Satyapath

Satyapath सनातन वैदिक धर्म के ज्ञान के प्रचार व ?

25/09/2018

सनातन वैदिक धर्म के कुछ वाक्य –

१. येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:। ते मृत्युलोके भुवि भारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति।। (उपनिषद)

अर्थ : जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, वह मनुष्य ऐसा जीवन व्यतीत करते हैं जैसे एक मृग। अर्थात जिस मनुष्य ने किसी भी प्रकार से विद्या अध्ययन नहीं किया, न ही उसने व्रत और तप किया, थोड़ा बहुत अन्न-वस्त्र-धन या विद्या दान नहीं दिया, न उसमें किसी भी प्रकार का ज्ञान है, न शील है, न गुण है और न धर्म है, ऐसे मनुष्य इस धरती पर भार होते हैं। मनुष्य रूप में होते हुए भी पशु के समान जीवन व्यतीत करते हैं।

२. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ -वृहदारण्यक उपनिषद

अर्थ : वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा सभी प्रकार से सदा सर्वदा परिपूर्ण है। यह जगत भी उस परब्रह्म से ही पूर्ण है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत पूर्ण होने पर भी वह परब्रह्म परिपूर्ण है। उस पूर्ण में से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही शेष रहता है।

३. शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।। -उपनिषद

अर्थ : शरीर ही सभी धर्मों (कर्तव्यों) को पूरा करने का साधन है। अर्थात शरीर को सेहतमंद बनाए रखना जरूरी है। इसी के होने से सभी का होना है अत: शरीर की रक्षा और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है। पहला सुख निरोगी काया।

४. आहार केवल मात्र वही नहीं जो मुख से लिया जाए, आहार का अभिप्राय है स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर को पुष्ट और स्वस्थ रखने के लिए इस संसार से जो भी खाद्य लिया जाए।
आहार शुद्धि से प्राणों के सत की शुद्धि होती है, सत्व शुद्धि से स्मृति निर्मल और स्थिरमति (जिसे प्रज्ञा कहते हैं) प्राप्त होती है। स्थिर बुद्धि से जन्म-जन्मांतर के बंधनों और ग्रंथियों का नाश होता है और बंधनों और ग्रंथियों से मुक्ति ही मोक्ष है। अत: आहार शुद्धि प्रथम नियम और प्रतिबद्धता है।
1. कान के लिए आहार है शब्द या ध्वनि।
2. त्वचा के लिए आहार है स्पर्श।
3. नेत्रों के लिए आहार है दृश्य या रूप जगत।
4. नाक के लिए आहार है गंध या सुगंध।
5. जिह्वा के लिए आहार है अन्न और रस।
6. मन के लिए आहार है उत्तम विचार और ध्यान।
ज्ञानेन्द्रियों के जो 5 दोष हैं जिससे चेतना में विकार पैदा होता है, उनसे बचें।

५. प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनं। तृतीयेनार्जितः कीर्तिः चतुर्थे किं करिष्यति।।

अर्थ : जिसने प्रथम अर्थात ब्रह्मचर्य आश्रम में विद्या अर्जित नहीं की, द्वितीय अर्थात गृहस्थ आश्रम में धन अर्जित नहीं किया, तृतीय अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में कीर्ति अर्जित नहीं की, वह चतुर्थ अर्थात संन्यास आश्रम में क्या करेगा‚ मात्र लोगों को भ्रमित करेगा व निश्चित मृत्यु को प्राप्त अपने कर्मों के फल भोगेगा।

६. ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ (कठोपनिषद)

अर्थ : परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें। हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए। हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें। हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। उक्त तरह की भावना रखने वाले का मन निर्मल रहता है। निर्मल मन से निर्मल भविष्य का उदय होता है।

04/08/2018

सर्वप्रथम क्षमा जो इतने दिन लिख नही पाया आज –

1.१० धर्म से सम्बन्धित :
क्रमशः ......................

इसके पूर्व में हमने बहुत जी बातों को जानते हुए योग के बारे में जान रहे थे व संक्षिप्त रूप में योग के दों अंगों को परिभाषित किया था‚ अब बाकी के ६ अंग –

3. आसन
यहां आसन का मतलब है आसान करना अर्थात् सरल करना। योग के इस अंग के द्वारा व्यक्ति विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाओं को करता हुआ शरीर के बाह्य व आंतरिक दोनों अंगों को सुदृढ व मजबूत करते हुए शुद्ध करता है ताकि शरीर के लिए बहुत से कार्य आसान हो जाएँ अर्थात्
विषम से विषम परिस्थितियों में पूण शारीरिक नियत्रण के लिए। आसन बहुत सारे हैं, जैसे चक्रासन, भुजङ्गासन, धनुरासन, गर्भासन, गरुडासन, गोमुखासन, हलासन, मकरासन, मत्स्यासन, पद्मासन, पश्चिमोत्तानासन, सर्वाङ्गासिद्धासन, सिंहासन, शीर्षासन, सुखासन, ताडासन, उड्डीयानबन्ध, वज्रासन, पवनमुक्तासन, कटिपिण्डमर्दनासन, अर्धमत्स्येन्द्रासन, योगमुद्रासन, गोरक्षासन या भद्रासन, मयूरासन, सुप्तवज्रासन, शवासन इत्यादि। इन सभी आसनों को भली भाँति करने के लिए आपको जरूरत होगी समय और संयम व सीखने हेतु एक प्रमाणित विद्वान गुरू की।

4. प्राणायाम
इस कथित प्राणायाम अंग के जरिए श्वास-लेने सम्बन्धी खास तकनीकों द्वारा प्राण पर नियंत्रण किया जाता है इसीलिए इस अंग को प्राणायाम कहते हैं। श्वास-लेने सम्बन्धी तकनीके भी बहुत सी हैं। यहां बात करते हैं कुछ जाने-माने प्राणायामों के बारे में। भ्रष्टिका प्राणायाम, कपालभाति प्राणायाम, बाह्य प्राणायाम, अनुलोम-विलोम प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, उद्गीथ प्राणायाम आदि।

5. प्रत्याहार
हमारी आँख देखने का कार्य करती है, नाक सूंघने का,कान सुनने का, जीभ से स्वाद का पता चलता है और त्वचा से स्पर्श का अनुभव होता है ! ये इंद्रिया विषयों की ओर जाकर अपनी प्रिय चीज की तलाश में रहती है जैसे हमारी आँख अच्छा दृश्य देखना पसंद करती है और ये देखना हमारी वासना व इच्छा पर निर्भर करता है असलियत में दृश्य तो आँख के पीछे बैठा मन देखना चाहता है, क्योंकि आँख तो केवल एक माध्यम है उस द्रश्य में आँख की पसंद ना पसंद कुछ नहीं होती,
इन्द्रियों को अंतर्मुखी करना महर्षि पतंजलि के अनुसार जो इन्द्रियां चित्त को चंचल कर रही हैं, उन इन्द्रियों का विषयों से हट कर एकाग्र हुए चित्त के स्वरूप का अनुकरण करना प्रत्याहार है। प्रत्याहार से इन्द्रियां वश में रहती हैं और उन पर पूर्ण विजय प्राप्त हो जाती है।
(प्रत्याहार की मदद से इन्द्रियों को अंतर्मुखी किया जाता है। उनपर काबू पाया जाता है। प्रत्याहार योग का पांचवां चरण है। योग मार्ग का साधक जब यम (मन के संयम), नियम (शारीरिक संयम) रखकर एक आसन में स्थिर बैठकर अपने वायु रूप प्राण पर काबू पाना सीखता है, तब उसके विवेक को ढंकने वाले अज्ञान का अंत होता है, तब जाकर मन प्रत्याहार और धारणा के लिए तैयार होता है। चेतना, शरीर और मन से ऊपर उठकर अपने स्वरूप में रुक जाने की स्थिति है प्रत्याहार। प्राणायाम तक योग साधना आंखों से दिखाई देती है। प्रत्याहार का मतलब है एक ओर खींचना। सवाल उठता है किसको खींचा जाना, तो मन को। योग दर्शन के अनुसार मन इंद्रियों के माध्यम से जगत के भोगों के पीछे दौड़ता है। उसे इस दौड़ से रोककर इंद्रियों के अधीन से मुक्त करना, भीतर की ओर खींचना प्रत्याहार है।)

6. धारणा
एकाग्रचित्त होना अपने मन को वश में करना।
(धारणा का मतलब है एकाग्रचित्त होना। धारणा अष्टांग योग का छठा चरण है। इससे पहले पांच चरण योग में बाहरी साधन माने गए हैं। इसके बाद सातवें चरण में ध्यान और आठवें में समाधि की अवस्था आ जाती है। धारणा का मतलब है संभालना, थामना या सहारा देना। मतलब किसी स्थान (मन के भीतर या बाहर) विशेष पर चित्त को स्थिर करने का नाम धारणा है। स्थिर हुए चित्त को एक जगह पर रोक लेना ही धारणा है। कुल मिलाकर धारणा धैर्य की स्थिति है।)

7. ध्यान
निरंतर ध्यान
(इसके अंतर्गत जरूरत होती है निरंतर ध्यान की। योग साधना का सातवां चरण है। योगी प्रत्याहार से इंद्रियों को चित्त में स्थिर करता है और धारणा की मदद से उसे एक स्थान पर बांध लेता है। इसके बाद ध्यान की स्थिति आती है। धारणा की निरंतरता ही ध्यान कहलाती है। यह मन की बेहद सूक्ष्म स्थिति है, जहां जाग्रतिपूर्वक एक वृत्ति को प्रवाह में रहना होता है। धारण और ध्यान से मिली एकाग्रता चेतना को अहंकार से मुक्त करती है। यही चेतनता का पूर्ण बोध आखिर में समाधि बन जाती है।)

8. समाधि
आत्मा से जुड़ना : शब्दों से परे परम-चैतन्य की अवस्था हम सभी समाधि का अनुभव करें !!!
(अष्टांग योग का आखिरी चरण समाधि है। यह चेतना का वह स्तर है, जहां इंसान पूर्ण मुक्ति का अनुभव करता है। योग शास्त्र के अनुसार ध्यान की सिद्धि होना ही समाधि है। समाधि अनुभूति की अवस्था है। वह शब्द, विचार व दर्शन सबसे परे है। इस स्थिति में मन उन गूढ़ विषयों का भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जो साधारण अवस्था में बुद्धि से प्राप्त नहीं होते। समाधि और नींद में हमें एक जैसी अवस्था प्रतीत होती है, दोनों में हमारा (बाह्य) स्वरूप सुप्त हो जाता है। जब कोई गहरी नींद में सोया रहता है, तब वह ज्ञान या चेतन की निम्न भूमि में चला जाता है। नींद से उठने पर वह पहले जैसे ही रहता है। उसमें कोई बदलाव नहीं होता, लेकिन जब मनुष्य समाधि में होता है, समाधि से वह महाज्ञानी होकर जागता है।)

16/07/2018

1.१० धर्म से सम्बन्धित :
क्रमशः ......................

इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए सभी आर्य (सज्जन व विनर्म अर्थात् श्रेष्ठ) मनुष्यों को बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनने के लिए कहा गया है। लेकिन बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुण की प्राप्ति कैसे हो यह भी जाना व जिन लक्षणों की आवश्यकता है वे कौन कौन से हैं।

यह समस्त लक्षण जिस पथ पर पूर्ण होते हैं उस पथ का नाम योग है‚ और इसके आठ चरण हैं‚ यहाँ तक हमने जाना था। अब योग क्या है उसके आठ चरण कौन कौन से हैं उनके क्या नियम हैं। यह जानेंगे।

"योग" अर्थात् जोड‚ महर्षि पातंजलि जी ने गहन शोध के बाद आठ चरणों को परिभाषित किया और उन आठों चरणों को जोडकर एक नाम दिया "योग"। क्योंकि इसके आठों चरण व्यक्ति को लौकिक व परलौकिक दोनो भागों से जोडते हैं। इस योग को आर्य मनुष्यों द्वारा अपनी प्रतिदिन व प्रतिक्षण की दिनचर्या में शामिल करना आवश्यक है तभी कोई मनुष्य वास्तविक मनुष्य बन पाएगा व इस संसार के अनेक अप्रकटीय रहस्यों से स्वयं के भीतर से ही परिचित हो सकेगा।

योग अर्थात् अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग) को आठ अलग-अलग चरणों वाला मार्ग नहीं समझना चाहिए बल्कि यह आठ आयामों वाला "योग" नाम से एक मार्ग है‚ जिसमें आठों आयामों का अभ्यास एक साथ किया जाता है।
योग के आठ अंग इस प्रकार हैं –
१) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि

1. यम– यम अर्थात् नैतिकता‚ मतलब मनुष्यों को पूर्ण रूपेण नैतिक होना चाहिए अर्थात् हमें वैसा व्यवहार दूसरो के साथ नही करना चाहिए जो हमें स्वयं के साथ पसंद नही I इस यम अंग में ५ भाग हैं‚ जो इस प्रकार हैं –
1. अहिंसा – बिना किसी उचित कारण के मन से‚ वाणी से व शरीर से किसी के भी प्रति हिंसा न करना अर्थात् न गलत सोचना न बोलना न करना।
2. सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना
3. अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना अर्थात् ऐसे विचार का नाश करना।
4. ब्रह्मचर्य – इसके दो अर्थ हैं:
• चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना।
• सभी इन्द्रिय-जनित सुखों को शास्त्रों के नियमानुसार भोगना।
5. अपरिग्रह – जीवन जीने की आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करना।

2. नियम – पाँच प्रकार की व्यक्तिगत नैतिकता
1. शौच – अर्थात शरीर और मन की शुद्धि मतलब पवित्रता
2. संतोष – स्वं कर्मों से प्राप्त वाली स्थिति में सन्तुष्ट रहना
3. तप – शास्त्रों के अनुसार स्वयं को नियमों के अनुसार चलाने की दृढता तप कहलाती है।
4. स्वाध्याय – विद्वानों के लिखित ग्रथों का अध्ययन व स्वयं में मनन व चिंतन करना।
5. ईश्वर-प्रणिधान – ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करते हुए उसके प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए स्वयं के समर्पण का भाव रखना।

आगे के ६ अंगों का अर्थ जारी ............

10/07/2018

1.९ धर्म से सम्बन्धित :
क्रमशः ......................

इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए और इसके लिए मनुष्यों को कहा गया है कि तुम बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनो‚ प्रमाण हेतु ऋग्वेद के कुछ प्रमाण भी हमने देखे।

आइए अब विचार करते हैं कि कैसे हम ईश्वरीय आदेश के अनुसार धर्म पालन के साथ साथ धर्म की स्थापना हेतु बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुणों की प्राप्ति करें ........।

तो जानिए कि शारीरिक बल की प्राप्ति होती है शरीर के बाह्य व आन्तरिक अंगों के स्वस्थ व पुष्ट होने से‚ जिसके लिए एक पूण शुद्ध वातावरण में मनुष्य की दिनचर्या में नियमित रूप से शुद्ध सात्विक आहार व विभिन्न प्रकार की शारीरिक क्रियाओं का करना आवश्यक है जिसके लिए मनुष्य को कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है। इस प्रकार से सिद्ध होता है कि
आर्य (श्रेष्ठ) मनुष्यों को शुद्ध वातावरण का निर्माण करना भी मनुष्य के लिए अत्यावश्यक है।

शक्ति गुण अर्थात् कितने अन्य मनुष्य जन आपके सुख व दुःख में सहभागिता करने के लिए प्रत्येक क्षण तैयार हैं‚ मनुष्य इस शक्ति गुण की प्राप्ति प्रेम‚ परोपकार व न्याय सत् लक्षणों के द्वारा करता है।

ज्ञान गुण की प्राप्ति शुद्ध वातारवरण‚ सात्विक आहार‚ स्वाध्याय व चिंतन मनन एवं विद्वानों का संग व उनसे तर्कसंगत चर्चा के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति होती है।

धन की प्राप्ति के लिए उपर्युक्त तीनों प्रकार के नियमों का पालन करते हुए परिश्रम की आवश्यकता होती है। धन प्राप्त करना ही महत्वपूण नही है बल्कि उसकी सुरक्षा व उसका निर्भयता पूण भोग करते हुए उस धन का प्रयोग धर्म स्थापना में भी आवश्यक है ताकि वह धन आपको धन्य कर सके। जो धन आपको मानसिक रूप से संतुष्ट न कर सके‚ समाज में आपकी यश‚ कीर्ति व प्रतिष्ठा स्थापित न कर सके‚ समाज में लोगों द्वारा आपकाे सम्मान न दिला सके‚ सबसे महत्वपूर्ण कि धर्म पालन व धर्म स्थापना में प्रयोग न हो सके‚ इस प्रकार का धन कूडे के ढेर के अतिरिक्त अन्य कुछ नही‚ और ऐसा धन आन्तरिक व बाह्य रूप से आपका शत्रु साबित होता है।

अब हमने जाना कि बल‚ शक्ति‚ ज्ञान व धन गुणों की प्राप्ति कैसे होती है परंतु प्रश्न उठता है कि
आखिर किस पथ पर अग्रसर हुआ जाय जो इन चारों गुणों की प्राप्ति के लिए इनके समस्त नियमों का पूर्ण किया जा सके व धर्म पालन व धर्म स्थापना दोनों कार्य हो सके। तो इसके लिए हमारे एक महान विद्‍वान ऋषि महाराज पातंजलि जी ने आठ चरणों का एक नियमरूपी मार्ग प्रशस्त किया है जिसका प्रसिद्ध नाम "योग" है।

यह योग क्या है‚ इसके कौन कौन से आठ चरण है उनके क्या नियम है यह हम आगे जानेंगे .......।

1.८ धर्म से सम्बन्धित (द्धितीय) :जारी ......................बल‚ शक्ति‚ धन व ज्ञान इन गुणों में धन प्राप्ति किस प्रकार की...
07/07/2018

1.८ धर्म से सम्बन्धित (द्धितीय) :
जारी ......................

बल‚ शक्ति‚ धन व ज्ञान इन गुणों में धन प्राप्ति किस प्रकार की होनी चाहिए ऋग्वेद के ऋषि इस बारे में स्पष्ट करते हैं‚ इस प्रकार के वेदों में कई प्रकार के श्लोक हैं परंतु सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद का मण्डल १‚ सूक्त १८५ का १९३३ वाँ संलग्न श्लोक अर्थ सहित देखिए कि ऋषि किस प्रकार के धन वैभव की कामना कर रहे हैं –

1.८ धर्म से सम्बन्धित (प्रथम) :क्रमशः ......................इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसा...
07/07/2018

1.८ धर्म से सम्बन्धित (प्रथम) :
क्रमशः ......................

इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषियों की वाणी के माध्यम से मनुष्यों को ईश्वर का आदेश है कि धर्म पालन के साथ – साथ धर्म की स्थापना के लिए और इसके लिए मनुष्यों को कहा गया है कि तुम बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान और ज्ञानवान बनो‚ जिसमें ईश्वर आदेश के अनुसार आर्य (श्रेष्ठ) मनुष्यों के लिए तो यह परम आवश्यक है क्योंकि एक कमजोर व्यक्ति धर्म लक्षणों का पालन तो कर सकता है परंतु उन धर्म लक्षणों की स्थापना का कार्य कदापि नही कर सकता। पवित्र वेदों के अनुसार धर्म स्थापना के कार्य का परित्याग कर मात्र धर्म पालन का कार्य मनुष्य के जीवन के वास्तविक उद्देश्य का अपूण पथ है‚ इसलिए लिए वेदों में देवताओं से बल‚ शक्ति‚ धन व ज्ञान की प्राप्ति के कई श्लोक हैं और जिनका प्रारम्भ सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद के प्रथम मण्डल से ही हो जाता है। उदाहरणार्थ –

ऋग्वेद के मण्डल १‚ सूक्त ५ के श्लोक ३९ व ४३ जो इस लेख के साथ अर्थों सहित संलग्न है। पुष्टि हेतु पढें व स्वयं विचार करें।

04/07/2018

1.७ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

पूर्व के लेख में हमने जाना कि कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों के ऋषि वाणी के माध्यम से ईश्वर ने बताया है कि मनुष्यों में जन्म के अनुसार दो जातियाँ स्त्री व पुरूष हैं व गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार सभी मनुष्य ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र चार भागों अर्थात् वरणों में विभक्त हैं व इन सभी को धर्म का आचरण करना अनिवार्य है। धर्म क्या है इसको लेकर अति महान ऋषियों के विचारों से अवगत हुए।

आइए अब जानते हैं कि धर्म को लेकर वेदों की मनुष्यों को और क्या आज्ञाएँ हैं। पवित्र वेद मनुष्यों से धर्म के पालन व उसकी स्थापना दोनों की बात कहते हैं न कि मात्र धर्म के पालन को और इसके लिए वेदों में ऋषियों ने अनेक प्रकार की प्रार्थनाएँ भी कि हैं जिनका सार है कि हे ईश्वर हमें बलशाली‚ शक्तिशाली‚ धनवान व ज्ञानवान बनाओ। क्योंकि इस पृथ्वी पर बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान व ज्ञानवान व्यक्ति ही कुछ भी कर सकता है क्योंकि मात्र इन्ही चार प्रकार के मनुष्यों का प्रभाव होता है। इसलिए वेदों की शिक्षा के अनुसार धर्म के पालन व उसकी स्थापना के लिए प्रत्येक मनुष्य का बलवान‚ शक्तिवान‚ धनवान व ज्ञानवान बनना अति आवश्यक है क्योंकि इन चारों गुणों से क्षीण एक कमजोर व्यक्ति धर्म का पालन तो कर सकता है परंतु धर्म की स्थापना कदापि नही अतः वह पवित्र वेदों के ईश्वरीय वाणी के अनुसार ईश्वरीय व धर्म पथ पर पूणरूपेण अग्रसर नही हो सकता। और ऋषियों के अनुसार धर्म पालन श्रेष्ठ है परंतु इसके साथ ही धर्म की स्थापना का कार्य कई गुणा श्रेष्ठ कार्य है‚ यही कारण है कि हमारी सनातन संस्कृति में श्री राम‚ परशुराम व श्री कृष्ण आदि को भगवान तक का दर्जा दिया गया परंतु शायद ही किसी ऋषि को यह दर्जा दिया गया है।

वस्तुतः ये चारों गुण किसी एक व्यक्ति में मिलना अत्यंत कठिन है परंतु एक – एक गुण कोई भी मनुष्य प्राप्त कर सकता है जो वेदों के ऋषियों के अनुसार पृथ्वी के प्रत्येक आर्य (श्रेष्ठ अर्थात् सज्जन व विनम्र) मनुष्य के लिए अति आवश्यक है अन्यथा धर्म की स्थापना सम्भव ही नही। बलवान व शक्तिवान बनना‚ धनवान व ज्ञानवान बनने की अपेक्षा सहज है।

जैसे यदि कोई दुर्जन व्यक्ति कोई अधर्म का कार्य कर रहा है जिसके कारण अधर्म की महत्ता बढ रही है तो धर्म की स्थापना हेतु उसका प्रतिकार उपर्युक्त चारों गुणों वाला ही कोई कर सकता है‚ कमजोर नही।

जारी ............

03/07/2018

1.६ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

इसके पूर्व के लेख में हमने जाना कि सनातन वैदिक धर्म के अनुसार वेदों ने मनुष्यों को जन्म के अनुसार दो जातियों स्त्री व पुरूष एवं गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र चार भागों अर्थात् वरणों में बाँटा है। जिन्हे वेदों के अनुसार अपना सम्पूण जीवन सोलह संस्कारों के नियमों का पालन करते हुए व धर्मयुक्त आचरण धारण करते हुए जीना होता है‚ जो मनुष्य ऐसा करते हैं वेद उन्हे आर्य (श्रेष्ठ) कहते हैं और इन नियमों के विपरीत जाकर अधर्मयुक्त आचरण का जीवन जीते हैं वे अनार्य‚ दस्यु व असुर आदि कहे गए हैं। सोलह संस्कार कौन से हैं व उनके क्या नियम हैं इस पर बाद में लिखा जाएगा। इस समय धर्म क्या है इसको लेकर बताया जाएगा क्यों धर्म के बिना सब व्यर्थ है और वेदों के समस्त नियम मनुष्यों द्वारा पृथ्वी पर धर्म स्थापना के लिए ही हैं।

वेदों में धर्म को ईश्वर प्रदत्त व अति गूढ विषय बताया गया है जिसको लेकर समय समय पर सनातन वैदिक धर्म के कुछ विख्यात अति विद्‍वान ऋषियों ने अपने ज्ञानानुसार धर्म को परिभाषित किया है‚ तो आइए जानते हैं कि उनके अनुसार धर्म क्या है –

याज्ञवल्क्य ने धर्म के नौ (9) लक्षण गिनाए हैं:

अहिंसा सत्य मस्तेतयं शौचमिन्द्रि यनिग्रह: ।
दानं दमो दया शान्ति : सर्वेषां धर्मसाधनम्‌ ।।
(अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना) , दान, संयम (दम) , दया अर्थात् संसार के समस्त प्राणियों के प्रति समभाव एवं शान्ति‚ शान्ति अर्थात् संसार के समस्त प्राणियों से प्रेम की भावना)

महाभारत के महान् यशस्वी पात्र विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं -
इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ।

उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान् बन जाता है।

गौतम ऋषि कहते हैं -
'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।'
अर्थात् जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है।

महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥ (मनुस्मृरति ६.९२)

अर्थात् धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा की गयी गलतियों को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आन्तरिक एवं बाह्य शुचिता अर्थात् पवित्रता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्ति की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य अर्थात् न्याय, करूणा, परोपकार, समभाव, अभय, प्रेम आदि सतगुणों का पालन) और अक्रोध (अकारण क्रोध न करना)।
ये दस धर्म के लक्षण हैं .........।

जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥
अर्थात् धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो। अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।

वात्स्यायन के अनुसार धर्म

वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि मानव के लिए धर्म मनसा, वाचा और कर्मणा होता है। यह केवल क्रिया या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन और वाणी से भी संबंधित है।

शरीर का अधर्म : हिंसा, अस्तेय, प्रतिसिद्ध मैथुन
शरीर का धर्म : दान, परित्राण, परिचरण (दूसरों की सेवा करना)

बोले और लिखे गये शब्दों (वाणी) द्वारा अधर्म : मिथ्या, परुष, सूचना, असम्बन्ध
बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा धर्म : सत्व, हितवचन, प्रियवचन, स्वाध्याय (self study)

मन का अधर्म : परद्रोह, परद्रव्याभिप्सा (दूसरे का द्रव्य पा लेने की इच्छ), नास्तिक्य (denial of the existence of morals and religiosity)
मन का धर्म : दया, स्पृहा (disinterestedness), और श्रद्धा

महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

जो पुरूष धर्म का नाश करता है, धर्म उसी का नाश कर देता है। और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म भी उसकी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म (धर्म को नष्ट करने का प्रयास या इच्छा) कभी हमारा नाश न कर डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।

इन महान ऋषियों की परिभाषाओं के अनुसार यदि कहा जाय कि धर्म के इऩ लक्षणों अर्थात् परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि ऐसे कर्म जिनसे विश्व‚ राष्ट व समाज के समस्त प्राणियों व जीवनदायिनी प्रकृति का कल्याण होता है‚ वही धर्म है। वास्तव में धर्म प्राचीनकाल में "संविधान का पर्यायवाची" हुआ करता था। आज जिस प्रकार संविधान का उल्लंघन करने पर व्यक्ति कानून द्वारा "दंडित" किया जाता है उसी तरह प्राचीन वैदिक संस्कति की समाज व्यवस्था में "धर्म विपरीत" आचरण करने पर उस समय के कानून व समाज द्वारा दंडित किया जाता था यहाँ तक कि विषय अधिक गम्भीर होने पर व्यक्ति का "सामाजिक बहिष्कार" तक कर दिया जाता था व विषय अक्षम्य होने पर मृत्यु दण्ड तक का प्रावधान था।

ओउम् .......।

28/06/2018

1.5 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

इसके पूर्व के लेख में हमने सनातन धर्म के सरवोच्च पवित्र ग्रथ वेदों के बारें में यह जाना कि उनके ज्ञान को यथायोग्य समझने के लिए किस प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता है।

आइए अब हम जानते हैं कि वेदों की शिक्षाऍ क्या हैं।
वैसे तो ईश्वरीय वेद अनंत ज्ञान का भण्डार हैं जिन पर उनकी उत्पत्ति से ही शोध होते आए हैं जो आज भी जारी हैं। परंतु मनुष्यों को लेकर यदि देखा जाए तो भी वेद अनेक प्रकार की आज्ञाऍ देते हैं। आइए संक्षिप्त रूप से प्रारम्भ करते हैं।

वेद मनुष्यों को दो जातियों स्त्री व पुरूष व गुण‚ कर्म व ज्ञान के अनुसार चार भागों (वर्णों) ब्राह्मण‚ क्षत्रिय‚ वैश्य व शूद्र में विभाजित करते हैं।

जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात समाज में उसके प्रचार प्रसार को उद्दत हुआ वह ब्राह्मण।
प्रतिदिन वेद पढना व पढाना‚ प्रतिदिन यज्ञ करना व कराना‚ दान लेना व दान देना ये ब्राह्मणों के मुख्य छः कर्तव्य हैं जिनसे वह किसी भी दशा में विमुख नही हो सकता।

जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात अपने वीर स्वभाव के कारण राज्य व समाज की सुरक्षा का संकल्प लेकर दुर्जनों के हदय में भय व्याप्त करने अन्यथा उनके विनाश को उद्दत हुआ वह क्षत्रिय।

जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान का अर्जन किया व तत्पश्चात अपनी व्यवसायिक बुद्धि के कारण समाज व राज्य को नाना प्रकार की वस्तुओं से अवगत कराने के प्रण लिया और ईमानदारीपूर्वक इसको प्रारम्भ किया व कार्यान्यवयन किया व वैश्य।

जिसने बाल्यकाल से युवावस्था तक नियम व संयम से रहते हुए पवित्रता का पूण पालन करते हुए वेद व अन्य प्रकार के ज्ञान के अर्जन का प्रयास किया परंतु तीव्र बुद्धि न होने के कारण वह इसमें सफल न हो सका मात्र शारीरिक रूप से ही स्वयं को सबल बना सका और समाज को शारीरिक रूप से ही सेवा देने का प्रण लिया वह शूद्र (सेवा भाव वाला)।

और इन चारों वर्णों को अपना समस्त जीवन वेदों द्वारा निरधारित सोलह संस्कारों के नियमानुसार जीना होता है जो व्यक्ति की मृत्यु पर शरीर के नरमेध यज्ञ तक चलता है।

वेदों के अनुसार हमने चार वर्णों में विभक्त मनुष्यों के कार्यों के बारे में जाना व किस कार्य को करने वाले को क्या कहते हैं यह भी जाना। वेदों ने वर्णों के नियमानुसार अपना कार्य कर धर्मयुक्त जीवन जीने वालों को आर्य (श्रेष्ठ) कहा व वर्णों के नियमों के विपरीत जाकर अधर्मयुक्त कार्य कर जीवन जीने वालों को अनार्य कहा है।

क्रमश ...........

1.४ धर्म से सम्बन्धितःक्रमशः ......................पूर्व के लेख में हमने सनातन धर्म के सरवोच्च पवित्र ग्रथ वेदों के बारे...
20/06/2018

1.४ धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

पूर्व के लेख में हमने सनातन धर्म के सरवोच्च पवित्र ग्रथ वेदों के बारें बारें में जाना‚ लेख को संक्षिप्त करने के लिए वेदों व सनातन धर्म के अन्य पवित्र ज्ञान के प्रमाणिक ग्रंथों की जानकारी व उनके प्राप्तकर्ता व अन्य ग्रंथों के रचनाकारों की जानकारी के लिए इस लेख के साथ एक चित्र संलग्न है कृपया उसे भी देखें।

सर्वप्रथम आपको जानना चाहिए कि वेदों की भाषा संस्कृत है व उसकी लिपि ब्राह्मी है जबकि वर्तमान संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी है। कभी कभार अापने सुना होगा कि वेदों को स्वयं न पढकर किसी प्रमाणिक विद्वान से सुनना चाहिए व उन्ही के लिखित बातों को मानना चाहिए‚ न कि बिना ज्ञान के स्वयं उनका अर्थ निकालना चाहिए जैसे पूर्व में कुछ दुष्ट प्रकृति के लोगों ने बिना किसी नियम के इन पवित्र वेदों के अकाट्य ज्ञान का स्वयं के अनुसार अर्थ कर लोगों को भ्रमित किया जैसे – मैक्समूलर व सायण आदि। धन्य हो विरजानंद महाराज व उनके शिष्य दयानंद सरस्वती महाराज जी की जो आधुनिक काल मेें उन पवित्र वेदों की शिक्षाओं को नियमानुसार पढ उनके प्रमाणिक भाष्य का आगे बढाया। आइए जानते हैं कि वेदों में उल्लिखित ज्ञान को समझने के लिए क्या नियम हैं।
प्रमाणिक विद्वानों के अनुसार वेदों को स्वयं से पढकर समझने के लिए ये निम्न ग्रंथों का ज्ञान परम आवश्यक है‚ इन ग्रंथों के पढे बिना जो वेदों के श्लोकों का स्वयं भाष्य करते हैं वे अनुचित व पापयुक्त कार्य करते हैं।
वेदों के श्लोकों को स्वयं से समझने के लिए ये छः गंथों का ज्ञान होना परम आवश्यक है –

वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों के अंग। वेदांग हिन्दू धर्म ग्रंथ हैं, इनकी संख्या 6 है।
• शिक्षा
• व्याकरण
• ज्योतिष
• निरुक्त
• छंद
• कल्प

शिक्षा-
वैदिक मंत्रों के शुद्ध उच्चारण के लिये इसकी रचना हुई। इससे संबंधित प्राचीनतम ग्रन्थ – प्रतिशाख्य है।

व्याकरण-
वेदों में प्रयुक्त की गई संस्कृत – व्याकरण का सरलीकरण इसमें मिलता है। संबंधित ग्रंथ – पाणिनि का अष्टाध्यायी(5 वी. शता. ई.पू.)।

ज्योतिष-
शुभ – अशुभ तथा वैदिक यज्ञों में कर्मकांडों के शुभ- अशुभ फलों के प्रभाव को जानने के लिये ग्रह नक्षत्रों का अध्ययन किया जाता है। इससे संबंधित ग्रंथ – मागध मुनि का वेदांग ज्योतिष।

निरुक्त –
इसमें वैदिक साहित्य में प्रयुक्त कठिन शब्दों की व्युत्पत्ति मिलती है। इससे संबंधित ग्रंथ – निगंठु । इस ग्रंथ में वैदिक साहित्य के कठिन शब्द मिलते हैं।

छंद-
वैदिक साहित्य के मंत्रों के लिये प्रयुक्त किये गये विभिन्न छंदों का उल्लेख छंद नामक वेदांग में हुआ है। इससे संबंधित ग्रंथ-पिंगलमुनि का छंद सूत्र।

कल्प –
वैदिक साहित्य में प्रयुक्त विभिन्न प्रकार के कर्म – कांडों को कल्प सूत्र में लिखा गया है।
इसके 4 भाग हैं(कल्प को ही सूत्र साहित्य कहा गया है)-
1. धर्म सूत्र-
वैदिक समाज के सामाजिक नियम – कानून सूत्र रूप में मिलते हैं । इसमें
एक – एक पंक्ति में
श्लोक मिलते हैं। इसी धर्म सूत्र पर आगे स्मृति ग्रंथ लिखे गये।
2. गृह्य सूत्र-
व्यक्ति और परिवार से संबंधित व्यक्तियों और कर्म – कांडों का उल्लेख
है।
3. श्रौत सूत्र-
इस सूत्र में संपूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये विविध प्रकार के
कर्मकांड दिये हुये हैं।
4. शुल्व सूत्र-
शुल्व का शाब्दिक अर्थ होता है-रस्सी । इसमें वैदिक यज्ञों के निर्माण की
विधि (हवन कुण्ड को बनाने की विधि) बताई गई है। यज्ञ वेदियों का
प्रकार कैसा होगा , वो सब इसमें बताया गया
है। इसे भारतीय ज्यामिति का प्राचीनतम ग्रंथ कहा गया है।

वेदों को समझने के लिए इन परम आवश्यक ग्रंथों को पढने व इनके ज्ञानार्जन के बाद ब्राह्मण, आरण्यक, संहिता आदि ग्रथों को पढना भी आवश्यक है ताकि वेदों को लेकर पूर्व ऋषियों के ज्ञान से भी अवगत हुआ जा सके ताकि पवित्र वेदों को लेकर भूल व त्रुटि की संभावना नगण्य हो सके।

अब बताइए अभी तक जिन दुष्ट प्रकृति के लोगों ने पवत्रि वेदों के भाष्य बिना इन ग्रंथों को पढे कर दिया उन्हे क्या कहा जाय। जबकि प्राचीन काल में इन ग्रंथों कों पढते हुए वेदों तक पहुचने की अवस्था ८ वर्ष से प्रारम्भ होकर २५ वर्ष की अवस्था निरधारति की गयी थी‚ परंतु इन मैक्समूलर व सायण आदि दुष्टों ने बिना नियम के स्वयं के अनुसार जो मन आया वो बकवास करते गए। ये धन्य हो उन महापुरूष विरजानंद महाराज जी का जिन्होने पहले से ज्ञान की अग्नि में जल रहे स्वामी दयानंद सरस्वती को परिश्रम की पराकाष्टा कराते हुए तपाकर खरा सोना तैयार किया व आधुनिक काल में लोग वेदों के अकाट्य ज्ञान से परिचित हो पा रहे हैं।

ओउम् .......।

04/06/2018

1.3 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

चूॅकि भारत के समस्त पंथ वैदिक संस्कृति से निकले हैं परंतु बाद में किसी न किसी कारण से उन्होने अपनी विचारधारा का प्रचार प्रसार किया व वेदों की बहुत सी बातों का खण्डन किया विशेषतया चार्वाक‚ जैन व बौद्ध विचारधारा ने और खण्डन किया भी तो ईश्वर सत्ता व आत्मा की सत्ता को लेकर अन्यथा बहुत सी बातों में समानता है। वैसे जिसे नाद ओउम् को वेद सर्वशक्तिमान‚ सर्वव्यापक ब्रह्म के रूप में परिभाषित करता है तो वहीं ये अनीश्वरवादी विचारधाराऍ उस नाद आेउम् को सर्वशक्तिमान‚ सर्वव्यापक ब्रह्म तो नही मानती परंतु ध्यान लगाने में इसी नाद का प्रयोग करती हैं। कुल मिलाकर भारत की पूरी संस्कृति के एकीकरण इस एक नाद ओउम् की वजह से जाना जा सकता है जो किसी न किसी रूप में इस नाद से जुडी हैं।

खैर‚ अब आते हैं वैदिक संस्कृति पर चूॅकि मैं भी इधर उधर भटका और पूण शांति का अनुभव इस वेदाें की अल्पशिक्षा से प्राप्त हुआ सो अब मैं अपनी सामथ्यनुसार अध्ययन‚ मनन व श्रवण से प्राप्त ज्ञान के अनुसार इन्ही वेदों की शिक्षा को आगे बढाउंगा।

भारतीय मनीषियों द्वारा चार वेदों का नाम बताया जाता है –
ऋग्वेद‚ यर्जुवेद‚ सामवेद‚ अथर्ववेद।
इन प्रत्येक वेदों में अनेक ऋषियों ने अपने अपने ज्ञान को समाहित किया है।

जनमानस की मान्यता है कि वेद, उस एक परमेश्वर के कथन है जिसे विद्वान ब्रह्म कहते हैं और जिसका ज्ञान ऋषियों को उनके अर्न्तमन अर्थात् हदय में सुनाकर दिया गया। चूंकि वेद ईश्वर द्वारा ऋषियों को सुनाए गए ज्ञान पर आधारित है इसीलिए इसे श्रुति कहा गया है। सामान्य भाषा में वेद का अर्थ होता है ज्ञान। ऋषियों ने जब इस ज्ञान को सुनकर दूसरे ऋषियों और राजाओं को सुनाया और उन ऋषियों एवं राजाओं ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार उसे लिपिबद्ध किया या लोगों को समझाया तो वह स्मृति ज्ञान हो गया। वेदों को छोड़कर सभी ज्ञान स्मृति के अंतर्गत आते हैं। इन वेदों के अंतिम भाग या तत्वज्ञान को उपनिषद‚ दर्शन और वेदांत कहते हैं। इसमें ईश्वर संबंधी बातों का उल्लेख मिलता है। उपनिषद या वेदांत को ही भगवान कृष्ण ने संक्षिप्त रूप में अर्जुन को कहा जिसे गीता कहते हैं। गीता वेदों का संक्षेप में सार है।

ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गंधर्ववेद और अथर्ववेद का स्थापत्यवेद ये क्रमशः चारों वेदों के उपवेद बतलाए गए हैं। > वेद के विभाग चार है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ऋग-स्थिति, यजु-रूपांतरण, साम-गति‍शील और अथर्व-जड़। ऋक को धर्म, यजुः को मोक्ष, साम को काम, अथर्व को अर्थ भी कहा जाता है। इन्ही के आधार पर धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना हुई।

विद्वानों के अनुसार मनुस्मृति व्यवस्था का ग्रंथ है जबकि वाल्मीकि रामायण, पुराण और स्मृति ग्रंथ। ये सभी भारतीय संस्कृति के इतिहास के ग्रंथ हैं। महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी ने कहा है कि जहां पुराणों की बातों में विरोधाभास या संशय नजर आता है या जो वेदसम्मत नहीं है, तो ऐसे में वेदों के कथन ही सर्वमान्य होंगे।

जारी .........

ओउम्।

12/12/2017

1.2 धर्म से सम्बन्धितः
क्रमशः ......................

पूव में हमने, मनुष्य जन्मावस्था से लेकर युवावस्था तक प्राप्त विचारों अर्थात् दर्शन के अनुसार अपना जीवन जीने वाला एक प्राणी है, जिसमें कुछ एक मनुष्य इस चक्र को तोड़ भी देते हैं, इस पर चर्चा की थी अब ............

इस संसार में सदैव से बहुत से मनुष्य स्वयं के या प्राप्त विचारों अर्थात दर्शन के अनुसार अन्य मनुष्यों को स्वयं के अनुसार प्रेरित करने का प्रयास करते चले आ रहे हैं जो आज भी अनवरत जारी है ..... जिसमें कुछ एक मनुष्यों को इस कार्य में अत्यधिक सफलता प्राप्त हुई और कुछ को नही। वैश्विक परिदृश्य में देखें तो हम पाएंगे कि इसाइयत व इस्लाम विचारधाराओं के प्रवर्तक जीसस और मोहम्मद ने बहुत हद तक लोगों को स्वयं के अनुसार परिवर्तित किया तथा संख्या अधिक होकर समूह बन जाने पर संगठित रखने के उद्देश्य से इसाई और इस्लाम नाम दिए। इसी तरह हमारे भारत देश की धरती से भी बहुत से लोग हैं जैसे - महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, गुरूनानक, कबीरदास, रविदास, स्वामी दयानंद आदि। इनमें बहुतों ने अपने से प्रभावित लोगों को कोई समूह रूप में रखने के लिए कोई सांगठनिक नाम आदि नही दिया परंतु बाद में लोगों ने पहचान स्थापित रखने के उद्देश्य से स्वयं ही कोई न कोई नाम स्थापित कर लिया।

भारत देश में इनके अतिरिक्त भी कुछ एक दर्शन हैं जिनकी स्थापना नही की गयी परंतु वे प्रभावित हो उसी के अनुसार अपना जीवन जीने का प्रयास करने लगे और सम्भवतः स्वयं ही नाम भी धारण किया जैसे - वैष्णव, शाक्त और शैव जिसमें वैष्णव लोग वैदिक दर्शन के ग्रंथ वेदों को सरवोच्च ग्रंथ मानते हैं। चूंकि आज के समय में वैष्णव, शाक्त एवं शैव लगभग एक हो चुके हैं और सभी एक दूसरे की परम्पराओं मे रच बस गए हैं तो लगभग सभी वेदों को सरवोच्च मानते हैं।

क्रमशः ..............

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