12/04/2020
गुरु का लंगर, 'किसी अमीर का किसी गरीब को' दान नहीं है।
'एक ख़ुराक' गुरू का लंगर तब बनती है जब भाव यह हो कि 'खाने वाला' और 'मैं' एक ही हैं। एक ही मिट्टी से बने हैं और एक ही प्रभु सबके अंदर बैठा है। सबमें, एक जितना ही बैठा है, न किसी में कम न ज्यादा, भले ही धर्म, जाति, रंग, नस्ल, भाषा कोई भी हो।
इसी लिए सिक्ख लंगर परोसते वख्त 'खाने वालों' को वाहेगुरु यानि प्रभु कहकर पुकारते हैं तभी तो कहते हैं "रोटी वाहेगुरु"। भोजन खाने वाला भी जब रोटी माँगता है तो "वाहेगुरू जी रोटी" कहता है जिसका अर्थ इस भाव से है कि मुझे परोसने वाला भी ईश्वर स्वंय ही है।
गुरू का संदेश है कि दाता होने का कोई अहंकार न हो और मदद लेने वाले में हीनता का भाव भी न हो।
आशा है इस आपदा की घड़ी में हम सब 'बाँट कर खाने' के गुरू नानक के सिद्धान्त को जियें। यहाँ खुद खा कर, 'बचा हुआ' बांटने को नहीं , 'बाँट कर, खाने' को कहा है।
दुनिया में सब संसाधनों का मालिक एक है और यह सबके साँझे हैं, हमारा तो कब्जा ही है।
हम स्वंय दाता न बनें, 'दाता' को उसके जीवों में पहचाने।
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