17/09/2026
🌼 श्री नेमनाथ वाणी
दुःख और सुख
दुःख कैसे हुआ? दुःख के साथ क्लेश है, जैसे काम, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या, रजोगुण, तमोगुण हैं। ये सब दुःख का ही घर हैं। ये ही फाँसी चढ़ा देते हैं, ये ही सिर फुड़वा देते हैं। ये ही तारीख लगवा देते हैं, ये ही सगा-संबंधियों में बैर पड़वा देते हैं, पड़ोस में और गाँव-बस्ती में बैर करवा देते हैं।
आखिर अपने मनुष्य जीवन का भी सत्यानाश करवा देते हैं। समझो और विचारो, सोचो और इन अपने शत्रुओं को अपने मनुष्य जीवन में मत आने दो, तो इसके बाद सुख ही सुख है।
जैसे—किसी को भी बुरा मत बोलो, कोई मनसा पाप मत करो। किसी की निंदा मत करो। अगर कोई मनमुखी घमंडी जीव बुरा बोलता है तो सहन करो, क्योंकि जैसे ठंडा लोहा गर्म को काटता है, इसी तरह आप अपनी सहनशीलता से उसको भी शील कर सकते हो। और अगर आप भी उसके बराबर बोलोगे तो आपकी ही सहनशक्ति और बुद्धि कमजोर होगी।
इसलिए जो बुरा बोलता है, बुरा कहता है, बुरा करता है, वो सब अपने ही लिए करता है और वैसा ही भरता है।
जैसे महापुरुषों ने कहा है—
राम किसी को मारे नहीं, नहीं हत्यारा वो राम।
अपने आप ही मरते, कर-कर खोटा काम॥
दुःख-सुख की कहीं दुकान नहीं लगी है। सब अपने आप ही में से निकलते हैं। अज्ञान से सुख कैसे पा सकते हो? सुख के पीछे शील है और संतोष है, सतोगुण है। कानों का काम सुनने का है। सभी बातें कानों में सुनी जाती हैं, उनका काम सुनने का है, विचारना हमारा यानी बुद्धि का काम है। पहले विचारे, अपना काम में आने वाली बात है तो उसका ध्यान करो, नहीं तो जाने दो। मीठा वचन से प्यारा लगता है। मीठा वचन कोई से भी बोलो तो सुख है।
तेरी-मेरी करने से बचो और इसके बदले राम का नाम लो तो सुख है। और दुनिया के गप्प-बाजी में तेरी-मेरी में दुःख है। और इससे अच्छा संता की संगत सुनो तो सुख है।
और किसी से लड़ाई हो जाए तो उससे लड़ने की कोशिश न करें। प्रेम से उस बात को समझाकर, शील वचन बोलकर काम ले तो लड़ाई यहाँ समाप्त हो जाएगी।
कोई कितना भी बड़ा कहे, उधर ध्यान नहीं रखें। अपने आप में छोटा बनकर रहें तो चारों ओर सुख है।
कुटुम्ब-परिवार, माल-खजाने का अभिमान नहीं करना चाहिए तो सुख ही सुख है।
हमारे सामने एक दूसरा भी प्रेमी आ रहा है तो पहले राम-राम करना चाहिए और मीठी वाणी बोलिए तो सुख है।
अभिमानी नहीं बनना चाहिए, ये दुःख है, सुख नहीं। सत्संग संता के सत्संग में जाकर सबको नमस्कार करना, यानी शीश झुकाना चाहिए, ये सुख है। जीवन मुक्ति है। ऐसे करने से गुरमुख का मान बढ़ता है।
सत्संग में लोग समझते हैं, ये गुरमुख है और जो कोई तो जा के तेली का सा लठ खड़ा हो जाते हैं और ये समझते हैं कि मैं सिर झुकाऊँगा तो मेरे बाप-दादा की जात में फर्क पड़ जाएगा। ऐसे मनुष्य को सत्संग मनमुख समझता है।
और भाई, आगे आप लोगों को मरजी सुख हो, सुख है।
नेमनाथ का तो यही ध्यान है—विचारो जग में ये राजस्थानी भाषा है, इन्हें समझो।
कपट का कोठा भीतर भरया, ऊपर नहाण सू के होसी।
प्रेम भाव से छोरी ने परणावे, आखिर जान बिदा होवे,
जद आप भी रोवे, और छोरी ने भी रुवावे।
छोरी ने ते जाणों घरां आपणे, तो अब रोयाँ सूं के होसी।
जो आदमी मर जाय घर में, जिकी अर्थी बाँधे, कफन ओढ़ावे,
ऊपर कुटुम्ब-परिवार सारो रोवे, ई परिवार मासूं,
जीवतांई इके सागे कुणबंधसी। झुर-झुर रोवे,
आँसू भुवावे, अब रोया सूं के बणसी।
जीवता माता-पिता ने तो पानी बी कोनी पायो,
अब गंगाजी न्हांभा से के बणसी।
जीवत करम करया कोनी, कोई करमां रा कीट,
गंगा जी में नहाण सूं कंया कट सी।
अरे भाई, अब भी नहीं समझो तो खूब करो अब करमां का सोटा,
बिन समझ्या, बिन पड़े पटकी, आँ फोका ज्ञाना सूं बचो।
घट में माला कभी न फेरी, बायर आँख मींचाँ सूं के बणसी।
मन की माला बिन नहीं उजालो, तोई काठका मणियां सूं के बणसी।
आप रो देव आपा में भेले, बाहिर ढूँढा के होसी।
जंतर-मंतर, भरम-टोटक्या, ताबीजां सूं के होसी॥
भैंसा-बकरा, मद का प्याला, भोग चढ़ाया के होसी।
ऊत पितरां को रात जगावे, नाड़ हिलायां के होसी॥
दादो जी पितर बण आवे, बेटा की बहू के गले चढ़ाया के होसी।
पातड़ी पहरायां के होसी॥
बकरा काटे, बेटा मांगे, भेंट चढ़ायां के होसी।
अपना पर छुरी नहीं फेरे, जीव सतायां के होसी॥
जोत जलाकर बुझा काढे, नाड़ हिलायां के होसी।
जग में करे भरमना पापी, आगे जमड़ा की गल पड़सी फांसी।
हे ढोंग्या का ढोंग घणा है, आमे बात नहीं एक सांची।
आने त्याग मुख राम भजो रे, यो सत को मारग पासी॥
सत्संग करो, संता को सत्संग में जाओ, संता का उपदेश सुनो।
सत-असत का निर्णय करके अपना भरम मिटाओ।
सतगुरु ध्याओ, ज्ञान विचारो, जन्म-मृत्यु सुलझाओ,
यो मनुष्य जन्म अमोलख वस्तु, जीवन सफल बणाओ॥