार है, तुम पहली सलाह, पहली एडवाइज, पहला सूत्र मुझे बता दो।

उस पक्षी ने कहा- मैंने जीवन में उन लोगों को दुखी होते देखा है, जो बीते हुए को भूल नहीं जाते हैं। और उन लोगों को मैंने आनंद से भरा देखा है जो बीते को विस्मरण कर देते हैं और जो मौजूद है उसमें जीते हैं, यह पहला सूत्र है। बात काम की थी और मूल्य की थी। उस आदमी ने उस पक्षी को छोड़ दिया। वह पक्षी वृक्ष पर बैठा और उस आदमी ने पूछा कि दूसरा सूत्र? उस पक्षी ने कहा- दूसरा सूत्र यह है कि कभी ऐसी बात पर विश्वास नहीं करना चाहिए जो तर्क विरुद्ध हो, जो विचार के प्रतिकूल हो, जो सामान्य बुद्धि के नियमों के विपरीत पड़ती हो, उस पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए, वैसा विश्वास करने वाला व्यक्ति भटक जाता है।

पक्षी आकाश में उड़ गया... उड़ते-उड़ते उसने कहा- एक बात तुम्हें उड़ते-उड़ते बता दूं, यह तीसरा सूत्र नहीं है, यह केवल एक खबर है जो तुम्हें दे दूं। तुम बड़ी भूल में पड़ गए हो मुझे छोड़ कर, मेरे शरीर में दो बहुमूल्य हीरे थे, काश, तुम मुझे मार डालते तो तुम आज अरबपति हो जाते।

वह आदमी एकदम उदास हो गया। वह एकदम चिंतित हो गया। लेकिन पक्षी तो आकाश में उड़ गया था। उसने उदास और हारे हुए और घबड़ाए हुए मन से कहा- खैर कोई बात नहीं, लेकिन कम से कम तीसरी सलाह तो दे दो। उस पक्षी ने कहा- तीसरी सलाह देने की अब कोई जरूरत न रही; तुमने पहली दो सलाह पर काम ही नहीं किया। मैंने तुमसे कहा था कि जो बीत गया उसे भूल जाने वाला आनंदित होता है, तुम उस बात को याद रखे हो कि तुम मुझे पकड़े थे और तुमने मुझे छोड़ दिया। वह बात बीत गई, तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो।

मैंने तुमसे दूसरा सूत्र कहा था- जो तर्क विरुद्ध हो, बुद्धि के अनुकूल न हो, उसे कभी मत मानना। तुमने यह बात मान ली कि पक्षी के शरीर में हीरे हो सकते हैं और तुम उसके लिए दुखी हो रहे हो। क्षमा करो, तीसरा सूत्र मैं तुम्हें बताने को अब राजी नहीं हूं। क्योंकि जब दो सूत्रों पर ही तुमने कोई अमल नहीं किया, कोई विचार नहीं किया, तो तीसरा भी व्यर्थ के हाथों में चला जाएगा, उसकी कोई उपादेयता नहीं।

इसलिए मैं पहली बात तो यह कहता हूं कि अगर पिछले दो सूत्रों पर ख्याल किया हो, सोचा हो, वह कहीं प्राण के किसी कोने में उन्होंने जगह बना ली हो, तो ही तीसरा सूत्र समझ में आ सकता है। अन्यथा तीसरा सूत्र बिल्कुल अबूझ होगा।

तीसरा सूत्र प्रस्तुत है, लेकिन वह आप तक पहुंचेगा या नहीं यह मुझे पता नहीं है। वह आप तक पहुंच सकता है अगर दो सूत्र भी पहुंच गए हों, उन्हीं की राह पर वह धीरे से विकसित होता है।

और अगर दो सीढ़ियां खो जाएं तो फिर तीसरी सीढ़ी बड़ी बेबूझ हो जाती है, उसको पकड़ना और पहचानना कठिन हो जाता है, वह बहुत मिस्टीरियस मालूम होने लगती है।

।। श्री राम परमात्मने नमः ।।

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