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जय श्री राम जी हनुमान जयंती को  भगवान राम के परम भक्त भगवान हनुमानजी े जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है । यह पर्व चैत्...
15/04/2022

जय श्री राम जी हनुमान जयंती को भगवान राम के परम भक्त भगवान हनुमानजी े जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाता है । यह पर्व चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन, भगवान हनुमान के भक्त उनकी पूजा करने के लिए मंदिरों में जाते हैं और उन्हें अन्य चीजों के साथ बूंदी, लड्डू और पान का भोग लगाते हैं।हनुमान जयंती 2022: तिथि, पूजा का समय, इतिहास, त्योहार का महत्व

हनुमान जयंती 2022: हनुमान जयंती भगवान हनुमान के जन्म के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। इस वर्ष यह पर्व 16 अप्रैल को पड़ रहा है।

इस वर्ष हनुमान जयंती 16 अप्रैल को पड़ रही है। द्रिकपंचांग के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 16 अप्रैल, 2022 को सुबह 02:25 बजे से शुरू होकर 17 अप्रैल, 2022 को दोपहर 12:24 बजे समाप्त होगी।
भगवान हनुमान की पूजा करने से लोगों की बुराई से रक्षा होती है और विजयी होने में मदद मिलती है। जबकि यह त्योहार देश भर में अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है, सबसे लोकप्रिय यह चैत्र के दौरान मनाया जाता है। उत्सव हनुमान जयंती पर सुबह जल्दी शुरू होता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान का जन्म सूर्योदय के समय हुआ था। भक्त इस दिन रामायण और महाभारत के छंदों को भी पढ़ते हैं और अन्य प्रार्थना करते हैं।
इतिहास
भगवान हनुमान को वायु का पुत्र कहा जाता है और इस प्रकार उन्हें पवनपुत्र और मारुति नंदन के रूप में भी जाना जाता है जो पवन भगवान के पुत्र का अनुवाद करते हैं। उनके अन्य नाम संकटमोचन और दुखभंजन हैं क्योंकि उनके बारे में माना जाता है कि वे लोगों को उनकी समस्याओं और दुखों से छुटकारा दिलाने में मदद करते हैं। हनुमान का जन्म अंजना से हुआ था जो एक शापित अप्सरा थी। हनुमान को जन्म देने के बाद उन्हें श्राप से मुक्ति मिली थी। किंवदंती के अनुसार, अंजना और उनके पति केसरी ने रुद्र से एक बच्चे के लिए प्रार्थना की और उनके निर्देश पर वायु ने अपनी पुरुष ऊर्जा अंजना के गर्भ में स्थानांतरित कर दी और यही कारण है कि हनुमान को वायु के पुत्र के रूप में जाना जाता है।
🌹💐🌹शंका समाधान💐🌹💐

*आजकल व्हाट्सएप आदि सोशल मीडिया में हनुमान जयंती शब्द को लेकर लोग शंका में है कि जयंती कहें या जन्मोत्सव????

हमने शास्त्र पुराण पढ़ा नहीं इसलिये किसी भी सनातन धर्म द्रोहियों की साजिश में बहुत जल्दी फंस जाते है। और अपने ही ऋषि मुनियों द्वारा बनाये हुए व्यवस्था पर शंका करने लग जाते है।

जयंती शब्द किसी मरणशील लोगो के संदर्भ में प्रयुक्त होता ऐसा नही है।

जयंती का अर्थ है पताका ,
इंद्र की पुत्री ,
दुर्गा जी का नाम।

*जयंती का अर्थ है जिसकी जय हो।*

जयंती किसी महत्वपूर्ण कार्य के आरंभ या घटित होने की वार्षिक तिथि पर होने वाले उत्सव को कहते हैं जैसे किसी की जन्म तिथि पर मनाया जाने वाला उत्सव चाहे वह भगवान हो या दिव्य अवतार जो या दिव्य मनुष्य।

भविष्य पुराण , विष्णुधर्मोत्तर पुराण , निर्णय सिंधु आदि के अनुसार जन्माष्टमी भी जयंती व्रत है।
रोहणी नक्षत्र संयुक्ता जन्माष्टमी जयंती ही कहलाती है।
कलयुग में सात चिरंजीवी शास्त्रों में बताए गए हैं
जिसमें व्यास जी , हनुमान जी व परशुराम जी के जन्म उत्सव शास्त्र में जयंती नाम से ही प्रसिद्धि है।
पराशर संहिता में हनुमान जयंती का विधान दिया गया है।

*भगवान के 10 अवतारों में -*

कूर्म जयंती , नरसिंह जयंती , वराह जयंती , वामन जयंती , कल्कि जयंती , परसुराम जयंती ,

*दश महाविद्या में-*
तारा जयंती , बगलामुखी जयंती , छिन्नमस्ता जयंती , धूमावती जयंती , महाकाली जयंती , भुवनेश्वरी जयंती ,
त्रिपुर भैरवी जयंती ।

*अन्य दिव्य अवतारों में -*
स्वामी नारायण जयंती , महावीर जयंती , हाटकेश्वर जयंती , श्रीमद्वल्लभाचार्यजी जयंती , आद्यशंकराचार्य जी जयंती , नारद जयंती , जानकी जयंती , शनि जयंती ,
गायत्री जयंती , कबीर जयंती , हयग्रीव जयंती , तुलसीदास जयंती , वाल्मीकि जयंती , करपात्री जयंती , बलराम जयंती , दधीचि जयंती , विश्वकर्मा जयंती , अग्रसेन जयंती , धनवंतरी जयंती , चित्रगुप्त जयंती , गुरुनानक जयंती , कालभैरव जयंती , गीता जयंती , दत्तात्रेय जयंती , शाकम्भरी जयंती , नर्मदा जयंती , आदि आदि अनगिनत जयंती हैं। यहां तक कि माघ शुक्ल चतुर्थी को श्री गणेश जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

अतः श्री हनुमान जी की जयंती आदि अवसरों पर जयंती शब्द पर विवाद करना शास्त्र विमुखता का परिचायक है। कृपया अपने सनातन धर्म की ओर लौटें।

आगे भी इस लेख को पोष्ट करें और किसी भी तरह के भ्रम या शंका हो तो अपने आसपास के विद्वानों से सम्पर्क कर समाधान जरूर कर लेवें , सोशल मीडिया के किसी भी अप्रमाणित पोष्ट पर एक बार स्वयं भी विचार कर लेवें तभी आगे किसी को भेजें।
पं वेद प्रकाश शर्मा

🙏🌹💐🙏🌹💐🙏🌹💐

10/04/2022
जय श्री राम जीॐॐ卐ॐ卐ॐ卐 💝ॐवंश बढ़ाने के लिए  दुर्गा  कवचॐ💝💝{धार्मिक स्थल ,हिन्दू,धर्मग्रंथ ,वेद  पुराणों मेंउल्लेखित  जानक...
09/02/2022

जय श्री राम जीॐॐ卐ॐ卐ॐ卐
💝ॐवंश बढ़ाने के लिए दुर्गा कवचॐ💝
💝{धार्मिक स्थल ,हिन्दू,धर्मग्रंथ ,वेद पुराणों में
उल्लेखित जानकारी, के लिए
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हमारे पुराने समय के ऋषि-मुनियों को बहुत कुछ पहले ही ज्ञात था कि मनुष्य को अपने परिवार के कुल की सुरक्षा कैसे करे और अपने परिवार के वंश कैसे आगे बढ़ा सकते है। इसलिए उन्होंने बहुत सारे यज्ञ हवन और देवी-देवताओं की स्तुति की उनके स्तुत की रचना की उन स्तुति मन्त्रों में इतनी शक्ति थी जो मनुष्य उन स्तुति मन्त्रों का अच्छी तरह से पाठ करते तो उनके वंश की रक्षा हो जाती थी। उन पर जिस देवी-देवताओं के सम्बन्धित स्त्रोत होता था वे देवी-देवता अपनी कृपा दृष्टि बनाकर रखते थे। इसलिए कहा जाता है की मन्त्रों बहुत शक्ति होती है राजा से रंक और रंक से राजा बना सकते है। लेकिन उन मन्त्रों के सही तरीके और अपनी अच्छी भावना से पाठ करने पर अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

माता दुर्गाजी की आराधना करके और उनको पूजा से खुश करना चाहिए। जिससे उनकी की कृपा दृष्टि मनुष्य की जीवन पर बनी रहे और माता दुर्गाजी का आशीर्वाद प्राप्त हो जावे। इसलिए मनुष्य को अपने पारिवारिक जीवन में वंश को बढ़ाने के लिए उनका वृद्धिकरं दुर्गाकवचम् का नियमित रूप से जाप करने से फायदा मिलता हैं, जिनके सन्तान होने के बाद कुछ दिवस तक जीवित रहती है या जिनके सन्तान होने में देरी होती हैं या जिनके बार-बार गर्भपात हो जाता हैं। उन स्त्रियों को माता दुर्गाजी का वृद्धिकरं दुर्गाकवचम् का जप करना चाहिए जिससे उनके परिवार की वंश की बढ़ोतरी हो सके।

जिनको अपने वंश परम्पराओ को आगे बढ़ाना होता हैं, उनको पुत्रदा एकादशी के दिन वंश वृद्धिकरं दुर्गाकवचम् का गयारह अथवा इक्कीस बार इस पाठ को पढ़ने से अवश्य ही वंश या कुल की वृद्धि होती है। माता दुर्गाजी की अनुकृपा से पूरे कुटुम्ब में दयाभाव और श्रद्धा भाव रखने वाली भक्त रूपी सन्तान की प्राप्ति होती है। इसलिए वंश वृद्धिकरं दुर्गाकवचम् का पाठ करने से फायदा मिलता है।

प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार में सुख-शांति चाहते है, वे अच्छी सन्तान की चाहत रखते है जिससे उनका वंश चल सके और अपने कुल वंश का नाम संसार में दिये कि रोशनी के समान जगमगाता रहे। इसलिए अपने परिवार के कुल को आगे बढ़ने के लिए और सभी तरह की बुरी शक्तियों से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य हमेशा प्रयास करते रहे हैं।
|| गर्भरक्षा देवी कवच ||

भगवन् देव देवेशकृपया त्वं जगत् प्रभो ।
वंशाख्य कवचं ब्रूहि मह्यं शिष्याय तेऽनघ ।
यस्य प्रभावाद्देवेश वंश वृद्धिर्हिजायते ॥१॥
सूर्य ऊवाच -
श‍ृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि वंशाख्यं कवचं शुभम् ।
सन्तानवृद्धिर्यत्पठनाद्गर्भरक्षा सदा नृणाम् ॥२॥
वन्ध्यापि लभते पुत्रं काक वन्ध्या सुतैर्युता ।
मृत वत्सा सुपुत्रस्यात्स्रवद्गर्भ स्थिरप्रजा ॥३॥
अपुष्पा पुष्पिणी यस्य धारणाश्च सुखप्रसूः ।
कन्या प्रजा पुत्रिणी स्यादेतत् स्तोत्र प्रभावतः ॥४॥
भूतप्रेतादिजा बाधा या बाधा कुलदोषजा ।
ग्रह बाधा देव बाधा बाधा शत्रु कृता च या ॥५॥
भस्मी भवन्ति सर्वास्ताः कवचस्य प्रभावतः ।
सर्वे रोगा विनश्यन्ति सर्वे बालग्रहाश्च ये ॥६॥
॥ अथ दुर्गा कवचम् ॥
ॐ पुर्वं रक्षतु वाराही चाग्नेय्यां अम्बिका स्वयम्।
दक्षिणे चण्डिका रक्षेन्नैरृत्यां शववाहिनी॥१॥
वाराही पश्चिमे रक्षेद्वायव्याम् च महेश्वरी।
उत्तरे वैष्णवीं रक्षेत् ईशाने सिंह वाहिनी॥२॥
ऊर्ध्वां तु शारदा रक्षेदधो रक्षतु पार्वती।
शाकंभरी शिरो रक्षेन्मुखं रक्षतु भैरवी॥३॥
कण्ठं रक्षतु चामुण्डा हृदयं रक्षतात् शिवा।
ईशानी च भुजौ रक्षेत् कुक्षिं नाभिं च कालिका॥४॥
अपर्णा ह्युदरं रक्षेत्कटिं बस्तिं शिवप्रिया।
ऊरू रक्षतु कौमारी जया जानुद्वयं तथा॥५॥
गुल्फौ पादौ सदा रक्षेद्ब्रह्माणी परमेश्वरी।
सर्वाङ्गानि सदा रक्षेद्दुर्गा दुर्गार्तिनाशनी॥६॥
नमो देव्यै महादेव्यै दुर्गायै सततं नमः ।
पुत्रसौख्यं देहि देहि गर्भरक्षां कुरुष्व नः॥७॥
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं ऐं ऐं ऐं
महाकाली महालक्ष्मी महासरस्वती
रुपायै नवकोटिमूर्त्यै दुर्गायै नमः ॥ ८॥
ह्रीं ह्रीं ह्रीं दुर्गार्तिनाशिनी संतानसौख्यम्
देहि देहि बन्ध्यत्वं मृतवत्सत्वं च हर हर
गर्भरक्षां कुरु कुरु सकलां बाधां कुलजां
बाह्यजां कृतामकृतां च नाशय नाशय
सर्वगात्राणि रक्ष रक्ष गर्भं पोषय पोषय
सर्वोपद्रवं शोषय शोषय स्वाहा ॥ ९॥
॥ फल श्रुतिः ॥
अनेन कवचेनाङ्गं सप्तवाराभिमन्त्रितम् ।
ऋतुस्नात जलं पीत्वा भवेत् गर्भवती ध्रुवम्॥१॥
गर्भ पात भये पीत्वा दृढगर्भा प्रजायते ।
अनेन कवचेनाथ मार्जिताया निशागमे॥२॥
सर्वबाधाविनिर्मुक्ता गर्भिणी स्यान्न संशयः।
अनेन कवचेनेह ग्रन्थितं रक्तदोरकम् ॥३॥
कटि देशे धारयन्ती सुपुत्रसुख भागिनी।
असूत पुत्रमिन्द्राणां जयन्तं यत्प्रभावतः॥४॥
गुरूपदिष्टं वंशाख्यम् कवचं तदिदं सुखे ।
गुह्याद्गुह्यतरं चेदं न प्रकाश्यं हि सर्वतः॥५॥
धारणात् पठनादस्य वंशच्छेदो न जायते ।
बाला विनश्यंति पतन्ति गर्भा-
-स्तत्राबलाःकष्टयुताश्च वन्ध्याः ॥६ ॥
बाल ग्रहैर्भूतगणैश्च रोगै-
-र्न यत्र धर्माचरणं गृहे स्यात् ॥

॥ इति श्रीज्ञानभास्करे वंशवृद्धिकरं
वंशकवचं सम्पूर्णम् ॥

जय श्री राम जी भाई-बहनों, महाभारत एक महाकाव्य ही नहीं है, यह मानव के लिए शिक्षा का ऐसा अनमोल खजाना  है जो कभी खाली नहीं ...
02/02/2022

जय श्री राम जी
भाई-बहनों, महाभारत एक महाकाव्य ही नहीं है, यह मानव के लिए शिक्षा का ऐसा अनमोल खजाना है जो कभी खाली नहीं होता, जीवन के हर क्षेत्र के लिये इसमें कोई न कोई शिक्षा या सबक जरूर है, कहा जाता है कि महाभारत मुख्य रूप से दो बातों पर जोर देता है, पहली, वे बातें जो मनुष्य को करनी चाहियें, उन्हें जीवन में अपनाओ, दूसरी, उन बातों को भी जो मनुष्य को कभी नहीं करनी चाहिये और उनसे हमेशा दूर रहो।

परिवार, मित्र, समाज और देश हर किसी के लिए महाभारत बहुत खास है, इसकी शिक्षायें हर व्यक्ति के जीवन को सच की राह दिखाती हैं, कभी किसी का अपमान मत करो, अपमान की आग बड़े-बड़े साम्राज्य नष्ट कर देती है, कभी किसी मनुष्य के व्यवसाय या नौकरी को छोटा मत समझो, उसे छोटा मत कहो।

अगर मित्रता करो तो उसे जरूर निभाओ, लेकिन मित्र होने का यह मतलब नहीं कि गलत काम में भी मित्र का साथ दो, अगर आपका मित्र कोई ऐसा कार्य करे जो अनैतिक, असंवैधानिक या किसी भी नजरिये से सही नहीं है तो उसे गलत राह छोड़ने के लिए कहना चाहियें, अत्यधिक लालच इंसान की जिंदगी को नर्क बना देता है।

जो आपका नहीं है उसे अनीतिपूर्वक लेने, हड़पने का प्रयास न करें, आज नहीं तो कल, ईश्वर उसका दंड अवश्य ही देता है, आप सत्य की राह पर हैं और कष्टों का सामना कर रहे हैं लेकिन आपका कोई परिचित अनीति, अधर्म और खोटे कर्म करने के बावजूद संपन्न है, सुविधाओं से मालामाल है तो उसे देखकर अपना मार्ग न छोड़ें, आपकी आंखें सिर्फ वर्तमान को देख सकती हैं, भविष्य को नहीं।

शिष्य या पुत्र को ज्ञान देना माता-पिता व गुरु का कर्तव्य है लेकिन बिना विवेक और सद्बुद्धि के ज्ञान विनाश का कारण बनता है, इसलिये ज्ञान के साथ विवेक और अच्छे संस्कार देने भी जरूरी हैं, विजय उसकी नहीं होती जहां लोग ज्यादा हैं, ज्यादा धनवान हैं या बड़े पदाधिकारी हैं, विजय हमेशा उसकी होती है जहां ईश्वर है और ईश्वर हमेशा वहीं है जहां सत्य है, इसलिये सत्य का साथ कभी न छोड़ें।

अपनी अच्छी स्थिति, बैंक बैलेंस, संपदा, सुंदर रूप और विद्वता का कभी अहंकार मत कीजिये, अगर आपमें ये खूबियां हैं तो ईश्वर का आभार मानिए, समय बड़ा बलवान है, धनी, ज्ञानी, शक्तिशाली पांडवों ने वनवास भोगा और अतिसुंदर द्रोपदी भी उनके साथ वनों में भटकती रही, जुआ, सट्टा, षड्यंत्र से हमेशा दूर रहो, ये चीजें मनुष्य का जीवन अंधकारमय बना देती हैं, किसी भी रूप में ये कार्य निंदनीय और वर्जित हैं।

जिस व्यक्ति को हितैषी, सच बोलने वाला, विपत्ति में साथ निभाने वाला, गलत कदम से रोकने वाला मित्र मिल जाता है उसका जीवन सुखी है, जो उसकी नेक राय पर अमल करता है, उसका जीवन सफल होता है, इंसान की जिंदगी, जन्म और मौत के बीच की कड़ी भर है, यह जिंदगी हमेशा नहीं रहेगी लेकिन भगवान कृष्ण के अनुसार, मौत के बाद भी हमारा अस्तित्व रहेगा।

इसलिये इस जीवन में जितने हो सकें उतने अच्छे कर्म कीजिये, एक बार यह जीवन बीत गया, फिर आपकी प्रतिभा, पहचान, धन और रुतबा किसी काम नहीं आयेंगे, इसलिये भाई-बहनों सत्य को जानों, सत्य में जीओ, सत्य को अपनाओ, सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं हो सकता, जहाँ सत्य है वहा परमात्मा है, भाई-बहनों! अध्यात्म संदेश के साथ आज के पावन दिवस की पावन सुप्रभात् आप सभी को मंगलमय् हो।

जय श्री लक्ष्मीनारायण!
हरि ओऊम् तत्सत्
शुभ रात्रि जी

मंडी : मंडी के भूतनाथ महादेव बने हमीरपुर के गसोता महादेव बाबा भूतनाथ को लगा 40 किलो माखन का लेप शुरू हुई शिवरात्रि की तै...
02/02/2022

मंडी : मंडी के भूतनाथ महादेव बने हमीरपुर के गसोता महादेव बाबा भूतनाथ को लगा 40 किलो माखन का लेप शुरू हुई शिवरात्रि की तैयारिया
मंडी जिला में तारारात्रि से माना जाता है शिवरात्रि का आगाज ,बीती रात थी तारारात्रि।।
जय बाबा भूतनाथ

सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमे संतोष कर लेना है। जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं बल्कि तब ...
28/01/2022

सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमे संतोष कर लेना है।
जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं बल्कि तब आता है जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है।

सोने के महल में भी आदमी दुखी हो सकता है यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो तो।
असंतोषी को तो कितना भी मिल जाये वह हमेशा अतृप्त ही रहेगा।

सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है। यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है।
हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान है अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि है कि कितने धैर्यवान हैं।
सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है।

जय श्री राम जी
21/01/2022

जय श्री राम जी

*हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता*5000 वर्षों पूर्व हमारे वेद पुराणों में बीमारी को रोकने के लिए स्वच्छता के उपदेश दिए गये ह...
04/01/2022

*हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता*

5000 वर्षों पूर्व हमारे वेद पुराणों में बीमारी को रोकने के लिए स्वच्छता के उपदेश दिए गये हैं 👇

1. लवणं व्यञ्जनं चैव घृतं
तैलं तथैव च ।
लेह्यं पेयं च विविधं
हस्तदत्तं न भक्षयेत् ।।
धर्म सिन्धु ३पू. आह्निक

*नमक, घी, तेल, चावल और अन्य खाद्य पदार्थ हाथ से न परोसें, चम्मच का उपयोग करें* ।

2. अनातुरः स्वानि खानि न
स्पृशेदनिमित्ततः ।।
मनुस्मृति ४/१४४

*बिना समुचित कारण के अपनें हाथ से अपनी इंद्रियों, अर्थात आंख, नाक, कान आदि, को न छुयें।*

3. अपमृज्यान्न च स्न्नातो
गात्राण्यम्बरपाणिभिः ।।
मार्कण्डेय पुराण ३४/५२

*पहने कपड़े को दोबारा न पहनें, स्नान के बाद बदन को सुखाएं*।

4. हस्तपादे मुखे चैव पञ्चाद्रे
भोजनं चरेत् ।।
पद्म०सृष्टि.५१/८८
नाप्रक्षालितपाणिपादो
भुञ्जीत ।।
सुश्रुतसंहिता चिकित्सा
२४/९८

*अपने हाथों, पांव, मुँह को भोजन करने के पहले धोएं*।

5. स्न्नानाचारविहीनस्य सर्वाः
स्युः निष्फलाः क्रियाः ।।
वाघलस्मृति ६९

*बिना स्नान और शुद्धि के किया गया हर कर्म निष्फल होता है।*

6. न धारयेत् परस्यैवं
स्न्नानवस्त्रं कदाचन ।I
पद्म० सृष्टि.५१/८६

*दूसरे व्यक्ति द्वारा उपयोग किए गये वस्त्र (तौलिया आदि) को स्नान के बाद शरीर पोछने के लिए उपयोग न करें।*

7. अन्यदेव भवद्वासः
शयनीये नरोत्तम ।
अन्यद् रथ्यासु देवानाम
अर्चायाम् अन्यदेव हि ।।
महाभारत अनु १०४/८६

*शयन, बाहर जाने और पूजा के समय अलग अलग वस्त्र उपयोग करें।*

8. तथा न अन्यधृतं (वस्त्रं
धार्यम् ।।
महाभारत अनु १०४/८६

*दूसरे के पहने वस्त्र को न धारण करें.*

9. न अप्रक्षालितं पूर्वधृतं
वसनं बिभृयाद् ।।
विष्णुस्मृति ६४

*एक बार पहनें कपड़े को दोबारा बिना धोये न पहनें।*

10. न आद्रं परिदधीत ।।
गोभिसगृह्यसूत्र ३/५/२४

*गीले कपड़े न पहनें।*

ये सावधानियां हमारे सनातन धर्म में 5000 वर्षों पूर्व बताई गई हैं. स्वच्छता के लिए हमें उस समय आगाह किया गया था, जब माइक्रोस्कोप नहीं था, लेकिन हमारे पूर्वजों ने इस वैदिक ज्ञान को धर्म के रूप स्थापित किया, सदाचार के रूप में अनुसरण करने को कहा।

जय श्री राम जी  पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. प...
07/11/2021

जय श्री राम जी
पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी की तिथि को देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. पंचांग के अनुसार 14 नवंबर 2021, रविवार को कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है. इसे देव प्रबोधिनी एकादशी और देवोत्थान एकादशी भी कहा जाता है.

चातुर्मास मास का समापन (Chaturmas 2021)
वर्तमान समय में चातुर्मास चल रहा है. पंचांग के अनुसार चातुर्मास का आरंभ बीते 20 जुलाई 2021 को हुआ था. चातुर्मास में कोई भी शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं. 14 नबंवर 2021 को देवउठनी एकादशी पर चातुर्मास समाप्त होगा. मान्यता है कि चातुर्मास में भगवान विष्णु आराम करते हैं. जिस दिन भगवान विष्णु का शयन काल आरंभ होता है, उसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है. वहीं जिस दिन भगवान विष्णु का शयन काल समाप्त होता है, उस दिन पड़ने वाली एकादशी तिथि को देवउठनी एकादशी कहा जाता है. भगवान विष्णु का शयन काल समाप्त होते ही शुभ और मांगलिक कार्य आरंभ हो जाते हैं.

तुलसी विवाह 2021 (Tulsi Vivah 2021)
देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह का भी आयोजन किया जाता है. इस दिन तुलसी की शालिग्राम से शादी की जाती है. तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय हैं. तुलसी को पवित्र माना गया है.

देवउठनी एकादशी का महत्व (Dev Uthani Ekadashi Shubh Muhurat)
एकादशी का व्रत सभी व्रतों में शुभ और महत्वपूर्ण माना गया है. एकादशी व्रत का वर्णन महाभारत की कथा में भी मिलता है. श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एकादशी व्रत के महत्व के बारे में बताया था. इसके बाद युधिष्ठिर ने विधि पूर्वक एकादशी व्रत को पूर्ण किया था. एकादशी व्रत पापों से मुक्ति दिलाता है और मनोकामनाओं को पूर्ण करता है.

देव उठानी एकादशी शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि का प्रारम्भ- 14 नवम्बर, 2021 को प्रातः 05 बजकर 48 मिनट से.
एकादशी तिथि का समाप्त- 15 नवम्बर, 2021 को प्रातः 06 बजकर 39 मिनट पर.

यह कथा भी है कि धर्मग्रंथो के अनुसार भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु दैत्य संखासुर को मारा था। दैत्य और भगवान विष्ण के बीच युद्ध लम्बे समय तक चलता रहा। युद्ध समाप्त होने के बाद भगवान विष्णु बहुत ही थक गए थे और क्षीर सागर में आकर सो गए और कार्तिक की शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे, तब देवताओं द्वारा भगवान विष्णु का पूजन किया गया। जैसे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की इस एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है।

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