13/04/2016
कभी आपने किसी बुद्धिजीवी को यह कहते सुना है-आज हजार रुपए मल्टीप्लेक्स में फूँकने के बजाए गरीब बच्चों को खाना खिला दिया - मन को फ़िल्म देखने से ज्यादा ख़ुशी हुई? या किसी प्रगतिशील महिला से यह सुना है -आज सैकड़ों खर्च कर ब्यूटी पार्लर जाने की बजाए गरीब बच्चों के लिए कपड़े ख़रीदे तो चेहरे की सुंदरता खुद ब खुद बढ़ गयी? या आज एक घण्टे गॉसिप करने की बजाए बुजुर्गों की सेवा की तो तन मन में अधिक स्फूर्ति महसूस हुई?
निस्सन्देह नहीं सुना होगा! पर इन्हीं डेढ़ श्यानों से अक्सर सुना होगा आज नवरात्रि की पूजा करने की जगह गरीब बच्चों को खाना खिलाया; आज दीवाली की पूजा की जगह गरीबों के लिए ये किया ..वो किया..आदि आदि। पूजा करने से अधिक ख़ुशी मिली।
जब आप फ़िल्म देखने की जगह समाजसेवा नहीं करते, जब आप महंगे रेस्टॉरेंट में बर्गर पिज्जा खाने की जगह समाजसेवा नहीं करते, जब आप घण्टों गॉसिप चैट या पार्लर की जगह समाजसेवा नहीं करते तब आप सिर्फ पूजा पाठ की जगह समाजसेवा का दिखावा कर क्या साबित करना चाहते हैं? पूजा-पाठ, व्रत-जप आपके वश की बात या आपकी श्रद्धा का विषय नहीं; न कीजिए कोई बात नहीं।पर मैंने पूजा की बजाए..फलाना किया ढिकाना किया...यह पाखण्ड बन्द कीजिए।यदि गरीबों को खाना खिलाना आपके फ़िल्म, पार्लर, चैट, गॉसिप, पिज्जा-बर्गर,क्लब-पार्टी का विकल्प नहीं हो सकता तो यह पूजा पाठ का विकल्प कैसे हो सकता है?
यदि करना चाहें तो व्रत-पूजा करके भी आप गरीबों को खाना खिला सकते हैं, कपड़े, जूते-चप्पल दे सकते हैं।यदि नहीं करते,तब भी दोनों अलग अलग कृत्य है जैसे पानी खाना का विकल्प नहीं हो सकता या खाना पानी का विकल्प नहीं वैसे ही पूजा और समाजसेवा भी एक दूसरे के पूरक हैं विकल्प नहीं।इन्हें विकल्प के तौर पर प्रस्तुत मत कीजिए।
फेक बुद्धिजीवियों के दुष्प्रभाव में न आएँ।
हर्षोल्लाष से नवरात्रि की पूजा करें।
समाजसेवा का कोई ड्रामा इसका विकल्प नहीं।
!!!नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!