24/05/2026
*यूहन्ना रचित सुसमाचार 16:1-6 में यीशु अपने चेलों से बहुत गहरी और भावनात्मक बात करते हैं। यह बातचीत उस समय की है जब यीशु क्रूस पर चढ़ाए जाने से ठीक पहले अपने शिष्यों को अंतिम शिक्षा दे रहे थे। वे जानते थे कि आगे कठिन समय आने वाला है, इसलिए वे अपने चेलों को मानसिक और आत्मिक रूप से तैयार कर रहे थे।*
*पद 1* — “मैं ने तुम से ये बातें इसलिए कही हैं कि तुम ठोकर न खाओ।”
यहाँ “ठोकर खाना” का अर्थ है — विश्वास से गिर जाना, डर जाना या यीशु को छोड़ देना।
यीशु जानते थे कि उनके चेले आगे जाकर विरोध, अपमान और सताव सहेंगे। अगर यह सब अचानक होता, तो वे सोच सकते थे कि “यदि यीशु सचमुच परमेश्वर के पुत्र हैं, तो हमारे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?”
इसलिए यीशु पहले से सब बता देते हैं ताकि उनका विश्वास मजबूत रहे।
सीख:
जीवन में कठिनाइयाँ आने का मतलब यह नहीं कि परमेश्वर हमारे साथ नहीं है। कई बार कठिनाइयाँ विश्वास की परीक्षा और तैयारी होती हैं।
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*पद 2* — “वे तुम्हें आराधनालयों से निकाल देंगे...”
उस समय आराधनालय केवल पूजा की जगह नहीं था, बल्कि समाज और धार्मिक जीवन का केंद्र था।
किसी को आराधनालय से निकाल देना मतलब उसे समाज से अलग कर देना।
यीशु बताते हैं कि उनके अनुयायियों के साथ ऐसा होगा। यहाँ तक कि कुछ लोग उन्हें मारना भी धर्म का काम समझेंगे।
इसका गहरा अर्थ:
धर्म के नाम पर भी गलत काम हो सकते हैं।
कई लोग बिना सच्चाई जाने, यह सोचकर दूसरों को दुख पहुँचाते हैं कि वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं।
इसका उदाहरण बाद में पौलुस प्रेरित के जीवन में भी दिखता है। यीशु को मानने से पहले वे मसीहियों को सताते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे सही काम कर रहे हैं।
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*पद 3* — “वे ऐसा इसलिए करेंगे क्योंकि उन्होंने न पिता को जाना, न मुझे।”
यहाँ यीशु एक बहुत बड़ी बात बताते हैं —
केवल धार्मिक होना ही परमेश्वर को जानना नहीं है।
कोई व्यक्ति पूजा-पाठ करे, धार्मिक नियम माने, फिर भी उसके भीतर प्रेम, दया और सत्य न हो, तो वह वास्तव में परमेश्वर को नहीं जानता।
यीशु का संदेश:
परमेश्वर को जानने का अर्थ केवल धर्म नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को समझना है — प्रेम, दया, सत्य और करुणा।
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*पद 4* — “मैं ने तुम से ये बातें इसलिए कही हैं कि जब समय आए तो तुम्हें याद आए...”
यीशु अपने चेलों को भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं।
जब कठिन समय आएगा, तब उन्हें याद होगा कि यीशु ने पहले ही यह सब कहा था।
इससे उनके भीतर दो बातें आएँगी:
डर कम होगा
विश्वास मजबूत होगा
आज के लिए सीख:
कई बार हम कठिन परिस्थिति में सोचते हैं कि “यह मेरे साथ क्यों?”
लेकिन परमेश्वर हमें पहले से अपने वचन, अनुभवों और शिक्षा के द्वारा तैयार करता रहता है।
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*पद 5* — “अब मैं उसके पास जाता हूँ जिसने मुझे भेजा...”
यहाँ यीशु अपने स्वर्गारोहण की ओर संकेत करते हैं।
वे अपने चेलों को बता रहे हैं कि अब उनका पृथ्वी पर समय पूरा होने वाला है।
लेकिन चेले इस बात को समझ नहीं पा रहे थे। वे यीशु से प्रेम करते थे और उन्हें खोने के डर से भर गए थे।
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*पद 6* — “तुम्हारा मन शोक से भर गया है।”
चेले दुखी थे क्योंकि:
उन्हें लग रहा था कि उनका सहारा जा रहा है
भविष्य अनिश्चित दिख रहा था
वे डर और चिंता में थे
यीशु उनके दुःख को समझते हैं।
यह दिखाता है कि परमेश्वर हमारे भावनाओं को समझता है।
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पूरे भाग का मुख्य संदेश
1. सच्चे मार्ग में विरोध आ सकता है
यदि कोई सत्य और धर्म के रास्ते पर चलता है, तो उसे कभी-कभी विरोध सहना पड़ सकता है।
2. केवल धार्मिक दिखना काफी नहीं
परमेश्वर को सच में जानने का अर्थ है प्रेम, दया और सत्य में चलना।
3. परमेश्वर पहले से तैयार करता है
यीशु अपने लोगों को अचानक अंधेरे में नहीं छोड़ते। वे पहले से चेतावनी और मार्गदर्शन देते हैं।
4. दुःख के बीच भी आशा है
चेले दुखी थे, लेकिन आगे चलकर वही लोग साहस के साथ सुसमाचार फैलाने लगे।
इसका अर्थ है कि परमेश्वर दुःख को भी नई शक्ति में बदल सकता है।