18/01/2026
यह श्रीकृष्ण और गोपियों की रासलीला की पावन कथा है, जो वृंदावन की दिव्य भूमि से जुड़ी हुई है:
वृंदावन की पावन रज में जब चंद्रमा अपनी पूर्णिमा की शीतल चाँदनी बिखेर रहा था, तब यमुना तट पर श्रीकृष्ण ने अपनी मधुर बाँसुरी बजाई। उस बाँसुरी की धुन में ऐसा अलौकिक आकर्षण था कि वृंदावन की सभी गोपियाँ अपने-अपने कार्य छोड़कर उस ध्वनि की ओर खिंची चली आईं। किसी ने दूध उबालना छोड़ दिया, किसी ने घर की देहरी लाँघ दी, क्योंकि वह पुकार केवल कानों से नहीं, आत्मा से सुनी जा रही थी।
यमुना के तट पर पहुँचकर गोपियों ने देखा कि श्रीकृष्ण मंद-मंद मुस्कान के साथ खड़े हैं। उन्होंने गोपियों से कहा कि यह समय गृहस्थ धर्म का है, उन्हें घर लौट जाना चाहिए। पर गोपियों ने विनम्र भाव से उत्तर दिया कि उनका मन, उनका प्राण, सब कुछ तो श्रीकृष्ण में ही समर्पित है। उनके लिए कृष्ण ही पति, कृष्ण ही जीवन और कृष्ण ही परम सत्य हैं।
गोपियों की इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने रासलीला आरंभ की। उस दिव्य नृत्य में प्रत्येक गोपी के साथ श्रीकृष्ण स्वयं उपस्थित थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो एक नहीं, अनेक कृष्ण नृत्य कर रहे हों। वृंदावन की वायु सुगंधित हो उठी, यमुना की लहरें थम गईं और देवता भी आकाश से पुष्पवर्षा करने लगे।
रासलीला केवल नृत्य नहीं थी, वह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक थी। गोपियों का प्रेम सांसारिक नहीं, बल्कि शुद्ध, निःस्वार्थ और पूर्ण समर्पण से भरा हुआ था। उसमें कोई इच्छा नहीं थी, केवल कृष्ण की सेवा और उनका सान्निध्य पाने की लालसा थी।
जब रास समाप्त हुई, तो गोपियाँ आनंद और विरह के मिश्रित भाव से भर उठीं। श्रीकृष्ण ने उन्हें समझाया कि यह लीला उन्हें यह सिखाने के लिए थी कि जो मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से ईश्वर का स्मरण करता है, वह कभी उनसे दूर नहीं रहता।
आज भी वृंदावन की गलियों में, यमुना के तट पर और कुंज गलियों में ऐसा माना जाता है कि रात्रि के समय श्रीकृष्ण की बाँसुरी की मधुर तान गूँजती है और गोपियों की रासलीला की स्मृति भक्तों के हृदय को प्रेम और भक्ति से भर देती है।
Gita Gyan