18/05/2026
एक बार एक आचार्य चरण जेठ के महीने की अत्यधिक गर्मी में तिरुपति बालाजी के दर्शन करने गए। पहाड़ पर स्थित भगवान वेंकटेश के मंदिर के आसपास की पूरी भूमि गर्मी से बुरी तरह तप रही थी। उन्हें देखकर आचार्य जी के मन में भाव आया कि यदि मंदिर के बाहर एक सरोवर (तालाब) बना दिया जाए और उसमें जल भर दिया जाए, तो भगवान को इस भीषण ताप से शीतलता मिलेगी। वे कभी-कभी नौका विहार या जल क्रीड़ा करने भी बाहर आ सकेंगे।
उस समय अधिक लोग नहीं थे, इसलिए वे स्वयं फावड़ा उठाकर एक स्थान पर खुदाई करने लगे। उनके साथ उनकी गर्भवती पत्नी भी थीं। आचार्य जी मिट्टी खोदकर परात में भरते और उनकी पत्नी उस मिट्टी को सिर पर रखकर दूर फेंकने जातीं। उन्होंने संकल्प लिया कि चाहे महीनों लग जाएं या साल, वे ठाकुर जी के लिए सरोवर बनाकर ही यहाँ से जाएंगे।
जब कुछ दिन बीत गए, तो मंदिर के भीतर बैठे भगवान तिरुपति बालाजी को उस गर्भवती महिला की इस कठिन सेवा और अवस्था पर दया आ गई। भगवान ने एक छोटे से ग्वाले (बालक) का रूप धारण किया और वहाँ आ गए। उन्होंने उस महिला से कहा कि वे दौड़ने में बहुत निपुण हैं, लेकिन अगर उनके पति देख लेंगे तो सेवा कराने के लिए नाराज होंगे, इसलिए वे छुपकर उनकी सहायता करेंगे। उन्होंने कहा कि आप मिट्टी लेकर थोड़ी आगे आ जाना, वहाँ से परात मुझे दे देना और मैं तुरंत डाल कर आया करूँगा।
अब वह बालक तुरंत महिला के हाथ से परात लेता और पलक झपकते ही मिट्टी फेंक कर वापस आ जाता। आचार्य जी ने ध्यान दिया कि पहले उनकी पत्नी को मिट्टी फेंककर आने में काफी समय लगता था, लेकिन अब वे तुरंत वापस आ जाती हैं। उन्होंने पत्नी से पूछा कि तुम दौड़कर जाती हो या मिट्टी यहीं पास में ही फेंक देती हो? इतनी जल्दी मिट्टी कहाँ फेंक कर आ रही हो?
तब पत्नी ने बताया कि एक छोटा सा बालक आता है, जो मेरे हाथ से परात लेकर भागकर मिट्टी फेंक आता है और चार-पांच दिन से वही यह सेवा करवा रहा है। आचार्य जी ने कहा कि मुझे भी उस बालक को देखना है। जब वे आगे बढ़े और उन्होंने उस बालक की अद्भुत और दिव्य रूप माधुरी को देखा, तो वे श्रेष्ठ भक्त और ज्ञानी होने के कारण तुरंत पहचान गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि साक्षात ठाकुर जी (भगवान तिरुपति बालाजी) हैं, जो अपने भक्तों को कष्ट से बचाने के लिए स्वयं सेवा करने आ गए हैं।
राधे राधे