आर्यसमाज ताहरपुर भभीसा

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आर्यसमाज ताहरपुर भभीसा ऋषि दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित क्रांतिकारी संस्था की एक ग्रामीण इकाई।

09/11/2024
09/11/2024

आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं मानता कि श्रीकृष्ण जी माखनचोर थे, गौएँ चुराते थे, गोपियों संग रास रचाते थे, राधा संग प्रेम प्रसंग में लिप्त थे, कुब्जा दासी से समागम किए थे, ईश्वर का अवतार थे ।
बल्कि ये मानता है कि वे जन्म से लेकर ४८ वर्ष तक ब्रह्मचारी थे, केवल एक रुक्मणी से विवाह करके भी उसके साथ विष्णु पर्वत पर उपमन्यु ऋषि के आश्रम में १२ वर्ष ब्रह्मचर्य तप करके अपने समान तेजस्वी पुत्र प्रद्युम्न को पैदा किया, योगेश्वर होने से वे नित्य ईश्वरोपासना, प्राणायाम, संध्या, अग्निहोत्र आदि करते थे, अनेकों प्रकार की युद्ध कलाओं में दक्ष थे, उनका प्रीय शस्त्र सुदर्शन चक्र था, महान विचारक थे, अद्वितीय योद्धा थे, भारतवर्ष के समस्त गणराज्यों को यादवों के संघर्ष तले एक करने वाले महान राजनीतिज्ञ थे ।........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज रामचरितमानस के आधार पर ये नहीं मानता कि हनुमान जी बंदरमुखी थे, न ये मानता है कि उन्होंने पूँछ से लंका दहन किया ।
बल्कि वाल्मिकी रामायण के आधार पर ये मानता है कि कि हनुमान जी दक्षिण भारत की क्षत्रिय शाखा जो वन में बसती है उसमें से अखंड ब्रह्मचारी, महाबली, व्याकरण के धुरंधर विद्वान, वेदों के ज्ञाता थे । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज गरुड़, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, भागवत आदि १८ नवीन पुराणों को नहीं मानता क्योंकि इनमें परस्पर विरोधाभास, देवी देवताओं के बारे में अभद्र अश्लील कथाएँ वर्णित हैं, अपने अपने देवों की स्तुति और अन्यों की निंदा है, जिन्हें व्यासकृत माना जाता है जब्की वे पक्षपातीयों के द्वारा समय समय पर रचे हुए कपोल कल्पित ग्रंथ हैं ।
बल्की ये मानता है कि चारों वेदों के चार ब्राह्मणग्रंथ ( ऐतरेय, तैत्तरीय, शतपथ, गोपथ ) को ही पुराण कहते हैं । जिनमें आश्वलायन, याज्ञवल्क्य, जैमीनि आदि ऋषियों - ऋषिकाओं का प्रमाणिक इतिहास है । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं मानता कि हिंदुओं के सारे संस्कृत शास्त्र प्रमाणिक हैं ।
बल्कि ये मानता है कि केवल वेद और वेद के सिद्धांतों के अनुकूल चलने वाले ग्रंथ ( दर्शन, उपनिषद्, अरण्यक, वेदांग, रामायण, मनुस्मृति, महाभारत, कौटिल्य अर्थशास्त्र ) आदि ही प्रमाणिक हैं ।........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं मानता कि पत्थर के लिंग पर दूध चढ़ाने से, मूर्ती के आगे माथा टेकने से, हाथ जोड़ने से, धूप अगरबत्ती करने से, मूर्ती को भोग लगाने से, कपड़े पहनाने से, ढोल बाजे बजाने से, और नाचने आदि अँधविश्वास से ईश्वर की भक्ति होती है ।
बल्कि ये मानता है कि पतंजलि ऋषि के योगशास्त्र की उपासना विधि ( यम नियम पालन, प्राणायाम, प्रणवजप, ध्यान आदि ) से ही निराकार सर्वव्यापक परमेश्वर की उपासना होती है । इसी विधी से हमारे पूर्वज ऋषि मुनि दुर्गा, राम, कृष्ण, सीता, सावित्री, शिव, हनुमान आदि उपासना किया करते थे । सो हमें भी ऐसे ही करनी चाहिए । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं मानता कि तीर्थयात्राएँ करने से, गंगा स्नान से, पंडे पुजारियों को दान देने से, व्यर्थ के पाखंड करके धन, समय, ऊर्जा, आदि व्यर्थ करने से मनोकामना पूरी होती है ।
बल्कि ये मानता है कि ऋषि परम्परा के अनुसार घर में हवन ( अग्निहोत्र ) करने से ३३ कोटी ( ३३ प्रकार के ) देव { ११ रुद्र, ८ वसु, १२ आदित्य मास, इन्द्र ( विद्युत ), } की पुष्टि होती है जिससे कि वृष्टि आदि समय पर होकर औषधीयों का पोषण होता है, फल फूल शाक सब्जी अन्न आदि की वृद्धि और शुद्धता होती है , ऐसा एक यज्ञ करने से हज़ारों मनुष्यों का उपकार होता है जैसा कि गीता में भी कहा है । एक यज्ञ में ही भरपूर पुण्य मिलता है । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं मानता कि मृतक का श्राद्ध करने से, पंडों का पेट भरने से, अस्थियाँ गंगा में बहाने आदि से मृत की आत्मा को शांती मिलती है ।
बल्कि ये मानता है कि व्यक्ति अपने किये कर्मों का स्वयं उत्तरदायी है, शव का दाह संस्कार ( नरमेध यज्ञ ) करने के बाद घर में वायु शुद्धि हेतु हवन करवाना चाहिये, उसके बाद मृतक की अस्थियों को जल में डालने के बजाए किसी खेत में खाद के रूप में प्रयोग करना चाहिये , इसके बाद मृतक के लिये शेष कुछ भी न करना चाहिए ।........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं चाहता कि करोड़ों, अरबों, खरबों का धन मंदिरों में दान देकर उसे व्यर्थ किया जाये , जिससे कि पंडे पुजारी अपनी तोंद भरने में, अपने बंगले बनाने में, अपने गले में मोटे मोटे सोने की चैन डालकर उस धन पर हराम की कमाई फ्री में खाएँ । और न ही ये चाहता है कि उस धन का ७०% भाग मस्जिदों और चर्चों पर खर्च हो ।
बल्कि ये चाहता है कि इसी अपार धन से हम वैदिक गुरुकुल, संस्कृत पाठशालाएँ, वैदिक विज्ञान पर शोध हेतु प्रयोगशालाएँ खोलें । जिससे कि हमारा देश शीघ्रता से संस्कृत राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो और वही प्रचीन आर्यवर्त देश बने, अनाथाश्रम आदि खोले जायें जिससे कि हिंदू बच्चे मदरसों और कानवेंट आदि में न जाकर मुसलमान ईसाई होने से बचें ।........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज ये नहीं चाहता कि खोखले लोकतंत्र के आधार पर राजनैतिक पारटीयाँ हिंदूओं को जाति में तोड़कर वोट लेती रहें और एक समुदाय विशेष का पोषण करती रहे और बेचार हिंदू केवल झंडा उठाकर हिंदूराष्ट्र का स्वप्न मात्र ही देखता रहे और ये हरामी नेता हिंदुओं को बरगलाकर वोट लेते रहें और शोषण करते रहें ।
बल्कि ये चाहता है कि लोकतंत्र जैसे भ्रष्टतंत्र को उखाड़कर मनुस्मृति के आधार पर राजतंत्र स्थापित किया जए और वैदिक शासन की नींव रख ( सच्चा हिंदुत्व ) स्थापित किया जा सके तांकि हमारा राजा पूरी पृथिवी को एकछत्र वैदिक गणराज्य में लाकर युधिष्ठिर, विक्रमादित्य की भांती खंडित मानवीय शासन के स्थान पर अखंडित वैदिक चक्रवर्ती राज्य स्थापित करे और राजसूय यज्ञ करे । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?
# आर्य समाज विवेकानंद और उसके रामकृष्ण मठ की सकुलर विचरधारा को नहीं मानता । आर्य समाज नहीं मानता कि माँस खाने वाला और दूसरों को माँस खाने का सुझाव देने वाला विवेकानंद कोई सन्यासी था, नहीं मानता कि उसने अमरीका में भाषण देने के सिवाय कभी गौरक्षा पर बात की हो, कभी धर्म परिवर्तन रोकने का प्रयास किया हो, कभी स्वतंत्रता के लिये कुछ किया हो, कभी स्त्री शिक्षा के लिये कुछ किया हो, कभी कानवेंट स्कूल के स्थान पर गुरुकुलीय शिक्षा की बात की हो, कभी किसी मौलवी या पादरी से शास्त्रार्थ करके अपने वैदिक धर्म को श्रेष्ठ सिद्ध किया हो ।
बल्कि ये मानता है कि वेद के आधार पर ब्रह्मचर्य, शाकाहार आदिका पालन और प्रचार करने वाले दयानंद जी ने ही हिंदू समाज का उद्धार किया । गौरक्षा हेतु आंदोलन किया, स्त्री शिक्षा आरंभ करवाई, धर्म परिवर्तन को रोक उलटा शुद्धि चक्र चलाया, स्वतंत्रता हेतु युवा तैयार किए, कानवेंट शिक्षा समाप्त कर वैदिक गुरूकुल खोलने का प्रयास किया, मौलवीयों पादरीयों से शास्त्रार्थ करके उनको धूल चटाई और हिंदुओं के मुर्दा शरीरों में गर्म रक्त का संचार किया । ........... तो ऐसा मानने से आर्य समाज हिंदू विरोधी कैसे ?

04/10/2024

महिषासुर शहादत दिवस-एक और पाखंड की शुरुआत

#डॉ_विवेक_आर्य

नवरात्र आ गए है। तथाकथित बौद्धिक समाज की राजधानी कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में महिषासुर शहादत दिवस से आयोजित किया जा रहा है। महिषासुर शहादत दिवस के दिन महिषासुर की तस्वीर रखकर उस पर फूल मालाएँ चढ़ाई जाएगी। आयोजक भाषण देंगे कि बंग देश के राजा महिषासुर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के नायक थे। लेकिन इतिहास लिखने वालो ने उन्हें खलनायक के रूप में पेश किया है। महिषासुर दस्यु थे और उनका दमन करने वाली दुर्गा आर्य थीं। इस विषय में यह मिथ्या प्रवाद जोर शोर से प्रचारित किया जायेगा कि यह सुर और असुर के मध्य संघर्ष था। सुर दरअसल आर्य थे और असुर अनार्य थे। यहाँ के मूलनिवासियों अर्थात् दलित, पिछड़ी आदि जातियों पर विदेशी आक्रमणकारी आर्यों ने अपने देवी-देवताओं को थोपा है और यहाँ के मूल देवताओं को खलनायक के रूप में चित्रित किया है। अब मूलनिवासी जाग्रत हो चुके है, उन्हें विदेशी देवताओं की कोई आवश्यकता नहीं है और वे अपने देवी देवताओं का महिमा मंडन स्वयं कर सकते हैं। इस प्रकार के आयोजन इसी प्रवाद को स्थापित करने के लिए किये जा रहे हैं।

पाठक एक कहावत से परिचित होंगे कि झूठ को हज़ार बार बोलें तो झूठ सच लगने लगता है। पहले तो भारतीय इतिहास के साथ विदेशी इतिहासकारों ने बलात्कार के समान अन्याय किया, फिर उनके मानस सन्तानों ने उनके द्वारा स्थापित झूठी मान्यताओं को इतना प्रचारित प्रसारित कर दिया कि सत्य पक्ष से अपरिचित अपरिपक्व छात्र उनके विषैले प्रचार का शिकार होकर असत्य को सत्य समझने लगते हैं। आर्यों का बाहर से आक्रमण, यहाँ के मूल निवासियों को युद्ध कर हराना, उनकी स्त्रियों से विवाह करना, उनके पुरुषों को गुलाम बनाना, उन्हें उत्तर भारत से हरा कर सुदूर दक्षिण की ओर खदेड़ देना, अपनी वेद आधारित पूजा पद्धति को उन पर थोंपना आदि अनेक भ्रामक, निराधार बातों का प्रचार तथाकथित साम्यवादी लेखकों द्वारा जोर-शोर से किया जाता है। रामविलास शर्मा जैसे वरिष्ठ साम्यवादियों को इस विचार से असहमत होने के कारण ये अपने खेमे ये बहिष्कृत कर चुके हैं।

पाठकों को जानकर प्रसन्नता होगी कि वैदिक वांग्मय और इतिहास के विशेषज्ञ स्वामी दयानंद सरस्वती जी का कथन इस विषय में मार्ग दर्शक है। स्वामीजी के अनुसार किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा कि आर्य लोग ईरान से आये और यहाँ के जंगलियों से लड़कर, जय पाकर, निकालकर इस देश के राजा हुए (सन्दर्भ-सत्यार्थप्रकाश 8 सम्मुलास) , जो आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं वैसे ही मैं भी मानता हूँ, आर्यावर्त देश इस भूमि का नाम इसलिए है कि इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी है इन चारों के बीच में जितना प्रदेश है उसको आर्यावर्त कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको आर्य कहते हैं। (सन्दर्भ-स्वमंतव्यामंतव्यप्रकाश-स्वामी दयानंद)।

135 वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद द्वारा आर्यों के भारत पर आक्रमण की मिथक थ्योरी के खंडन में दिए गये तर्क का खंडन अभी तक कोई भी विदेशी अथवा उनका अँधानुसरण करने वाले मार्क्सवादी इतिहासकार नहीं कर पाए हैं। एक कपोल कल्पित, आधार रहित, प्रमाण रहित बात को बार-बार इतना प्रचार करने का उद्देश्य विदेशी इतिहासकारों की 'बांटो और राज करो' की कुटिल नीति को प्रोत्साहन मात्र देना है। इतिहास में अगर कुछ भी घटा है तो उसका प्रमाण होना उसका इतिहास में वर्णन मिलना उस घटना की पुष्टि करता है। किसी अंग्रेज इतिहासकार ने कुछ भी लिख दिया और आप उसे बिना प्रमाण, बिना उसकी परीक्षा के सत्य मान रहे हैं-- इसे मूर्खता कहें या गोरी चमड़ी की मानसिक गुलामी कहें। सर्वप्रथम तो हमें कुछ तथ्यों को समझने की आवश्यकता हैं:-

१. आर्य और अनार्य या दस्यु में क्या भेद हैं?
२. सुर और असुर में क्या भेद हैं?
३. क्या शुद्र और दस्यु शब्द का एक ही अर्थ हैं?

१. आर्य और अनार्य या दस्यु में क्या भेद हैं?

प्रथम तो 'आर्य' शब्द जातिसूचक नहीं अपितु गुणवाचक हैं अर्थात आर्य शब्द किसी विशेष जाति, समूह अथवा कबीले आदि का नाम नहीं हैं अपितु अपने आचरण, वाणी और कर्म में वैदिक सिद्धांतों का पालन करने वाले, शिष्ट, स्नेही, कभी पाप कार्य न करनेवाले, सत्य की उन्नति और प्रचार करनेवाले, आतंरिक और बाह्य शुचिता इत्यादि गुणों को सदैव धारण करनेवाले आर्य कहलाते हैं। आर्य का प्रयोग वेदों में श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए (ऋक १/१०३/३, ऋक १/१३०/८ ,ऋक १०/४९/३) विशेषण रूप में प्रयोग हुआ हैं।

अनार्य अथवा दस्यु किसे कहा गया हैं

अनार्य अथवा दस्यु के लिए 'अयज्व’ विशेषण वेदों में (ऋग्वेद १|३३|४) आया है अर्थात् जो शुभ कर्मों और संकल्पों से रहित हो और ऐसा व्यक्ति पाप कर्म करने वाला अपराधी ही होता है। अतः यहां राजा को प्रजा की रक्षा के लिए ऐसे लोगों का वध करने के लिए कहा गया है। सायण ने इस में दस्यु का अर्थ चोर किया है। दस्यु का मूल ‘दस' धातु है जिसका अर्थ होता है ‘उपक्क्षया' अर्थात जो नाश करे। अतः दस्यु कोई अलग जाति अथवा समूह नहीं है, बल्कि दस्यु का अर्थ विनाशकारी और अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से है। इस सिद्ध होता हैं की दस्यु गुणों से रहित मनुष्य के लिए प्रयोग किया गया संबोधन हैं नाकि जातिसूचक शब्द हैं।

इसी प्रकार से ऋग्वेद १|३३|५ में दस्यु (दुष्ट जन ) शुभ कर्मों से रहित और शुभ करने वालों के साथ द्वेष रखने वाले को कहा गया हैं। इसी प्रकार से ऋग्वेद १|३३|७ में जो शुभ कर्मों से युक्त तथा ईश्वर का गुण गाने वाले मनुष्य हैं उनकी रक्षा करने का आदेश राजा को दिया गया हैं इसके विपरीत अशुभ कर्म करने वाले अर्थात दस्युओं का संहार करने का आदेश हैं। इसी प्रकार से दस्यु या दास शब्द का प्रयोग अनार्य (ऋक १०/२२/८ ), अज्ञानी, अकर्मा, मानवीय व्यवहार शुन्य (ऋक १०,२२,८), भृत्य (ऋक ), बल रहित शत्रु (ऋक १०/८३/१) आदि के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाति अथवा स्थान के लोगों के लिए वेदों में आया हैं।

सुर और असुर में क्या भेद हैं?

जैसे आर्य और अनार्य हैं उसी प्रकार से सुर और असुर में भेद हैं। दोनों एक दुसरे के लिए प्रयुक्त हुए विशेषण के समान हैं। यजुर्वेद ४०/३ में देव(सुर) और असुर को विद्वान और मुर्ख के रूप में बताया गया हैं और इन दोनों के परस्पर विरोध को देवासुर संग्राम कहते हैं। यहाँ पर भी सुर और असुर में भेद गुनातात्मक हैं नाकि जातिसूचक हैं।

क्या शुद्र और दस्यु शब्द का एक ही अर्थ हैं?

आर्य लोगों में वर्ण अर्थात गुण, कर्म और स्वाभाव के अनुसार चार भेद ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र कहलाते हैं। शुद्र शब्द दस्युओं के लिए अपितु गुणों से रहित व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ हैं। जैसे एक शिक्षित व्यक्ति राष्ट्र विरोधी कार्य करे तो उसे दस्यु कहा जायेगा और एक अशिक्षित व्यक्ति को जो की देश के प्रति ईमानदार हो उसे शुद्र कहा जायेगा। शुद्र शब्द नीचे होने का बोधक नहीं है अपितु गुण रहित होने का बोधक हैं। यजुर्वेद ३०/ ५ में कहा हैं- तपसे शुद्रम अर्थात शुद्र वह है जो परिश्रमी, साहसी तथा तपस्वी है।

वेदों में अनेक मन्त्रों में शूद्रों के प्रति भी सदा ही प्रेम-प्रीति का व्यवहार करने और उन्हें अपना ही अंग समझने की बात कही गयी हैं और वेदों का ज्ञान ईश्वर द्वारा ब्राह्मण से लेकर शुद्र तक सभी के लिए बताया गया है।

यजुर्वेद २६.२ के अनुसार हे मनुष्यों! जैसे मैं परमात्मा सबका कल्याण करने वाली ऋग्वेद आदि रूप वाणी का सब जनों के लिए उपदेश कर रहा हूँ, जैसे मैं इस वाणी का ब्राह्मण और क्षत्रियों के लिए उपदेश कर रहा हूँ, शूद्रों और वैश्यों के लिए जैसे मैं इसका उपदेश कर रहा हूँ और जिन्हें तुम अपना आत्मीय समझते हो , उन सबके लिए इसका उपदेश कर रहा हूँ और जिसे ‘अरण’ अर्थात पराया समझते हो, उसके लिए भी मैं इसका उपदेश कर रहा हूँ, वैसे ही तुम भी आगे आगे सब लोगों के लिए इस वाणी के उपदेश का क्रम चलते रहो।

अथर्ववेद १९.६२.१ में प्रार्थना है कि हे परमात्मा ! आप मुझे ब्राह्मण का, क्षत्रियों का, शूद्रों का और वैश्यों का प्यारा बना दें।

यजुर्वेद १८.४८ में प्रार्थना है कि हे परमात्मन आप हमारी रुचि ब्राह्मणों के प्रति उत्पन्न कीजिये, क्षत्रियों के प्रति उत्पन्न कीजिये, विषयों के प्रति उत्पन्न कीजिये और शूद्रों के प्रति उत्पन्न कीजिये।

अथर्ववेद १९.३२.८ हे शत्रु विदारक परमेश्वर मुझको ब्राह्मण और क्षत्रिय के लिए, और वैश्य के लिए और शुद्र के लिए और जिसके लिए हम चाह सकते हैं और प्रत्येक विविध प्रकार देखने वाले पुरुष के लिए प्रिय कर।

मनुस्मृति १०/४५ में कहा गया है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र इन दोनों से जो भिन्न है। वह दस्यु है।

इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि शुद्र और दस्यु एक नहीं है। अपितु इन दोनों में भेद हैं।

क्या कोई भी कागज़ी बुद्धिजीवी यह बतायेगे की उनके द्वारा बताया गया महिषासुर का इतिहास किस इतिहास की पुस्तक में वर्णित है? इसका उत्तर वेद नहीं है क्यूंकि वेद न तो इतिहास की पुस्तक है, न ही वेदों के अनुसार आर्य, दस्यु, शुद्र आदि शब्द जातिवादी है। फिर यह व्यर्थ का पाखंड क्यूँ किया जा रहा है। दुर्गा द्वारा महिषासुर का अंत अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीकात्मक वर्णन है। इसे आर्य बनाम अनार्य, ब्राह्मण बनाम शुद्र की संज्ञा देना विकृत मानसिकता का परिचायक है। विडंबना यह है कि यहाँ तो राई भी नहीं हैं। जिसका पहाड़ बनाया जा सके यहाँ तो बस हित घटिया मानसिकता है जो बाटों और राज करो की कुटिल मानसिकता का अनुसरण करता है। हिन्दू समाज की संगठन क्षमता को कमजोर करना उसे विधर्मी ताकतों के सामने कमजोर बनाता है।

25/08/2024

◘ *महर्षि दयानन्द सरस्वती और फादर नेहेम्या गोरे*
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एक दिन एक पण्डित जी तीव्रगति से अपनी पीठिका की ओर जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक परिचित भंगी और उनकी पत्नी सड़क की सफाई करते हुए दिखाई पड़े। उनका नन्हा बच्चा पास खड़ा चीख-पुकार कर रहा था। थोड़ी देर बाद सड़क पर भगदड़ मच गई। एक इक्के का घोड़ा बेकाबू होकर बेतहाशा दौड़ने लगा। इक्केवाले ने शोर मचाया, "बचो, बचो, घोड़ा काबू से बाहर हो गया है।" सहमे हुए लोग रास्ता छोड़ सड़क के किनारे हो गए। काबू से बाहर घोड़ा सरपट दौड़ता हुआ आगे बढ़ा चला आ रहा था। इक्केवाला बागें खैच रोकने की सरतोड़ कोशिश कर रहा था। घोड़ा रुकता ही न था; दौड़ता ही चला आ रहा था। भंगी का नन्हा मासूम बच्चा भी माँ-बाप को पास न पा रोता हुआ सरकता-सरकता उस समय सड़क के ऐन बीच आ खड़ा हुआ। पास से गुजर रहे पण्डित जी को लगा कि बच्चा घोड़े के पैरों तले कुचला जाएगा। उनके मन में दया आई। आगे बढ़कर उन्होंने बच्चे को उठाना चाहा, किन्तु अन्त्यज भंगी के बच्चे को छूने से धर्मभ्रष्ट होने के भय से हिचकिचा पीछे हट गए। उनके मन में पुनः दया ने जोर मारा। वे कभी बच्चे को उठाने के लिए आगे बढ़ते और फिर पाप लग जाने के डर से घबराकर पीछे हट जाते। धर्मसंकट में पड़ी बुद्धि निश्चय न कर पा रही थी। इतने में काबू से बाहर हुआ सरपट दौड़ता घोड़ा बच्चे के बिल्कुल समीप आ पहुँचा। दयाभाव से प्रेरित पण्डित जी बच्चे को उठाऊँ या न उठाऊँ, इस दुविधा में अभी उलझे हुए थे। इससे पहले कि घोड़ा आगे बढ़ बच्चे को पैरों तले रौंद देता, सड़क की दूसरी ओर से दयाद्रवित एक ईसाई पादरी आगे बढ़ा। झपट्टा मार उसने बच्चे को अपनी ओर बैंच लिया। बच्चा और भी अधिक चीखो-पुकार करने लगा। तांगा आनन-फानन उनके सामने से होकर गुजर गया। बच्चे को सही सलामत देख पण्डित जी बहुत प्रसन्न हुए, किन्तु उनकी यह प्रसन्नता अधिक समय तक स्थिर न रह सकी। शीघ्र ही उन्हें आत्मग्लानि ने आ दबाया। उन्हें लगा कि वे अपना कर्तव्य निभा नहीं पाए। बच्चे को बचाने के लिए बार-बार मन में उठी सच्ची धर्मभावना को अपनी झूठी धर्मभीरूता के कारण तिरस्कृत कर उन्होंने घोर पाप किया है। पश्चात्ताप के कारण रात भर उन्हें नींद नहीं आई। इसी उधेड़-बुन में वे सारी रात लगे रहे कि इस पाप का कैसे प्रायश्चित् किया जाए। सबेरा होते ही वे बिस्तर से उठे। नहा-धो सीधे गिरजाघर (चर्च) पहुँचे और वहाँ पादरी से बप्तिस्मा (दिक्षा) ले ईसाई बन गए। दिल में बैठे पाप-ताप से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने जो पहला काम किया वह था सुललित सुबोध संस्कृत में ‘बाइबल’ का अनुवाद। पण्डित जी द्वारा अनूदित बाइबल का यह संस्कृत संस्करण जब छपकर दुनिया के सामने आया तो आधुनिक संस्कृत साहित्य की उत्कृष्टतम कृति के रूप में सर्वत्र अभिनन्दित हुआ। आज भी ईसाई लोग इस संस्कृत बाइबल की प्रतियाँ संस्कृतज्ञों तक पहुँचाना अपना धार्मिक कर्त्तव्य मानते हैं।
ईसाईमत में बप्तिस्मा लेने वाले यह संस्कृतज्ञ पण्डित जी सुप्रसिद्ध *पं. नीलकण्ठ शास्त्री गोरे* थे। १९वीं शताब्दी में जिन कुलीन हिन्दुओं नें ईसाई मत अपनाया उनमें पं. नीलकण्ठ शास्त्री (बप्तिस्मा के बाद *पादरी नेहेम्या गोरे* ) का नाम सर्वाधिक चर्चित रहा है।
पं. नीलकण्ठ शास्त्री गोरे (फादर नेहेम्या गोरे) का जन्म ८ फरवरी १८२५ ई. में बुन्देलखण्ड अंचल में झाँसी के पास काशीपुर नामक गाँव में हुआ था। यह परिवार मूलतः *महाराष्ट्रीय कोकणस्थ ब्राह्मण* परिवार था। इनके पूर्वजों का मूल निवास स्थान रत्नागिरी जनपद में खेड़ नामक गाँव था। १४ मार्च १८४८ को आपने रेवरण्ड रॉबर्ट हाज से ईसाई मत की दीक्षा ग्रहण की थी। बाद में रेव. गोरे की धर्मपत्नी व कन्या ने भी ईसाई मत की दीक्षा ग्रहण की। उल्लेखनीय है कि *पंजाब के सुप्रसिद्ध महाराजा रणजीतसिंह के पुत्र दिलीपसिंह ने भी ३ मार्च १८५३ को ईसाइयत को स्वीकार कर लिया था।* अगले वर्ष १८५४ में नेहेम्या गोरे महाराजा दिलीपसिंह के शिक्षक व दुभाषिए के रूप में विलायत गए थे। इसी समय उनकी भेंट महारानी विक्टोरिया, प्रिंस अल्बर्ट और प्रख्यात विद्वान् मैक्समूलर से हुई थी।
महर्षि दयानन्द के जीवन चरित्रों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सन् १८७५ में *पुणे में स्वामी दयानन्द जी के व्याख्यानों का प्रभाव निष्प्रभ करने का बीडा फादर नेहम्या गोरे ने उठाया था, जिसमें उनके प्रयास पूर्णतया असफल रहे थे।* यह भी प्रसिद्ध है कि महर्षि दयानन्द और फादर नेहम्या गोरे में सन् १८७४ में प्रयाग में वेद और बाइबिल पर परस्पर विचार-विमर्श हुआ था। प्रयाग में महर्षि कुल सात बार पधारे थे। छटी बार जुलाई से सितम्बर १८७४ के अन्त तक रहे। इसी अवधि में स्वामीजी से सर्वप्रथम मिलने वाले चर्चित व्यक्तियों में फादर गोरे भी थे। रेव. गोरे से वेदार्थ के विषय में चर्चा हुई। फादर गोरे अपने साथ मैक्समूलर का ऋग्वेदभाष्य यह बतलाने के लिए लाए थे कि ‘अग्नि’ शब्द केवल ‘आग’ का वाचक है, ‘ईश्वर’ का नहीं। उनका कहना था कि प्रो. मैक्समूलर ने ‘अग्नि’ का केवल ‘आग’ अर्थ ही ग्रहण किया है। दयानन्द जी ने प्रत्युत्तर में कहा कि *मोक्षमूलर ईसाई मत के पक्षपाती हैं, अत: उन्होंने वेदों के अर्थों का अनर्थ किया है। उनके तो वेदभाष्य का उद्देश्य ही यह था कि भारतवासी वेदभाष्यों को देखकर भ्रम में पड़ जायें तथा वेदमत को छोड़कर ईसाई मत ग्रहण कर लें। इसलिए उनके अनुवाद को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।*
स्वामी दयानन्द जी ने इसी प्रसंग में ईसाइयों के ईश्वर विषयक विचार किस प्रकार अज्ञानमूलक हैं, यह बतलाने के लिये तौरेत (बाईबल) की एक कहानी का उल्लेख किया, जिसमें यह लिखा है कि - एक बार बाबल नगर के लोगों ने स्वर्ग या देवमाला में प्रविष्ट होने के उद्देश्य से एक बहुत ऊँचा बुर्ज (मीनार) बनाना प्रारम्भ किया, जिसे देखकर बाइबिल के परमेश्वर को भय हुआ कि कहीं ये लोग आसमान पर चढ़ न जावें! इसलिए उसने उनकी भाषा में ऐसी गड़बड़ उत्पन्न कर दी कि जिससे वे एक-दूसरे की बात को समझने में असमर्थ हो जायें और बुर्ज बनाना छोड़ दें, तथा वह स्वयं भी मनुष्य के बर्बरता पूर्ण आक्रमण से बच जाए। स्वामीजी ने इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इससे बाबल निवासियों की यह मूर्खता ही स्पष्ट होती है कि वे आसमान को ठोस पदार्थ समझकर उस पर चढ़ने का प्रयत्न करने लगे और उनके ईश्वर को भी यह पता नहीं था कि आसमान जब ठोस पदार्थ है ही नहीं, तो वे उस पर चढ़ेंगे कैसे? ईसाइयों के ईश्वर का अपने ही उत्पन्न किये जीवों से डर जाना आश्चर्यजनक व हास्योत्पादक है! इससे यही स्पष्ट होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सर्वव्यापी नहीं, अपितु एकदेशी है। स्वामी जी की इस बात का फादर नेहेम्या गोरे के पास कोई उत्तर नहीं था और उन्होंने मौन साध लिया।
स्वामी दयानन्द के प्रति पादरी गोरे की घृणा सीमातीत थी। तभी तो वह स्वामी को ‘दुष्ट-पापी’ कहने से भी नहीं चूकता। फिर भी पादरी नेहेम्या गोरे ने अपने जीवन काल में ही स्वामी दयानन्द की शिक्षाओं को फलते-फूलते तथा आर्यसमाज के माध्यम से देश व्यापी होते देखा। स्वामी दयानन्द के इस कटु आलोचक को स्वामी की शिक्षाओं की अभूतपूर्व सफलताओं को अन्ततः स्वीकार करना पड़ा। एक अन्य पादरी को लिखे पत्र में पादरी गोरे ने दयानन्द की सफलता रहस्य समझाया है और आग्रा, दिल्ली, अमृतसर आदि नगरों में आर्यसमाजीयों की बढ़ती हुई संख्या का हवाला देकर खेद के साथ लिखा है कि इन नगरों में आर्यसमाज ने ईसाईयों की प्रगती को अवरुद्ध किया है।
पुणे के “पवित्र नाम देवालय” में सन् १८८९ से १८९३ तक नेहेम्या गोरे ने फादर के रूप में अपनी सेवाएँ सौपी थीं। मुम्बई के उमरवाडी स्थित एंग्लिकन चर्च में २९ अक्टूबर १८९५ को उनका ७० वर्ष की अवस्था में निधन हो गया।

19/08/2024

स्वामी श्रद्धानन्दजी की कलम से- रक्षाबन्धन का संदेश
['रक्षाबन्धन' पर्व पर विशेष रूप से प्रकाशित ]
माता का पुत्र पर जो उपकार है उसकी संसार में सीमा नहीं। यही कारण है कि हर समय और हर देश में मातृशक्ति का स्थान अन्य शक्तियों से ऊंचा समझा जाता है। जहां ऐसा नहीं है वहां सभ्यता और मनुष्यता का अभाव समझा जाता है।
जब वह मातृशक्ति ऊंचे स्थान पर रहती है तो वह श्रद्धा और भक्ति की अधिकारिणी होती है। और जब वह बराबरी पर आती है तो बहन के रूप में भाई पर प्रेम और रक्षा के अन्य साधारण अधिकार रखती है। एक सुशिक्षित सभ्य देश में देश की माताएं पूजी जाती हैं, बहनें प्रेम और रक्षा की अधिकारिणी समझी जाती हैं और पुत्रियां भावी माताएं और भावी बहनें होने के कारण उस चिन्ता और सावधानता से शिक्षण पाती हैं, जो बालकों को भी नसीब नहीं होती। यह एक उन्नत और सभ्य जाति के चिन्ह हैं।
भारत के स्वतन्त्र सुन्दर प्राचीन काल में माताओं, बहनों और पुत्रियों का यथायोग्य पूजन रक्षण और शिक्षण होता था। यही कारण था कि भारत की महिलाएं प्रत्युत्तर में पुरुषों को आशीर्वाद देती थीं, उन्हें नाम की अधिकारिणी बनाती थीं, उन्हें अपनी जन्म घुट्टी के साथ वीरता और स्वाधीनता का अमृत पिलाती थीं। उन्हीं पूजा पाई हुई माताओं का आशीर्वाद था जिस कारण भारतवासियों में आत्मसम्मान था। पाण्डव वीर थे, पर यह न भूलना चाहिए कि उन्हें अपना 'पांडव' यह उपनाम उतना प्यारा न था, जितना प्यारा 'कौन्तेय' था। राम का सबसे प्यारा नाम 'कौशल्या नन्दन' है। वे वीर माता के नाम से नाम कमाने को अपमान न समझते थे- उसे अधिक अच्छा समझते थे, और यही कारण था उन पर माताओं का आशीर्वाद फलता था। राजपूतों में स्त्री जाति की रक्षा करना आवश्यक धर्म समझा जाता था। रक्षाबन्धन उसका एक अधूरा शेष है। यह दिन बहिन और भाई देश की अबलाओं और वीर पुरुषों के परस्पर रक्षा-रक्षक सम्बन्ध को दृढ़ करने का दिन है। जब भारत में स्वाधीनता आत्म सम्मान और यश का कुछ भी मूल्य समझा जाता था, तब देश के नवयुवक अपनी देश बहिनों की मानमर्यादा की रक्षा के लिए प्राणों की बलि देने में अपना अहोभाग्य समझते थे।
परन्तु आज क्या दशा है? पाठक यह समझकर विस्मित नहीं हों कि हम सब स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह का रोना लेकर बैठेंगे। यह रोना रोते-रोते आधी सदी बीत गई और अब उसका असर देश के सभी विचारशीलों पर है। हम तो आज अपने पाठकों को केवल यह अनुभव करना चाहते हैं कि स्त्री जाति के प्रति भारतवासियों के जो वर्तमान भाव हैं वह कितने हीन और तुच्छ हैं। यह याद रखना चाहिए कि जो जाति माताओं को इतना हीन और तुच्छ समझती हैं, वह दासता की ही अधिकारिणी है। हमारे हरेक व्यवहार में हमारे शहरों और गांव के हरेक कोने में हमारे असभ्य और सभ्य नागरिकों के मुंह में दिन-रात माताओं और बहनों का नाम लेकर गालियां निकलती हैं। लड़ाई आदमी से, गाली और बेइज्जती मां और बहनों के लिए। यदि किसी दूसरे को बदनाम करना है तो उसका सबसे सरल उपाय उसकी बहिन या लड़की को बदनाम करना समझा जाता है। सामाजिक स्थिति में स्त्रियों को अछूतों से बढ़कर गिना जाता है। हमारी सभा सोसाइटियों के योग्य उन्हें नहीं समझा जाता।
स्त्री जाति पर शत्रु का आक्रमण एक ऐसी घटना हुआ करती थी कि उस पर हमारे वीर पुरुषों के ही नहीं, साधारण लोगों के भी खून उबल पड़ते थे। राम ने रावण को मारा, अपनी स्त्री की रक्षा के लिए। पाण्डवों ने कुरुकुल का संहार किया, द्रौपदी के अपमान का बदला लेने के लिए। राजपूतों में कितने युद्ध केवल महिलाओं के मान रक्षा के लिए हुए और फिर महिलाएं भी अपनी निज बहिन व बेटी नहीं अपितु जाति की। आज हम लोग अपनी माताओं और बहिनों के लिए गन्दी से गन्दी गालियां सुनते हैं और चुप रहते हैं। विदेशी लेखक और समाचार पत्रों और ग्रन्थों में हमारी स्त्री जाति के लिए निरादर सूचक शब्द लिखते हैं और हम उन्हें पढ़कर चुप रहते हैं। इतना ही नहीं, पिछले साल की मार्शलता की घटनाओं को याद कीजिए। एक विदेशी अफसर आता है और भारत पुत्रियों और माताओं को गांव से बाहर बुलाता है, उनका पर्दा अपनी छड़ी से उठाता है, उनपर थूकता है, उन्हें गन्दी गालियां देता है और भारतवासी हैं, जो इस पर प्रस्ताव पास करते हैं। क्या किसी जीवित जाति में स्त्रियों पर ऐसा अत्याचार सहा जा सकता था? क्या किसी जानदार देश में ऐसा अपमान करने वाला व्यक्ति एक मिनट भी रह सकता है? हम पूछते हैं कि क्या राम के समय के क्षत्रिय, क्या भीम और अर्जुन, क्या हम्मीर और सांगा के समय के राजपूत और क्या शिवाजी के मराठे ऐसे जातीय अपमान को क्षणभर भी सहते? क्या भारत की भूमि ऐसे तिरस्कार के पीछे भी शान्त रहती? कभी नहीं, उसमें वह भूडोल आता जिसमें शासकों का दर्प और पापी का पाप चकनाचूर हो जाता। पर हाय! यह आत्मसम्मान का भाव इस अभागे देश में बाकी नहीं रहा। माताओं और बहनों के लिए वह अतुल भक्ति और प्रेम का भाव अब भारतवासियों में नहीं रहा।
रक्षाबन्धन उन्हीं भावों का चिन्ह था। आज भी वह कुछ सन्देश रखता है। आज भी वह अबला की पुकार देशवासियों के कानों में डाल सकता है- पर यदि कोई सुनने वाला हो। जिनके कान हैं वह रक्षाबन्धन के सन्देश को और अबलाओं की पुकार को सुन सकते हैं। यदि वह भी नहीं सुन सकते, तो फिर हे देशवासियों! अपने भविष्य से निराश हो जाओ। तुम्हारे जीने से न कोई भला है और न उसकी आशा है। जिस जाति के पुरुष अपनी माताओं, बहिनों और पुत्रियों के मान की रक्षा नहीं कर सकते, वह जाति इस भूतल से धुल जाने के ही योग्य है।
-श्रद्धा पत्रिका, ३ सितम्बर १९२० से उद्धृत
प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ

16/08/2024

शत शत नमन

16/08/2024

पेरियार की कहानी दलित की जुबानी !

लेखक- अरुण लवानिया

चेन्नई की झुग्गी-झोपड़ी में एक दलित परिवार में जन्मे और वहीं पचीस वर्ष बिताने वाले ऐम वेंकटेशन एक आस्थावान हिंदू हैं। उन्होंने चेन्नई के विवेकानन्द महाविद्यालय से दर्शन शास्त्र में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की है। जब वेंकटेशन ने महाविद्यालय में प्रवेश लिया तो उनके कथनानुसार उन्हें प्रतिदिन पेरियारवादियों के एक ही कथन का लगातार सामना करना पड़ा कि पेरियार एक महान दलित उद्धारक थे। चूंकि उन्हें पेरियार दर्शन का कोई ज्ञान नहीं था, उन्होंने पेरियार से संबंधित समस्त उपलब्ध साहित्य के अध्ययन और शोध करने का संकल्प लिया। इसके लिये उन्होंने पेरियार द्वारा स्थापित, संचालित और संपादित सभी पत्रिकाओं , विदुथालाई, कुडियारासु , द्रविड़नाडु, द्रविड़न, उनके समकालीन सभी नेताओं अन्नादुराई, ऐम पी सिवागन, केएपी विश्वनाथन, जीवानंदम आदि के भाषण और लेख तथा 'पेरियार सुयामरियादि प्रचारनिलयम' द्वारा प्रकाशित उनके समस्त साहित्य पर गहन शोध किया। एक आस्थावान हिंदू होने के कारण पेरियार द्वारा हिंदू देवी देवताओं पर लगाये गये बेबुनियाद आरोपों से आहत होकर पेरियार का सत्य सामने लाने के लिये वेंकटेशन ने एक पुस्तक तमिल में लिखी, 'ई.वी. रामास्वामी नायकरिन मरुपक्कम'(पेरियार का दूसरा चेहरा)।

वेंकटेशन के शब्दों में :

" मैं अपने ईष्ट देवी-देवताओं और हिंदू धर्म पर पेरियार के असभ्य और जंगली विचारों को सहन न कर सका। मुझे जिसने जन्म दिया उस प्रिय और पवित्र मां पर यह हमला था। पेरियार के संपूर्ण साहित्य पर शोध के बाद मुझे तीव्र सांस्कृतिक चोट पहुंची और उनकी हिंदू देवी-देवताओं और मेरे धर्म के प्रति घनघोर घृणा देखकर मैं अत्यधिक दुखी हो गया। पेरियार ने दलितों के लिये कुछ भी नहीं किया बल्कि उन्हें दोयम दर्जे का ही बनाये रखा। अगर पेरियार सौ प्रतिशत ब्राह्मण विरोधी थे तो अस्सी प्रतिशत दलित विरोधी भी थे।"

वेंकटेशन की पुस्तक पेरियार का संपूर्ण शव विच्छेदन करती हुई पेरियार वादियों के गले की हड्डी बन गई है। वेंकटेशन का दावा है कि जो भी सत्य का अन्वेषक है वह इस पुस्तक को पढ़ने के बाद पेरियार को त्याग देगा।

इस पुस्तक का तमिल से अंग्रेज़ी और हिंदी में अनुवाद आज तक ना हो पाने के कारण पेरियार का असली चेहरा देश के सामने प्रकट नहीं हो पाया है। परिणाम स्वरूप पेरियार को दलित उध्दारक बताने और अंबेडकर के साथ जोड़ने का कुचक्र आज भी जारी है।

इन्हीं वेंकटेशन के नीचे दिये यूट्यूब वीडियो के लिंक में 24 मिनट के संबोधन को इस लेख द्वारा हिंदी में प्रस्तुत किया जा रहा है। वेंकटेशन ने पेरियार दलित, राष्ट्र और धर्म विरोधी एजेंडे का बेरहमी से तथ्यों का संदर्भ देकर जो पोस्टमार्टम किया है वो आंखें खोलने वाला है। वेंकटेशन कहते हैं:

" अंग्रेजों ने हमपर शासन प्रारंभ करने के साथ ही यह समझने लिया था कि शायद वो भारत पर स्थाई रूप से शासन करने में असमर्थ होंगे। क्योंकि उनके विरुद्ध निरंतर विद्रोह होने लगा था और इन घटनाओं को लेकर वो बहुत चिंतित थे। उन्होंने मंथन किया कि यदि उन्हें भारत पर अपना शासन चलाये रखना है तो किसी भी तरह विरोध की आग को बुझाना ही होगा। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने विदेश से अनेक विद्वानों को भारत बुलाया। इन विद्वानों को यह पता लगाना था कि किन-किन उपायों और कार्यवाहियों से वो अनंत काल तक शासन कर सकते हैं।यही बात समझने के लिये सारे आयातित गोरे विद्वान देश के विभिन्न राज्यों में गये। एक ऐसे ही गोरे विद्वान के अनुसार :

"यदि हम भारत पर स्थाई रूप से शासन करना चाहते हैं तो हमें इस देश को विभाजित और तोड़ना पड़ेगा। भारत एक स्वाभिमानी राष्ट्र है और हमें सर्वप्रथम भारतियों के स्वाभिमान को नष्ट करना होगा। इस राष्ट्र की नींव हिंदू आध्यात्मिकता है जिसे सर्वप्रथम जड़ से उखाड़ फेंकना है। यदि हम ऐसा करने में असफल रहे तो हम भारत पर लंबे समय तक शासन नहीं कर पायेंगे। इसी हिंदू संस्कृति को हमें अपमानित, हीन और पूरी तरह ध्वस्त करना होगा। हिंदू देवी-देवताओं को लोगों की निगाहों से गिराना होगा। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी भाषा को नीचा साबित करना होगा। हमें यह भी पक्का करना होगा कि भारतीय हमारी इन बातों पर विश्वास भी करने लगे जायें कि उनकी संस्कृति नीच है। इसमें कुछ भी अच्छा नहीं है। इसप्रकार भारतियों को मानसिक रूप से अपना गुलाम बना लेना ही उनपर शासन करने का एकमात्र उपाय है। उपर्युक्त सारी संस्तुतियां
आयातित गोरे विद्वानों के शोध से निकल कर सामने आयीं और अंग्रेजों ने तत्परता से इसपर कार्य करना प्रारंभ कर दिया।

सर्वप्रथम काल्डवेल ने 'ए ग्रामर औफ द्रविड़ियन लैंग्वेजेस' लिखी। साथ ही यह भी लिखा कि सारी भारतीय भाषायें तमिल से ही उपजी हैं और संस्कृत का तमिल से कोई संबंध नहीं है। इसके तुरंत पश्चात् ऐसे ही लेखों कि बाढ़ आने लगी। इसी समय अंग्रेजों ने निर्णय लिया कि भारत को तोड़ने के लिये उन्हें अपने भारतीय समर्थकों के साथ ही उन कतिपय नेताओं की भी आवश्यकता है जो उनकी साजिश को अंजाम दे सकें। इसलिये अंग्रेजों के इशारे पर तत्कालीन मद्रास प्रांत में टी एम नायर, सर पित्ती तेइगरिया आदि ने जस्टिस पार्टी का गठन किया। प्रारंभ में यह गैर राजनीतिक थी परंतु शनै: शनै: राजनीति में शामिल होने लगी। जस्टिस पार्टी ने ही सर्वप्रथम ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण की अवधारणा तमिलनाडु में पैदा की। ऐसी विभाजनकारी अवधारणा तमिलनाडु में इसके पहले अनुपस्थित थी। हमारे अपने ही लोगों के माध्यम से अंग्रेजों ने हमें कदम दर कदम तोड़ना शुरू कर दिया।

1916 में जस्टिस पार्टी की स्थापना हुयी और 1919 में पेरियार राजनीति में आये। इससे पहले इन्हें राजनीति में कोई नहीं जानता था। राजनीति के प्रारंभिक दिनों में वो राष्ट्रभक्त और आध्यात्मिक थे। उन्होंने आर्य और द्रविड़ के विभाजन की अवधारणा को सिरे से नकारा भी। 1919 में एक पत्रिका 'नेशनलिस्ट' में लेख लिखकर आर्य-द्रविड़ विभाजन के सिद्धांत सिरे से नकारते हुये पेरियार ने इसे धोखा बताया। यहां तक कि जब उन्होंने अपनी प्रथम पत्रिका निकाली तो ये लिखा कि वो यह कार्य ईश्वर के दिव्य आशीर्वाद से कर रहे हैं। उन्होंने एक हिंदू संत से अपनी पत्रिका के कार्यालय का उद्घाटन भी करवाया। पेरियार ने जस्टिस पार्टी का विरोध सैद्धांतिक रूप से भी किया और अपने कार्यों से भी। पेरियार और थिरू वी के ने एक संगठन बनाकर जस्टिस पार्टी का तमिलनाडु में विरोध भी किया। फिर अचानक पेरियार ने जस्टिस पार्टी से संबंध बनाने शुरू किये जिसके सभी सदस्य अंग्रेजों के पिट्ठू थे। सच्चाई यह थी कि जस्टिस पार्टी बनाने में अंग्रेजों का ही हाथ था। जस्टिस पार्टी के कारण पेरियार की प्रसिद्धि और प्रचार बढ़ने लगा।

पेरियार तमिलनाडु के सर्वाधिक धनी व्यक्ति थे। उन दिनों जितने भी राष्ट्रीय नेता तमिलनाडु आते थे वो पेरियार के व्यक्तिगत् अतिथि हुआ करते थे। उनका रहना, खाना-पीना सब पेरियार के घर पर ही होता था। पेरियार का परिवार इरोड का एक सम्मानित और संपन्न परिवार था। उनकी नेतृत्व क्षमता का आकलन कर अंग्रेजों ने उन्हें जस्टिस पार्टी में शामिल करने की योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। अंग्रेजों के इशारे पर जस्टिस पार्टी के कर्णधारों ने पेरियार से मिलना जुलना और उनसे संबंध बनाना चालू कर दिया। पेरियार ने भी उनका गर्मजोशी से स्वागत किया और थोड़े ही समय में दोनों के मध्य नज़दीकी संबंध भी बन गये।

तभी कतिपय आर्थिक अनियमितताओं को लेकर पेरियार और कांग्रेस में गहरी दरार पड़ गयी। अधिकतर लोगों को इस बात की जानकारी आज भी नहीं है। दरअसल आंध्रप्रदेश के संस्थानम ने चेरन मां देवी गुरुकुलम को पांच हजार का दान दिया था। पेरियार पर आरोप था कि उसने कांग्रेस के पैसे का दुरपयोग किया। पेरियार ने अपने बचाव में कहा कि यह पैसा उसकी अनुमति लिये बिना दिया गया। इसी आरोप के साथ पेरियार का कांग्रेस के साथ मतभेद गहराता चला गया और उसने 'सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट' की शुरुआत कर दी। इस मूवमेंट के पीछे अंग्रेजों की गहरी साज़िश थी और उनके और जस्टिस पार्टी के अतिरिक्त और किसी ने भी इसका समर्थन तमिलनाडु में नहीं किया। शनै: शनै: पेरियार अंग्रेजों के बौद्धिक प्यादा हो गये। अंग्रेजों के दृष्टिकोण का उन्होंने समर्थन करना शुरु कर दिया।

यदि हम 1927 के पश्चात् पेरियार के दिये हुये भाषणों के देखें तो सब राष्ट्र और हिंदू विरोधी थे। यदि इन भाषणों को गहराई से देखें तो आश्चर्यजनक रूप से ये दलित विरोधी थे। इसका कारण यह है कि गांधी दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिये उस समय सत्याग्रह आंदोलन कर रहे थे। गांधी ने अपील की चूंकि आगम नियमों के मुताबिक शूद्र मंदिर के मंडप तक जा सकते हैं, दलितों को भी मंडप तक जाने का अधिकार है। उनको भी यह अनुमति मिलनी चाहिये पेरियार ने तुरंत इस बात का प्रतिवाद किया कि शूद्र और दलित समान हैं। उस काल में शूद्रों मंडप तक जा सकते थे। पेरियार ने कभी यह नहीं कहा कि मंदिर प्रवेश के लिये सभी वर्णों को समान अधिकार है। वो शूद्रों को चौथा वर्ण मानते थे और दलित को पांचवां जो मंदिर प्रवेश के अधिकारी नहीं है। उन्होंने मरते दम तक यह माना कि शूद्र और दलित अलग-अलग है। इस बात को उन्होंने सार्वजनिक मंचों से कई बार बिना किसी शर्म के कहा भी।

तभी चेतन मां देवी गुरुकुलम में हुयी एक घटना ने पूरे तमिलनाडु को झकझोर दिया। हुआ यह कि वी वी एस अय्यर ने विशेष रूप से पकाये भोजन को गुरुकुल के दो ब्राह्मण विद्यार्थियों को ही दिया। यह घटना तमिलनाडु में बड़ा मुद्दा बन गयी। तुरंत इसका बहाना खड़ा कर सर्वप्रथम पेरियार ने ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण का हौआ राज्य में खड़ा करना शुरू किया। यहीं से उसकी ब्राह्मण और गैर ब्राह्मण की राजनीति की नींव पड़ी। इस मुद्दे के समाधान और सभी को समान अधिकार देने के लिये एक राष्ट्रवादी कांग्रेसी गावियकंद गणपथि सास्त्रुगल अय्यर सामने आये। उन्होंने कहा कि यद्यपि गुरुकुल में एक भी दलित विद्यार्थी नहीं है फिर भी एक दलित को गुरुकुल का बावर्ची नियुक्त किया जाये। जिसके हाथों से पकाया भोजन सभी विद्यार्थी खायें। यही सामाजिक न्याय का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण होगा। अय्यर संस्कृत के उत्कृष्ट विद्वान भी थे। लेकिन सामाजिक न्याय के योद्धा पेरियार ने कहा कि वो इस सुझाव को कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने प्रश्न खड़े किये कि कैसे दलित का पकाया भोजन शूद्रों खा सकता है। यह उनकी दलित विरोधी मानसिकता थी जिसका पालन उन्होंने आजीवन किया। हास्यास्पद रूप से आज भी पेरियार को दलितों का मसीहा बताकर लोगों को बरगलाया जाता है। यह झूठ का पुलिंदा मात्र है।

अपने दलित विरोधी विचारों के साथ ही उन्हें अब यह लगा कि हिंदुत्व का विनाश कर ही राष्ट्र को तोड़ा जा सकता है। इसके लिये जो रणनीति उसने बनायी उसमें प्रथम था रामायण को गालियां देना। रामायण को नीचा साबित करने के लिये अनेक पुस्तकें लिखी गयीं। महाभारत को भी नहीं बख्शा गया। हम सभी महान संत और कवि कंब से परिचित हैं जिन्होंने कंब रामायण लिखी थी। पेरियार ने एक पुस्तक 'कंब रस्म' लिखकर रामायण को बेहद अश्लील तरीके से प्रस्तुत किया। नीचता की पराकाष्ठा कर उसने संत कवि कंब, भगवान राम और देवी सीता को जी भर गालियां दीं।

पेरियार के इस कदम का शैव मतावलंबियों ने तालियां बजाकर स्वागत् और समर्थन किया क्योंकि पेरियार वैष्णव मत वालों पर हमला कर रहा था। शैव मठों के प्रमुख महंतों ने, जिसमे कुंद्राकुडी अडिगल भी सम्मिलित थे, इसी कारण पेरियार का समर्थन किया। यही स्थिति थी उस समय तमिलनाडु में। लेकिन कुछ समय पश्चात् जब पेरियार ने तमिल शैव 'पेरिया पुराणम्' पर भी हमला बोला तब शैवों को पेरियार की असल साजिश का एहसास हुआ। फलस्वरूप सभी मतावलंबी एकजुट होकर पेरियार के विरोध में आ गये। एक-एक कर सभी हिंदू ग्रंथ पेरियार के निशाने पर आने लगे। यहां तक कि उसने तिरुक्कुरल को भी हर संभव गालियां देनी प्रारंभ कर दी। पेरियार के शब्दों में तिरुक्कुरल "सोने की थाली में परोसी गयी मानव विष्ठा है।"

प्राचीन तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम के रचनाकार इलांगो अडिगल, तोल्कापियर आदि जितने महापुरुष, जिनको तमिल हिंदू हृदय से पूजते थे, उन सभी को पेरियार अपमानित करने लगा। पेरियार की इस साज़िश के पीछे एकमात्र कारण यह था कि इन महापुरुषों और इनके द्वारा रचित सभी ग्रंथों से हिंदू, जिन्हें वो पवित्र मानते हैं, गुमराह होकर इनसे घृणा करने लगें और इनसे विमुख हो जायें। पेरियार का शातिर दिमाग यह जानता था किसी भी व्यक्ति को उसकी संस्कृति से काट कर ही उसे किसी विदेशी संस्कृति को अपनाने के लिये सहजता से तैयार किया जा सकता है। यही उसका एकमात्र ध्येय भी था।

इसके बाद उसने राम के पुतले का दहन किया। विनयागर (गणेश) मूर्ति को सलेम जिले में जनता के मध्य तोड़ा।पेरियार की कहने पर उसके गुंडों ने हर तरह के अत्याचार हिंदू मान्यताओं पर करना शुरू किया। किसी ने भी उसका विरोध नहीं किया। विनयागर मूर्ति तोड़ने के मामले पर सलेम जिले में हिंदुओं की धार्मिक आस्था आहत करने का मुकदमा पेरियार के संगठन द्रविड़ कड़गम पर दर्ज भी हुआ। अदालत में न्यायाधीश की टिप्पणी थी कि यदि मूर्ति तोड़ने से वास्तव में किसी की भावना आहत हुयी है तो कम से कम किसी एक ने तो इसपर मौके पर या बाद में अपनी प्रतिक्रया दी होती। चूंकि किसी ने भी विरोध नहीं किया तो इसका अर्थ है कि किसी को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी और सबने इस कार्य को स्वीकार किया।

उस समय सभी मौन थे। पेरियार की सभी हरकतों को हमने अपनी नियति मान ली थी। किसी ने भी विरोध में चूं तक नहीं की। एक ओर हमारा हिंदू धर्म था और दूसरी ओर हमारी भाषा जिसे हम देवी के रूप में पूजते थे। उसने संस्कृत और तमिल को बांट दिया। दलितों के दिमाग में यह बात ठूंस दी कि संस्कृत विदेशी भाषा है और दलितों और संस्कृत का कोई नाता नहीं है। लेकिन भला ऐसा कैसे संभव है ? दलितों और संस्कृत के मध्य सदा से गहरा और निकट का नाता रहा है। वाल्मीकि जी और व्यास ने संस्कृत में लिखा। किसने उन्हें संस्कृत पढ़ाई ? संस्कृत ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी जाता रहा। दलितों की एक उपजाति है वल्लुवर जो आज की तारीख तक हिंदू पंचांग संस्कृत में लिखते हैं। क्या कोई बिना संस्कृत ज्ञान के पंचांग लिख सकता है ? ध्यान देने की बात है कि आज भी वल्लुवरों को कोई ब्राह्मण संस्कृत नहीं पढ़ाता है। डा. अंबेडकर ने कहा था कि यदि कोई भाषा संपूर्ण राष्ट्र की साझा भाषा हो सकती है तो वो केवल संस्कृत ही है। ऐसा उन्होंने संविधान सभा की चर्चा के मध्य संसद में कहा था। सिलापथिकरम कोवलन संस्कृत के विद्वान थे। वो संस्कृत सहजता से बोला भी करते थे। एकबार किसी राहगीर ने उनसे संस्कृत भाषा में लिखा कोई पता पूछा तो उन्होंने संस्कृत पढ़कर उसे उत्तर दिया। कोवलन वनिबा चेट्टियार थे जो एक वैश्य उपजाति है। यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत आमजन की भाषा भी थी। हर व्यक्ति के हृदय में संस्कृत के लिये भक्तिभाव था। अत: पेरियार के लिये यह आवश्यक था कि अपने कुटिल उद्देश्य की पूर्ति हेतु संस्कृत के प्रति आम जनता के भक्तिभाव को कैसे भी हो तोड़ा और नष्ट किया जाये।

तमिलनाडु में दलित और अन्य जातियां सदा से मिलजुल कर रहा करती थीं। पेरियार इसी आपसी सद्भाव को तोड़कर समाज को दलित और गैर दलित में बांटने की साज़िश रच रहा था। इस साज़िश के तहत उसने योजनाबद्ध तरीके से यह घोषणा की कि समस्त जातिगत् झगड़े ब्राह्मणों के कारण ही हैं। तमिलनाडु के अनेक गांवों में जहां एक भी ब्राह्मण नहीं आबाद था वहां जातिगत् झगड़े और हिंसा हुआ करते थे। पेरियार ने इन सभी के लिये ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहराता था। आज भी तमिलनाडु में ऐसा ही होता है। मुडुकुलथुर दंगे तमिलनाडु की मझोली जातियों के समूह मुक्कलदोर और देवेन्द्र कुला वेल्लार दलितों के बीच ही हुये थे। इस दंगे में दो व्यक्ति मारे गये थे। एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इन दंगों को लेकर कहा :

" तुम जातियों का विनाश चाहते हो या नहीं ! मन बना लो। फांसी की रस्सी के लिये तैयार रहो। सभी युवा खून से हस्ताक्षर कर इस बारे में घोषणा करें कि वो गांधी की मूर्तियों तोड़ेंगे और ब्राह्मणों को मारेंगे।"

जबकि मुडुकुलथुर और ब्राह्मणों के बीच कोई संबंध ही नहीं था। साथ ही पेरियार ने यह भी कहा कि सभी प्रकार की जातिगत् झगड़े ब्राह्मणों के कारण हैं।

पेरियार ने एक हजार से भी अधिक निबंध और लेख लिखे हैं। अस्सी प्रतिशत से अधिक अपने लेखों में उसने सभी स्थानों में सभी प्रकार की समस्याओं का कारण केवल ब्राह्मणों को ही बताया है।

वर्ष 1962 में किलवेनमनि दंगों में नायडू जाति वालों ने 44 दलितों को जिंदा जला कर मार डाला था। इस पूरे क्षेत्र में एक भी ब्राह्मण नहीं रहता था। यहां भी पेरियार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दंगों के लिये ब्राह्मणों को दोषी मानते हुये मांग की:

" जातियों को तोड़ने के लिये ब्राह्मणों का समूल नाश कर दिया जाये। "

भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। जो भी इस दिव्य राष्ट्र और हिंदुत्व की रक्षा करता है उसे हम उच्च पायदान पर रख कर उसको एक संत के समान पूजते हैं। यदि कोई भगवान वस्त्र धारण करता है तो हम उसका सम्मान करते हैं। हमारे हृदय में ब्राह्मणों के लिये सदा से सम्मान इसलिये रहा है क्योंकि वो भौतिक जीवन का त्याग कर राष्ट्रीय के लिये ही जीते रहे हैं। कुंज वृत्ति ! अर्थात् ब्राह्मणों द्वारा खेतों में गिरे अन्य के दानों को चुनकर उन्हें पकाकर खाना। यही वो ब्राह्मण थे जिनका तमिलनाडु में सभी समुदाय सदा से सम्मान करते थे। ब्राह्मणों की यही प्रतिष्ठा धूमिल और नष्ट करना पेरियार के जीवन का एक बड़ा लक्ष्य था। इसके लिये पेरियार ने समाज की सभी समस्याओं के लिये ब्राह्मणों को दोषी ठहराना प्रारंभ किया। वह और उसके लोग बहुत धूर्तता से इस साज़िश को मूर्तरूप देने लगे। अंततोगत्वा तमिलनाडु के निर्दोष ब्राह्मण पेरियार की कुटिल चाल की भेंट चढ़ ही गये। वह अपनी चाल में सफल हो गया।

तत्पश्चात् पेरियार ने वर्ष 1944 में एक प्रस्ताव पारित किया:

" अंग्रेजों को भारत छोड़कर वापस नहीं जाना चाहिये। लेकिन यदि ऐसा करना ही पड़े तो वो भारत के सभी राज्यों को आजादी दे दें। बस तमिलनाडु ही अंग्रेजों के राज्य के अधीन रहे।"

इस प्रस्ताव के सामने आते ही तमिलनाडु की जनता की आंखें खुलीं और उन्हें एहसास हुआ कि पेरियार और उसके संगठन द्रविड़ कड़गम और जस्टिस पार्टी के समस्त कार्यकलापों के पीछे अंग्रेजी राज का ही हाथ है। ये दोनों संगठन ब्रिटिश राज की ही उपज थे।"

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