AWGP- Sheopur- M.P.

AWGP- Sheopur- M.P. Gayatri Pariwar is a living model of a futuristic society, being guided by the principles of human unity and equality.

26/05/2026
26/05/2026

जब परम पूज्य गुरुदेव ने १ लाख कार्यकर्ताओं के लिए आव्हान किया ।

#गायत्रीपरिवार

*🌴//  २६ मई  २०२६ मंगलवार   //🌴* *🙏  पुरुषोत्तम मास /अधिकमास 🙏**🥀 ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी २०८३ 🥀*➖➖➖➖‼️➖➖➖➖          *‼️ऋ...
26/05/2026

*🌴// २६ मई २०२६ मंगलवार //🌴*
*🙏 पुरुषोत्तम मास /अधिकमास 🙏*
*🥀 ज्येष्ठ शुक्लपक्ष दशमी २०८३ 🥀*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*❗ "आलस्य" एवं "प्रमाद" ❗*
*‼️ मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु ‼️*
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👉 *शरीर को श्रम से बचाने का नाम है- "आलस्य" और मन को निर्धारित काम की उपेक्षा करके जहाँ-तहाँ दौड़ाने की दुष्प्रवृत्ति का नाम है- "प्रमाद" ।* जहाँ इन दोनों का संयोग मिल जाय, वहाँ समझना चाहिये कि समय की बर्बादी और काम की असफलता दोनों साथ-साथ चलेंगी और मनुष्य ऐसा कुछ भी न कर सकेगा, जिसे महत्वपूर्ण या सराहनीय कहा जा सके ।
👉 *कुछ लोग विलासी प्रकृति के होते हैं ।* आरामतलबी उन्हें बहुत सुहाती है । समय काटने के लिये मनोरंजन का कोई शुगल ढूँढ़ते हैं । *बेकार पड़े रहने से तो पीठ दुखने लगती है, इसलिये आलसी लोग भी आवारागर्दी के लिये निठल्ले यार-दोस्तों का जमघट लगाते हैं, उनकी आव-भगत के लिये पैसा खर्च करते हैं; अपने साथ-साथ ही घर वालों को उस कुटेब का आदी बनाते हैं।* मनोरंजन के कुछ साधन तो ऐसे होते हैं, जो घर पर भी जुट सकते हैं। *ताश, चौपड़, शतरंज आदि घरेलू मनोरंजन हैं। सिनेमा, पर्यटन, शिकार जैसे माध्यम ऐसे हैं, जिनके लिये घर से बाहर जाना पड़ता है । इनके साथ दुर्बुद्धि का और गहरा पुट लगने लगे, तो नशेबाजी, जुआ, व्यभिचार जैसी बुराइयाँ भी शामिल हो जाती हैं। यह सभी खर्चीली हैं।* आलसी व्यक्ति इन प्रयोजनों में अपनी संचित पूँजी गँवा बैठते हैं या फिर जहाँ-तहाँ से कर्ज लेते हैं। यह सभी परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जो कुछ ही दिन में आदत का रूप धारण कर लेती हैं और फिर छुड़ाये नहीं छूटतीं । *ऐसे लोगों को कभी कोई सही उत्तरदायित्व सँभालने की विवशता आ पड़े, तो वे उन्हें आधे-अधूरे छोड़कर निरर्थक समय गँवाने वाली पुरानी आदतों की ओर भटक जाते हैं और जो काम करना था, वह जहाँ का तहाँ पड़ा बर्बाद होता रहता है ।* इस प्रकार छूटे हुए काम मनुष्य का मनोबल गिराते हैं और बदनामी कराते हैं। फिर नये सिरे से किसी काम को करने के लिये न उत्साह उठता है और न कोई उन्हें जिम्मेदारी सौंपता ही है । *ऐसे निरर्थक समय गँवाने वाले परिवारियों, सम्बन्धियों और शुभचिंतकों की दृष्टि में क्रमशः क्षोभ और घृणा के पात्र बनते जाते हैं ।*
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*"भव बंधनों से मुक्त हों" पृष्ठ १९*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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#गायत्रीपरिवार

*🌴//  २४ मई  २०२६ रविवार   //🌴* *🙏  पुरुषोत्तम मास /अधिकमास 🙏**🥀 ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी २०८३ 🥀*➖➖➖➖‼️➖➖➖➖          *‼️...
24/05/2026

*🌴// २४ मई २०२६ रविवार //🌴*
*🙏 पुरुषोत्तम मास /अधिकमास 🙏*
*🥀 ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी २०८३ 🥀*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*अहंता त्यागें - सज्जनता अपनाएं*
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👉 *"अहंकार" हल्की मात्रा में हो या बड़ी मात्रा में, उसका प्रभाव दूसरों पर बुरा ही पड़ता है, उसे उद्धत माना जाता है, सनकी समझा जाता है, प्रकट या अप्रकट में उसके प्रति अन्यों की मान्यता घृणा मिश्रित होती है, व्यक्तित्व का वजन उथले-बचकाने स्तर का समझा जाने लगता है ।* वस्तुस्थिति छिपी तो रहती नहीं, सभी जानते हैं कि किसी के पास कोई विशेषता है, तो वही उसका लाभ उठाता रहेगा । अन्यों को उसमें भागीदारी नहीं मिलने वाली है। *ऐसी दशा में कोई क्यों उसका लोहा माने ? क्यों दबाव स्वीकार करे ? क्यों मिथ्या आत्मश्लाघा का पोषण करे ?* अपने को किसी के सामने गया- 'गुजरा मानने में उसकी भी तो हेटी होती है। *ऐसी दशा में अहंकारी का सारा सम्पर्क क्षेत्र तनाव से भर जाता है ।* पियक्कड़ को देखकर लोग आत्म रक्षा के लिये चौकन्ने हो जति हैं। उससे बचकर निकलते हैं । *उसी प्रकार अभिमानी के प्रति सर्वसाधारण की मान्यता पाखण्डी जैसी बन जाती है । उसके साथ सहयोग करना तो दूर, सम्पर्क करने वालों में से हर एक की इच्छा होती है कि इस बला से जितनी दूर रहा जाय, उतना ही अच्छा ।* न उसका कोई हितैषी रहता है, न मित्र, न घनिष्ठ । मात्र चापलूस ही उसकी हाँ में हाँ मिलाकर उल्लू बनाते और साथ ही अपना कोई अनुचित स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं। *उनकी पटरी ऐसे ही लोगों के साथ बैठती है। बार-बार ठगे जाते हैं। फिर भी अन्यत्र कहीं सहारा न मिलने के कारण ऐसे ही चाटुकारों के पास जा पहुँचते हैं और प्रकारान्तर से उन्हें रिश्वत देते या ठगे जाते रहते हैं ।*
👉 *"अहंकार" एक भ्रांति है, जो आत्म प्रदर्शन के लिये पग-पग पर पाखण्ड रचने के लिये प्रेरित करती है।* जिनमें वस्तुतः कुछ विशेषतायें होती हैं, जो वस्तुतः साधन-सम्पन्न, गुणवान या वरिष्ठ होते हैं, उनमें सज्जनता भी सहज ही साथ रहती है । *"सज्जनता" का पहला लक्षण है- "नम्रता" दूसरा +-"शिष्टता ।" तीसरा गुण है- हर किसी को "यथोचित सम्मान प्रदान करना।"* जिनमें इनमें से एक भी गुण न हो, उसकी गणना *"दुर्जनों"* में होती है। मानवी गरिमा की दृष्टि से उसे गया-गुजरा माना जाता है। इस तथ्य से जो अवगत है, उसी को यथार्थवादी या बुद्धिमान कहा जाता है । *इसलिये "सज्जन" अपने में इन तीनों ही विशेषताओं को समुचित मात्रा में अपनाये रहकर अपना दृष्टिकोण और स्वभाव उसी ढाँचे में ढाल लेते हैं।* उन्हें अभिमान आत्मघात जैसा प्रतीत होता है और उससे बचे रहने का सतर्कतापूर्वक प्रयत्न करते हैं । *"आत्म-निरीक्षण" करते हुए पैनी दृष्टि से यह जाँचते रहते हैं कि कहीं "अहंकार" ने व्यक्तित्व के किसी पक्ष में डेरा डालना तो आरंभ नहीं कर दिया ।* यदि किसी भी मात्रा में ऐसा हो रहा होता है, तो वे उसे हटाने के लिये बड़ा प्रयत्न करते हैं । *इस दुस्स्वभाव को पतन का गर्त मानकर उसमें गिरने से बचे रहते हैं।*
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*"भव बंधनों से मुक्त हों" पृष्ठ १६*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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#गायत्रीपरिवार

23/05/2026
23/05/2026

गुरुदेव की वाणी : गुरुदेव माताजी से संपर्क कैसे बनाएं

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#गायत्रीपरिवार

ग्रहे ग्रहे गायत्री यज्ञ एवं अन्नप्राशन संस्कार              #गायत्रीपरिवार
23/05/2026

ग्रहे ग्रहे गायत्री यज्ञ एवं अन्नप्राशन संस्कार

#गायत्रीपरिवार

*🌴//  २३ मई  २०२६ शनिवार   //🌴* *🍁 पुरुषोत्तम मास / अधिकमास 🍁**🥀ज्येष्ठ शुक्लपक्ष सप्तमी २०८३ 🥀*➖➖➖➖‼️➖➖➖➖          *‼️ऋ...
23/05/2026

*🌴// २३ मई २०२६ शनिवार //🌴*
*🍁 पुरुषोत्तम मास / अधिकमास 🍁*
*🥀ज्येष्ठ शुक्लपक्ष सप्तमी २०८३ 🥀*
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*‼️ऋषि चिंतन ‼️*
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*।। अहंकार रूपी शत्रु से बचें।।*
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👉 *"स्व" के विकृत बोध को ही "अहंकार" कहते हैं।* वह आत्म तत्व से न जुड़कर भौतिक सम्पदाओं के साथ जुड़ा होता है। दूसरों की तुलना में अपने को विशिष्ट मान बैठने पर अहंता की उत्पत्ति होती है। *बलिष्ठता, सुन्दरता, सम्पन्नता, पद, अधिकार आदि उसके कारण हो सकते हैं।* कई बार भ्रम भी उसका निमित्त बना हुआ होता है। *जाति-पाँति के आधार पर कई अपने को ऊँचा मानते हैं। इस आधार पर दूसरे नीच या हेय प्रतीत होने लगते हैं और अहंकार जड़ जमा लेता है ।*
👉 *अपनी अहंता प्रकारान्तर से दूसरों को हेय या हीन गिनने लगती है। अपनी मान्यता को दूसरों को गले उतारने के लिये वह अपने साधनों का उद्धत प्रयोग करती है, ताकि उनकी ओर अन्यान्यों का ध्यान आकर्षित हो, वे उसे देखें, समझें और बड़प्पन स्वीकार करें ।* इस प्रकार की स्वीकृति तभी बन पड़ती है, जब उसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिले। साधारण स्थिति बनी रहने पर तो ध्यान उस ओर जाता नहीं । *इसलिये कुछ न कुछ उद्धत आचरण अहंकारी को करना पड़ता है, अन्यथा दूसरे क्यों उसका बड़प्पन स्वीकार करें ? क्यों दबें ? क्यों डरें ? क्यों गिड़गिड़ायें ? क्यों ललचायें ?* अहंकार इस हेतु उद्धत आत्म-प्रदर्शन किये बिना नहीं रहता । *कुछ नहीं तो आत्मश्लाघा सहित अपना बखान स्वयं ही करने लगता है ।* ऐसी घटनाओं का सच्चा-झूठा वर्णन करता है, जिससे उसकी छाप सुनने वाले पर पड़े और समीपवर्ती उसका लोहा मानने के लिये बाधित हों। इस कार्य के लिये हर घड़ी तो प्रशंसा-कृत्य के लिये साथी-सेवक रखे नहीं जा सकते । *इसलिये आतुरता इस रास्ते फूटती है कि अपनी बात या क्रिया में ऐसा पुट लगा रहे, जिसमें उसकी विशिष्टता से दूसरों को अवगत होते रहना पड़े।* जब कभी अपने साथ तुलना करें, तो समझें कि इनकी स्थिति मेरी अपेक्षा कहीं अच्छी है। इसलिये इनके सामने मुझे दबकर रहना चाहिये। यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो अहंकारी इसमें अपना अपमान मानता है, तिरस्कृत उपेक्षित अनुभव करता है, इसमें मानहानि की गंध सूँघता है और जिसने महत्ता स्वीकारने में उपेक्षा दिखाई, उसे अपना शत्रु तक मानने लगता है। इसका बदला वह नीचा दिखाने का अवसर ढूँढ़कर करता है। *जो हाँ में हाँ न मिलाये, जी हुजूरी न करे, उसके साथ वह ऐसा व्यवहार करता है, ऐसी चाल चलता है, जिससे उसे तिलमिलाने का दण्ड भुगतना पड़े। अहंकारी के पास स्नेह-सौजन्य नहीं रहता। सज्जनता, विनयशीलता, नम्रता का तो अस्तित्व ही नहीं रहा।* नशे की खुमारी जिस प्रकार पियक्कड़ को अस्त-व्यस्त अनगढ़ बना देती है, लगभग उससे मिलती-जुलती स्थिति अहंकारी की बन जाती है। *यह असामान्य स्थिति, मिथ्या प्रवंचना उसके लिये अन्ततः घातक सिद्ध होती है, जो इस रंग में अपने को रंग लेता है, सनक की तरह इस दुर्गुण को अपना लेता है ।*
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*"भव बंधनों से मुक्त हों" पृष्ठ ०२*
*🍁।।पं श्रीराम शर्मा आचार्य।।🍁*
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