23/05/2026
*🌴// २३ मई २०२६ शनिवार //🌴*
*🍁 पुरुषोत्तम मास / अधिकमास 🍁*
*🥀ज्येष्ठ शुक्लपक्ष सप्तमी २०८३ 🥀*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*।। अहंकार रूपी शत्रु से बचें।।*
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👉 *"स्व" के विकृत बोध को ही "अहंकार" कहते हैं।* वह आत्म तत्व से न जुड़कर भौतिक सम्पदाओं के साथ जुड़ा होता है। दूसरों की तुलना में अपने को विशिष्ट मान बैठने पर अहंता की उत्पत्ति होती है। *बलिष्ठता, सुन्दरता, सम्पन्नता, पद, अधिकार आदि उसके कारण हो सकते हैं।* कई बार भ्रम भी उसका निमित्त बना हुआ होता है। *जाति-पाँति के आधार पर कई अपने को ऊँचा मानते हैं। इस आधार पर दूसरे नीच या हेय प्रतीत होने लगते हैं और अहंकार जड़ जमा लेता है ।*
👉 *अपनी अहंता प्रकारान्तर से दूसरों को हेय या हीन गिनने लगती है। अपनी मान्यता को दूसरों को गले उतारने के लिये वह अपने साधनों का उद्धत प्रयोग करती है, ताकि उनकी ओर अन्यान्यों का ध्यान आकर्षित हो, वे उसे देखें, समझें और बड़प्पन स्वीकार करें ।* इस प्रकार की स्वीकृति तभी बन पड़ती है, जब उसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिले। साधारण स्थिति बनी रहने पर तो ध्यान उस ओर जाता नहीं । *इसलिये कुछ न कुछ उद्धत आचरण अहंकारी को करना पड़ता है, अन्यथा दूसरे क्यों उसका बड़प्पन स्वीकार करें ? क्यों दबें ? क्यों डरें ? क्यों गिड़गिड़ायें ? क्यों ललचायें ?* अहंकार इस हेतु उद्धत आत्म-प्रदर्शन किये बिना नहीं रहता । *कुछ नहीं तो आत्मश्लाघा सहित अपना बखान स्वयं ही करने लगता है ।* ऐसी घटनाओं का सच्चा-झूठा वर्णन करता है, जिससे उसकी छाप सुनने वाले पर पड़े और समीपवर्ती उसका लोहा मानने के लिये बाधित हों। इस कार्य के लिये हर घड़ी तो प्रशंसा-कृत्य के लिये साथी-सेवक रखे नहीं जा सकते । *इसलिये आतुरता इस रास्ते फूटती है कि अपनी बात या क्रिया में ऐसा पुट लगा रहे, जिसमें उसकी विशिष्टता से दूसरों को अवगत होते रहना पड़े।* जब कभी अपने साथ तुलना करें, तो समझें कि इनकी स्थिति मेरी अपेक्षा कहीं अच्छी है। इसलिये इनके सामने मुझे दबकर रहना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो अहंकारी इसमें अपना अपमान मानता है, तिरस्कृत उपेक्षित अनुभव करता है, इसमें मानहानि की गंध सूँघता है और जिसने महत्ता स्वीकारने में उपेक्षा दिखाई, उसे अपना शत्रु तक मानने लगता है। इसका बदला वह नीचा दिखाने का अवसर ढूँढ़कर करता है। *जो हाँ में हाँ न मिलाये, जी हुजूरी न करे, उसके साथ वह ऐसा व्यवहार करता है, ऐसी चाल चलता है, जिससे उसे तिलमिलाने का दण्ड भुगतना पड़े। अहंकारी के पास स्नेह-सौजन्य नहीं रहता। सज्जनता, विनयशीलता, नम्रता का तो अस्तित्व ही नहीं रहा।* नशे की खुमारी जिस प्रकार पियक्कड़ को अस्त-व्यस्त अनगढ़ बना देती है, लगभग उससे मिलती-जुलती स्थिति अहंकारी की बन जाती है। *यह असामान्य स्थिति, मिथ्या प्रवंचना उसके लिये अन्ततः घातक सिद्ध होती है, जो इस रंग में अपने को रंग लेता है, सनक की तरह इस दुर्गुण को अपना लेता है ।*
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*"भव बंधनों से मुक्त हों" पृष्ठ ०२*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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#गायत्रीपरिवार