त्रिपुरारि बाबा से संबंधित एक संस्मरण---
------TN SINHA
त्रिपुरारि बाबा मेरी जन्मस्थली (ग्राम एकाढ़ा,प्रखंड चेवाड़ा, जिला शेखपुरा, बिहार राज्य, भारतवर्ष ) के सबसे अधिक प्रभावशाली ग्राम देवता हैं । उनके अनन्य भक्तों का कहना है कि सभी ग्रामवासियों का दुख-सुख, उन्नति-अवनति उन्हीं की कृपा पर निर्भर करता है । हर प्रकार की मनोकामना की पूर्ति के लिये ग्रामवासियों
का ध्यान उन्हीं की पूजा आराधना पर जाता है । बहुत छोटी उम्र में मैं उनसे संबंधित एक चमत्कार की कहानी अक्सर सुना करता था । एक बार बरसात के आरंभिक अषाढ़ के महीने में वर्षा बिल्कुल नहीं हुई । नतीजा हुआ कि खेतों मे धान का बीज समय पर नहीं डाला जा सका और सावन में रोपा जाने वाला पौधा (seedlings for transplantation) तैयार नहीं हो सका । सावन में पहली वर्षा
होने के बाद जल्दबाजी में कुछ पौधा तैयार करने की कोशिश हुई । उसके बाद लगातार इतनी वर्षा होने लगी कि बाढ़ आ गई और अधिकांश पौधा गल गया । अब गाँव के सारे लोगों के सामने त्रिपुरारि बाबा के सामने भजनकीर्तन करने के अलावा कोई उपाय नहीं रहा । आखिर बाबा को दया आई और उन्होंने नियमित पूजा करने वाले पुजारी जी को सपने में दर्शन दिया और कहा, "तुमलोगों को घबराने की जरूरत नहीं है । धान काटने के समय तुम सबलोगों को एक बोझा में उतना ही धान निकल जायेगा जितना पिछले साल हुआ था ।" अब लोगों ने अपनी मुठ्ठी में ही आने वाले पके धान के पौधे का बोझा बना दिया । बाबा तो बचनबद्ध थे ।यह देखकर उन्हें गुस्सा तो आया कि ग्रामीण लोग उनकी परीक्षा ले रहे हैं, लेकिन अपना बचन वे वापस तो ले नहीं सकते थे । लोगों ने देखा कि उनकी हर मुठ्ठी के पके पौधे में उतना ही धान निकल गया जितना एक बोझे में निकलता था । लेकिन गुस्से में बाबा गाँव छोड़कर चले गये । कई पीढ़ियों के बाद अपने एक भक्त की कठिन तपस्या से खुश होकर बहुत मानमनौव्वल के बाद वे फिर लौटे । अब हर ग्रामीण इसका ध्यान रखता है कि बाबा दुबारा रूठकर कहीं नहीं जायें ।
इस सिलसिले में एक बात का जिक्र आवश्यक है । मैट्रिक पास करके मेरा गाँव में रहना, आना-जाना बहुत कम हो गया । जब तक मैं वहाँ रहा, त्रिपुरारि बाबा का स्थायी निवास गाँव से करीब एक किलोमीटर एक विशाल बटबृक्ष की जड़ में था । एक छोटी सी मूर्ति के रूप में वे वहाँ कब आये थे कोई नहीं जानता । मेरे बचपन के दिनों में उनके नियमित पुजारी थे एक सम्पन्न किसान बाबू अयोध्या प्रसाद सिंह । सुबह सूर्योदय के समय ही वे छाता लगाकर अपने इष्टदेव के पास चले जाते और एक बजे तक लौटते । पाँच बजे फिर अपना छाता लगाये हुए वहीं वापस चले जाते और रात 9 बजे तक लौटते । दिन हो या रात,अपना छाता लगाना वे कभी नहीं भूलते । जाड़ा गर्मी बरसात एक दिन भी अपनी पूजा आराधना में कमी नहीं आने देते । कुछ लोगों का कहना था कि उन्हीं की भक्ति के कारण रूठे हुए बाबा फिर से लौटकर आ गये थे ।
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