04/10/2026
शारदीय नवरात्र में देवी-माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती) पाठ करने और उसको सुनने का अतिविशेष महत्व है।
मार्कण्डेय पुराण में स्वयं भगवती का स्पष्ट वचन है -
शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः॥
सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥
अर्थात्
शरद ऋतु में होने वाली भगवती की वार्षिक महापूजा के अवसर पर जो मनुष्य भक्तिभाव से देवी के इस माहात्म्य को सुनता है, वह भगवती की कृपा से समस्त बाधाओं से मुक्त होकर धन-धान्य आदि से सम्पन्न होता है इसमें कोई संशय नहीं।
ध्यान दीजिए माँ ने केवल पूजा करने की बात नहीं कही, बल्कि “ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः” कहा है। अर्थात् माँ का माहात्म्य सुनना भी स्वयं देवी द्वारा कहा गया साधन है।
इसलिए इस नवरात्रि पूर्ण दुर्गा सप्तशती पाठ अपने घर में अवश्य करें।
कितनी आवृत्ति करें?
विधानमाला में श्रीनृसिंहभट्ट ने शारदीय नवरात्र में नवचंडी पाठ का अतिविशेष महत्व बताया है। अतः सर्वोत्तम रहेगा आप पूर्ण सप्तशती के नौ पाठ करें। कामनाभेद से
दुर्गा सप्तशती के पाठ की संख्या पाठ भिन्न हो सकती है।
फलसिद्धि, नियमित साधना एवं भगवती की आराधना के लिए १ पूर्ण सप्तशती पाठ, उपद्रव-शान्ति के लिए ३, ग्रहदोष/ग्रहबाधा की शान्ति के लिए ५, महाभय की शान्ति के लिए ७, विशेष शान्ति तथा वाजपेय यज्ञ के फल के लिए ९, राजभय आदि की शान्ति एवं ऐश्वर्य के लिए ११, काम्यसिद्धि एवं शत्रु-विनाश के लिए १२, रिपु-वशीकरण आदि के लिए १४, सौख्य एवं श्री की प्राप्ति के लिए १५, पुत्र-पौत्र, धन-धान्य आदि की वृद्धि के लिए २६, राजभय एवं शत्रु-संबंधी विशेष प्रयोजनों के लिए १७–१८, महाऋण/महासंकट से विमुक्ति के लिए २०, बन्धन-मोचन के लिए २५ और अत्यन्त बड़े संकटों के लिए शतचंडी (१०० पाठ) के विधान ग्रन्थों में मिलते हैं।
परन्तु यहाँ संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है - श्रद्धा, शुद्धता, संकल्प और पाठ की शुद्ध परम्परा।
पाठ में शुद्धता क्यों आवश्यक है?
सप्तशती केवल कोई सामान्य स्तोत्र नहीं है। यह मन्त्रात्मक देवी-माहात्म्य है। “श्रीदुर्गासप्तशती भगवती का वाङ्मय स्वरूप है”
इसलिए पाठ में यथासम्भव -
देह की शुद्धि
मन की शुद्धि
स्थान की शुद्धि
आसन की शुद्धि
वाणी एवं जिह्वा की शुद्धि
और पाठ के उच्चारण की शुद्धि
का ध्यान रखना चाहिए। विशेष रूप से संस्कृत मूलपाठ का शुद्ध उच्चारण और सही पाठक्रम बहुत महत्वपूर्ण है। सप्तशती-पाठ में कवच, अर्गला, कीलक आदि अंगों सहित सम्प्रदायानुसार पाठ-विधि का पालन करना श्रेष्ठ माना गया है। इसलिए यदि विधि का ज्ञान नहीं है तो केवल पुस्तक खोलकर किसी भी क्रम से पढ़ने के स्थान पर किसी योग्य आचार्य/ब्राह्मण से विधि समझ लेना अथवा उन्हीं से पाठ कराना अधिक उचित है।
यदि आपके पास स्थानीय स्तर पर योग्य पाठकर्ता उपलब्ध नहीं हैं, तो हमारे समूह में उपस्थित विद्वान हैं जिनसे अनुरोध करने पर वह अपने-अपने पवित्र तीर्थक्षेत्रों से इस साधना को करा सकते हैं
🔱 काशी के शिव-शक्तिमय क्षेत्र से — पं. शिवेश जी +917007896359
🔱 उज्जयिनी के महाकाल-शक्ति क्षेत्र से — पं. प्रदीप जी +919754553020
🔱 प्रभासक्षेत्र की प्राचीन शिव-शक्ति परम्परा से — पं. हेत भट्ट जी +919157575400
यदि आपके लिए घर पर पाठ करवाना सम्भव न हो, तो इन विद्वानों से सम्पर्क करके संकल्पपूर्वक सप्तशती पाठ/नवरात्रि अनुष्ठान कराया जा सकता है।
मेरी दृष्टि में बात बहुत सरल है -
इस नवरात्रि कम-से-कम १ पूर्ण पाठ का संकल्प अवश्य लें।
और यदि सामर्थ्य, समय तथा उचित पाठकर्ता उपलब्ध हो तो ९ आवृत्तियों का विशेष संकल्प अत्यन्त उत्तम है। क्योंकि नवावृत्ति के लिए स्वयं शास्त्र में “शान्ति” और “वाजपेयफल” का विशेष उल्लेख है।
आप सभी के कल्याण की कामनाओं सहित आपका मित्र Essence Of Astrology