27/08/2026
।। विजय स्तोत्रम् ।।
इस पाठ से गारंटी से नर नारी, देव, किन्नर, गंधर्व आदि को विजय मिलती है। शत्रु रोयेंगे- बस देवी के इस स्तोत्र का आश्रय ले लो। भगवान श्रीराम ने भी इसी स्तोत्र से विजय प्राप्त की।
भगवान श्रीराम द्वारा देवी की स्तुति-
इस स्तोत्र से सदा जीत (विजय) होती रहेगी पर पापमार्ग में विजय न मांगे। यह विजय स्तोत्र कल्पवृक्षस्वरुप है। इसमें मात्र १६श्लोक हैं। इसे अक्षय नवमी पर या युगादि व मन्वादि तिथियों पर
कम से कम ११ बार पढ़े और नित्य शुभ मुहूर्त से आरंभ करके १-१ बार। यह विजय का मूल मंत्र है।
जो सारे प्रयास करके हार चुका और हताश हो गया उसे रोना छोड़कर इस स्तोत्र की शरण लेना चाहिए। यह स्तोत्र देवीपुराण अध्याय ४४ से संकलित है।
हिन्दी में प्रस्तुति-
श्रीरामजी बोले- त्रिलोकवन्दनीया ! युद्ध में विजय देनेवाली ! कात्यायनि ! आपको बार-बार नमस्कार है। मुझपर प्रसन्न हों और मुझे विजय प्रदान करें।
सर्वशक्तिमयी, दुष्ट शत्रुओं का निग्रह करनेवाली, दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती ! संग्राम में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।
आप ही सभी प्राणियों में निवास करनेवाली परा शक्ति हैं, संग्राम में दुष्ट राक्षस का संहार करें और मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।
युद्धप्रिये ! शरणागत की पीड़ा हरनेवाली ! जगदम्बा ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।
हाथ में खट्वाङ्ग तथा खड्ग धारण करनेवाली एवं मुण्डमाला से सुशोभित विग्रहवाली भगवती ! विषम परिस्थितियों में जो आपका स्मरण करते हैं, उनका दुःख हरण कीजिये।
शरणागत-प्रिये! आप अपने चरणकमल के अनुग्रह से दीनता का नाश कीजिये, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं का विनाश कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है, पुनः नमस्कार है।
आपका पराक्रम, रूप, सौन्दर्य तथा चरित्र अपरिमित होने के कारण सम्पूर्ण रूप से चिन्तन का विषय बन नहीं सकता। आप स्वयं भी अचिन्त्य हैं। मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
जो लोग विपत्तियों में दुर्गति का नाश करनेवाली आप भगवती का स्मरण करते हैं, वे विषम परिस्थितियों में दुःखी नहीं होते। आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
युद्ध में महिषासुर का मर्दन करनेवाली तथा शरणग्रहण करनेयोग्य हिमालयसुता! आप मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
चण्डासुर का नाश करनेवाली प्रसन्नमुखी चण्डिके ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
रक्तवर्णके नेत्रवाली, रक्तरञ्जित दन्तपङ्किवाली तथा रक्त से लिप्त शरीरवाली भगवती ! आप रक्तबीज का संहार करनेवाली हैं, आप मुझे विजय प्रदान करें, आपको नमस्कार है।
निशुम्भ तथा शुम्भ का संहार करनेवाली, जगत की सृष्टि करनेवाली सुरेश्वरी! आप नित्य युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
भवानी! आप सर्वदा इस सम्पूर्ण जगत का पालन करती हैं। माता! आप इन दुष्ट राक्षसों को मारकर इस विश्व की रक्षा कीजिये। दुष्टों का संहार करनेवाली भगवती! आप सबमें विद्यमान रहनेवाली शक्तिस्वरूपा हैं। जगन्माता! प्रसन्न होइये, मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
दुराचारियों का दमन करनेवाली तथा सदाचारियों का सम्यक् पालन करनेवाली भगवती ! युद्ध में शत्रुओं का संहार कीजिये और मुझे विजय प्रदान कीजिये, आपको नमस्कार है।
शरणागतों का दुःख दूर करनेवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली जगन्माता कात्यायनी ! युद्ध में मुझे विजय प्रदान कीजिये और भय से सदा रक्षा कीजिये।
।। श्री कात्यायनी विजय स्तोत्रम् ।।
श्रीराम उवाच।
नमस्ते त्रिजगद्वन्द्ये संग्रामे जयदायिनि।
प्रसीद विजयं देहि कात्यायनि नमोऽस्तु ते।।१।।
सर्वशक्तिमये दुष्टरिपुनिग्रहकारिणि।
दुष्टजृम्भिणि संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।२।।
त्वमेका परमा शक्तिः सर्वभूतेष्ववस्थिता।
दुष्ट संहर संग्रामे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।३।।
रणप्रिये रक्तभक्षे मांसभक्षणकारिणि।
प्रपन्नार्तिहरे युद्धे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।४।।
खट्वाङ्गासिकरे मुण्डमालाद्योतितविग्रहे।
ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु तेषां दुःखहरा भव।।५।।
त्वत्पादपङ्कजादैन्यं नमस्ते शरणप्रिये।
विनाशय रणे शत्रून् जयं देहि नमोऽस्तु ते।।६।।
अचिन्त्यविक्रमेऽचिन्त्यरूपसौन्दर्यशालिनि। अचिन्त्यचरितेऽचिन्त्ये जयं देहि नमोऽस्तु ते।।७।।
ये त्वां स्मरन्ति दुर्गेषु देवीं दुर्गविनाशिनीम्।
नावसीदन्ति दुर्गेषु जयं देहि नमोऽस्तु ते।।८।।
महिषासृप्रिये संख्ये महिषासुरमर्दिनि।
शरण्ये गिरिकन्ये मे जयं देहि नमोऽस्तु ते।।९।।
प्रसन्नवदने चण्डि चण्डासुरविमर्दिनि।
संग्रामे विजयं देहि शत्रूञ्जहि नमोऽस्तु ते।।१०।।
रक्ताक्षि रक्तदशने रक्तचर्चितगात्रके।
रक्तबीजनिहन्त्री त्वं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।११।।
निशुम्भशुम्भसंहन्त्रि विश्वकर्त्रि सुरेश्वरि।
जहि शत्रून् रणे नित्यं जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१२।।
भवान्येत जगत्सर्व त्वं पालयसि सर्वदा।
रक्ष विश्वमिदं मातर्हत्वैतान् दुष्टराक्षसान्।।१३।।
त्वं हि सर्वगता शक्तिर्दष्टमर्दनकारिणि।
प्रसीद जगतां मातर्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१४।।
दङ्क्तवृन्ददमनि सवृत्तपरिपालिनि।
निपातय रणे शत्रूञ्जयं देहि नमोऽस्तु ते।।१५।।
कात्यायनि जगन्मातः प्रपन्नार्तिहरे शिवे।
संग्रामे विजयं देहि भयेभ्यः पाहि सर्वदा।।१६।।
।। इति श्री विजय स्तोत्रं संपूर्णम् ।।