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Essence Of Astrology ज्योतिष, पुराण, उपनिषद, तंत्रशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों, सनातन धर्म ग्रंथों से संकलित जानकारी

Essence Of Astrology पेज पुराणों, वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों आदि में वर्णित ज्ञान, जीवन उपयोगी बातें, वैदिक प्राचीन पुस्तकों में वर्णित ज्योतिष शास्त्र, शास्त्र सम्मत कर्म, उपाय, सनातम धर्म का ज्ञान, उत्सव/त्योहारों की शास्त्र सम्मत जानकारी आदि का संग्रह है।

शारदीय नवरात्र में देवी-माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) पाठ करने और उसको सुनने का अतिविशेष महत्व है।मार्कण्डेय पुराण में स्वय...
04/10/2026

शारदीय नवरात्र में देवी-माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) पाठ करने और उसको सुनने का अतिविशेष महत्व है।

मार्कण्डेय पुराण में स्वयं भगवती का स्पष्ट वचन है -
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥

अर्थात्
शरद ऋतु में होने वाली भगवती की वार्षिक महापूजा के अवसर पर जो मनुष्य भक्तिभाव से देवी के इस माहात्म्य को सुनता है, वह भगवती की कृपा से समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य आदि से सम्पन्न होता है इसमें कोई संशय नहीं।

ध्यान दीजिए माँ ने केवल पूजा करने की बात नहीं कही, बल्कि “ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः” कहा है। अर्थात् माँ का माहात्म्य सुनना भी स्वयं देवी द्वारा कहा गया साधन है।

इसलिए इस नवरात्रि पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ अपने घर में अवश्य करें।

कितनी आवृत्ति करें?

विधानमाला में श्रीनृसिंहभट्ट ने शारदीय नवरात्र में नवचंडी पाठ का अतिविशेष महत्व बताया है। अतः सर्वोत्तम रहेगा आप पूर्ण सप्तशती के नौ पाठ करें। कामनाभेद से
दुर्गा सप्तशती के पाठ की संख्या पाठ भिन्न हो सकती है।

फलसिद्धि, नियमित साधना एवं भगवती की आराधना के लिए १ पूर्ण सप्तशती पाठ, उपद्रव-शान्ति के लिए ३, ग्रहदोष/ग्रहबाधा की शान्ति के लिए ५, महाभय की शान्ति के लिए ७, विशेष शान्ति तथा वाजपेय यज्ञ के फल के लिए ९, राजभय आदि की शान्ति एवं ऐश्वर्य के लिए ११, काम्यसिद्धि एवं शत्रु-विनाश के लिए १२, रिपु-वशीकरण आदि के लिए १४, सौख्य एवं श्री की प्राप्ति के लिए १५, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य आदि की वृद्धि के लिए २६, राजभय एवं शत्रु-संबंधी विशेष प्रयोजनों के लिए १७–१८, महाऋण/महासंकट से विमुक्ति के लिए २०, बन्धन-मोचन के लिए २५ और अत्यन्त बड़े संकटों के लिए शतचंडी (१०० पाठ) के विधान ग्रन्थों में मिलते हैं।

परन्तु यहाँ संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है - श्रद्धा, शुद्धता, संकल्प और पाठ की शुद्ध परम्परा।

पाठ में शुद्धता क्यों आवश्यक है?

सप्तशती केवल कोई सामान्य स्तोत्र नहीं है। यह मन्त्रात्मक देवी-माहात्म्य है। “श्रीदुर्गासप्तशती भगवती का वाङ्मय स्वरूप है”
इसलिए पाठ में यथासम्भव -
देह की शुद्धि
मन की शुद्धि
स्थान की शुद्धि
आसन की शुद्धि
वाणी एवं जिह्वा की शुद्धि
और पाठ के उच्चारण की शुद्धि

का ध्यान रखना चाहिए। विशेष रूप से संस्कृत मूलपाठ का शुद्ध उच्चारण और सही पाठक्रम बहुत महत्वपूर्ण है। सप्तशती-पाठ में कवच, अर्गला, कीलक आदि अंगों सहित सम्प्रदायानुसार पाठ-विधि का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए यदि विधि का ज्ञान नहीं है तो केवल पुस्तक खोलकर किसी भी क्रम से पढ़ने के स्थान पर किसी योग्य आचार्य/ब्राह्मण से विधि समझ लेना अथवा उन्हीं से पाठ कराना अधिक उचित है।

यदि आपके पास स्थानीय स्तर पर योग्य पाठकर्ता उपलब्ध नहीं हैं, तो हमारे समूह में उपस्थित विद्वान हैं जिनसे अनुरोध करने पर वह अपने-अपने पवित्र तीर्थक्षेत्रों से इस साधना को करा सकते हैं

🔱 काशी के शिव-शक्तिमय क्षेत्र से — पं. शिवेश जी +917007896359
🔱 उज्जयिनी के महाकाल-शक्ति क्षेत्र से — पं. प्रदीप जी +919754553020
🔱 प्रभासक्षेत्र की प्राचीन शिव-शक्ति परम्परा से — पं. हेत भट्ट जी +919157575400

यदि आपके लिए घर पर पाठ करवाना सम्भव न हो, तो इन विद्वानों से सम्पर्क करके संकल्पपूर्वक सप्तशती पाठ/नवरात्रि अनुष्ठान कराया जा सकता है।

मेरी दृष्टि में बात बहुत सरल है -

इस नवरात्रि कम-से-कम १ पूर्ण पाठ का संकल्प अवश्य लें।
और यदि सामर्थ्य, समय तथा उचित पाठकर्ता उपलब्ध हो तो ९ आवृत्तियों का विशेष संकल्प अत्यन्त उत्तम है। क्योंकि नवावृत्ति के लिए स्वयं शास्त्र में “शान्ति” और “वाजपेयफल” का विशेष उल्लेख है।

आप सभी के कल्याण की कामनाओं सहित आपका मित्र Essence Of Astrology

माता के नवरात्र
02/10/2026

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25 अक्टूबर 2026 आकाशदीप-आरम्भः

इस नवरात्र स्वयं करें एक सरल लेकिन प्रभावशाली अनुष्ठानइस शारदीय नवरात्र (11–19 अक्टूबर 2026) एक छोटा-सा संकल्प लें और नौ...
28/09/2026

इस नवरात्र स्वयं करें एक सरल लेकिन प्रभावशाली अनुष्ठान

इस शारदीय नवरात्र (11–19 अक्टूबर 2026) एक छोटा-सा संकल्प लें और नौ दिनों तक स्वयं माँ भगवती की उपासना करें।

11 अक्टूबर 2026 को कलश स्थापना के पश्चात माँ दुर्गा की मूर्ति अथवा चित्र स्थापित करें। फिर माँ के किसी एक प्रिय स्तोत्र जैसे अर्गला स्तोत्र, नारायणी स्तुति, देवी कवच, अर्जुनकृत दुर्गा स्तवन, सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र आदि का संकल्प लें।

इसके बाद नौ दिनों तक प्रतिदिन 36 पाठ श्रद्धा और नियमपूर्वक करें। अष्टमी/नवमी (19 अक्टूबर) तक आपके 324 पाठ पूर्ण हो जाएंगे।

संकल्प लेते समय अपनी मनोकामना, अपनी पीड़ा, अपना भय या अपनी प्रार्थना किसी औपचारिक भाषा में नहीं, बल्कि एक अबोध निष्कपट बालक की तरह अपनी माँ से कह दें।

36 और 324 का सांकेतिक महत्व

36 = 9 × 4 : 9 नवदुर्गाओं का अंक है और 4 जीवन के चार पुरुषार्थों का। अर्थात प्रतिदिन नवदुर्गा की कृपा को जीवन के चारों आयामों में आमंत्रित करना।
324 = 108 × 3 : 108 जप की पूर्ण संख्या मानी गई है। उसके तीन गुना पाठ शरीर, मन और आत्मा इन तीनों स्तरों पर देवी कृपा का आह्वान करने का प्रतीक है।

यह संख्या किसी अनिवार्य शास्त्रीय विधान का दावा नहीं करती, बल्कि साधना को पूर्णता और नियमितता देने वाला एक सुंदर आध्यात्मिक संकेत है।

जय माता दी
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विद्वानजन कहते हैं  #गजेन्द्रमोक्ष का पाठ पितरों का उद्धार करता है। #वामनपुराण के अनुसार गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रक...
26/09/2026

विद्वानजन कहते हैं #गजेन्द्रमोक्ष का पाठ पितरों का उद्धार करता है।

#वामनपुराण के अनुसार गजेन्द्रमोक्ष पवित्र और सब प्रकारके पापों का नाश करने वाला है । इस गजेन्द्रमोक्ष के कहने, स्मरण करने और सुनने से मनुष्य तुरंत सभी पापों से मुक्त हो जाता है । मुरारि विष्णु का यह पवित्र चरित्र पुण्य प्रदान करने वाला तथा कीर्तन करने योग्य है । इसे कहनेसे मनुष्य गजेन्द्रके समान अनेक पापों के बन्धन से मुक्त हो जाता है ।

#श्रीमद्भागवतपुराण के अष्टम स्कन्ध में गजेन्द्र मोक्ष की कथा है । द्वितीय अध्याय में ग्राह के साथ गजेन्द्र के युद्ध का वर्णन है, तृतीय अध्याय में गजेन्द्रकृत भगवान के स्तवन और गजेन्द्र मोक्ष का प्रसंग है और चतुर्थ अध्याय में गज ग्राह के पूर्व जन्म का इतिहास है । श्रीमद्भागवत में गजेन्द्र मोक्ष आख्यान के पाठ का माहात्म्य बतलाते हुए इसको स्वर्ग तथा यशदायक, कलियुग के समस्त पापों का नाशक, दुःस्वप्न नाशक और श्रेयसाधक कहा गया है।

http://essenceofastro.blogspot.com/2014/08/gajendra-moksh.html

#श्राद्ध_महालय
#श्राद्ध_महालय_२०२४

Gajendra Moksh, गजेन्द्र मोक्ष

26/09/2026

"अच्युतानन्तगोविन्दाञ्छ्राद्धकाले च संस्मरेत्" #गरुडपुराण

श्राद्धकाल में भगवान विष्णु के अच्युत, अनन्त और गोविन्द इन तीन नामों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करना चाहिए।

26/09/2026

भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को किया जाने वाला प्रौष्ठपदी श्राद्ध : नान्दीमुख पितरों का दिव्य श्राद्ध
महालय श्राद्ध का मंगल द्वार

नान्दीमुखानां प्रत्यब्दं कन्याराशिगते रवौ।
पौर्णमास्यां तु कर्तव्यं वराहवचनं यथा॥
जब सूर्य कन्या राशि में स्थित हों, तब भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा के दिन प्रत्येक वर्ष नान्दीमुख पितरों का श्राद्ध करना चाहिए।

* नान्दीमुख पितर कौन हैं?
प्रौष्ठपदी श्राद्ध का संबंध उन दिव्य पूर्वजों से है जो हमारे प्रपितामह से पूर्व की तीन पीढ़ियों में स्थित हैं। शास्त्र उन्हें इस प्रकार संबोधित करते हैं—
- वृद्धप्रपितामह (चौथी पीढ़ी)
- अतिवृद्धप्रपितामह (पाँचवीं पीढ़ी)
- वृद्धातिवृद्धप्रपितामह (छठी पीढ़ी)

यही तीनों नान्दीमुख पितर कहलाते हैं।

* नान्दीमुख पितरों का दिव्य स्वरूप
शास्त्रों में नान्दीमुख पितरों का अद्भुत वर्णन मिलता है। उन्हें
- दिव्य पितर कहा गया है।
- जन्म-मरण के शोक से मुक्त बताया गया है।
- सोमप्रधान पितर माना गया है।
- उनमें सत्त्व और ज्ञान की प्रधानता कही गई है।
- उनकी दृष्टि सदैव अपने वंशजों के मंगल और समृद्धि पर रहती है।

इसी कारण विवाह, उपनयन, गृहप्रवेश, यज्ञ तथा अन्य सभी मांगलिक संस्कारों में सबसे पहले नान्दीमुख पितरों का आवाहन किया जाता है।

प्रौष्ठपदी श्राद्ध में नान्दीमुख पितरों की तीन संज्ञाएँ बताई गई हैं
• सत्य — दिव्यता, सत्य और सद्गति का प्रतीक।
• वसु — समृद्धि, पोषण और जीवनदायी शक्ति का प्रतीक।
• विश्वेदेव — देवतुल्य पितर, जो सम्पूर्ण कुल के कल्याणकारी माने गए हैं।

इसीलिए नान्दीमुख पितरों को केवल पितृ नहीं, बल्कि दिव्य पितर कहा गया है।

* प्रौष्ठपदी श्राद्ध क्यों करें?
“नान्दी” का अर्थ है — मंगल, आनंद, समृद्धि और शुभारम्भ।
प्रौष्ठपदी श्राद्ध हमें अपनी उन दिव्य पूर्वज पीढ़ियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर देता है, जिनकी कृपा से कुल में मंगल और समृद्धि का प्रवाह बना रहता है।

इस दिन नान्दीमुख पितरों से प्रार्थना की जाती है कि वे हमारे कुल को प्रदान करें—
- कुल की समृद्धि।
- आयु एवं आरोग्य।
- संतति की वृद्धि।
- धर्म, ज्ञान और मंगलमय जीवन।
- पितृकृपा एवं कुल-कल्याण।

प्रौष्ठपदी श्राद्ध अपने दिव्य पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और मंगलकामना का पावन पर्व है

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पितृगण का आधार चन्द्रमा है और चन्द्रमा का आधार योग है।इसलिए  #श्राद्ध के लिए योगिजन को नियुक्त करना अतिउत्तम है। यदि श्र...
24/09/2026

पितृगण का आधार चन्द्रमा है और चन्द्रमा का आधार योग है।

इसलिए #श्राद्ध के लिए योगिजन को नियुक्त करना अतिउत्तम है। यदि श्राद्धभोजी (श्राद्ध का भोजन ग्रहण करने आये) एक हजार ब्राह्मणों के बीच एक #योगी भी हो तो वो यजमान के सहित उन सभी का उद्धार कर देता है।

#श्राद्ध_महालय

 #श्राद्ध क्या है?श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है। विस्तृत विवरण पढ़ें:http://essenceofastro.blogspot.c...
23/09/2026

#श्राद्ध क्या है?

श्रद्धा शब्द से श्राद्ध शब्द की निष्पत्ति होती है। विस्तृत विवरण पढ़ें:

http://essenceofastro.blogspot.com/2017/08/what-is-shraddh.html

#श्राद्ध_महालय

श्राद्ध क्या है, What is Shraddh

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