29/10/2023
नवाब शेर मोहम्मद खान मलेरकोटला
गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज और मुगल सेना संघर्ष को अंग्रेजों के समय से लेकर आज तक अलगाववादी तत्व प्रचारित करते हैं कि वो संघर्ष औरंगज़ेब द्वारा हिंदुओं के जबरन धर्मपरिवर्तन के विरोध में हुआ
हिंदुओं की रक्षा के लिए सिखों ने मुगलों से युद्ध किया और औरंगजेब ने गुरु महाराज के साहिबज़ादों को इस्लाम स्वीकार न करने के कारण शहीद कर दिया था... इसलिये सिखों और इस्लाम में हमेशा का बैर है........ लेकिन सच इन सब बातों के उलट है, न वो औरंगजेब के साथ हुई लड़ाई थी, और न इस्लाम के कारण हुई लड़ाई थी, और न हिन्दू इस लड़ाई में सिखों का एहसान मान रहे थे या सिखों के साथ थे, बल्कि लड़ाई तो पहाड़ी हिन्दू राजा ही सिखों के साथ कर रहे थे,
दूसरी तरफ पीर बूद्दू शाह एक मुसलमान सन्त थे जो पहाड़ी राजाओं के ख़िलाफ़ युद्ध मे गुरु गोबिंद सिंह जी का साथ दे रहे थे...
चमकौर के युद्ध के बाद माता गूजरी के साथ छल करके उन्हें गिरफ्तार करवाने वाला गंगू एक हिन्दू था, कचहरी में नन्हे साहिबज़ादों के विरुद्ध मौत की सजा का सुझाव देने वाला सुच्चानन्द एक हिन्दू था... .. ऐसे में आज जो कहानियां सुनाई जाती हैं कि हिंदुओं के जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए सिख मुग़ल संघर्ष हुए, ये कहानियां कहाँ तक सही बैठती हैं ??
सच्चाई ये है कि औरंगज़ेब ने अपने किसी निजी स्वार्थ में नही, बल्कि किसी अन्य (पहाड़ी राजाओं) की झूटी बातों में आकर मुग़ल सेना सिखों के विरुद्ध भेजी थी और ये बात गुरु महाराज ने जफरनामा में स्पष्ट की है,
"मनम कुश्तहम कोहियां पुरफितन,
के आँ बुतपरस्तां दूं मन बुत शिकन" (95)
.... यानि गुरु महाराज ने लिखा है कि मैंने जिन पहाड़ी राजाओं से युद्ध किये थे,वो उपद्रवी हैं, वे मूर्तिपूजक हैं, और मैं मूर्तिभंजक...!!! यानी गुरु महाराज का तात्पर्य था कि इस युद्ध के बीच में औरंगजेब ने मूर्तिपूजको का साथ क्यों दिया ?
दरअसल सिख गुरुओं द्वारा चलाई गई धार्मिक पाखंड विरोधी मुहीम से रूढ़िवादी पहाड़ी राजा गुरु महाराज के शत्रु बन गए थे, लेकिन ये राजे खुद इतने शक्तिशाली नही थे कि सिखों से लड़कर उनका दमन कर सकते इसलिये उन्होंने मुग़ल राज को सिखों से लड़ाने की साज़िशें रचनी शुरू कर दीं, और दक्कन में व्यस्त औरंगज़ेब के पास बार बार ये सन्देश भिजवाने शुरू कर दिए कि ये सिख गुरु जनता को मुग़ल राज से बगावत के लिये उकसा रहे हैं, उस वक्त औरंगजेब के उत्तर भारत आकर सही वस्तुस्थिति पता करने की संभावना नही थी, यही देखकर सूबेदारों ने ये झूठे पत्र औरंगजेब के पास भेजे, तब मजबूरन औरंगज़ेब ने सिखों के खिलाफ लड़ने के लिये पहाड़ी राजाओं को अनुमति दे दी, इन पहाड़ी राजाओं ने सरहिंद के भ्रष्ट नवाब वज़ीर खान को भी अपने साथ मिला लिया था, वज़ीर खान की कचहरी में ही चमकौर युद्ध के कैदियों का मुकदमा सुनाया जाना था...... वज़ीर खान ने मुनादी करवा दी थी कि छोटे साहिबज़ादों को गिरफ्तार कराने वाले व्यक्ति को बहुत ईनाम दिया जाएगा, ये सुनकर कभी गुरु की रसोई में सेवादार रहे एक व्यक्ति गंगू, यानी गंगाराम ने एक चाल चली और माता गूजरी और नन्हे साहिबज़ादों को शरण देने की पेशकश की, जिस रात माताजी इसके घर में शरण लेने रुकीं, उसी रात गंगू ने माता गूजरी की सोने के सिक्कों से भरी थैली चुरा ली, और अगली ही सुबह उन्हें मुरिन्डे के कोतवाल को सौंप दिया
जहां से इन्हें यातनाएं देते हुए वज़ीर खान की कचहरी में ले जाया गया था, जहां बच्चों के वीरतापूर्ण जवाबों से क्रोधित हो कर दीवान सुच्चानन्द ने इन बच्चों को मौत की सज़ा देने की सलाह वज़ीर खान को दी, और वज़ीर खान ने उस सलाह पर अमल किया... जब गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज के दोनों छोटे साहिबजादों जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह को सरहिंद की कचहरी में मौत का फरमान सुनाया जा रहा था तो उस कचहरी में मलेर कोटला के नवाब शेर मुहम्मद खां भी मौजूद थे। उन्होंने इस पाप के खिलाफ आवाज़ उठाई और सरहिंद के सूबेदार वज़ीर खान के इस फैसले का डट कर विरोध किया।
नवाब मलेरकोटला को वज़ीर खान द्वारा याद दिलाया गया कि कैसे सिक्खों के साथ जंग में उनका सगा भाई मारा गया । नवाब साहब ने कहा कि जंग दो सेनाओं में होती है। जब सैनिक आमने सामने होते हैं तो दोनों तरफ से लोग मरते हैं, उसमे इन मासूम बच्चों का क्या कसूर। हां, मैं जंग का बदला जंग में लूंगा, इन नन्हें बच्चों को मार कर नही। ये इस्लाम के खिलाफ है, कि नाबालिग बच्चों को किसी भी तरह की सज़ा दी जाए। फिर भी सूबेदार सरहिंद वज़ीर खां नही माना। उसने गुरु गोबिंद सिंह के दोनों पुत्रों की सजा बरकरार रखी। यह देख सुन कर नवाब साहब " हा दा नारा" यानी हक़ की आवाज़ (अल्लाह हक़) बोल कर वहां से बाहर चले गए। ये हा दा नारा सिख कौम के लिए एक अमर नारा बन गया।
जब इस घटना की जानकारी गुरु गोबिंद सिह जी महाराज को हुई तो उन्होंने पत्र लिखकर नवाब शेर मुहम्मद खान के प्रति आभार जताया।
.. बाद के दिनों में सन 1783 ई में जब सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया और सरदार बघेल सिंह के नेतृत्व में सिख राज्य का विस्तार दिल्ली से लेकर कैथल, करनाल, दर्रा खैबर तक फैला, तब भी मलेर कोटला की ओर आँख उठा कर भी सिखों ने नहीं देखा। मलेर कोटला के नवाब साहब ने जो अहसान सिखों पर किया, वो आज भी सिख समुदाय मानता है। 1947 में बंटवारे के वक़्त एक भी मुस्लिम परिवार यहां से पलायन कर पाकिस्तान नही गया ।
आज भी मलेर कोटला नवाब शेर मुहम्मद खान की यादगार और हा के नारे को अमर बनाने के लिए सिख क़ौम ने शहीदी स्थान गुरुद्वारा फतेहगढ़ साहिब का मुख्य द्वार का नाम, शेर मुहम्मद खान के नाम पर है जो सिख मुस्लिम भाईचारे की अद्भुत मिसाल है। ये तसवीर उन्ही नवाब शेर मोहम्मद खान की है