Sant Shri guru pipa ji "संत श्री गुरु पीपाजी धाम मंदिर - सिरसा हरियाणा"." .

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11/02/2023
श्री पीपा जी मन्दिर परिवार कि तरफ से सभी भक्त जनों को रंगो के त्योहार होली की शुभकामनाए 🙏🙏श्री  पीपा जी मंदिर मे अखिल मं...
18/03/2022

श्री पीपा जी मन्दिर परिवार कि तरफ से सभी भक्त जनों को रंगो के त्योहार होली की शुभकामनाए 🙏🙏

श्री पीपा जी मंदिर मे अखिल मंदिर परिवार संग होली मनाई गई

शिवरात्रि के पावन पर्व पर भगवान मृत्युंजय महादेव का रुद्राभिषेक करते हुए भक्तगण मुख्य यजमान = सुरेश जी तवर। वीरेंद्र चौह...
01/03/2022

शिवरात्रि के पावन पर्व पर भगवान मृत्युंजय महादेव का रुद्राभिषेक करते हुए भक्तगण

मुख्य यजमान = सुरेश जी तवर। वीरेंद्र चौहान

गढ़ गागरोण के राजर्षि सन्त पीपा जी महाराज एवं उनके 52 अनुसरणकर्ता राजपूत राजाओं के इतिहास और पुस्तक का लेखन हो रहा है... ...
31/12/2021

गढ़ गागरोण के राजर्षि सन्त पीपा जी महाराज एवं उनके 52 अनुसरणकर्ता राजपूत राजाओं के इतिहास और पुस्तक का लेखन हो रहा है... जिसमे तारातरा मठ के मठाधीश, वर्तमान राजनीति में राजस्थान के स्वामी विवेकानंद बनकर उभर रहे महंत प्रताप पूरी जी महाराज ( Mahant Pratap Puri )ने शुभकामनाएं प्रेषित की..
साधुवाद... गुरुदेव आपका मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद सदैव हम पर बना रहे..

1891 हमारे पूर्वज मारवाड़ जनगणना में पीपा वंशी राजपूत लिखवाया था ।हमारी समाज के बुद्धिजीवी और दिग्भ्रमित लोगों ने समाज क...
18/12/2021

1891 हमारे पूर्वज मारवाड़ जनगणना में पीपा वंशी राजपूत लिखवाया था ।
हमारी समाज के बुद्धिजीवी और दिग्भ्रमित लोगों ने समाज को एक खाई में धकेल ने के लिए क्या नहीं किया ?

जो सत्य है उसे मतलब कितना छुपाकर और कैसे इन लोगों ने एक राजनीति करके समाज को भ्रमित किया ?

कहते हैं कि राजनीति समाज के लिए करो समाज मैं नहीं !

हम बात करते हैं उस वर्ष की इसवी सन 1891 जब भारतवर्ष में नामदेव बंसी और भी पीपा वंशी दोनों की जातिगत गणना में नामदेव बंसी को दर्जी जाति का जाति गणना में लिया गया जबकि पीपा वंशी राजपूत समाज को 1891 दरमियान एक बड़ा सम्मेलन हुआ था जोधपुर के अंदर वहां उन्हें राजपूत जाति में सम्मिलित किया ।

1897 में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा बनी उस समय उस समय समस्त राजपूत समाज को एक जाजम पर लाने के लिए पीपा वंशीय राजपूतों स्वर्ण इतिहास से और उनका बलिदान देखकर उन्हें शुद्ध रक्त क्षत्रिय माना गया ।

अखंड भारत की एकता के लिए समस्त क्षत्रिय समाज की जनगणना विशेष रुप से जोधपुर में सभा हुई थी उस समय समाज के वरिष्ठ पंचों को उस मीटिंग में अनुग्रहित किया था । समाज में विशेष तौर पर उस मीटिंग में पढ़े लिखे गए थे उन्होंने समाज को विशेष रूप से पीपा वंशी राजपूतों को राजपूत समुदाय से जोड़ा गया यह सत्य घटना उनसे छुपाई गई । उन्होंने उस झंडे को छोड़कर एक अलग झंडा बनाने का सोचा कि हमें आरक्षण में जाना है तो हमें भी श्री पीपा बंसी राजपूत लिख पाते हैं बंधारण सूची में तो हमें आरक्षण मिलेगा ?

समाज की बड़ी मीटिंग का आयोजन हुई उस समय समाज की एक सभा का नाम रखा गया *श्री पीपावंशीय राजपूत सभा* उस सभा ने बहुत प्रयास करने के बाद भी आरक्षण में समाज को नहीं जोड़ पाए और ना ही बंधारण में अपनी जाति *सूचित न कर पाए* उस समय पीपावंशीय राजपूत सभा ने अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा से एक सबन्धन पत्र जारी करवाया ।

समाज के कुछ ठेकेदारों ने श्री पीपावंशीय राजपूत सभा एक झंडे के नीचे न चल कर एक अलग दुकान का निर्माण हुआ वह मूल रूप से पीपा क्षत्रिय रखा गया उस मीटिंग के दरमियान 1956 में समाज के वरिष्ठ पंचों ने संत पीपा जी का इतिहास को लेकर समस्त राव भाट सम्मेलन हुआ उस दरमियान हमारे समाज को राजपूत संत पीपाजी महाराज के उपदेश ग्रहण करने वाले सभी क्षत्रिय वंश से थे संत पीपा जी ने मांस मदिरा का त्यागने एव समस्त हिंदू धर्म और क्षत्रिय धर्म की रक्षा के लिए छापामारी युद्ध उपदेश दिया था ।

उस समय मुगलों ने भारत पर आक्रमण करते थे तो समस्त पीपा वंशी राजपूत गांव गढ़ किले के बीचो-बीच रहे कर मुगलों की आक्रमण की नीति को जान लेते थे और जब भी भारत के अंदर ऐसे आक्रमणकारियों से युद्ध भी किया और बड़े मुगलों षड्यंत्र को पराजित कर देते थे और उनसे जरूरत पड़ने पर युद्ध भी करते थे पीपा वंशी राजपूतों का बहुत बड़ा इतिहास रहा है और इनका भी बलिदान समस्त राजपूत समाज के लिए गौरव की बात है इन्होंने बहुत बड़ा बलिदान दिया है ।

हम समस्त राजपूत समाज एवं पीपा क्षत्रिय समाज से आह्वान करते हैं क्या आप भी अपने मूल धारा में लौटकर क्षत्रिय समाज की ताकत बने अपने पूरे पूर्वजों का बलिदान पर गर्व करें राजपूत हमेशा कमजोर नहीं हो सकता चाहे बूढ़ा भी हो आपने कॉम ने जो बलिदान दिया उस पर समस्त समाज को गर्व है और 36 हुकुम कि आपके पूर्वजों ने बलिदान देकर हिंदू संस्कृति बचाया है यह हमारे लिए गौरव की बात है ।

आप सभी से निवेदन है कि राजराजेश्वर संत पीपाजी महाराज गढ़ गागरोन झालावाड़ झालावाड़ के राजा थे उनके सन्यास उपरांत आप सभी को मांस मदिरा का त्यागने का उपदेश दिया बॉस राजपूत समाज के लिए गर्व की बात है । उस समय कुलदेवी भी युद्ध में लड़ा करती थी, मांस मदिरा के कारण धीरे-धीरे दूर होती चली गई , इतनी करो की बातें अपने संत के उद्देश्य को पालन करते हुए ।

*धर्म व संस्कृति की रक्षा*

जय राजपुताना
क्षत्रिय धर्म युगे युगे
जय माताजी री
आपका अपना
ठाकुर राकेश सिंह चौहान राजपूत
ठिकाना सिरसा हरियाणा

जय पीपा जी महाराज
02/12/2021

जय पीपा जी महाराज

 #पीपा इन वंदन करूँ, अद्भुत सहज सरूप।रंग,वास,जग में रमें, पाणी पातर रूप॥११९॥(मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत  #पीपा...
01/12/2021

#पीपा इन वंदन करूँ, अद्भुत सहज सरूप।
रंग,वास,जग में रमें, पाणी पातर रूप॥११९॥
(मध्यकालीन भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत #पीपाजी कहते हैं वे जन वंदनीय हैं जिनका स्वरूप अद्भुत, सहज और सुंदर है। जो रंग और बास के भाव से जगत में व्याप्त है और पानी से तरल/पतला है।)
संदर्भ: शोधग्रंथ
#संत_पीपाजी एवं #भक्ति_आंदोलन

जय संत गुरु पीपा जी महाराज जी की जय हो
27/11/2021

जय संत गुरु पीपा जी महाराज जी की जय हो

काया देवा काया देवल,काया जगम जाती।काया धूप दीप नइबेदा,काया पूजा पाती।काया के बहुखड खोजते,नवनिधि तामे पाई। ना कछु आइबो ना...
09/10/2021

काया देवा काया देवल,काया जगम जाती।
काया धूप दीप नइबेदा,काया पूजा पाती।
काया के बहुखड खोजते,नवनिधि तामे पाई।
ना कछु आइबो ना कछु जाइबो, राम जी की दुहाई।
जो ब्रह्मडे सोई पिडे,जो खोजे सो पावे।
पीपा प्रणवै परम तत्त है,सतगुरु होय लखावै।

अर्थ:- मानव की आत्मा में ही ईश्वर का वास होता हैं. उनके भीतर ही ईश्वर और मन्दिर दोनों हैं. मानव शरीर ही चेतन यात्री हैं यही धूप दीप फूल पत्ते तथा यही सच्चे देवता हैं.🙏🙏

संत श्री गुरु पीपा जी की जीवनी 🙏संत पीपा जी कालीसिंध नदी पर बना प्राचीन गागरोंन दुर्ग संत पीपा की जन्म स्थली रहा है. इनक...
08/10/2021

संत श्री गुरु पीपा जी की जीवनी 🙏

संत पीपा जी कालीसिंध नदी पर बना प्राचीन गागरोंन दुर्ग संत पीपा की जन्म स्थली रहा है. इनका जन्म विक्रम संवत् 1417 चैत्र शुक्ल पूर्णिमा को खिचीं राजवंश परिवार में हुआ था. वे गागरोंन राज्य के वीर साहसी एवं प्रजापालक शासक थे. शासक रहते हुए उन्होंने दिल्ली सल्तनत के सुलतान फिरोज तुगलक से संघर्ष करके विजय प्राप्त की, लेकिन युद्ध जनित उन्माद, हत्या, जमीन से जल तक रक्तपात को देखा तो उन्होंने सन्यासी होने का निर्णय ले लिया.

संत पीपा जी के पिता पूजा पाठ व भक्ति भावना में अधिक विश्वास रखते थे. पीपाजी की प्रजा भी नित्य आराधना करती थी. देवकृपा से राज्य में कभी भी अकाल व महामारी का प्रकोप नही हुआ. किसी शत्रु ने आक्रमण भी किया तो परास्त हुआ. राजगद्दी त्याग करने के बाद संत पीपा रामानन्द के शिष्य बने. रामानन्द के 12 शिष्यों में पीपा जी भी एक थे.

वे देश के महान समाज सुधारकों की श्रेणी में आते है. संत पीपा का जीवन व चरित्र महान था. इन्होने राजस्थान में भक्ति व समाज सुधार का अलख जगाया. संत पीपा ने अपने विचारों और कृतित्व से समाज सुधार का मार्ग प्रशस्त किया. पीपाजी निर्गुण विचारधारा के संत कवि एवं समाज सुधारक थे. पीपाजी ने भारत में चली आ रही चतुर वर्ण व्यवस्था में नवीन वर्ग, श्रमिक वर्ग सृजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

इनके द्वारा सृजित यह नवीन वर्ग ऐसा था जो हाथों से परिश्रम करता और मुख से ब्रह्म का उच्चारण करता था. समाज सुधार की दृष्टि से संत पीपाजी ने बाहरी आडम्बरों , कर्मकांडो एवं रूढ़ियों की कड़ी आलोचना की तथा बताया कि ईश्वर निर्गुण व निराकार है वह सर्वत्र व्याप्त है. मानव मन में ही सारी सिद्धिया व वस्तुएं व्याप्त है. ईश्वर या परम ब्रह्म की पहचान मन की अनुभूति से है.

रामानंद की सेवा में

दैवीय प्रेरणा से पीपाराव गुरु की तलाश में काशी के संतश्रेष्ठ जगतगुरु रामानन्दाचार्य जी की शरण में आ गए तथा गुरु आदेश पर कुए में कूदने को तैयार हो गए। रामानन्दाचार्य जी आपसे बहुत प्रभावित हुए व पीपाराव को गागरोन जाकर प्रजा सेवा करते हुए भक्ति करने व राजसी संत जीवन व्यतित करने का आदेश दिया। एक वर्ष पश्चात संत रामानन्दाचार्य जी अपनी शिष्य मंडली के साथ गागरोन पधारे व पीपाजी के करुण निवेदन पर आसाढ शुक्ल पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) संवत १४१४ को दीक्षा देकर वैष्णव धर्म के प्रचार के लिये नियुक्त किया। पीपाराव ने अपना सारा राजपाठ अपने भतीजे कल्याणराव को सौपकर गुरुआज्ञा से अपनी सबसे छोटी रानी सीताजी के साथ वैष्णव -धर्म प्रचार-यात्रा पर निकल पडे।

चमत्कार

पीपानन्दाचार्य जी का संपुर्ण जीवन चमत्कारों से भरा हुआ है। राजकाल में देवीय साक्षात्कार करने का चमत्कार प्रमुख है उसके बाद संयास काल में स्वर्ण द्वारिका में ७ दिनों का प्रवास, पीपावाव में रणछोडराय जी की प्रतिमाओं को निकालना व आकालग्रस्त इस में अन्नक्षेत्र चलाना, सिंह को अहिंसा का उपदेश देना, लाठियों को हरे बांस में बदलना, एक ही समय में पांच विभिन्न स्थानों पर उपस्थित होना, मृत तेली को जीवनदान देना, सीता जी का सिंहनी के रूप में आना आदि कई चमत्कार जनश्रुतियों में प्रचलित हैं।

रचना की संभाल

गुरु नानक देव जी ने आपकी रचना आपके पोते अनंतदास के पास से टोडा नगर में ही प्राप्त की। इस बात का प्रमाण अनंतदास द्वारा लिखित 'परचई' के पच्चीसवें प्रसंग से भी मिलता है। इस रचना को बाद में गुरु अर्जुन देव जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में जगह दी।

पीपा जी भक्त बने

'देखो भक्त! आज से राज अहंकार नहीं होना चाहिए, राज बेशक करते रहना लेकिन हरि भजन का सिमरन मत छोड़ना| साधू-संतों की सेवा भी श्रद्धा से करना, निर्धन नि:सहाय को तंग मत करना| ऐसा ही प्यार जताना जब प्रजा सुखी होगी, हम तुम्हारे पास आएंगे, आपको आने की आवश्यकता नहीं| राम नाम का आंचल मत छोड़ना| 'राम नाम' ही सर्वोपरि है|

पीपा जी उठ गए| उनकी सोई सुई आत्मा जाग पड़ी| रामानंद जी से दीक्षा लेकर उनके शिष्य बन गए| पूर्ण उपदेश लेकर अपने शहर गगनौर की तरफ मुड़ पड़े| तदुपरांत उनकी काय ही पलट गई, स्वभाव बदल गया तथा कर्म बदला| हाथ में माला तथा खड़तालें पकड़ लीं, हरि भगवान का यश करने लगा|

पीपा जी अपने राज्य में आ पहुंचे| उन्होंने भक्ति करने के साथ साथ साधू-संतों की सेवा भी आरम्भ कर दी| गरीबों के लिए लंगर लगवा दिए तथा कीर्तन मण्डलियां कायम कर दीं| राज पाठ का कार्य मंत्रियों पर छोड़ दिया| सीतां जी के अलावा बाकी रानियों को राजमहल में खर्च देकर भक्ति करने के लिए कहा| ऐसे उनके भक्ति करने में कोई फर्क न पड़ा|

पर वह गुरु-दर्शन करने के लिए व्याकुल होने लगे| उनकी व्याकुलता असीम हो गई तो एक दिन रामानंद जी ने काशी में बैठे ही उनके मन की बात जान ली| उन्होंने हुक्म दिया कि वह गगनौर का दौरा करेंगे| उनके हुक्म पर उसी समय अमल हो गया| वह काशी से चल पड़े तथा उनके साथ कई शिष्य चल पड़े| एक मण्डली सहित वे गगनौर पहुंच गए|

संत पीपा जी ……………..

o =संत पीपा मध्यकालीन राजस्थान में भक्ति आन्दोलन के प्रमुख संतों में से एक थे। वे देवी दुर्गा के भक्त बन गए थे। बाद के समय में उन्होंने रामानंद जी को अपना गुरु मान लिया। फिर वे अपनी पत्नी सीता के साथ राजस्थान के तोडा नगर में एक मंदिर में रहने लगे थे।

o संत पीपा जी का जन्म 1426 ईसवी में राजस्थान में कोटा से 45 मील पूर्व दिशा में गगनौरगढ़ रियासत में हुआ था।

o इनके बचपन का नाम राजकुमार प्रतापसिंह था और लक्ष्मीवती इनकी माता थीं।

o पीपा जी ने रामानंद से दीक्षा लेकर राजस्थान में निर्गुण भक्ति परम्परा का सूत्रपात किया था।

o दर्जी समुदाय के लोग संत पीपा जी को आपना आराध्य देव मानते हैं।

o बाड़मेर ज़िले के समदड़ी कस्बे में संत पीपा का एक विशाल मंदिर बना हुआ है, जहाँ हर वर्ष विशाल मेला लगत है। इसके अतिरिक्त गागरोन (झालावाड़) एवं मसुरिया (जोधपुर) में भी इनकी स्मृति में मेलों का आयोजन होता है।

o संत पीपाजी ने "चिंतावानी जोग" नामक गुटका की रचना की थी, जिसका लिपि काल संवत 1868 दिया गया है।

o पीपा जी ने अपना अंतिम समय टोंक के टोडा गाँव में बिताया था और वहीं पर चैत्र माह की कृष्ण पक्ष नवमी को इनका निधन हुआ, जो आज भी 'पीपाजी की गुफ़ा' के नाम से प्रसिद्ध है।

o गुरु नानक देव ने इनकी रचना इनके पोते अनंतदास के पास से टोडा नगर में ही प्राप्त की थी। इस बात का प्रमाण अनंतदास द्वारा लिखित 'परचई' के पच्चीसवें प्रसंग से भी मिलता है। इस रचना को बाद में गुरु अर्जुन देव ने 'गुरु ग्रंथ साहिब' में जगह दी थी। P**aji Dham Jhalawar Rajasthan पीपाजी धाम समदड़ी - P**a Kshatriya Darji Samaj P**aji Mandir Samdari P**ajifoundation Trust

05/10/2021

#गुरु के साथ ऐसा प्रेम होना चाहिए, जैसा एक प्यासे को पानी के साथ*
जैसे गर्मी का मौसम हो, लंबा सफर हो, धूप हो और कोई इंसान प्यास से तड़प रहा हो।
उस समय अगर कोई हजार रुपए भी उसको दे, कि एक मील और चल, तो वह कहेगा कि नहीं, पानी ...
*जब तक ऐसी तड़प, सतगुरु से मिलने की न हो जाए, 'दरवाजा' नहीं खुलता*
हमारा इस तरह का प्यार तो है, मगर... 'दुनिया' से है, *दरवाजा' किस तरह खुले*?🙏🏻🙏🏻

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