परमात्म-चिंतन

परमात्म-चिंतन God helps those who help themselves.

27/08/2026

श्री दुर्गादेव्यै नमो नमः।

27/08/2026

श्री महादेव्यै नमो नमः।

।। श्रीधान्यलक्ष्मी स्तवनम् ।।       (हिन्दी अर्थ सहित)धान्यपूर्णां शुभां देवीं फलपुष्पसमन्विताम्।सर्वलोकहितां देवीं धान...
27/08/2026

।। श्रीधान्यलक्ष्मी स्तवनम् ।।
(हिन्दी अर्थ सहित)

धान्यपूर्णां शुभां देवीं फलपुष्पसमन्विताम्।
सर्वलोकहितां देवीं धान्यलक्ष्मीं नमाम्यहम्।।

जो देवी धान्य अर्थात् अन्न से परिपूर्ण, मंगलमयी, फल-पुष्पों से सुशोभित तथा समस्त लोकों का हित करने वाली हैं-ऐसी श्रीधान्यलक्ष्मी को मैं नमस्कार करता हूँ।

अन्नपूर्णे महालक्ष्मि नमस्तुभ्यं विष्णुप्रिये।
धान्यदात्रि कृपां कुरु सर्वधान्यैः सुपूरय।।

हे विष्णुप्रिया और महालक्ष्मीस्वरूपा अन्नपूर्णे! आपको नमस्कार है। हे धान्य प्रदान करने वाली देवी! हम पर कृपा करें और हमारे घर-भण्डार को सभी प्रकार के धान्यों से परिपूर्ण करें।

श्रीधान्यलक्ष्मी ध्यानम्।
वरदाभयसंयुक्तां किरीटमकुटोज्ज्वलाम्।
अम्बुजं चेक्षुशालिं च कदम्बफलद्रोणिकाम्।।

पङ्कजं चाष्टहस्तेषु दधानां शुक्लरूपिणीम्।
कृपामूर्तिं जटाजूटां सुखासनसमन्विताम्।।

सर्वालङ्कारसंयुक्तां सर्वाभरणभूषिताम्।
मदमत्तां मनोहारिरूपां धान्यश्रियं भजे।।

जो देवी वरद एवं अभय मुद्राओं से युक्त, किरीट-मुकुट से सुशोभित हैं; जो कमल, ईख (गन्ना), शालि (धान) तथा कदम्बफल से भरे पात्र आदि धारण करती हैं और श्वेत स्वरूप वाली हैं; जो करुणामयी, जटाजूटधारिणी, सुखासन पर विराजमान, समस्त अलंकारों एवं आभूषणों से विभूषित हैं तथा जिनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है—ऐसी धान्यश्री देवी का मैं भजन करता हूँ।

।। श्रीधान्यलक्ष्म्यै नमः ।।

अहिकलिकल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमये
क्षीरसमुद्भवमङ्गलरूपिणि मन्त्रनिवासिनि मन्त्रनुते।
मङ्गलदायिनि अम्बुजवासिनि देवगणाश्रितपादयुते
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।१।।

हे मधुसूदन-प्रिया धान्यलक्ष्मी! आप कलियुग के पाप-कल्मषों का नाश करने वाली, कामना-योग्य, वैदिक स्वरूपा एवं वेदमयी हैं। क्षीरसागर से उद्भूत मंगलमयी रूपवाली, मन्त्रों में निवास करने वाली तथा मन्त्रों द्वारा स्तुति करने योग्य हैं। मंगल प्रदान करने वाली, कमलवासिनी तथा देवगणों द्वारा जिनके चरणों का आश्रय लिया जाता है- हे देवी! आप सदा मेरी रक्षा करें।

धान्यस्वरूपिणि शुभप्रदे देवि सस्यसमृद्धिप्रदायिनि
अन्नप्रदायिनि मातर्मुदे लोकपोषणकारिणि।
क्षेत्रेषु शस्यसमृद्धिं दद गृहकोषं धान्यपूर्णकम्
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।२।।

हे शुभप्रदा धान्यलक्ष्मी! आप धान्यस्वरूपा तथा सस्य-समृद्धि प्रदान करने वाली हैं। हे माता! अन्न प्रदान करके समस्त लोकों का पोषण करने वाली हैं। खेतों में फसलों की समृद्धि तथा घर के अन्न-भण्डार को धान्य से पूर्ण करें। हे मधुसूदन-प्रिया! सदा मेरी रक्षा करें।

सस्यश्यामलभूमिषु देवि वर्षाधारास्वरूपिणि
बीजाङ्कुरविवर्धिनि मातः फलशाकसमृद्धिदे।
कृषकजनहितकारिणि शुभे भूमेः सौभाग्यदायिनि
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम।।३।।

हे देवी! आप सस्य से श्यामल हुई भूमि की समृद्धि का स्वरूप हैं। वर्षाधारा-स्वरूपा तथा बीज और अङ्कुर की वृद्धि करने वाली माता हैं। फल एवं शाक की समृद्धि देने वाली, कृषक-जनों का हित करने वाली और पृथ्वी को सौभाग्य प्रदान करने वाली शुभमयी देवी! सदा मेरी रक्षा करें।

अन्नपूर्णस्वरूपिणि देवि पोषणशक्तिसमन्विते
क्षुधितानां क्षुधां हंसि अन्नदात्री दयामये।
अतिथीनां च विप्राणां दीनानां च हितप्रदे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।४।।

हे देवी! आप अन्नपूर्णा-स्वरूपा और पोषण-शक्ति से सम्पन्न हैं। क्षुधित प्राणियों की भूख दूर करने वाली, दयामयी अन्नदात्री माता हैं। अतिथियों, विप्रों और दीन-जनों का हित करने वाली देवी! सदा मेरी रक्षा करें।

धान्यकोशसमृद्धिं च गृहभाण्डारपूरिताम्
शालियवगोधूमादीन् सस्यजातान् विवर्धय।
नित्यं सौख्यं च सम्पत्तिं पोषणं देहि मे शुभे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।५।।

हे शुभमयी देवी! हमारे धान्य-कोष को समृद्ध तथा गृह-भण्डार को पूर्ण करें। शालि, यव, गोधूम आदि सभी सस्य-जातियों की वृद्धि करें। नित्य सुख, सम्पत्ति और उचित पोषण प्रदान करें। हे मधुसूदन-प्रिया धान्यलक्ष्मी! सदा मेरी रक्षा करें।

गोक्षेत्रपालिनि देवि लोकजीवनधारिणि
भूमेः फलप्रदात्री त्वं जीवनस्योपजीविनी।
अन्नस्य न परित्यागं दानधर्मप्रवर्तिनि
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।६।।

हे देवी! आप गो एवं कृषि-क्षेत्रों की पालिका तथा लोक-जीवन की धारिणी हैं। पृथ्वी को फलवती बनाने वाली और जीवों के जीवन-निर्वाह की आधार-स्वरूपा हैं। अन्न का परित्याग न करने तथा अन्नदान-धर्म में प्रवृत्त करने वाली धान्यलक्ष्मी! सदा मेरी रक्षा करें।

हरितवस्त्रे शुभे देवि सुवर्णाभरणभूषिते
पद्महस्ते प्रसन्नास्ये सर्वसम्पत्प्रदायिनि।
सस्यपुष्टिं धान्यवृद्धिं गृहशान्तिं च देहि मे
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।७।।

हे शुभमयी देवी! हरित-वस्त्र धारण करने वाली, सुवर्ण-आभरणों से विभूषित, पद्महस्ता और प्रसन्नमुखी माता! आप समस्त सम्पत्ति प्रदान करने वाली हैं। फसलों की पुष्टि, धान्य की वृद्धि तथा गृह में शान्ति प्रदान करें। हे मधुसूदन-प्रिया! सदा मेरी रक्षा करें।

अन्नं ब्रह्मेति भावेन पूजिते लोकमातरि
अन्नदानेन तुष्टे देवि सर्वजीवनपोषिणि।
धनधान्यसमृद्धिं च भक्तानां कुरु सर्वदा
जय जय हे मधुसूदनकामिनि धान्यलक्ष्मि सदा पालय माम्।।८।।

हे लोकमाता! “अन्नं ब्रह्म” इस भाव से पूजित होने वाली देवी! अन्नदान से प्रसन्न होने वाली तथा समस्त जीवों का पोषण करने वाली माता! अपने भक्तों को सदैव धन-धान्य की समृद्धि प्रदान करें। हे मधुसूदन-प्रिया धान्यलक्ष्मी! सदा मेरी रक्षा करें।

धान्यलक्ष्मी मूल मन्त्र-
ॐ श्रीं धान्यलक्ष्म्यै नमः।

प्रार्थना-
हे श्रीधान्यलक्ष्मी माता! हमारे गृह में शुद्ध एवं सात्त्विक अन्न की कभी कमी न हो। भूमि, कृषि, बीज, फसल एवं अन्नदाता कृषकों पर आपकी कृपा बनी रहे। हमें अन्न का सम्मान, अन्न का सदुपयोग तथा सामर्थ्यानुसार अन्नदान की बुद्धि प्रदान करें।

।। श्रीधान्यलक्ष्म्यै नमः ।।

।।  विजय स्तोत्रम् ।।इस पाठ से गारंटी से नर नारी, देव, किन्नर, गंधर्व आदि को विजय मिलती है। शत्रु रोयेंगे- बस देवी के इस...
27/08/2026

।। विजय स्तोत्रम् ।।

इस पाठ से गारंटी से नर नारी, देव, किन्नर, गंधर्व आदि को विजय मिलती है। शत्रु रोयेंगे- बस देवी के इस स्तोत्र का आश्रय ले लो। भगवान श्रीराम ने भी इसी स्तोत्र से विजय प्राप्त की।

भगवान श्रीराम द्वारा देवी की स्तुति-
इस स्तोत्र से सदा जीत (विजय) होती रहेगी पर पापमार्ग में विजय न मांगे। यह विजय स्तोत्र कल्पवृक्षस्वरुप है। इसमें मात्र १६श्लोक हैं। इसे अक्षय नवमी पर या युगादि व मन्वादि तिथियों पर
कम से कम ११ बार पढ़े और नित्य शुभ मुहूर्त से आरंभ करके १-१ बार। यह विजय का मूल मंत्र है।

जो सारे प्रयास करके हार चुका और हताश हो गया उसे रोना छोड़कर इस स्तोत्र की शरण लेना चाहिए। यह स्तोत्र देवीपुराण अध्याय ४४ से संकलित है।

हिन्दी में प्रस्तुति-
श्रीरामजी बोले- त्रिलोकवन्दनीया ! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनि ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें।

सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती ! संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

आप ही सभी प्राणियों में निवास करनेवाली परा शक्ति हैं, संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

युद्धप्रिये ! शरणागत की पीड़ा हरनेवाली ! जगदम्बा ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

हाथ में खट्वाङ्ग तथा खड्ग धारण करनेवाली एवं मुण्डमाला से सुशोभित विग्रहवाली भगवती ! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुःख हरण कीजिये।

शरणागत-प्रिये! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिये, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है, पुनः नमस्कार है।

आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिमित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिन्तन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिन्त्य हैं। मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करनेवाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

युद्ध में महिषासुर का मर्दन करनेवाली तथा शरणग्रहण करनेयोग्य हिमालयसुता! आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

चण्डासुर का नाश करनेवाली प्रसन्नमुखी चण्डिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

रक्तवर्णके नेत्रवाली, रक्तरञ्जित दन्तपङ्किवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करनेवाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।

निशुम्भ तथा शुम्भ का संहार करनेवाली, जगत की सृष्टि करनेवाली सुरेश्वरी! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

भवानी! आप सर्वदा इस सम्पूर्ण जगत का पालन करती हैं। माता! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिये। दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती! आप सबमें विद्यमान रहनेवाली शक्तिस्वरूपा हैं। जगन्माता! प्रसन्न होइये, मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक् पालन करनेवाली भगवती ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।

शरणागतों का दुःख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिये और भय से सदा रक्षा कीजिये।

।। श्री कात्यायनी विजय स्तोत्रम् ।।

श्रीराम उवाच।
नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि।
प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते।।१।।

सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि।
दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।२।।

त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता।
दुष्ट संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।३।।

रणप्रिये रक्तभक्षे मांसभक्षणकारिणि।
प्रपन्नार्तिहरे युद्धे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।४।।

खट्वाङ्गासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे।
ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु तेषां दुःखहरा भव।।५।।

त्वत्पादपङ्कजादैन्यं नमस्ते शरणप्रिये।
विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोऽस्तु ते।।६।।

अचिन्त्यविक्रमेऽचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि। अचिन्त्यचरितेऽचिन्त्ये जयं देहि नमोऽस्तु ते।।७।।

ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवीं दुर्गविनाशिनीम्।
नावसीदन्ति दुर्गेषु जयं देहि नमोऽस्तु ते।।८।।

महिषासृप्रिये संख्ये महिषासुरमर्दिनि।
शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।९।।

प्रसन्नवदने चण्डि चण्डासुरविमर्दिनि।
संग्रामे विजयं देहि शत्रूञ्जहि नमोऽस्तु ते।।१०।।

रक्ताक्षि रक्तदशने रक्तचर्चितगात्रके।
रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।११।।

निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि विश्वकर्त्रि सुरेश्वरि।
जहि शत्रून् रणे नित्यं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१२।।

भवान्येत जगत्सर्व त्वं पालयसि सर्वदा।
रक्ष विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान्।।१३।।

त्वं हि सर्वगता शक्तिर्दष्टमर्दनकारिणि।
प्रसीद जगतां मातर्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१४।।

दङ्क्तवृन्ददमनि सवृत्तपरिपालिनि।
निपातय रणे शत्रूञ्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१५।।

कात्यायनि जगन्मातः प्रपन्नार्तिहरे शिवे।
संग्रामे विजयं देहि भयेभ्यः पाहि सर्वदा।।१६।।

।। इति श्री विजय स्तोत्रं संपूर्णम् ।।

।। श्रीलक्ष्मीनामावली-स्तोत्रम् ।।ब्राह्मी नारायणी श्रीश्चाक्षरी मुक्तानिता रमा।  ब्रह्म्प्रिया च कमला हरिप्रिया च माणिक...
27/08/2026

।। श्रीलक्ष्मीनामावली-स्तोत्रम् ।।

ब्राह्मी नारायणी श्रीश्चाक्षरी मुक्तानिता रमा।
ब्रह्म्प्रिया च कमला हरिप्रिया च माणिकी।।१।।

राधा लक्ष्मीः पराविद्या रमा श्रीः च नारायणी।
विद्या सरस्वती माता वैष्णवी पद्मिनि सती।।२।।

पद्मा च पद्मजा चाब्धिपुत्री रम्भा च राधिका।
भूर्लीला सुखदालक्ष्मीः हरिणी माधवीश्वरि।।३।।

गौरी कार्ष्णी कृष्णनारायणी स्वाहा स्वधा रतिः।
सम्पत्स्मृध्दिर्वासुदेवी विरजा च हिरण्मयी।
भार्गवी शिवराज्ञी श्रीरामा श्रीकान्तवल्लभा।।४।।

ऐतानि लक्ष्मीनामानि सदा प्रातः पठेध्दियः।
स पुत्रपौत्रादियुक्तः श्रियमाप्नोत्यनाशिनीम्।।५।।

।। इति श्रीलक्ष्मीनारायणसंहितायां श्रीलक्ष्मीनामावली स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

।। आर्यादुर्गाष्टकम् ।।श्रीगणेशाय नमः।आर्यादुर्गाऽभिधाना हिमनगदुहिता शङ्करार्धासनस्थामाता षाण्मातुरस्याखिलजनविनुता संस्थ...
27/08/2026

।। आर्यादुर्गाष्टकम् ।।

श्रीगणेशाय नमः।

आर्यादुर्गाऽभिधाना हिमनगदुहिता शङ्करार्धासनस्था
माता षाण्मातुरस्याखिलजनविनुता संस्थिता स्वासनेऽग्र्ये।
गीता गन्धर्वसिद्धैर्विरचितबिरुदैर्याऽखिलाङ्गेषु पीता
संवीता भक्तवृन्दैरतिशुभचरिता देवता नः पुनातु।।१।।

मातस्त्वां साम्बपत्नीं विदुरखिलजना वेदशास्त्राश्रयेण
नाहं मन्ये तथा त्वां मयि हरिदयितामम्बुजैकासनस्थाम्।
नित्यं पित्रा स देशे निजतनुजनिता स्थाप्यते प्रेमभावात्
एतादृश्यानुभूत्यो दधितटसविधे संस्थितां तर्कयामि।।२।।

नासीदालोकिता त्वत्तनुरतिरुचिराऽद्यावधीत्यात्मदृष्ट्या
लोकोक्त्या मे भ्रमोऽभूत्सरसिजनिलये नामयुग्माक्षरार्थात्।
सोऽयं सर्वो निरस्तस्तव कनकमयीं मूर्तिमालोक्य सद्यः
साऽपर्णा स्वर्णवर्णार्णवतनुजनिते न श्रुता नापि दृष्टा।।३।।

श्रीसूक्तोक्ताद्यमन्त्रात्कनकमयतनुः स्वर्णकञ्जोच्चहारा
सारा लोकत्रयान्तर्भगवतिभवतीत्येवमेवागमोक्तम्।
तन्नामोक्ताक्षरार्थात्कथमयि वितथं स्यात्सरिन्नाथकन्ये
दृष्टार्थे व्यर्थतर्को ह्यनयपथगतिं सूचयत्यर्थदृष्ट्या।।४।।

तन्वस्ते मातरस्मिञ्जगति गुणवशाद्विश्रुतास्तिस्र एव
काली श्रीर्गीश्च तासां प्रथममभिहिता कृष्णवर्णा ह्मपर्णा।
लक्ष्मीस्तु स्वर्णवर्णा विशदतनुरथो भारती चेदमूषु
स्वच्छा नोनापि कृष्णा भगवति भवती श्रीरसीत्येव सिद्धम्।।५।।

नामाद्यायाः स्वरूपं कनकमयमिदं मध्यमायाश्च यान-
मन्त्यायाः सिंहरूपं त्रितयमपि तनौ धारयन्त्यास्तवेदृक्।
दृष्ट्वा नूत्नैव सर्वा व्यवहृतिसरणीरिन्दिरे चेदतर्क्या
त्वामाद्यां विश्ववन्द्यां त्रिगुणमयतनुं चेतसा चिन्तयामि।।६।।

त्वद्रूपज्ञानकामा विविधविधसमाकॢप्ततर्कैरनेकै-
र्नो शक्ता निर्जरास्ते विधि-हरि-हरसंज्ञा जगद्वन्द्यपादाः।
का शक्तिर्मे भवित्री जलनिधितनये ज्ञातुमुग्रं तवेदं
रूपं नाम्ना प्रभावादपि वितथफलो मे बभूव प्रयत्नः।।७।।

अस्त्वम्ब त्वय्यनेकैरशुभशुभतरैः कल्पितैरम्ब तर्कै-
रद्याहं मन्दबुद्धिः सरसिजनिलये सापराधोऽस्मि जातः।
तस्मात्त्वत्पादपद्मद्वयनमितशिरा प्रार्थयाम्येतदेव
क्षन्तव्यो मेऽपराधो हरिहरदयिते भेदबुद्धिर्न मेऽस्ति।।८।।

आर्यादुर्गाष्टकमिदमनन्तकविना कृतम्।
तव प्रीतिकरं भूयादित्यभ्यर्थनमम्बिके।।९।।

।। इति श्रीमदनन्तकविविरचितमार्या दुर्गाष्टकं सम्पूर्णम् ।।

।। श्रीगर्ग-संहिता- श्रीवृन्दावनखण्ड ।।           (उन्नीसवाँ अध्याय)राधया शुशुभे रासे यथा रत्या रतीश्वरः।एवं गायन् हरिः ...
27/08/2026

।। श्रीगर्ग-संहिता- श्रीवृन्दावनखण्ड ।।
(उन्नीसवाँ अध्याय)

राधया शुशुभे रासे यथा रत्या रतीश्वरः।
एवं गायन् हरिः साक्षात्सुन्दरीगणसंवृतः।।२७।।

यमुनापुलिनं पुण्यमाययौ राधया युतः।
गृहीत्वा हस्तपादेन पद्माभं स्वप्रियाकरम्।।२८।।

निषसाद हरिः कृष्णातीरे नीरमनोहरे।
पुनर्जल्पन् सुमधुरं पश्यन् वृन्दावनं प्रियम्।।२९।।

चलन् हसन् राधिकया कुंजं कुंजं चचार ह।
कुंजे निलीयमानं तं त्वरं त्यक्त्वा प्रियाकरम्।।३०।।

विलोक्य शाखान्तरितं राधा जग्राह माधवम्।
राधा दुद्राव तद्धस्ताज्झंकारं कुर्वती पदे।।३१।।

निलीयमाना कुंजेषु पश्यतो माधवस्य च।
धावन् हरिर्गतो यावत्तावद्‌राधा ततो गता।।३२।।

वृक्षपार्श्वे हस्तमात्रादितश्चेतश्च धावती।
तमालो हेमवल्ल्येव घनश्चंचलया यथा।।३३।।

हेमखन्येव नीलाद्री रेजे राधिकया हरिः।
राधया विश्वमोहिन्या बभौ मदनमोहनः।।३४।।

वृन्दावने रासरंगे रत्येव मदनो यथा।
धृत्वा रूपाणि तावन्ति यावन्ति व्रजयोषितः।।३५।।

ननर्त रासरंगेऽसौ रंगभूम्यां नटो यथा।
गायन्त्यश्चापि नृत्यन्त्यः सर्वा गोप्यो मनोहराः।।३६।।

विरेजुः कृष्णचन्द्रैश्च यथा शक्रैः सुरांगनाः।
वारां विहारं कृष्णायां चकार मधुसूदनः।।३७।।

सर्वैर्गोपीगणैः सार्धं यक्षीभिर्यक्षराडिव।
कबरीकेशपाशाभ्यां प्रसूनैः प्रच्युतैः शुभैः।
चित्रवर्णैर्बभौ कृष्णो यथोष्णिङ्‌मुद्रिता तथा।।३८।।

मृदंगतालैर्मधुरध्वनिस्वनै-
र्जगुर्यशस्ता मधुसूदनस्य।
प्रापुर्मुदं पूर्णमनोरथाश्चल-
त्प्रसूनहारा हरिणा गतव्यथाः।।३९।।

श्रीहस्तसंताडितवारिबिंदुभिः
स्फारासमस्फूर्जितशीकरद्युभिः।
वृन्दावनेशो व्रजसुंदरीभी
रेजे गजीभिर्गजराडिव स्वयम्।।४०।।

विद्याधर्यो देवगंधर्वपत्‍न्यः
पश्यन्त्यस्ता रासरंगं दिविस्थाः।
देवैः सार्धं चक्रिरे पुष्पवर्षं
मोहं प्राप्ताः प्रश्लथद्‌वस्त्रनीव्यः।।४१।।

भावार्थ-
रति के साथ रतिनाथ की जैसी शोभा होती है, उसी प्रकार रासमण्डल में श्रीराधा के साथ राधावल्लभ की हो रही थी। इस प्रकार सुन्दरियों के अलाप से संयुक्त होकर साक्षात् श्रीहरि अपनी प्रिया राधा के साथ यमुना के पुण्य- पुलिन पर आये। उन्होंने अपनी प्राणवल्लभा का हाथ अपने करकमल में ले रखा था। यमुना के मनोहर तीर पर उन सुन्दरियों के साथ श्यामसुन्दर थोड़ी देर बैठे रहे। फिर मधुर-मधुर बातें करते हुए अपने प्रिय वृन्दाविपिन की शोभा निहारने लगे।

वे श्रीराधा के साथ चलते और हास-विनोद करते हुए कुञ्जवन में विचरने लगे। एक कुञ्ज में प्रिया का हाथ छोड़कर वे तुरंत कहीं छिप गये। किंतु एक शाखा की ओट में उन्हें खड़ा देख श्रीराधा ने माधव को अविलम्ब जा पकड़ा। फिर श्रीराधा उनके हाथ से छूटकर पग- पग पर नूपुरों का झंकार प्रकट करती हुई भागीं और माधव के देखते-देखते कुञ्जों में छिपने लगीं। माधव हरि ज्यों ही दौड़कर उनके स्थान पर पहुँचे, त्यों-ही राधा वहाँ से अन्यत्र चली गयीं।

वृक्षों के पास हाथ- भर की दूरी पर इधर-उधर वे भागने लगीं। उस समय श्रीराधा के साथ श्यामसुन्दर हरि की उसी तरह शोभा हो रही थी, जैसे सुवर्णलता से श्याम तमाल की, चपला से घनमण्डल की तथा सोने की खान से नीलाचल की होती है। वृन्दावन में रास की रङ्गस्थली में रति के साथ कामदेव की भाँति विश्वमोहिनी श्रीराधा के साथ मदनमोहन श्रीकृष्ण सुशोभित हो रहे थे।

जितनी व्रजसुन्दरियाँ वहाँ विद्यमान थीं, उतने ही रूप धारण करके रङ्गभूमि में नट के समान नटवर श्रीकृष्ण रासरङ्ग में नृत्य करने लगे। उनके साथ सम्पूर्ण मनोहर गोप सुन्दरियाँ भी गाने और नृत्य करने लगीं।

अनेक कृष्णचन्द्रों के साथ वे गोपसुन्दरियाँ ऐसी जान पड़ती थीं, मानो बहुसंख्यक इन्द्रों के साथ देवाङ्गनाएँ नृत्य कर रही हों। तदनन्तर मधुसूदन श्रीकृष्ण समस्त गोप- सुन्दरियों के साथ यमुनाजल में विहार करने लगे- ठीक उसी तरह जैसे यक्षसुन्दरियों के साथ यक्षराज कुबेर विहार करते हैं। उन सुन्दरियों के केशपाश तथा कबरी (बँधी हुई चोटी) से खिसककर गिरे हुए सुन्दर चित्र-विचित्र पुष्पों से यमुनाजी की ऐसी शोभा हो रही थी, जैसे किसी नीलपट पर विभिन्न रंग के फूल छाप दिये गये हों।

मृदङ्ग और खड़तालों की मधुर ध्वनि के साथ वे व्रजाङ्गनाएँ मधुसूदन का यश गाती थीं। उनका मनोरथ पूर्ण हो गया। श्रीहरि ने उनकी सारी व्यथा हर ली थी। उनके पुष्पहार चञ्चल हो रहे थे और वे परमानन्द में निमग्न हो गयी थीं। जिनके सुन्दर हाथों से ताडित हो उछलते हुए वारि-बिन्दु, जो फुहारों से छूटते हुए असंख्य अनुपम जलकणों की छवि धारण कर रहे थे, उन व्रज-सुन्दरियों के साथ वृन्दावनाधीश्वर श्रीकृष्ण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो बहुत-सी हथिनियों के साथ यूथपति गजराज सुशोभित हो रहा हो। आकाश में खड़ी हुई विद्याधरियाँ, देवाङ्गनाएँ तथा गन्धर्वपत्नियाँ उस रास - रङ्ग को देखती हुई वहाँ देवताओं के साथ पुष्पवर्षा कर रही थीं। वे सब की सब मोह को प्राप्त हो गयी थीं। उनके वस्त्रों के नीवी-बन्ध ढीले पड़कर खिसक रहे थे।

।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।

।। श्रीहयग्रीव संपदा स्तोत्रम‌् ।।हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति वादिनम्।नरं मुञ्चन्ति पापानि दरिद्रमिव योषितः।।१।।हयग्रीव ह...
27/08/2026

।। श्रीहयग्रीव संपदा स्तोत्रम‌् ।।

हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति वादिनम्।
नरं मुञ्चन्ति पापानि दरिद्रमिव योषितः।।१।।

हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो वदेत्।
तस्य निस्सरते वाणी जह्नुकन्याप्रवाहवत्।।२।।

हयग्रीव हयग्रीव हयग्रीवेति यो ध्वनिः।
विशोभते च वैकुण्ठकवाटोद्घाटनक्षमः।।३।।

श्लोकत्रयमिदं पुण्यं हयग्रीवपदाङ्कितम्।
वादिराज यतिप्रोक्तं पठतां संपदां पदम्।।४।।

।। इति वादिराजतीर्थ विरचितं हयग्रीवसंपदा स्तोत्रं संपूर्णम् ।।

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