24/03/2026
अपराजिता स्तोत्र की – वह शक्तिशाली वैष्णवी महाविद्या, जिसका अर्थ है “जो कभी पराजित नहीं होती”अपराजिता का मतलब है “अजेय” या “अपराजित”। यह देवी दुर्गा की ही एक अत्यंत शक्तिशाली रूप हैं – वैष्णवी अपराजिता। मार्कंडेय पुराण में वर्णित यह महाविद्या विष्णु भगवान की परम प्रिय मानी गई है।
जब देवासुर संग्राम में नवदुर्गाओं ने दानवों का संहार कर दिया, तब माँ दुर्गा ने अपनी आदि शक्ति “अपराजिता” को शमी के पत्ते लेकर हिमालय में साधना की थी। विजयादशमी (दशहरा) का त्योहार इसी अपराजिता पूजन से जुड़ा है।
भगवान श्रीराम ने भी रावण से युद्ध से पहले अपराजिता स्तोत्र का अनुष्ठान किया था और विजय प्राप्त की थी। आज भी राजकीय कार्य, मुकदमे, व्यापार, परीक्षा या किसी भी संघर्ष में यह स्तोत्र “रामबाण” माना जाता है। इस स्तोत्र के विधिवत पाठ से:
सभी प्रकार के शत्रु नष्ट हो जाते हैं (दृश्य-अदृश्य दोनों)।
रोग, दोष, बंध्या दोष समाप्त होते हैं।
मुकदमे, विवाद, राजकीय कार्यों में निश्चित विजय मिलती है।
अग्नि, जल, वायु, विष, चोर, शाप, भूत-प्रेत, ग्रह-पीड़ा से रक्षा होती है।
दु:स्वप्न, नकारात्मक ऊर्जा, काला जादू का नाश होता है।
सभी कामनाएँ पूरी होती हैं – पुत्र प्राप्ति, सौभाग्य, धन, यश।
गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव और स्वस्थ संतान मिलती है।
रणभूमि, व्यापार, परीक्षा में अपराजित रहते हैं।
जो व्यक्ति रोज या विशेष दिनों में इसका पाठ करता है, उसके चारों ओर एक अदृश्य सुरक्षा कवच बन जाता है। कोई भी उसे पराजित नहीं कर सकता।विनियोग और ध्यान (Viniyog + Dhyan)
विनियोग
ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः।
वामदेव-बृहस्पति-मार्कण्डेया ऋषयः।
गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती छन्दांसि।
लक्ष्मीनृसिंहो देवता।
ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं बीजम्।
हुं शक्तिः।
सकलकामनासिद्ध्यर्थं अपराजिता-विद्यामन्त्रपाठे विनियोगः।
ध्यान
ॐ नीलोत्पलदलश्यामां भुजङ्गाभरणान्विताम्।
शुद्धस्फटिकसङ्काशां चन्द्रकोटिनिभाननाम्॥
शङ्खचक्रधरां देवीं वैष्ण्वीमपराजिताम्।
बालेन्दुशेखरां देवीं वरदाभयदायिनीम्॥
नमस्कृत्य पपाठैनां मार्कण्डेयो महातपाः॥
(देवी नीले कमल के समान श्याम वर्ण, सर्पों के आभूषण, शंख-चक्र धारण किए, बालचंद्र मस्तक पर, वरद-भय मुद्रा में – इस रूप का ध्यान करें।)
मार्कण्डेय उवाच
शृणुष्व मुनयः सर्वे सर्वकामार्थसिद्धिदाम्।
असिद्धसाधनीं देवीं वैष्णवीमपराजिताम्॥
(ऋषि कहते हैं – हे मुनियों! सुनो, यह अपराजिता देवी सभी कामनाओं को सिद्ध करने वाली और असिद्ध को भी सिद्ध करने वाली हैं।)
ॐ नमो नारायणाय, नमो भगवते वासुदेवाय...
(विष्णु के सभी रूपों – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, राम आदि – का आवाहन और नमस्कार।)
ॐ असुर-दैत्य-यक्ष-राक्षस... हन हन पच पच मथ मथ विध्वंसय... स्वाहा।
(सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश करने वाला मंत्र – भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, शत्रु आदि को भस्म करने का संकल्प।)
ॐ सहस्रबाहो... सर्वपापप्रशमन, जनार्दन, नमोऽस्तुते स्वाहा।
(भगवान विष्णु के हजारों हथियारों और सभी दोषों को नष्ट करने वाले रूप का स्तवन।)
विष्णोरियमनुप्रोक्ता सर्वकामफलप्रदा...
(यह विद्या विष्णु द्वारा बताई गई है, सभी कामनाओं को फल देने वाली, सौभाग्य बढ़ाने वाली, सभी भय नष्ट करने वाली है।)
ॐ शुक्लाम्बरधरं विष्णुं...
(विघ्न नाश के लिए विष्णु ध्यान।)
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ह्यभयामपराजिताम्...
(अब मैं अभय और अपराजिता विद्या का वर्णन करता हूँ।)
य इमामपराजितां... न तस्याग्निवायुवज्रोपलाशनिवर्षभयं...
(जो इस विद्या का पाठ, स्मरण, जप या धारण करता है, उसे अग्नि, जल, वज्र, विष, शत्रु, चोर, ग्रह आदि का कोई भय नहीं रहता।)
एतैर्मन्त्रैरुदाहृतैः...
(इसके बाद देवी के 32 नामों का स्तवन – अभये, अनघे, अजिते, अमिते... गायत्रि, सावित्रि, सरस्वति, गौरी, काली आदि – और अंत में “स्थलगतं जलगतम् अन्तरिक्षगतं वा मां रक्ष सर्वोपद्रवेभ्यः स्वाहा”।)
यस्याः प्रणश्यते पुष्पं...
(इस विद्या को धारण करने से गर्भपात, बंध्या दोष, रोग नष्ट होते हैं, संतान सुख मिलता है।)
(
दोस्तों, यह स्तोत्र सिर्फ पढ़ने भर से नहीं, भाव और श्रद्धा से पढ़ने पर फल देता है। रोज 11 बार या विशेष मुहूर्त में 108 बार पढ़ें। भूर्ज पत्र पर लिखकर ताबीज में रख सकते हैं।
जो साधक इसे नित्य पाठ करता है, उसके जीवन में कोई शत्रु टिक नहीं सकता