02/08/2022
जय हो देवता साहब विष्णु नारायण (बायो मेटींग)
जी जुन्ड़ी व
जय हो देवता साहब बद्री नारायण जी किल्बा
मामा व भांजे
देवता विष्णु नारायण (किलबालू) का संपूर्ण इतिहास, शक्तियां और महत्व
देवता विष्णु नारायण जिनको छौहारा क्षेत्र में किलबालू के नाम से जाना जाता है उनकी उत्पति पवित्र बाऊ किलबा से हुई जो कि किन्नौर जिले में स्थित है।
पवित्र क़िलबा बाऊ {किन्नौर} का रहस्य
किलबा गांव में एक धनी रावत नाम का राजा रहता था जो अत्यंत समृद्ध था,परन्तु गांव में पानी की अत्यंत कमी रहती थी।
देवता विष्णु नारायण का किलबा बाऊ में आगमन किसी जाई (स्त्री ) के साथ हुआ।
किलबा बाऊ (कांकटी नगरी) बाहर से बेखल से घिरी है और उसके अंदर स्वर्ण नगरी है । किलबा के राजा ने देवता विष्णु नारायण को चुनौती दी कि यदि वे गांव में पानी की कमी को दूर करेंगे तो उनकी मान्यता पूरे गांव में होगी। इतना सुनते ही देवता विष्णु नारायण ने अपने खांडे से प्रहार किया और वहीं पर पानी की बड़ी जलधारा उत्पन्न हो गई।विष्णु नारायण ने अपनी पालकी बनाने का हुक्म दिया और किलबा में बायोमाटिंग के नाम से प्रसिद्ध हुए। इसके बाद विष्णु नारायण ने अपना एक अपरूप छौैहारा क्षेत्र की ओर भेजा।
देवता विष्णु नारायण का तपस्या का स्थान
छौहारा क्षेत्र में विष्णु नारायण सर्वप्रथम शातुल घाटी पहुंचे और यहां आकर अपनी शक्तियों का आहवान करने लगे। विष्णु नारायण के तप को देखकर कई सूक्ष्म देव इनकी तपस्या भंग करने आए। उस समय अचानक इनका ध्यान टूटा,और तब तक केवल 18 शक्तियां ही प्रकट हो पाई थी। गुस्से में आकर देवता विष्णु नारायण ने 18 शक्तियों में से एक को चोटी पर तीर के सहारे फेंका। जिसके प्रभाव से सात उपशक्तियां जलधारा के रूप में प्रकट हुई, इस सप्त जलधाराओं के संगम से शिमनिया वीर प्रकट हुए। ये दृश्य देख कर सभी सूक्ष्म देव डर के मारे वापिस चले गए। शिमनिया वीर को साथ लेकर विष्णु नारायण रोहल सेरी की तरफ बड़े। सोलह सावनी काली भी इनकी शक्तियों से प्रभावित होकर इनके साथ हो गई। इनका सामना छौहारा क्षेत्र के कोई भी देव नहीं के सकते थे।
देवता विष्णु नारायण की शक्ति का प्रमाण
यह दृश्य देखकर महाशिव पवासी को स्वयं उतराखंड से शाटूल घाटी आना पड़ा। महाशिव छातन रूप में रोहल सेरी के पवा सरू पहुंचे। महाशिव ने विष्णु नारायण की शक्तियों को छिंग करने के लिए चारों महासुओं की शक्तियों का आहवान किया। तब जाकर विष्णु नारायण को शांत किया जा सका।
उसके बाद विष्णु नारायण पवासी महाराज के साथ रोहल गए,जहां आज भी इन दोनों देवताओं की एक साथ पूजा की जाती है।