Prabhu Valmiki Ashram Matili Rathan

Prabhu Valmiki Ashram Matili Rathan Jai Valmiki ji
This place is a more historical.
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Since july 1958, Sri Sri 1008 Satguru Gyan Nath ji Maharaj ( Valmiki Ashram Sri Amritsar Sahib ) was cames into "Valmiki Ashram Matli Rathan ".

16/05/2026
॥ ਘਟ ਘਟ ਮੇਂ ਪਰਵੇਸ਼ ਹੈ ਰਿਖੀਕੇਸ਼ ਭਗਵੰਤ ॥ ॥ ਜਿਸ ਮਨ ਤੇਰੀ ਪ੍ਰੀਤ ਹੈ ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਸੰਤ ॥ ਵਿਆਖਿਆ :-  ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਾਹਿਬ -ਏ- ਕਮਾਲ ਸਤਿਗ...
02/05/2026

॥ ਘਟ ਘਟ ਮੇਂ ਪਰਵੇਸ਼ ਹੈ ਰਿਖੀਕੇਸ਼ ਭਗਵੰਤ ॥
॥ ਜਿਸ ਮਨ ਤੇਰੀ ਪ੍ਰੀਤ ਹੈ ਸੋ ਵਡਭਾਗੀ ਸੰਤ ॥ ਵਿਆਖਿਆ :- ਬ੍ਰਹਮ ਗਿਆਨੀ ਸਾਹਿਬ -ਏ- ਕਮਾਲ ਸਤਿਗੁਰੂ ਗਿਆਨ ਨਾਥ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਦੇ ਚਰਨ ਸੇਵਕ ਸੰਤ ਗੁਰਦੇਵ ਸਿੰਘ ਜੀ ਗਿੱਲ ਪਾਵਨ ਬਾਣੀ " ਜਗਤਗੁਰੂ ਵਾਲਮੀਕਿ ਮਹਾਰਾਜ ਜੀ ਦੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ " ਦੇ ਉਪਰੋਕਤ ਸਲੋਕ ਵਿੱਚ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਸਰਵ-ਵਿਆਪਕਤਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਪ੍ਰੇਮ-ਭਗਤੀ ਦੀ ਮਹਿਮਾ ਨੂੰ ਦਰਸਾਉਂਦਿਆਂ ਸਮਝਾਉਣਾ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ 'ਰਿਖੀਕੇਸ਼' ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਵਾਲਮੀਕਿ ਜੀ ਹਰ ਇੱਕ ਹਿਰਦੇ ਘਟ ਘਟ ਵਿੱਚ ਮੌਜੂਦ ਹੈ। ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਕਿਤੇ ਦੂਰ ਨਹੀਂ, ਸਗੋਂ ਉਹ ਇਸ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦੇ ਕਣ-ਕਣ ਅਤੇ ਹਰ ਜੀਵ ਦੇ ਅੰਦਰ ਵਸ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਉਹ ਸਰਵ-ਵਿਆਪਕ ਹੈ ਅਤੇ ਹਰ ਇਨਸਾਨ ਦੇ ਮਨ ਦੀ ਗੱਲ ਜਾਣਦਾ ਹੈ। ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਮਨ ਵਿੱਚ ਤੁਹਾਡੇ ਲਈ ਸੱਚੀ ਪ੍ਰੀਤ (ਪਿਆਰ) ਪੈਦਾ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਬਹੁਤ ਵੱਡੇ ਭਾਗਾਂ ਵਾਲਾ ਭਾਵ ਵਡਭਾਗੀ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹ ਸਹੀ ਅਰਥਾਂ ਵਿੱਚ 'ਸੰਤ' ਹੈ । ਭਾਵ ਦੁਨੀਆ ਵਿੱਚ ਸਭ ਤੋਂ ਖੁਸ਼ਕਿਸਮਤ ਉਹ ਵਿਅਕਤੀ ਹੈ ਜਿਸ ਨੂੰ ਪ੍ਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਬੰਦਗੀ ਅਤੇ ਮੁਹੱਬਤ ਨਸੀਬ ਹੋਈ ਹੈ। ਅਜਿਹਾ ਇਨਸਾਨ ਹੀ ਅੰਦਰੂਨੀ ਸ਼ਾਂਤੀ ਅਤੇ ਰੂਹਾਨੀ ਉੱਚਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦਾ ਹੈ।

॥ रखो गुर अपने ते डोर ॥॥ प्रीत करो जिउ चंद चकोर ॥अर्थात :- ब्रह्मज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण स...
01/05/2026

॥ रखो गुर अपने ते डोर ॥
॥ प्रीत करो जिउ चंद चकोर ॥
अर्थात :- ब्रह्मज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक, संत गुरदेव सिंह जी गिल, पावन बाणी "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत बाणी" के उपरोक्त श्लोक में गुरु पर अटूट भरोसे और निस्वार्थ प्रेम की महिमा को दर्शाते हुए समझाते हैं कि हमें अपने जीवन की बागडोर (डोर) पूरी तरह से अपने गुरु के हाथों में सौंप देनी चाहिए। हमें अपने हर दुख-सुख और कार्य के लिए गुरु पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए। 'चकोर' पक्षी और 'चंद्रमा' का उदाहरण देते हुए वे समझाते हैं कि ऐसी मान्यता है कि चकोर पक्षी चंद्रमा से इतना प्रेम करता है कि वह पूरी रात बिना पलक झपकाए केवल चाँद की ओर ही देखता रहता है। ठीक इसी प्रकार, एक शिष्य का अपने गुरु के प्रति प्रेम भी वैसा ही होना चाहिए जिसमें कोई दूरी न हो और जिसकी दृष्टि सदैव अपने प्रीतम (गुरु) पर ही टिकी रहे।

॥ गुरु का नाम जपे बिना ढोला ॥॥ खुस जावेगा माणस चोला ॥अर्थात :- ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के ...
30/04/2026

॥ गुरु का नाम जपे बिना ढोला ॥
॥ खुस जावेगा माणस चोला ॥
अर्थात :- ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक संत गुरदेव सिंह जी गिल पावन वाणी "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत वाणी" के माध्यम से हमें सचेत करते हुए समझाते हैं कि हे प्यारे इंसान! गुरु द्वारा प्रदान किए गए भगवान वाल्मीकि जी के नाम का जाप ही जीवन का असली आधार है। इसके बिना आत्मा को कभी तृप्ति नहीं मिल सकती। यह मानव देह (चोला) एक सीमित समय के लिए मिली है। यह कभी भी हमसे छीनी जा सकती है। यदि हमने इस अनमोल जन्म को केवल दुनियादारी में गंवा दिया और सिमरन नहीं किया, तो हम मुक्ति के मार्ग से भटक जाएंगे।

With Sant Sukhvinder Nath – I just got recognised as one of their top fans! 🎉
29/04/2026

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॥ अमर भए संसार ते जिन प्रीत लगाई ॥॥ सेवा जगत गुरु की बिरथी नाहीं जाई ॥व्याख्या : -ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञा...
29/04/2026

॥ अमर भए संसार ते जिन प्रीत लगाई ॥
॥ सेवा जगत गुरु की बिरथी नाहीं जाई ॥
व्याख्या : -ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक संत गुरदेव सिंह जी गिल, पावन "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत वाणी" के उपरोक्त श्लोक में गुरु और परमेश्वर की सेवा एवं प्रेम की महिमा का वर्णन करते हुए समझाते हैं कि जिन मनुष्यों ने इस संसार में रहते हुए परमात्मा या मानवता के साथ सच्ची प्रीत जोड़ी है, वे मृत्यु के पश्चात भी समाप्त नहीं होते, बल्कि सदा के लिए अमर हो जाते हैं। जिनके हृदय में निस्वार्थ प्रेम होता है, उनकी स्मृति और उनके द्वारा किए गए परोपकारी कार्य इस संसार में युगों-युगों तक जीवित रहते हैं। जगतगुरु परमात्मा वाल्मीकि जी महाराज और पूर्ण गुरु की भक्ति भाव से की गई सेवा कभी भी व्यर्थ (वृथा) नहीं जाती। गुरु के दिखाए मार्ग पर चलकर की गई निष्काम सेवा का फल निश्चित रूप से प्राप्त होता है। यह सेवा मनुष्य के मन को शांति प्रदान करती है और उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्त कर प्रभु के चरणों में लीन कर देती है।

॥ धर्म कर्म विच पके रहना ॥॥ कूड़ कपट के राह ना पैणा ॥व्याख्या :-ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के...
26/04/2026

॥ धर्म कर्म विच पके रहना ॥
॥ कूड़ कपट के राह ना पैणा ॥व्याख्या :-ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक संत गुरदेव सिंह जी गिल, पावन वाणी "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत वाणी" के उपरोक्त श्लोक में मनुष्य को अपने धर्म के प्रति दृढ़ता और भरोसा रखने के लिए प्रेरित करते हुए समझाते हैं कि मनुष्य को हमेशा अपने धर्म (सत्य के मार्ग) और नेक कर्मों (अच्छे कार्यों) पर दृढ़ता के साथ टिके रहना चाहिए। चाहे जीवन में कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएँ, इंसान को अपनी ईमानदारी और उच्च आचरण का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। हमें झूठ (असत्य) और धोखाधड़ी (कपट) के रास्ते पर कभी भी नहीं चलना चाहिए। दूसरों के साथ चालाकी करना या गलत तरीके से सफलता हासिल करने की कोशिश करना अंत में नुकसानदेह ही होता है।

॥ ज्ञान कहे बनजारिया कर्म कुमंदड़े छोड़ ॥॥ जे कुछ खटणा जग चों हरि संग अखियां जोड़ ॥व्याख्या :- ब्रह्मज्ञानी साहिब-ए-कमाल...
25/04/2026

॥ ज्ञान कहे बनजारिया कर्म कुमंदड़े छोड़ ॥
॥ जे कुछ खटणा जग चों हरि संग अखियां जोड़ ॥
व्याख्या :- ब्रह्मज्ञानी साहिब-ए-कमाल सद्गुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक संत गुरदेव सिंह जी गिल, पावन वाणी "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत वाणी" के उपरोक्त श्लोक में मनुष्य को जीवन के असली उद्देश्य के प्रति सचेत कर रहे हैं। आध्यात्मिकता में मनुष्य को एक 'वंजारा' (व्यापारी/बंजारा) माना गया है, जो सासों की पूँजी लेकर इस संसार रूपी बाज़ार में आया है। सतगुरु जी समझाते हैं कि यदि व्यापारी सही सौदा नहीं करेगा, तो वह अपनी पूँजी गँवाकर खाली हाथ लौटेगा। मनुष्य अक्सर ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और लोभ-मोह जैसे 'कुमंदड़े' (बुरे कर्मों के जाल) में फँसा रहता है। महाराज जी फरमाते हैं कि जब तक इन बुरे कर्मों का पीछा नहीं छोड़ा जाता, तब तक आत्मिक उन्नति संभव नहीं है। दुनियावी धन-दौलत सिर्फ शारीरिक सुखों के लिए है, लेकिन मृत्यु के बाद जो साथ जाता है, वह है 'नाम की कमाई'। यदि इस जीवन में कुछ खटना (कमाना) है, तो वह केवल नेकी और बंदगी है। सतगुरू जी कहते हैं कि अपनी सुरति (ध्यान) को परमात्मा के नाम के साथ जोड़कर उसके रंग में रंगे जाओ।

॥ वाल्मीकि दुनिया के राजा जग विच सभ रंग तेरे ॥ पढ़ कर तेरी अमृत बाणी हुंदे दूर हनेरे ॥ व्याख्या :- ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए...
24/04/2026

॥ वाल्मीकि दुनिया के राजा जग विच सभ रंग तेरे ॥ पढ़ कर तेरी अमृत बाणी हुंदे दूर हनेरे ॥
व्याख्या :- ब्रह्म ज्ञानी साहिब-ए-कमाल सतगुरु ज्ञान नाथ महाराज जी के चरण सेवक, संत गुरदेव सिंह जी गिल, पावन वाणी "जगतगुरु वाल्मीकि महाराज जी की अमृत वाणी" के उपरोक्त श्लोक में परम पिता परमात्मा वाल्मीकि जी की महिमा और उनकी पवित्र वाणी के महत्व को दर्शाते हुए समझाते हैं कि हे भगवान वाल्मीकि जी! आप इस सारी दुनिया के मालिक (राजा) हैं। इस संसार में जो भी रौनक, रंग और खुशहाली नज़र आ रही है, वह सब आपकी ही कृपा और आशीर्वाद है। सारी सृष्टि में आपका ही नूर (प्रकाश) व्याप्त है। हे प्रभु! जब कोई मनुष्य आपकी अमृत के समान पवित्र वाणी (श्री रामायण और श्री योग वशिष्ठ महा रामायण) का पाठ करता है, तो उसके जीवन से अज्ञानता का अंधकार समाप्त हो जाता है ।जिस प्रकार सूर्य के उदय होने से रात का अंधेरा मिट जाता है, उसी प्रकार आपके ज्ञान से मन आलोकित हो जाता है और सभी दुःख-कष्ट दूर हो जाते हैं। Prabhu Valmiki Ashram Matili Rathan

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