27/03/2017
[24/03 11:00 pm] sonam mayank57: *शोभा डे नाम की एक प्रख्यात लेखिका की टिप्पणी* -
*"मांस तो मांस ही होता है,*
*चाहे गाय का हो,*
*या बकरे का,*
*या किसी अन्य जानवर* *का......।*
*फिर,*
*हिन्दू लोग जानवरों के प्रति* *अलग-अलग व्यवहार कर के*
*क्यों ढोंग करते है कि बकरा* *काटो,*
*पर, गाय मत काटो ।*
*ये उनकी मूर्खता है कि नहीं......?"*
*जवाब -1.*
बिल्कुल ठीक कहा शोभा जी आप ने ।
मर्द तो मर्द ही होता है,
चाहे वो भाई हो,
या
पति,
या
बाप,
या
बेटा ।
फिर, *तीनो के साथ आप अलग-अलग व्यवहार क्यों करती हैं ?*
*क्या सन्तान पैदा करने,
या यौन-सुख पाने के लिए पति जरुरी है ?*
भाई, बेटा, या बाप के साथ भी वही व्यवहार किया जा सकता है,
जो आप अपने पति के साथ करती हैं ।
*ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं.....?*
*जवाब-2.*
घर में आप अपने बच्चों और अपने पति को खाने-नाश्ते में दूध तो देती ही होंगी, या चाय-कॉफी तो बनाती ही होंगी...!
जाहिर है, वो दूध गाय, या भैंस का ही होगा ।
तो, क्या आप कुतिया का भी दूध उनको पिला सकती हैं, या कुतिया के दूध की भी चाय-कॉफी बना सकती हैं..?
क्यों नही ? दूध तो दूध है , चाहे वो किसी का भी हो..!
*ये आप की मूर्खता और आप का ढोंग है कि नहीं......?*
*प्रश्न मांस का नहीं, आस्था और भावना का*
*है ।*
जिस तरह, भाई, पति, बेटा, बेटी, बहन, माँ, आदि रिश्तों के पुरुषों-महिलाओं से हमारे सम्बन्ध मात्र एक पुरुष, या मात्र एक स्त्री होने के आधार पर न चल कर भावना और आस्था के आधार पर संचालित होते हैं,
उसी प्रकार गाय, बकरे, या अन्य पशु भी हमारी भावना के आधार पर व्यवहृत होते
हैं ।
*जवाब - 3.*
एक अंग्रेज ने स्वामी विवेकानन्द से पूछा -
"सब से अच्छा दूध किस जानवर का होता है ?"
स्वामी विवेकानंद -
"भैँस का ।"
अंग्रेज -
"परन्तु आप भारतीय तो गाय को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं न.....?"
स्वामी विवेकानन्द कहा -
"आप ने "दूध" के बारे मे पुछा है जनाब, "अमृत" के बारे में नहीं,
और दूसरी बात,
आप ने जानवर के बारे मेँ पूछा था ।
*गाय तो हमारी 'माता' है,*
*कोई जानवर नहीं ।"*
*इसी विषय में एक सवाल :-*
"Save tiger" कहने वाले समाज सेवी होते हैं
और
"Save Dogs" कहने वाले पशु प्रेमी होते हैं ।
तब,
*"Save Cow" कहने वाले कट्टरपन्थी कैसे हो गये.....?*
इसका जवाब अगर किसी के पास हो, तो बताने की ज़रूर कृपा करे ।प्लीज आगे शेयर करे अगर आपको भी मेरे मत से सहमत है l
अगर आप शोभा डे के मत से प्रभावित है तो शेयर मत कीजिये ।
[25/03 3:44 pm] Duga Sir: *🌸 कर्म भोग 🌸*
★ पूर्व जन्मों के कर्मों से ही हमें इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, सब मिलते हैं । क्योंकि इन सबको हमें या तो कुछ देना होता है या इनसे कुछ लेना होता है ।
★ *सन्तान के रुप में कौन आता है ?*
★ वेसे ही सन्तान के रुप में हमारा कोई पूर्वजन्म का 'सम्बन्धी' ही आकर जन्म लेता है । जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है --
★ *ऋणानुबन्ध :* पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे आपने ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह आपके घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और आपका धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये ।
★ *शत्रु पुत्र :* पूर्व जन्म का कोई दुश्मन आपसे बदला लेने के लिये आपके घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा । हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा ।
★ *उदासीन पुत्र :* इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है । बस, उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है । विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं ।
★ *सेवक पुत्र :* पूर्व जन्म में यदि आपने किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए आपका पुत्र या पुत्री बनकर आता है और आपकी सेवा करता है । जो बोया है, वही तो काटोगे । अपने माँ-बाप की सेवा की है तो ही आपकी औलाद बुढ़ापे में आपकी सेवा करेगी, वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा ।
★ आप यह ना समझें कि यह सब बातें केवल मनुष्य पर ही लागू होती हैं । इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है । जैसे आपने किसी गाय कि निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है । यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी । यदि आपने किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह आपके जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और आपसे बदला लेगा ।
★ इसलिये जीवन में कभी किसी का बुरा ना करें । क्योंकि प्रकृति का नियम है कि आप जो भी करोगे, उसे वह आपको इस जन्म में या अगले जन्म में सौ गुना वापिस करके देगी । यदि आपने किसी को एक रुपया दिया है तो समझो आपके खाते में सौ रुपये जमा हो गये हैं । यदि आपने किसी का एक रुपया छीना है तो समझो आपकी जमा राशि से सौ रुपये निकल गये ।
★ ज़रा सोचिये, "आप कौन सा धन साथ लेकर आये थे और कितना साथ लेकर जाओगे ? जो चले गये, वो कितना सोना-चाँदी साथ ले गये ? मरने पर जो सोना-चाँदी, धन-दौलत बैंक में पड़ा रह गया, समझो वो व्यर्थ ही कमाया । औलाद अगर अच्छी और लायक है तो उसके लिए कुछ भी छोड़कर जाने की जरुरत नहीं है, खुद ही खा-कमा लेगी और औलाद अगर बिगड़ी या नालायक है तो उसके लिए जितना मर्ज़ी धन छोड़कर जाओ, वह चंद दिनों में सब बरबाद करके ही चैन लेगी ।"
★ मैं, मेरा, तेरा और सारा धन यहीं का यहीं धरा रह जायेगा, कुछ भी साथ नहीं जायेगा । साथ यदि कुछ जायेगा भी तो सिर्फ *नेकियाँ* ही साथ जायेंगी । इसलिए जितना हो सके *नेकी* कर, *सतकर्म* कर ।
🙏🏼 *श्रीमद्भभगवतगीता।* 🙏🏼
🌸 *जय श्री कृष्ण* 🌸
[26/03 12:11 pm] Duga Sir: *आयो लाल झूलेलाल*--१
*-राधा कृष्ण भागिया*
महाभारत के भयंकर युद्ध का दृश्य। भारतवर्ष के लगभग सभी महान प्रतापी योद्धा एक-दूसरे को समाप्त करने को तैयार खड़े थे। पाप तब अपनी चरम सीमा पर पहंुच चुका था, तब अर्जुन और विश्व को भगवान श्री कृष्ण ने संसार की रक्षा के लिए यह संदेश दिया था-
*'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत*।
*अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम*।।
*परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम*।
*धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे*।।'
ठीक इसी तरह सिन्धु नदी के किनारे सिन्ध के लाखों पीडि़त हिन्दुओं के समक्ष जल से आकाशवाणी हुई कि 'हिन्दू भक्तो, तुम निश्चिन्त होकर अपने घर जाओ, अपने धर्म पर दृढ़ रहो, मैं शीर्घ ही नसरपुर मंे जन्म लूंगा और तुम्हारे सारे संकट दूर कर धर्म की स्थापना करुंगा।'
*यह कथा है कि करीब 900 वर्ष पहले, जब सिन्ध पर इस्लाम मजहब का राज हो चुका था। उस समय मकरब खान नाम का अत्यन्त अत्याचारी, अहंकारी, मतांध मुस्लिम सम्राट सिन्ध पर राज करता था, जो बाद में स्वयं को मरखशाह के नाम से बुलवाने लगा।*
वह कट्टर मुसलमान एवं यातना देने वाला था। उसने हिन्दुओं को समाप्त करने का आदेश जारी किया था कि सभी हिन्दू अपना धर्म छोड़कर इस्लाम मजहब स्वीकार करें। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो अपने भगवान को प्रत्यक्ष रूप में प्रमाणित करें नहीं तो जबरन उनका मतान्तरण कर दिया जाएगा।
*यही नहीं, मतांतरण नहीं करने वालों को मार दिया जाएगा। इससे पूरे प्रान्त की जनता घबरा गई और चारों ओर खलबली मच गई। इससे भयभीत होकर सभी सिन्ध प्रान्त की हिन्दू संत मंडलियां सिन्धी पंचायती मंत्री से मिलीं।*
उन्होंने हाथ जोड़कर सात दिनों का समय मांगा, बड़ी आनाकानी के बाद उन्हें मरखशाह ने मात्र 3 दिन का समय दिया।
*इस बीच सभी हिन्दू सिन्धु नदी के तट पर वरुण देवता से दया की गुहार करने लगे। किसी के हाथ मंे तबला, किसी के मंजीरा, किसी के हाथ में झंडे तो किसी के हाथ में ढोलक थी। माताएं-बहनें भजन-कीर्तन करने लगीं और भूखे-प्यासे बड़ों से लेकर बच्चों तक किसी ने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया।*
इस तरह तीन दिन बीत गए, लेकिन भक्तों का विश्वास नहीं डगमगाया और वे भक्ति के मार्ग पर डटे रहे और दया की विनती करते रहे। अंत में तीसरा दिन बीतने से पहले सिन्धु नदी में जोरदार उछाल आया और आकाशवाणी हुई कि ह्यहिन्दू भक्तों तुम सभी अपने घर जाओ, अपने धर्म पर दृढ़ रहो, तुम्हारे संकट दूर करने के लिए मैं सात दिन में नसरपुर में जन्म लूंगा। इतना कहकर सिन्धु नदी में प्रकट हुई वरुण देव की वह छवि गायब हो गई।
*आकाशवाणी सुनकर सभी हिन्दू नाच उठे और हर्षोल्लास से वरुण देव की जय-जयकार करते हुए अपने घर को चले गए। इस बीच भविष्यवाणी को मरखशाह के जासूसों ने भी सुना था और उन्होंने तुरंत सारी बात सम्राट को बता दी।*
यह सुनकर सम्राट ने नसरपुर में जन्म लेने वाले बच्चे पर निगरानी रखने का अपने जासूसों को आदेश दिया। ठीक सात दिन बाद सम्वत 1117 चैत्र शुल्क मास की दूसरी तिथि को नसरपुर में रतनलाल और देवकी के घर एक अत्यन्त रूपवान तेजस्वी बालक ने जन्म लिया। वह बालक न रोया, न उसने मां का दूध पिया और न ही उसने पानी पिया।
*सिन्धु नदी का जल जब उसके मुख में डाला गया, तब जाकर उसने अपनी क्रियाएं शुरू कीं। एक दिन मरखशाह का मंत्री बालक के जन्म लेने की सूचना मिलने पर नसरपुर पहंुच गया। वहां रतनलाल के घर जाकर उसने बच्चे को देखने की इच्छा प्रकट की।*
क्रमशः