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01/01/2026

Maa Baap Kab Shatru Ban Jaate Hain? | Shastra Ka Kadwa Sach

Maa Baap Kab Shatru Ban Jaate Hain? | Shastra Ka Kadwa Sach | Kathavachak

Maa Baap Kab Shatru Ban Jaate Hain? | Shastra Ka Kadwa Sach | Kathavachak

Maa Baap Kab Shatru Ban Jaate Hain? | Shastra Ka Kadwa Sach | Kathavachak

Jo Parents Bachchon Ko Nahi Padhate | Shastra Kya Kehte Hain?
Bachche Anpadh Kyun Reh Jaate Hain? | Sanatan Gyan
Education Na Mile To Kya Hota Hai? | Kathavachak Pravachan
Parents Ki Sabse Badi Galti | Shastra Warning

Shastra ka ek kadwa sach jo har maa-baap ko sunna chahiye 🙏
Is short video mein kathavachak style mein samjhaya gaya hai
“Mata Shatruh Pita Vairi” shlok ka asli matlab।
Agar parents apne bachchon ko
education aur vidya se door rakhte hain,
toh anjaane mein unka future khatre mein daal dete hain।
Is video mein jaaniye👇
✔️ Education ka real importance
✔️ Shastra parents ko shatru kyun kehte hain
✔️ Vidya bina jeevan kyun adhoora hai
👉 Agar baat sach lage
toh Like zaroor karein
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31/12/2025

Raat Ko Joothe Bartan Chhodna Kyun Galat Hai? | Lakshmi Upay | Bhakti Vedant

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Shastra kehte hain,
raat ko joothe bartan rehne se
ghar ki positive energy khatam hone lagti hai।

Agar ghar mein Lakshmi ka vaas chahte ho,
toh is baat ko ignore mat kijiye 🙏
👍 Like karein
💬 Comment karein – Jai Mata Lakshmi
🔄 Share karein apne parivaar ke saath
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कहानी: "सीतामढ़ी से तिरुपति का सफर और उस छोटे से बालक की याद"दिनांक: 26 दिसंबर 2024यह कहानी एक ऐसे सफर की है जो एक आदमी ...
28/12/2024

कहानी: "सीतामढ़ी से तिरुपति का सफर और उस छोटे से बालक की याद"
दिनांक: 26 दिसंबर 2024
यह कहानी एक ऐसे सफर की है जो एक आदमी के दिल में छाप छोड़ गया, और उसे जीवनभर के लिए याद रहा। यह कहानी एक ट्रेन यात्रा की है, जिसमें एक छोटे से बालक और उसके अंधे पिता ने उस आदमी के दिल को गहरे तक छुआ।
मैं, रूपेश, एक सामान्य आदमी, सीतामढ़ी से तिरुपति बालाजी के दर्शन के लिए जा रहा था। मेरे मन में बस यही ख्याल था कि मैं भगवान के दर्शन करूं और जीवन के कष्टों से मुक्ति पाऊं। यह यात्रा मेरे लिए एक साधारण तीर्थ यात्रा थी, लेकिन जो कुछ मैंने उस ट्रेन में देखा, उसने मुझे बदल दिया।
रात का समय था, ट्रेन धीरे-धीरे अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी। मैं अपनी सीट पर बैठकर खिड़की से बाहर देख रहा था, तभी मेरे सामने एक दृश्य आया जिसने मेरी आंखों में आंसू भर दिए। एक छोटा सा बालक, लगभग 7-8 साल का, अपने पिता के साथ ट्रेन में चढ़ा। उस बालक के पिता अंधे थे। वह बालक अपने पिता का हाथ पकड़कर ट्रेन के डिब्बे के अंदर घुस रहा था। उसकी आंखों में एक अनकही कहानी थी, एक दर्द, एक संघर्ष, जो शायद किसी और ने महसूस नहीं किया होगा।
बालक का चेहरा बालकों जैसा नहीं था, वह मासूमियत की जगह एक गहरी जिम्मेदारी से भरा हुआ था। वह अपने पिता के साथ चलने के लिए मजबूर था, क्योंकि उसके पिता की आंखों में अंधेरा था। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते जाते, और हर कदम पर वह बालक अपने पिता को संभालता। उसकी नन्ही उंगलियां उस अंधे पिता का हाथ पकड़कर उन्हें रास्ता दिखातीं। वह बच्चे का चेहरा मुझे हमेशा के लिए याद रहेगा—इतना मासूम, इतना नन्हा, और इतनी बड़ी जिम्मेदारी के साथ।
हमेशा अपने छोटे कदमों में यह बालक अपनी पूरी दुनिया को संभालने की कोशिश कर रहा था। उसकी छोटी सी उम्र में इतनी बड़ी जिम्मेदारी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। लेकिन उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह शांत था, संतुष्ट था, और वह जानता था कि उसका पिता उस पर निर्भर है।
मैंने उस बच्चे को देखा और अनायास ही मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। यह सोचकर कि वह बच्चा अपनी मासूमियत के बावजूद अपने पिता का सहारा बन रहा था, मुझे खुद पर ही शर्म आई। हम बड़े होते जाते हैं, लेकिन कभी अपनी जिम्मेदारियों को सही से नहीं निभा पाते। और यह बच्चा, जिसे हमें देख कर सोचना चाहिए था कि वह भी अपनी जिंदगी के बारे में सोच रहा होगा, आज अपने पिता की जिंदगी के हर पहलू को संभालने की पूरी कोशिश कर रहा था।
ट्रेन के अंदर उस छोटे से बालक का संघर्ष और उसके पिता के साथ उसका प्यार मुझे गहरे तक छू गया। यह दृश्य मेरे लिए भगवान के दर्शन से कहीं अधिक मूल्यवान बन गया। मुझे लगा कि भगवान ने उस बच्चे को इतना मजबूत बना दिया है कि वह अपने पिता के लिए सब कुछ करता है। उसकी मासूमियत में एक अद्वितीय साहस था, जो उसकी उम्र से बहुत बड़ा था।
मैंने सोचा, अगर हम सब उस बच्चे की तरह अपने माता-पिता की सेवा करें, तो जीवन में सच्ची खुशी और संतोष मिलेगा। जीवन में आने वाली हर परेशानी को अपने साहस और धैर्य से पार किया जा सकता है। वह बालक, जो किसी बड़े संकट से गुजर रहा था, मुझे यह सिखा रहा था कि जीवन में छोटे-छोटे कदमों से भी बड़ी मंजिलें हासिल की जा सकती हैं।
ट्रेन जैसे ही तिरुपति पहुंची, मैं भगवान के दर्शन के लिए गया। लेकिन मेरे मन में उस बच्चे का चेहरा था, और मैं जानता था कि असली दर्शन तो मैंने उस छोटे से बालक के रूप में पाई थी। भगवान का रूप भी कभी न कभी किसी न किसी रूप में हमें हमारे रास्ते पर लाता है। उस दिन मुझे महसूस हुआ कि जीवन की सच्ची पूजा किसी मंदिर में नहीं, बल्कि उन लोगों की सेवा में है, जो हमें जरूरतमंद होते हैं।
आज भी जब मैं किसी मुसीबत में फंसा होता हूं, मुझे उस बच्चे का चेहरा याद आता है। और मैं समझता हूं कि हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए, चाहे जीवन में कितनी भी कठिनाई आए। भगवान हमें सिर्फ खुशियों के लिए नहीं, बल्कि हमें संघर्ष करने की ताकत देने के लिए भी भेजते हैं। उस छोटे से बालक ने मेरे जीवन को नया दृष्टिकोण दिया, और आज मैं उस बच्चे को कभी नहीं भूल सकता।
वह यात्रा, वह बच्चा, वह पिता, और वह दिन मेरी यादों में हमेशा जिंदा रहेगा। और जब भी जीवन में कठिनाई आती है, मैं उस बालक की तरह अपने पिता का हाथ पकड़कर हर कठिनाई का सामना करने की ताकत पाता हूं।
कभी-कभी भगवान हमें सीधे नहीं दिखते, लेकिन वे हमारे आस-पास होते हैं, उन लोगों के रूप में जो हमें जीवन के सच्चे पाठ सिखाते हैं।

जबलपुर स्टेशन पर रात गहराने लगी थी। ठंडी हवा चल रही थी, और मैं प्लेटफॉर्म पर अपनी थाली में खाना खा रहा था। सफर लंबा था, ...
28/12/2024

जबलपुर स्टेशन पर रात गहराने लगी थी। ठंडी हवा चल रही थी, और मैं प्लेटफॉर्म पर अपनी थाली में खाना खा रहा था। सफर लंबा था, और भूख की वजह से मैंने स्टेशन पर खाना खरीद लिया। हर निवाले के साथ मन में यह ख्याल था कि जल्द ही मैं अपने गंतव्य पर पहुंच जाऊंगा। लेकिन मुझे नहीं पता था कि उस रात का अनुभव मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल देगा।

जैसे ही मैं खाना खाने में व्यस्त था, अचानक मेरी नजर एक महिला पर पड़ी। वह साधारण, मैली सी साड़ी पहने हुए थी, गोद में करीब एक साल का बच्चा था। उसकी आंखों में थकावट और दर्द साफ झलक रहा था। वह धीमे-धीमे मेरे पास आई और मेरे सामने खड़ी हो गई।

उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। मुझे समझ नहीं आया कि वह क्या चाहती थी। मैंने सोचा कि शायद वह पैसे मांग रही है। मैंने जल्दी से अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और उसकी ओर बढ़ा दिए। लेकिन उसने पैसे लेने से मना कर दिया। मैं अचंभित रह गया। मुझे लगा शायद उसे और ज्यादा पैसे चाहिए, इसलिए मैंने कुछ और रुपये उसकी ओर बढ़ाए।

पर उसने फिर भी मना कर दिया। उसकी आंखों में दर्द और बेबसी थी, जो मुझे समझने पर मजबूर कर रही थी। वह इशारों में कुछ कहने की कोशिश कर रही थी। तभी मुझे एहसास हुआ—वह पैसे नहीं, खाना मांग रही थी।

मेरा दिल जैसे किसी ने मुठ्ठी में जकड़ लिया हो। मेरे सामने एक मां थी, जिसकी गोद में उसका भूखा बच्चा रो रहा था। मैंने जल्दी से अपनी थाली देखी। मेरे पास सिर्फ एक रोटी बची थी। बाकी सब मैं खा चुका था। मैंने तुरंत वह रोटी उठाई और उसके हाथों में दे दी।

जैसे ही महिला ने वह रोटी अपने बच्चे को दी, बच्चा मचलने लगा। उसने उस रोटी को ऐसे पकड़ा, जैसे वह उसके जीवन का आखिरी सहारा हो। उसकी नन्हीं-नन्हीं उंगलियां रोटी को कसकर पकड़े हुए थीं। वह उसे जल्दी-जल्दी खाने लगा, मानो उसे कई दिनों से खाना नहीं मिला हो।

महिला वहीं प्लेटफॉर्म के कोने में बैठ गई। उसने अपने बच्चे को गोद में बिठाया और पानी के साथ रोटी तोड़-तोड़कर खिलाने लगी। बच्चा हर टुकड़े को ऐसे खा रहा था, जैसे वह किसी अमूल्य खजाने का हिस्सा हो।

मैं वहां खड़ा यह सब देख रहा था। मेरे हाथ में पैसे थे, लेकिन मेरे दिल में सिर्फ अफसोस। मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैंने पहले यह क्यों नहीं सोचा कि वह भूखी है। उस मां के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि थी। उसने खुद कुछ नहीं खाया, बस अपने बच्चे को खिलाती रही।

मेरी आंखों से आंसू बहने लगे। मैं सोचने लगा कि हम कितनी बार खाना बर्बाद कर देते हैं, बिना यह सोचे कि कहीं कोई भूखा है। उस मां और उसके बच्चे की हालत ने मुझे अंदर तक हिला दिया।

तभी, स्टेशन पर ट्रेन का अनाउंसमेंट हुआ। मेरी ट्रेन आने वाली थी। भारी मन से, मैं अपने डिब्बे के पास खड़ा हो गया। लेकिन उस मां और बच्चे का चेहरा मेरी आंखों के सामने घूमता रहा। उनकी भूख, उनका दर्द, और उनका संघर्ष मुझे किसी सजा की तरह महसूस हो रहा था।

उस रात मैंने महसूस किया कि अन्न की कीमत क्या है। वह सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि जीवन का आधार है। मैंने तय किया कि अब से कभी भी खाना बर्बाद नहीं करूंगा। उस बच्चे की भूख ने मुझे सिखा दिया कि जीवन में सबसे बड़ी सेवा किसी भूखे का पेट भरना है।

उस मां और बच्चे ने मुझे भगवान से भी बड़ी सीख दी— "जीवन में अगर किसी भूखे को खाना खिला सको, तो वही सच्चा धर्म है।"

आज भी, जब मैं खाना खाता हूं, तो वह बच्चा और उसकी मां मेरी आंखों के सामने आ जाते हैं। और मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूं कि किसी भी मां को अपने बच्चे को भूख से तड़पते हुए न देखना पड़े।

यह कहानी केवल मेरा अनुभव नहीं है, बल्कि एक संदेश है— "अन्न की कीमत समझो, और उसे कभी बर्बाद मत करो।"
____________________________________________
यह कहानी नहीं मेरे व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। मैं, रूपेश चौबे, इसे लिखने का उद्देश्य केवल मानवता, भूख की वास्तविकता, और अन्न की महत्वता को समझाना है। इस घटना का विवरण पूरी ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया गया है। यदि इस कहानी से किसी की भावनाएं आहत होती हैं या किसी को असुविधा महसूस होती है, तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं।

इस का मुख्य उद्देश्य पाठकों को प्रेरित करना और यह संदेश देना है कि जीवन में अन्न का आदर करना और जरूरतमंदों की मदद करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।

भक्तमाल संतों और भक्तों की कहानियों का संग्रह है, जो भक्तिकाल के महापुरुषों के जीवन और उनके ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम क...
18/12/2024

भक्तमाल संतों और भक्तों की कहानियों का संग्रह है, जो भक्तिकाल के महापुरुषों के जीवन और उनके ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है। इसमें अनेक प्रेरक कहानियाँ हैं। एक प्रसिद्ध कथा प्रस्तुत है:

संत तुलसीदास और हनुमानजी का आशीर्वाद

संत तुलसीदासजी का जीवन प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित था। वे काशी में गंगा किनारे बैठकर रामचरितमानस की रचना किया करते थे। एक दिन एक पंडित ने तुलसीदासजी से पूछा, "आप राम के इतने बड़े भक्त हैं, तो क्या आपने श्रीराम का साक्षात्कार किया है?"

तुलसीदासजी ने उत्तर दिया, "नहीं, लेकिन मैंने राम नाम का ही साक्षात्कार किया है, जो स्वयं भगवान से बढ़कर है।"
पंडित हँसते हुए बोले, "क्या फायदा ऐसा भक्ति करने का, जिसमें भगवान के दर्शन ही न हों?"

यह सुनकर तुलसीदासजी चिंतित हो गए। उसी रात वे गहन ध्यान में लीन होकर श्रीराम के दर्शन की प्रार्थना करने लगे। हनुमानजी उनकी सच्ची भक्ति और व्याकुलता से प्रसन्न हुए। वे एक वृद्ध साधु के रूप में तुलसीदासजी के पास आए और बोले, "तुम्हें श्रीराम के दर्शन तभी होंगे जब तुम चित्रकूट जाओगे।"

हनुमानजी के वचनों को सुनकर तुलसीदासजी तुरंत चित्रकूट की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामघाट पर राम नाम का जप करना शुरू किया। उनकी भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर हनुमानजी ने भगवान श्रीराम को उनके भक्त के सामने प्रकट होने के लिए कहा।

एक दिन, जब तुलसीदासजी रामघाट पर बैठकर भजन गा रहे थे, तभी दो सुंदर बालक उनके पास आए। वे बालक कोई और नहीं, बल्कि श्रीराम और लक्ष्मण थे। उनके दिव्य स्वरूप को देखकर तुलसीदासजी की आँखों से अश्रु प्रवाहित होने लगे। उन्होंने श्रीराम के चरणों में गिरकर कहा, "प्रभु, यह मेरे जीवन का सबसे सौभाग्यशाली क्षण है। अब मैं और कुछ नहीं चाहता।"

श्रीराम ने तुलसीदासजी को गले लगाते हुए कहा, "तुलसी, तुम्हारी भक्ति हमें बहुत प्रिय है। यह संसार तुम्हारे रामचरितमानस के माध्यम से हमारे नाम और लीलाओं को जानेगा।"

तुलसीदासजी ने यह अनुभव पूरी दुनिया को दिखाने के लिए रामचरितमानस को और अधिक भक्तिभाव से पूरा किया। उनकी भक्ति ने संसार को यह सिखाया कि राम नाम और भगवान में कोई भेद नहीं है।

शिक्षा:
सच्ची भक्ति और प्रेम से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। ईश्वर की कृपा उनके नाम का सुमिरन करने से ही प्राप्त होती है।

(((( क्रोध के दो मिनट ))))एक युवक ने विवाह के बाद दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार की इच्छा पिता से कही. पिता ने स्वीकृति द...
26/04/2024

(((( क्रोध के दो मिनट ))))
एक युवक ने विवाह के बाद दो साल बाद परदेस जाकर व्यापार की इच्छा पिता से कही. पिता ने स्वीकृति दी तो वह अपनी गर्भवती को माँ-बाप के जिम्मे छोड़कर व्यापार को चला गया.
परदेश में मेहनत से बहुत धन कमाया. 17 वर्ष धन कमाने में बीते गए तो सन्तुष्टि हुई और वापस घर लौटने की इच्छा हुई. पत्नी को पत्र लिखकर आने की सूचना दी और जहाज में बैठ गया.
उसे जहाज में एक व्यक्ति मिला जो दुखी मन से बैठा था. सेठ ने उसकी उदासी का कारण पूछा तो उसने बताया कि इस देश में ज्ञान की कोई कद्र नही है. मैं यहां ज्ञान के सूत्र बेचने आया था पर कोई लेने को तैयार नहीं है.
सेठ ने सोचा इस देश में मैने तो बहुत धन कमाया. यह तो मेरी कर्मभूमि है. इसका मान रखना चाहिए. उसने ज्ञान के सूत्र खरीदने की इच्छा जताई. उस व्यक्ति ने कहा- मेरे हर ज्ञान सूत्र की कीमत 500 स्वर्ण मुद्राएं है.
सेठ को सौदा महंगा लग तो रहा था लेकिन कर्मभूमि का मान रखने के लिए 500 मुद्राएं दे दीं. व्यक्ति ने ज्ञान का पहला सूत्र दिया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट रूककर सोच लेना. सेठ ने सूत्र अपनी किताब में लिख लिया.
कई दिनों की यात्रा के बाद रात्रि के समय अपने नगर को पहुंचा. उसने सोचा इतने सालों बाद घर लौटा हूं क्यों न चुपके से बिना खबर दिए सीधे पत्नी के पास पहुंच कर उसे आश्चर्य उपहार दूं.
घर के द्वारपालों को मौन रहने का इशारा करके सीधे अपने पत्नी के कक्ष में गया तो वहां का नजारा देखकर उसके पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई. पलंग पर उसकी पत्नी के पास एक युवक सोया हुआ था.
अत्यंत क्रोध में सोचने लगा कि मैं परदेस में भी इसकी चिंता करता रहा और ये यहां अन्य पुरुष के साथ है. दोनों को जिन्दा नही छोड़ूंगा. क्रोध में तलवार निकाल ली.
वार करने ही जा रहा था कि उतने में ही उसे 500 अशर्फियों से प्राप्त ज्ञान सूत्र याद आया- कोई भी कार्य करने से पहले दो मिनट सोच लेना. सोचने के लिए रूका. तलवार पीछे खींची तो एक बर्तन से टकरा गई.
बर्तन गिरा तो पत्नी की नींद खुल गई. जैसे ही उसकी नजर अपने पति पर पड़ी वह ख़ुश हो गई और बोली- आपके बिना जीवन सूना सूना था. इन्तजार में इतने वर्ष कैसे निकाले यह मैं ही जानती हूं.
सेठ तो पलंग पर सोए पुरुष को देखकर कुपित था. पत्नी ने युवक को उठाने के लिए कहा- बेटा जाग. तेरे पिता आए हैं. युवक उठकर जैसे ही पिता को प्रणाम करने झुका माथे की पगड़ी गिर गई. उसके लम्बे बाल बिखर गए.
सेठ की पत्नी ने कहा- स्वामी ये आपकी बेटी है. पिता के बिना इसकी मान को कोई आंच न आए इसलिए मैंने इसे बचपन से ही पुत्र के समान ही पालन पोषण और संस्कार दिए हैं.
यह सुनकर सेठ की आंखों से आंसू बह निकले. पत्नी और बेटी को गले लगाकर सोचने लगा कि यदि आज मैने उस ज्ञानसूत्र को नहीं अपनाया होता तो जल्दबाजी में कितना अनर्थ हो जाता. मेरे ही हाथों मेरा निर्दोष परिवार खत्म हो जाता.
ज्ञान का यह सूत्र उस दिन तो मुझे महंगा लग रहा था लेकिन ऐसे सूत्र के लिए तो 500 अशर्फियां बहुत कम हैं. ज्ञान अनमोल है.
इस कथा का सार यह है कि जीवन के दो मिनट जो दुःखों से बचाकर सुख की बरसात कर सकते हैं. वे क्रोध के दो मिनट हैं.
भागवत में भी यही संदेश दिया गया है. कहा गया है कि यदि तुम्हारे काम से किसी का अपकार होता है तो उस काम को एक दिन के लिए टाल दो. यदि उपकार होता हो तो तुरंत करो ताकि कहीं उपकार का विचार न बदल जाए

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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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कल्पवृक्षस्वरूपायै प्रदात्र्यै सर्वसम्पदाम्। श्रीदायै धनदायै च बुद्धिदायै नमो नमः।।शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नमः।...
20/11/2023

कल्पवृक्षस्वरूपायै प्रदात्र्यै सर्वसम्पदाम्। श्रीदायै धनदायै च बुद्धिदायै नमो नमः।।
शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नमः। यशोदायै सौख्यदायै धर्माज्ञायै नमो नमः।।

(((( संतान का दर्द ))))हल्दुआ ग्राम में जब सूरज की किरण पड़ती है तो दूर-दूर फैले झोपड़े दिखाई देने लगते हैं मानो वे खेत ...
30/07/2023

(((( संतान का दर्द ))))
हल्दुआ ग्राम में जब सूरज की किरण पड़ती है तो दूर-दूर फैले झोपड़े दिखाई देने लगते हैं मानो वे खेत में उग आए हों।
रात के अंधेरे में यहां कुछ भी दिखाई नहीं देता। पूरे गांव में जब कुत्ते के भौंकने की आवाज़ सुनाई देती है, तो लगता है कुछ हलचल हुई है। अन्यथा पूरा गांव सोया-सा लगता है।
झोपड़े दूर-दूर हैं, पर हैं एक-दूसरे से संबंधित। सब जानते हैं एक-दूसरे की आवाज़।
गांव सोया हुआ था। एक झोपड़े में आग तापते बैठे थे मंगलिया और उसकी पत्नी हड़कू। हड़कू और मंगलिया इसी गांव के निवासी हैं। यहीं पैदा हुए। यहीं की मिट्टी में खेले-कूदे और फिर कुछ ऐसा हुआ कि पति-पत्नी बन गए।
मंगलिया चिंतित था। उसकी दो माह की बेटी रोए जा रही थी। मां हड़कू परेशान थी। बेटी दूध ही नहीं पी रही थी। पता नहीं क्या हो गया ? किसकी नज़र लगी ?
अभी कल तक तो खूब हलचल करती हाथ-पैर हिलाती, मुस्कराती थी। जब उसे भूख लगती, बस तभी रोती।
मंगलिया और हड़कू दोनों सड़क निर्माण कार्य में रोज़गार पाए हुए थे। दिन भर सड़क पर मिट्टी-पत्थर डालते, शाम ढले आ जाते झोपड़े पर।
बेटी सोई रहती। कभी परेशान नहीं किया उसने। आज पता नहीं क्या हो गया। दोनों चिंतामग्न बैठे थे।
मंगलिया ने कहा ‘हड़कू, कल सुबह-सुबह चलते हैं शहर। वहां डॉक्टर को दिखाते हैं। हालत तो अच्छी नहीं है।’
हड़कू चिंता में पड़ी थी। बोली, ‘क्या होगा शहर ले जाने से ? कितनी दूर है यहां से। फिर वहां बहुत खर्च है। वहां जाने पर रोज़गारी भी नहीं मिलेगी।
भगवान ने चाहा, तो बेटी ठीक हो जाएगी। तुम ओझा को बुला लाओ। वही ठीक कर देगा।’
मंगलिया को लगा ठीक ही कहती है हड़कू। शहर है दूर-दूर तक फैला, न जान, न पहचान। शहर की जान-पहचान होती है पैसा। वहां सब दूर तो पैसा लगता है। जाना तो सचमुच मुश्किल है। उसे हड़कू की बात समझ में आ गई। दोनों आग तापते-तापते सो गए।
सुबह अभी आई नहीं थी। अंधकार बाहें फैलाए पड़ा था। मंगलिया उठा और चल दिया अंधकार को चीरता ओझा के झोपड़े की ओर। उसकी इस हलचल से गांव के कुत्ते भौंकने लगे।
गांव जाग गया। सब देखने लगे क्या गड़बड़ है। मंगलिया पहुंच गया था ओझा विश्वासी के खेत पर। उसने खेत की मेड़ पर खड़े हो, दोनों हाथ मुंह पर रख विश्वासी को आवाज़ लगाई। विश्वासी आवाज़ पहचान गया। झोपड़े के बाहर आया और पूछा, ‘क्या बात है मंगलिया ?’
मंगलिया ने वहीं से कहा-‘ओझा भाई ! बेटी बीमार है जल्दी चलो।’ मंगलिया की आवाज़ गूंज गई गांव भर में।
गांव जान गया इस समाचार को। लोग उठ कर चल दिए मंगलिया के झोपड़े की ओर। सूरज अब दिखाई देने लगा था। खेत रोशनी से भर रहे थे। पगडंडी पर लोग मंगलिया के घर जाते दिखाई दिए।
मंगलिया की बेटी नहीं, गांव की बेटी बीमार हो गई थी। सबको चिंता हो गई। मंगलिया के झोपड़े के आसपास गांव एकत्र हो गया था।
ओझा आया। उसने बेटी को देखा। दो माह की बेटी निस्तेज पड़ी थी। सांस धीमी चल रही थी। कोई हलचल नहीं हुई। ओझा ने मंत्र पढ़ा। कुछ चावल फेंके पर कोई हलचल नहीं हुई। ओझा लगातार कुछ बुदबुदा रहा था। आसमान को ताक रहा था, मानो पुकार रहा हो किसी को।
थोड़ी देर यह सब कर वह बोला, ‘यह तो गड़बड़ मामला है कोई हवा लगी है। किसी की बुरी नज़र लग गई है। इसमें तो बहुत खर्चा होगा ?’ मंगलिया ने पूछा- ‘बहुत याने कितना ?’
ओझा बोला,‘कम से कम तीन हजार।’ उपस्थित लोगों में हलचल मच गई। बेचारा मंगलिया इतना कहां से लाएगा। इतना धन होता, तो शहर नहीं ले जाता। मंगलिया मौन रहा। मौन ही उसका उत्तर था।
ओझा ने हलचल सुनी। वह समझ गया कि मांग कुछ ज्यादा हो गई। बोला, ‘मामला ऐसा ही है फिर भी मंगलिया की हालत देखकर कुछ कम खर्चा करूंगा। गांव वाले मदद करें। गांव की बेटी का सवाल है।’
मंगलिया हाथ जोड़े बोला,‘ओझा भाई, सड़क की मजदूरी कर काम चला रहा हूं। अभी खेत भी खाली है आपको मैंने कष्ट दिया। आप क्षमा करना।’ ओझा ने सुना, समझ में आया कि उससे गलती हो गई।
वह समझ रहा था कि गांव वाले मिल जुलकर कुछ करेंगे। दया का समुद्र उमड़ेगा और उसकी आज की सुबह मंगलमय हो जाएगी।
उसने मंगलिया को हाथ-जोड़कर क्षमा मांगते देखा, तो पैंतरा बदला। बोला, ‘यह सच है कि तुम इतना न कर पाओगे।
ऐसा करो कि बकरी का एक मेमना ही दे दो, तो मैं ऐसा करूंगा कि यह संकट टल जाए। इससे कम में तो कुछ हो ही नहीं सकता।’
मंगलिया के पास तो मेमना भी न था। उसने फिर हाथ जोड़कर कहा-‘ओझा भाई ! मेरे पास तो मेमना भी नहीं है। मैं क्या करूं ?’
उसकी आवाज़ में निराशा थी। वह बुझ-सा गया था। मां हड़कू बार-बार बेटी की ओर देख रही थी। बेटी निढाल पड़ी थी। सांस धीमे-धीमे चल रही थी। कोई हलचल नहीं थी।
वह ओझा की बात सुन रही थी। पति मंगलिया की बेबसी देख रही थी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे,
तभी उसे उसके भाई बुधरिया का स्वर सुनाई दिया, ‘ओझा भाई ! मेरे पास है मेमना, मैं दे दूंगा। आप बलि की जो क्रिया करना हो, करो। ’
यह स्वर जादू भरा था। गांव वालों में हर्ष छा गया। चलो, गांव की बेटी के लिए कुछ हुआ। अब शायद बच जाए बेटी।
मंगलिया के चेहरे पर संतोष झलक रहा था। वह शांत था। तभी हड़कू बोली, ‘मैं अभी तैयार नहीं हूं। ओझा भाई, आप कल आना। मैं आज सोचूंगी।’ उसने स्नेहपूर्ण नज़रों से बुधरिया को देखा।
ओझा को बुरा लगा। बना-बनाया खेल बिगड़ गया। बोला, ‘ठीक है जैसी इच्छा। हड़कू को जब अपनी बेटी की चिंता नहीं तो मैं क्या करूं ?’
गांव वाले सब चर्चामग्न थे। क्या हो गया ? क्यों मना कर दिया हड़कू ने ? पता नहीं हड़कू के मन में क्या है। कल क्या होगा ? क्या हड़कू तैयार होगी या मना कर देगी।
पुरुषों का मत था कि हड़कू ने गलती कर दी। अपनी बेटी की जान बचाने के लिए एक क्या, ऐसी कई बलि दी जा सकती हैं। गांव की महिलाएं चुप थीं। वे समझ रही थीं हड़कू की पीड़ा। पर चुप थीं। कल पता चल ही जाएगा।
अगले दिन सुबह ओझा स्नान ध्यान कर तिलक लगाए तैयारी से उपस्थित हुआ। बुधरिया मेमने को गोद में उठाए ले आया। ओझा ने कंकू -चावल मेमने पर मंत्र पढ़कर डाले और बोला, ‘मंगलिया और हड़कू अपने दोनों हाथ मेमने पर रखकर बोलो, मेमना हमने बेटी की जान के खातिर ओझा को भेंट दिया।’
हड़कू बोली, ‘ओझा भाई ! ऐसा नहीं होगा। जैसी मेरी बेटी, वैसी ही बकरी के लिए यह मेमना है। मैं मां हूं, मैं जानती हूं संतान की मृत्यु का दुख क्या होता है।
इस मेमने की बलि से बकरी को जो हृदय विदारक पीड़ा होगी, वह मैं जानती हूं। मैं अपनी बेटी के लिए मेमने की जान नहीं जाने दूंगी। मेरी बेटी जाए या रहे- यह भगवान की इच्छा है। मैं मेमने की बलि नहीं होने दूंगी। आप सब मुझे क्षमा करें।
सब सुनकर स्तब्ध रह गए। एक मां की वाणी में संतान का दर्द समाया हुआ था। हड़कू आंख बंद कर प्रार्थना में रत थी। मेमना उछल-कूदकर आनंद मना रहा था।
अधिक श्रावण शुक्ल द्वादशी उपरांत त्रयोदशी, विक्रम संवत 2080
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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(((( विवेक रूपी चश्मा ))))एक दरिद्र ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजर रहा था, बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को ...
14/07/2023

(((( विवेक रूपी चश्मा ))))
एक दरिद्र ब्राह्मण यात्रा करते-करते किसी नगर से गुजर रहा था, बड़े-बड़े महल एवं अट्टालिकाओं को देखकर ब्राह्मण भिक्षा माँगने गया, किन्तु उस नगर मे किसी ने भी उसे दो मुट्ठी अन्न नहीं दिया।
आखिर दोपहर हो गयी, तो ब्राह्मण दुःखी होकर अपने भाग्य को कोसता हुआ जा रहा था, सोच रहा था “कैसा मेरा दुर्भाग्य है इतने बड़े नगर में मुझे खाने के लिए दो मुट्ठी अन्न तक नहीं मिला ? रोटी बना कर खाने के लिए दो मुट्ठी आटा तक नहीं मिला ?
इतने में एक सिद्ध संत की निगाह उस ब्राहम्ण पर पड़ी, उन्होंने ब्राह्मण की बड़बड़ाहट सुन ली, वे बड़े पहुँचे हुए संत थे..
उन्होंने कहाः “हे दरिद्र ब्राह्मण तुम मनुष्य से भिक्षा माँगो, पशु क्या जानें भिक्षा देना ?”
यह सुनकर ब्राह्मण दंग रह गया और कहने लगाः “हे महात्मन् आप क्या कह रहे हैं ? बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहने वाले मनुष्यों से ही मैंने भिक्षा माँगी है”
महात्मा बोले, “नहीं ब्राह्मण मनुष्य शरीर में दिखने वाले वे लोग भीतर से मनुष्य नहीं हैं, अभी भी वे पिछले जन्म के हिसाब से ही जी रहे हैं।
कोई शेर की योनी से आया है तो कोई कुत्ते की योनी से आया है, कोई हिरण की योनी से आया है तो कोई गाय या भैंस की योनी से आया है..
उन की आकृति मानव-शरीर की जरूर है, किन्तु अभी तक उन में मनुष्यत्व निखरा नहीं है, और जब तक मनुष्यत्व नहीं निखरता, तब तक दूसरे मनुष्य की पीड़ा का पता नहीं चलता।
"दूसरे में भी मेरा प्रभु ही है" यह ज्ञान नहीं होता। तुम ने मनुष्यों से नहीं, पशुओं से भिक्षा माँगी है।"
ब्राह्मण का चेहरा दुःख व निराशा से भरा था। सिद्धपुरुष तो दूरदृष्टि के धनी होते हैं उन्होंने कहाः “देख ब्राह्मण, मैं तुझे यह चश्मा देता हूँ इस चश्मे को पहन कर जा और कोई भी मनुष्य दिखे, उस से भिक्षा माँग फिर देख, क्या होता है”
वह दरिद्र ब्राह्मण जहाँ पहले गया था, वहीं पुनः गया और योगसिद्ध कला वाला चश्मा पहनकर गौर से देखाः
‘ओहोऽऽऽऽ….वाकई कोई कुत्ता है कोई बिल्ली है तो कोई बघेरा है। आकृति तो मनुष्य की है, लेकिन संस्कार पशुओं के हैं, मनुष्य होने पर भी मनुष्यत्व के संस्कार नहीं हैं’।
घूमते-घूमते वह ब्राह्मण थोड़ा सा आगे गया तो देखा कि एक मोची जूते सिल रहा है, ब्राह्मण ने उसे गौर से देखा तो उस में मनुष्यत्व का निखार पाया।
ब्राह्मण ने उस के पास जाकर कहाः “भाई तेरा धंधा तो बहुत हल्का है, औऱ मैं हूँ ब्राह्मण रीति रिवाज एवं कर्मकाण्ड को बड़ी चुस्ती से पालता हूँ...
मुझे बड़ी भूख लगी है, इसीलिए मैं तुझसे माँगता हूँ, क्योंकि मुझे तुझमें मनुष्यत्व दिखा है..
उस मोची की आँखों से टप-टप आँसू बरसने लगे वह बोलाः “हे प्रभु, आप भूखे हैं ? हे मेरे भगवन् आप भूखे हैं ? इतनी देर आप कहाँ थे ?”
यह कहकर मोची उठा एवं जूते सिलकर टका, आना-दो आना वगैरह जो इकट्ठे किये थे, उस चिल्लर (रेज़गारी) को लेकर हलवाई की दुकान पर पहुँचा और बोला..
“हलवाई भाई, मेरे इन भूखे भगवान की सेवा कर लो ये चिल्लर यहाँ रखता हूँ जो कुछ भी सब्जी- पराँठे- पूरी आदि दे सकते हो, वह इन्हें दे दो मैं अभी जाता हूँ”
यह कहकर मोची भागा, और घर जाकर अपने हाथ से बनाई हुई एक जोड़ी जूती ले आया, एवं चौराहे पर उसे बेचने के लिए खड़ा हो गया।
उस राज्य का राजा जूतियों का बड़ा शौकीन था, उस दिन भी उस ने कई तरह की जूतियाँ पहनीं, किंतु किसी की बनावट उसे पसंद नहीं आयी तो किसी का नाप नहीं आया...
दो-पाँच बार प्रयत्न करने पर भी राजा को कोई पसंद नहीं आयी तो राजा मंत्री से क्रुद्ध होकर बोला..
अगर इस बार ढंग की जूती लाया तो जूती वाले को इनाम दूँगा, और ठीक नहीं लाया तो मंत्री के बच्चे तेरी खबर ले लूँगा।
दैव योग से मंत्री की नज़र इस मोची के रूप में खड़े असली मानव पर पड़ गयी जिस में मानवता खिली थी, जिस की आँखों में कुछ प्रेम के भाव थे, चित्त में दया-करूणा थी, ब्राह्मण के संग का थोड़ा रंग लगा था।
मंत्री ने मोची से जूती ले ली एवं राजा के पास ले गया। राजा को वह जूती एकदम ‘फिट’ आ गयी, मानो वह जूती राजा के नाप की ही बनी थी।
राजा ने कहाः “ऐसी जूती तो मैंने पहली बार ही पहन रहा हूँ, किस मोची ने बनाई है यह जूती ?”
मंत्री बोला “हुजूर यह मोची बाहर ही खड़ा है”
मोची को बुलाया गया। उस को देखकर राजा की भी मानवता थोड़ी खिली। राजा ने कहा...
“जूती के तो पाँच रूपये होते हैं किन्तु यह पाँच रूपयों वाली नहीं है, पाँच सौ रूपयों वाली जूती है।
जूती बनाने वाले को पाँच सौ और जूती के पाँच सौ, कुल एक हजार रूपये इसको दे दो!”
मोची बोलाः “राजा जी, तनिक ठहरिये, यह जूती मेरी नहीं है, जिसकी है उसे मैं अभी ले आता हूँ”
मोची जाकर विनयपूर्वक उस ब्राह्मण को राजा के पास ले आया एवं राजा से बोलाः “राजा जी, यह जूती इन्हीं की है।
”राजा को आश्चर्य हुआ वह बोलाः “यह तो ब्राह्मण है इस की जूती कैसे ?”
राजा ने ब्राह्मण से पूछा तो ब्राह्मण ने कहा मैं तो ब्राह्मण हूँ, यात्रा करने निकला हूँ”
राजाः “मोची जूती तो तुम बेच रहे थे इस ब्राह्मण ने जूती कब खरीदी और बेची ?”
मोची ने कहाः “राजन् मैंने मन में ही संकल्प कर लिया था कि जूती की जो रकम आयेगी वह इन ब्राह्मण देव की होगी।
जब रकम इन की है तो मैं इन रूपयों को कैसे ले सकता हूँ ? इसीलिए मैं इन्हें ले आया हूँ।
न जाने किसी जन्म में मैंने दान करने का संकल्प किया होगा और मुकर गया होऊँगा तभी तो यह मोची का चोला मिला है...
अब भी यदि मुकर जाऊँ तो तो न जाने मेरी कैसी दुर्गति हो ?
इसीलिए राजन् ये रूपये मेरे नहीं हुए। मेरे मन में आ गया था कि इस जूती की रकम इनके लिए होगी फिर पाँच रूपये मिलते तो भी इनके होते और एक हजार मिल रहे हैं तो भी इनके ही हैं।
हो सकता है मेरा मन बेईमान हो जाता इसीलिए मैंने रूपयों को नहीं छुआ और असली अधिकारी को ले आया!

राजा ने आश्चर्य चकित होकर ब्राह्मण से पूछाः “ब्राह्मण मोची से तुम्हारा परिचय कैसे हुआ ?
”ब्राह्मण ने सारी आप बीती सुनाते हुए सिद्ध पुरुष के चश्मे वाली बात बताई, और कहा कि राजन्, आप के राज्य में पशुओं के दर्शन तो बहुत हुए लेकिन मनुष्यत्व का अंश इन मोची भाई में ही नज़र आया।
”राजा ने कौतूहलवश कहाः “लाओ, वह चश्मा जरा हम भी देखें।”
राजा ने चश्मा लगाकर देखा तो दरबारियों में उसे भी कोई सियार दिखा तो कोई हिरण, कोई बंदर दिखा तो कोई रीछ।
राजा दंग रह गया कि यह तो पशुओं का दरबार भरा पड़ा है.. उसे हुआ कि ये सब पशु हैं तो मैं कौन हूँ ?
उस ने आईना मँगवाया एवं उसमें अपना चेहरा देखा तो शेर! उस के आश्चर्य की सीमा न रही, ‘ये सारे जंगल के प्राणी और मैं जंगल का राजा शेर यहाँ भी इनका राजा बना बैठा हूँ।’
राजा ने कहाः “ब्राह्मणदेव योगी महाराज का यह चश्मा तो बड़ा गज़ब का है, वे योगी महाराज कहाँ होंगे ?”
ब्राह्मणः “वे तो कहीं चले गये ऐसे महापुरुष कभी-कभी ही और बड़ी कठिनाई से मिलते हैं।”
श्रद्धावान ही ऐसे महापुरुषों से लाभ उठा पाते हैं, बाकी तो जो मनुष्य के चोले में पशु के समान हैं वे महापुरुष के निकट रहकर भी अपनी पशुता नहीं छोड़ पाते।
ब्राह्मण ने आगे कहाः "राजन् अब तो बिना चश्मे के भी मनुष्यत्व को परखा जा सकता है। व्यक्ति के व्यवहार को देखकर ही पता चल सकता है कि वह किस योनि से आया है।
एक मेहनत करे और दूसरा उस पर हक जताये तो समझ लो कि वह सर्प योनि से आया है क्योंकि बिल खोदने की मेहनत तो चूहा करता है, लेकिन सर्प उस को मारकर बल पर अपना अधिकार जमा बैठता है।”
अब इस चश्मे के बिना भी विवेक का चश्मा काम कर सकता है, और दूसरे को देखें उसकी अपेक्षा स्वयं को ही देखें कि हम सर्पयोनि से आये हैं कि शेर की योनि से आये हैं या सचमुच में हममें मनुष्यता खिली है ?
यदि पशुता बाकी है तो वह भी मनुष्यता में बदल सकती है कैसे ?
गोस्वामी तुलसीदाज जी ने कहा है...
बिगड़ी जनम अनेक की, सुधरे अब और आजु।
तुलसी होई राम को, रामभजि तजि कुसमाजु।।
कुसंस्कारों को छोड़ दें… बस अपने कुसंस्कार आप निकालेंगे तो ही निकलेंगे। अपने भीतर छिपे हुए पशुत्व को आप निकालेंगे तो ही निकलेगा।
यह भी तब संभव होगा जब आप अपने समय की कीमत समझेंगे मनुष्यत्व आये तो एक-एक पल को सार्थक किये बिना आप चुप नहीं बैठेंगे।
पशु अपना समय ऐसे ही गँवाता है। पशुत्व के संस्कार पड़े रहेंगे तो आपका समय बिगड़ेगा अतः पशुत्व के संस्कारों को आप बाहर निकालिये एवं मनुष्यत्व के संस्कारों को उभारिये फिर सिद्धपुरुष का चश्मा नहीं, वरन् अपने विवेक का चश्मा ही कार्य करेगा..
और इस विवेक के चश्मे को पाने की युक्ति मिलती है हरि नाम संकीर्तन व सत्संग.. तो हे आत्म जनों, मानवता से जो पूर्ण हो, वही मनुष्य कहलाता है। बिन मानवता के मानव भी, पशुतुल्य रह जाता है।

(((( सांकरी खोर, गोरस की लूट लीला ))))‘सखियों, कल चलोगी गोरस बेचने ?’ .. ललिता जीजी ने पूछा।हम सब जल भरने आयी थी। उधर से...
09/07/2023

(((( सांकरी खोर, गोरस की लूट लीला ))))
‘सखियों, कल चलोगी गोरस बेचने ?’ .. ललिता जीजी ने पूछा।
हम सब जल भरने आयी थी। उधर से बरसाने की सखियाँ भी आ गयीं, श्रीकिशोरी जू साथ थी।
परस्पर मिलना अभिवादन हुआ और सब घड़े माजने- धोने में लग गयीं।
‘गोरस बेचने ?’– नंदीश्वरपुर की बालायें चौंककर देखने लगी उनकी ओर।
‘हाँ गोरस, आश्चर्य क्यों हो रहा है?’ श्यामा जू बोली- ‘हम सब जा रही हैं कल दोपहर को।’
‘किंतु गोरस लेगा कौन? और हम विनिमय में क्या लेंगी? फिर मैया बाबा जाने देंगे ?’ .. मैंने पूछा !
‘अन्य बातें रहने दो, बाबा मैया को मना लेना। कैसे ? सो तुम अपनी बुद्धि का प्रयोग उपयोग करना।’ .. विशाखा जीजी ने कहा।
‘क्यों री ऐसी छोटी दहेड़ी का क्या करेगी?’ .. मैया ने रात दही जमाते समय पूछा, जब मैं एक छोटी मटुकिया में दूध जमाने लगी।
‘मैया मैं कल दही बेचने जाऊँगी।’
‘क्या कहा री! कहाँ जायेगी?’ मैया ने चौंक कर पूछा।
‘दही बेचने बरसाने और नंदगाँव की सभी बहिनें जा रही हैं, और तो और श्री वृषभानु नंदिनी भी जा रही हैं।’
‘किसने कहा तुझसे ?’
‘सभी सखियाँ कह रही थी।श्रीकिशोरी जी भी वहीं थीं।’
‘कुछ समझ में नहीं आती इन बड़े लोगों की बातें। नंदमहर के युवराज गायें चरायें और वृषभानुपर के राजा की बेटी गोरस बेचे।
क्या कमी पड़ गयी जाने कीर्तिदा जू को !
सुमन सुकुमार लली कहाँ भटकेगी ?’ – मैया अपनी धुन में बड़बड़ करती रही। इस से मेरा पिंड छूटा।
नंदगाँव से सब सखियाँ बरसाने गयीं और वहाँ से सब मिलकर वन की ओर चलीं।
दोनों ओर श्वेत-श्याम पर्वत और बीचमें सांकरी खोर। सखियाँ हँसती बोलती जा रही थी। दोनों ओर के वृक्षों पर कपि लदे थे।
एकाएक आगे वाली सखियाँ ठिठक कर रुक गयीं। सबने नेत्र उठाकर देखा दोनों पैर फैलाये, कटि पर कर टिकाये खौर के मुहाने पर श्याम सुंदर खड़े हैं।
सखियों ने मुस्करा कर एक दूसरे की ओर देखा चंद्रावली जीजी आगे बढ़ आयी-
‘पथ काहे को रोके खड़े हो ? हमें निकलने दो।’
‘कहाँ जा रही हो?’– श्यामसुंदर बोले ।
‘गोरस बेचने।’
‘किधर …. कहाँ ?’
‘तुम्हें इससे क्या? हमें जाने दो।’
‘मेरा कर दे के चली जाओ, जहाँ जाना हो।’
‘कैसा कर ? “
‘मेरी भूमि में होकर निकलने का कर।’
‘अहाहा! ऐसा अनोखा कर न कभी देखा, न सुना। भूमि तुम्हारी है कि राजा की?”
‘इस भूमि का तो मैं ही राजा हूँ।’
‘आरसी में मुँह देखा है कभी? बड़े राजा बने हैं।’-
चंद्रावली जीजी की बात सुन कर सखियाँ हँस पड़ी; पर श्याम का उत्तर सुन सकपका कर चुप हो गयीं।
उन्होंने कहा—’सो तो सखी! अब भी देख रहा हूँ, तेरा मुख क्या किसी आरसी से कम है?’
‘पथ छोड़ो।’ चंद्रावली जीजीने स्वर और नेत्र कड़े किये – ‘बहुत बातें बनानी आ गयी हैं।’
‘बातें बनाना मुझको भी अच्छा नहीं लगता सखी! तुम मेरा कर दो और अपना पथ पकड़ो।’
‘हम नहीं देंगी।’
‘मैं तो लूँगा। राजी से नहीं दोगी तो बरजोरी से लूँगा।’
‘बरजोरी ?’
‘हाँ सखी! बरजोरी।’
‘लाज नहीं आती कहते! छोरियों से बरजोरी करते?”
‘जब तुमने लाज उतार के खूँटी पर टाँग दी तो मैं कितनी देर उसे थामे रहूँगा ?
हाँ सखी, मुझसे – एक छोरा से लपालप जीभ चलाते तुम्हें लाज नहीं लगती और मुझे लाज की शिक्षा देती हो!
लज्जा नारीका भूषण है कि पुरुषका ?’
‘अब हटो भी! हम राजा कंस से जाकर कह देंगी।’
‘कंस क्या तेरा सगा लगता है चंद्रा ! ऐसी कृपण हो तुम कि चुल्लू भर गौरस के कारण कंस तक दौड़ी जाओगी?
जा इसी घड़ी जाकर कह दे।’
श्याम ने झपट कर दहेड़ी छीन ली, फिर तो वन की झाड़ियों से चीटियों की भाँति उनके सब सखा ‘हा-हा’ ‘हू-हू’ करते निकल आये।
श्याम दहेड़ियाँ छीन छीनकर उन्हें थमाते जाते कितने हार टूटे, चुनरियाँ फटीं, कोई गिनती नहीं। हम सब ने मिलकर श्री किशोरी जू को घेर लिया।
‘अरे कन्नू, तेरी मटुकिया तो रही गयी रे।’ मधुमंगलने कहा, तो कान्ह फिर दौड़ पड़े।
‘देखो कृष्ण ! इस दहेड़ी को हाथ लगाया तो अच्छा न होगा।’
‘क्या करेगी री तू?’ कह कर श्याम ने किसी को धक्का दिया, किसी को झटका और उछलकर दहेड़ी पकड़ ली।
श्रीराधा जू ने तो जैसे स्वयं ही सौंप दी।
अँगूठा दिखाते हुए श्यामसुंदर पर्वत पर चढ़ गये। फिर तो उस महाभोज को देखने में हम ऐसी लीन हुई कि अपने टूटे हारों और फटे गीले वस्त्रों की भी सुध भूल गयीं।
सांकरी खोर में गोरस की कीच मच गयी। दहेड़ियों के टूटे टुकड़ों में कपि और पक्षी भोग लगाने लगे।
श्यामसुंदर सखाओं के साथ हमें अँगूठा दिखाते, मुँह चिढ़ाते, एक दूसरे पर फेंकते हुए खाते और खिलाते रहे।
‘अरी अब क्यों खड़ी हो यहाँ ? साँझ हो जायेगी लौटते- लौटते।’ भद्रने कहा।
‘अरी ये क्या हुआ री ?’ मैया ने मेरी फटी चुनरी देखकर पूछा।
‘क्या कहूँ मैया! हम सब जा रहीं थी, कि वन में से एक बड़ा मोटा-सा भल्लूक निकल आया।
उसको देखकर हम सब भागीं, तो दहेड़ियाँ फूट गयीं और गिरने पड़ने से वस्त्र भी फट गये।
हमारा चिल्लाना सुनकर श्याम सुंदर दौड़े आये। उसको भगाकर, हम सबको आश्वस्त करके पथ बताया, तब जाकर हम लौट पायीं।’
सुनकर मैया ने आसीसों की झड़ी लगा दी।
श्रावण कृष्ण सप्तमी, विक्रम संवत 2080
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