17/04/2025
पहले घूम कर रेकि (पुख्ता-पहचान) कि गई स्याही से मकान पर निशान लगाए गए। तब
कुछ दिन पहले भाईजान हमारे घर ईद की सेवइयां लेकर आए थे, उससे पहले हमने भी दिवाली पर उनके यहां मिठाई भेजी थी।
एक अच्छे पड़ोसी की तरह घर की मामूली जरूरतों में भी एक दूसरे के काम आते थे। उनके घर चीनी खत्म हो जाए तो हमारे यहां से ले जाते थे, हमें भी बाजार से कुछ मंगाना हो तो भाईजान ला देते थे।
लेकिन पता नहीं उस दिन क्या हुआ कि एक भीड़ के साथ आए भाईजान ने हमारे घर में आग लगा दी, मेरे भाई को मारा और मेरे कपड़े फाड़ने लगे,मेरे पूरे शरीर को बुरी तरह से कुचला, कई लोगों के साथ मिलकर कुचला नोचा
हमारे पड़ोस के कई लोगों को मार दिया।
मैं समझ नहीं पाई कि यह सब क्यों हो रहा है। हमने तो भाजपा को वोट भी नहीं की थी, दीदी को वोट दी थी।
यह कहानी है मुर्शिदाबाद की एक हिन्दू पीड़िता की।
हजार सालों से ऐसी कहानी या शायद इससे भी अधिक दुर्दांत कहानी हजारों लाखों माता बहनों की है।
सामान्य रूप से भाईचारा निभा रहा व्यक्ति कब जिहाद के सिपाही के रूप में सामने खड़ा हो जाता है लोगों को समझ नहीं आता, जब तक समझ आता है तब तक वें खुद को लुटा, पिटा पाते हैं।
हर दंगे, हर हिंसा के बाद ऐसी ही कहानियां सामने आती है।
वर्तमान में बंगाल और बांग्लादेश से ऐसी घटनाएं सबसे ज्यादा आ रही हैं।
बंगाली मानुष का पौरुष कुंद होते होते शायद समाप्त हो चला है ..........