सन्देश भास्कर

सन्देश भास्कर The purpose of our life as a Hindu/Sanatani is to achieve four aims, called Purusharthas . These are Dharma, Karma, Artha and Moksha.

These provide us opportunities to act morally and ethically and lead a good life.

24/11/2025

*संदेश*भास्कर*
🙏सोच 🙏
एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- *"मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।"*
यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।
अगले दिन, *मंत्री* उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण0 नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। *अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाए। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।*
अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद *दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।*
बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।
जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि *चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये।* राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।
*जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।*
यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।
*"कर्म क्या है?"*
*"हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ.।"*
*हमारे सोच विचारों से ही हमारे कर्म बनते हैं।* दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। *अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाए। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।*
अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद *दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।*
बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।
जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि *चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये।* राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।
*जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।*
यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।
*"कर्म क्या है?"*
*"हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ.।"*
*हमारे सोच विचारों से ही हमारे कर्म बनते हैं।*
*जय श्री राम*

17/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*🔥अंधे संत का अटूट विश्वास”💐*
ऋषिकेश की पावन नगरी, जहाँ गंगा की कलकल ध्वनि आकाश तक गूंजती है,
वहीं एक संत निवास करते थे — जन्म से नेत्रहीन, परंतु आत्मा से ज्योतिर्मय।
उनका एक नियम था — प्रत्येक संध्या वे गगनचुंबी पर्वतों की ओर प्रस्थान करते,
गंगा तट से ऊपर चढ़ते हुए “हरी नाम” का मधुर संकीर्तन करते।
उनके एक शिष्य ने एक दिन विनम्रता से पूछा —
“गुरुदेव! आप प्रतिदिन इतने ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर जाते हैं,
जहाँ गहरी खाइयाँ हैं, पथरीले मार्ग हैं,
और आपको नेत्रों से कुछ भी दिखाई नहीं देता।
क्या आपको भय नहीं होता?
यदि कहीं पैर फिसल गया तो?”
संत मुस्कराए, मौन रह गए।
संध्या का समय हुआ, उन्होंने शिष्य को साथ लिया।
दोनों पर्वतों की ओर चल पड़े।
रास्ते में संत ने कहा —
“बेटा! जब कोई गहरी खाई दिखे, तो मुझे बताना।”
कुछ दूर चलने पर शिष्य ने पुकारा —
“बाबा! आगे गहरी खाई है!”
संत ने शांत स्वर में कहा —
“तो अब मुझे इस खाई में धक्का दे दे।”
शिष्य चौंक गया।
उसके होश उड़ गए, बोला —
“बाबा! यह मैं कभी नहीं कर सकता।
आप मेरे गुरुदेव हैं,
मैं तो अपने शत्रु को भी इस खाई में नहीं धकेल सकता।”
संत ने दृढ़ स्वर में कहा —
“यह मेरी आज्ञा है।
यदि तुमने इसका उल्लंघन किया,
तो नर्क के भागी बनोगे।”
शिष्य के नेत्र भर आए।
उसने कहा —
“गुरुदेव! मैं नर्क भोग लूंगा,
पर आपको इस खाई में नहीं गिरा सकता।”
तब संत मुस्कराए, बोले —
“अरे नादान बालक!
जब तुझ जैसा एक साधारण मनुष्य मुझे खाई में नहीं धकेल सकता,
तो सोच, मेरा स्वामी, मेरा सच्चा मालिक —
वह परमेश्वर — भला कैसे मुझे गिरने देगा?
उसे तो गिरे हुओं को उठाना आता है,
भटके हुओं को राह दिखाना आता है।
वह अपने भक्त को कभी नहीं गिरने देता,
बस हमें उस पर विश्वास रखना चाहिए।”
शिष्य के नेत्रों से आँसू झरने लगे,
और हृदय में एक दिव्य प्रकाश भर गया।
उसने गुरु के चरणों में सिर झुका दिया —
“बाबा! आज मैंने जाना कि आस्था ही सच्ची आँख है,
और विश्वास ही जीवन का सबसे बड़ा बल।”
गंगा के प्रवाह में उस दिन जैसे स्वयं प्रभु मुस्करा उठे —
पर्वतों में गूंज उठा “हरी नाम संकीर्तन”,
और आकाश ने भी कहा
*“जिसका विश्वास अडिग है, उसे कोई खाई नहीं गिरा सकती।”*
*जय श्री राम*

17/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*राजद की हार एक समीक्षा*
*लालू यादव ने महाकुंभ को फालतू बोला*
राम मंदिर का दर्शन करने लालू का परिवार एक बार भी नहीं गया
सावन के महीने में हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए राहुल गांधी के साथ चंपारण मटन बनाया
फिर एक बार नवरात्रि के टाइम में हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए तेजस्वी यादव ने मछली खाकर हिंदुओं को खूब चिढ़ाया
फिर उनके मंच से अंबानी को गालियां दी जाती रही लेकिन अंबानी के घर पत्तल चाटने लालू का परिवार पहुंचा
फिर बिहार का सबसे बड़ा लोक पर्व छठ आया प्रतिवर्ष लालू के घर धूमधाम से मनाया जाने वाला छठ इस बार कैथोलिक क्रिश्चियन बहू की वजह से नहीं मनाया गया
फिर कैथोलिक क्रिश्चियन का त्योहार हेलोवीन आया और बिहार के लोग यह देखकर चौंक उठे कि जिस लालू यादव को महाकुंभ फालतू लग रहा था छठ फालतू लग रहा था वही लालू का पूरा परिवार क्रिश्चियन त्यौहार हेलोवीन मना रहा है
लालू यादव भूत बनकर हूं हु हु भु भु करके बच्चों को डरा रहे हैं लालू के परिवार के बच्चे भूत बने हैं
कहीं ना कहीं राजद के हर में यह भी एक प्रमुख कारण रहा
गलती ना SIR में है ना चुनाव आयोग में है ना मतदाता सूची में है ना ईवीएम में है
तुम हिंदुओं से नफरत करोगे हिंदू त्योहारों को महाकुंभ को फालतू बोलोगे बिहार में रहकर छठ नहीं मनाओगे क्रिश्चियन त्यौहार हेलोवीन बनाओगे
तो तुमको बिहार की जनता वोट देगी बे ??
जो बूढ़ापा लालू और मुलायम ने देखा वो शानदार है, वैसे तो ये बूढ़ापा ईश्वर दुश्मन को भी ना दिखाए लेकिन हजारों जिंदगी उजाड़ने वाले इन दो के लिए तो बनता है, ये समाज के उन बुजुर्गो के लिए भी है जो अगली पीढ़ी को विरासत मे दौलत के साथ नफ़रत भी दे रहे है।
जिस रोहिणी आचार्य के लिए लालू ने टाटा मेडिकल वाली हेराफेरी की, जिसकी शादी के लिए पूरे पटना के शोरूम और ज्वेलर्स को लूटवा दिया, आज वही रोहिणी आचार्य उसे दुत्कार चली गयी वो भी ऐसे समय ज़ब उसकी पूरी साख बिखर चुकी है। वैसे लालू रोहिणी की ही एक किडनी पर जिन्दा है।
ऐसा कहा जाता है लालू ज़ब छोटा था तो पढ़ना चाहता था, पड़ोसी भूमिहारो से जाति का दंश सहता बढ़ा हुआ था। राजनीति मे आया तो इंदिरा गाँधी का धुर विरोधी था उसी चक्कऱ मे जेल भी गया, फिर जेल से लौटा, उलटफेर मे मुख्यमंत्री बना।
लालू के जंगलराज पर विस्तार से लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है, कुछ ऐसा ही मुलायम के साथ था। ज़ब दोनों की अर्थी पास आयी तो जिन बच्चों के लिए पूरी दुनिया का विषपान किया उन्ही बच्चों ने ठोकर मार दी। राम मंदिर के कंटको को राम जैसी संतान तो मिलनी भी नहीं थी।
लालू मुलायम दोनों ने एक बात हमेशा कही कि वे शोषित वर्ग से है, उन्होंने बहुत कुछ खुद झेला है। लेकिन ऐसा सच मे था तो ईश्वर द्वारा दिये मौके को क्यों नहीं भुनाया।
भगवान परशुराम के माता पिता की भी हत्या की गयी थी, भगवान महावीर का भी लोगो ने अपमान किया था। मगर एक ने सशक्तिकरण से समाज को मुक्त किया तो दूसरे ने वचनो से। भगवान तक ना भी जाए तो अकेले बिहार मे कर्पूरी ठाकुर जैसा उदाहरण था।
जरूरी नहीं कि सामाजिक नफ़रत का उत्तर नफ़रत से ही दिया जाए, लालू और मुलायम के पास मौका था चाहते तो पिछडो की शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ करते। पिछडो के लिए गाँवों मे ही अच्छे विद्यालय खोलते, उच्च शिक्षा का प्रबंध करते। दलित पढ़ लिख जाते तो कभी मज़ाक ना बनता।
लेकिन इसके विपरीत लालू मुलायम ने गुंडाराज चुना, गुंडों का विकास किया और उन गुंडों ने बिना जाति देखे नरसंहार किये। सवर्ण हाशिये पर आया और दलित जो पहले से हाशिये पर था वह जमीन मे धंस गया।
ऐसी ही पिछडी जाति से नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह भी आते थे, हो सकता है बचपन मे थोड़ा बहुत सहन किया हो मगर ज़ब भगवान ने शासन की संभावना दी तो नफ़रत नहीं परोसी बल्कि हर वर्ग को उपकृत किया, इसलिए आज एक प्रधानमंत्री तो दूसरा क़ृषि मंत्री है।
जबकि लालू के नाम से जनता को आज भी डराया जा रहा है, मुलायम एक मामले मे ठीक थे कि मृत्युपूर्व उन्होंने अपनी अंतर्रात्मा की सुनी। मौका 2019 चुनाव से पहले हुए सत्र का था, अपने बेटे अखिलेश द्वारा मंच पर जलील होने से मुलायम शोकग्रस्त थे।
मुलायम ने तब अपने भाषण मे प्रधानमंत्री की ओर मुंह करके कहा था कि भगवान करे आप दोबारा प्रधानमंत्री बने। एक टीस थी इस बयान के पीछे, जाते जाते एहसास हो रहा था कि जीवन मे जो किया वो गलत है और यही समय था कि डूबने से पहले लकड़ी पकड़ ली जाए। मुलायम अपने अंतिम दिनों मे सरकार को मौन समर्थन देने लगे थे।
लेकिन इसके विपरीत लालू का अहंकार आज भी ज्यो का त्यों है, लालू को आज भी खुशफहमी है कि उसका जंगलराज एक महान शासन था। हालांकि चित्रगुप्त जी कर्मो का लेखा जोखा करते है खुशफहमियों का नहीं, ईश्वर से प्रार्थना है लालू जीवित रहे और अपनी आँखों के सामने वो सब बर्बादी देखे जो उसकी वजह से हजारों घरो की हुई है।
मौत से पहले लालू पूरी तरह अपने उन सभी दुष्कर्मो, हत्याओं और अपहरणो को याद करें। कर्म कोई बांधकर नहीं ले जा सकता, सारा लेखा जोखा इसी सृष्टि मे होना है।
*जय श्री राम*

16/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*हरि मिलन*
सबरी को आश्रम सौंपकर महर्षी मतंग जब देवलोक जाने लगे तब सबरी भी साथ जाने की जिद करने लगी।
सबरी की उम्र दस वर्ष थी। वो महर्षि मतंग का हाथ पकड़ रोने लगी
महर्षि सबरी को रोते देख व्याकुल हो उठे! सबरी को समझाया "पुत्री इस आश्रम में भगवान आएंगे यहां प्रतीक्षा करो!"
अबोध सबरी इतना अवश्य जानती थी कि गुरु का वाक्य सत्य होकर रहेगा! उसने फिर पूछा "कब आएंगे?
महर्षि मतंग त्रिकालदर्शी थे वे भूत भविष्य सब जानते थे वे ब्रह्मर्षि थे।
महर्षि सबरी के आगे घुटनों के बल बैठ गए, सबरी को नमन किया
आसपास उपस्थित सभी ऋषिगण असमंजस में डूब गए, ये उलट कैसे हुआ! गुरु यहां शिष्य को नमन करे! ये कैसे हुआ?
महर्षि के तेज के आगे कोई बोल न सका!
महर्षि मतंग बोले "पुत्री अभी उनका जन्म नही हुआ!"
अभी दसरथजी का लग्न भी नही हुआ! उनका कौशल्या से विवाह होगा! फिर भगवान की लम्बी प्रतीक्षा होगी फिर दसरथजी का विवाह सुमित्रा से होगा ! फिर प्रतीक्षा! फिर उनका विवाह कैकई से होगा फिर प्रतीक्षा! फिर वो जन्म लेंगे! फिर उनका विवाह माता जानकी से होगा! फिर उन्हें 14 वर्ष वनवास होगा और फिर वनवास के आखिरी वर्ष माता जानकी का हरण होगा तब उनकी खोज में वे यहां आएंगे! तुम उन्हें कहना "आप सुग्रीव से मित्रता कीजिये उसे आतताई बाली के संताप से मुक्त कीजिये आपका अभिष्ट सिद्ध होगा! और आप रावण पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे!"
सबरी एक क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई! अबोध सबरी इतनी लंबी प्रतीक्षा के समय को माप भी नही पाई!
वह फिर अधीर होकर पूछने लगी "इतनी लम्बी प्रतीक्षा कैसे पूरी होगी गुरुदेव!"
महर्षि मतंग बोले " वे ईश्वर हैं अवश्य ही आएंगे! यह भावी निश्चित हैं"
लेकिन यदि उनकी इच्छा हुई तो काल दर्शन के इस विज्ञान को परे रखकर वे कभी भी आ सकते हैं! लेकिन आएंगे अवश्य"
जन्म मरण से परे उन्हें जब जरूरत हुई तो प्रह्लाद के लिए खम्बे से भी निकल आये थे! इसलिए प्रतीक्षा करना ! वे कभी भी आ सकते हैं!
तीनों काल तुम्हारे गुरु के रूप में मुझे याद रखेंगे! शायद यही मेरे तप का फल हैं ।
सबरी गुरु के आदेश को मान वहीं आश्रम में रुक गई
उसे हर दिन प्रभु श्रीराम की प्रतीक्षा रहती थी । वह जानती थी समय का चक्र उनकी उंगली पर नाचता हैं वे कभी भी आ सकतें हैं
हर रोज रास्ते मे फूल बिछाती हर क्षण प्रतीक्षा करती!
कभी भी आ सकतें हैं
हर तरफ फूल बिछाकर हर क्षण प्रतीक्षा! सबरी बूढ़ी हो गई !!
लेकिन प्रतीक्षा उसी अबोध चित्त से करती रही
और एक दिन उसके बिछाए फूलों पर प्रभु श्रीराम के चरण पड़े!
सबरी का कंठ अवरुद्ध हो गया!
आंखों से अश्रुओं की धारा फूट पड़ी!
गुरु का कथन सत्य हुआ! भगवान उसके घर आ गए!
सबरी की प्रतीक्षा का फल ये रहा कि जिन राम को कभी तीनों माताओं ने जूठा नही खिलाया उन्ही राम ने सबरी का जूठा खाया!
*जय श्री राम*

13/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*अहंकार"*
बहुत समय पहले की बात है| एक गाँव में एक मूर्तिकार ( मूर्ति बनाने वाला ) रहता था| वह ऐसी मूर्तियाँ बनता था, जिन्हें देख कर हर किसी को मूर्तियों के जीवित होने का भ्रम हो जाता था ! आस-पास के सभी गाँव में उसकी प्रसिद्धि थी, लोग उसकी मूर्तिकला के कायल थे ! इसीलिए उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था|
जीवन के सफ़र में एक वक़्त एसा भी आया जब उसे लगने लगा की अब उसकी मृत्यु होने वाली है, वह ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगा ! उसे जब लगा की जल्दी ही उसकी मृत्यु होने वाली है तो वह परेशानी में पड़ गया ! यमदूतों को भ्रमित करने के लिए उसने एक योजना बनाई ! उसने हुबहू अपने जैसी दस मूर्तियाँ बनाई और खुद उन मूर्तियों के बीच जा कर बैठ गया !
यमदूत जब उसे लेने आए तो एक जैसी ग्यारह आकृतियों को देखकर दंग रह गए| वे पहचान नहीं कर पा रहे थे की उन मूर्तियों में से असली मनुष्य कौन है ! वे सोचने लगे अब क्या किया जाए ! अगर मूर्तिकार के प्राण नहीं ले सके तो सृष्टि का नियम टूट जाएगा और सत्य परखने के लिए मूर्तियों को तोड़ा गया तो कला का अपमान हो जाएगा ! अचानक एक यमदूत को मानव स्वाभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार को परखने का विचार आया| उसने मूर्तियों को देखते हुए कहा, “कितनी सुन्दर मूर्तियाँ बने है।
लेकिन मूर्तियों में एक त्रुटी है ! काश मूर्ति बनाने वाला मेरे सामने होता, तो मैं उसे बताता मूर्ति बनाने में क्या गलती हुई है” यह सुनकर मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा, उसने सोचा “मैंने अपना पूरा जीवन मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया भला मेरी मूर्तियों में क्या गलती हो सकती है” वह बोल उठा “कैसी त्रुटी”… झट से यमदूत ने उसे पकड़ लिया और कहा “बस यही गलती कर गए तुम अपने अहंकार में, कि बेजान मूर्तियाँ बोला नहीं करती”…!!
अभिप्राय.....✍️
कहानी का तर्क यही है, कि “इतिहास गवाह है, अहंकार ने हमेशा इन्सान को परेशानी और दुःख के सिवा कुछ नहीं दिया” !!
*जय श्री राम*

12/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*जहां स्वार्थ होगा वहां दुख भी होगा..*
पुराने समय में एक व्यक्ति बहुत गरीब था। उसके पास कुछ भी नहीं था। दुखी रहता था। वह एक दिन गांव के विद्वान संत के पास गया और अपनी सारी परेशानियां बता दीं। संत को उस पर दया आ गई और उन्होंने गरीब को पारसमणी दे दी। संत ने कहा कि इससे तुम जितना चाहे उतना सोना बना लो। तुम्हारी गरीबी हमेशा के लिए दूर हो जाएगी।
पारस पत्थर से गरीब व्यक्ति ने बहुत सारा सोना बना लिया। अब वो धनवान हो गया। उसके पास सुख-सुविधा की हर चीज थी। अपार धन था। फिर भी वह दुखी रहने लगा। अब उसे अपने धन की चिंता लगी रहती थी। उसे चोरों का डर सताता, राजा का डर लगा रहता। इतना धन होने के बाद भी उसके जीवन में सुख-चैन नहीं था। एक दिन वह फिर से उसी संत के पहुंचा।
संत ने उससे कहा कि अब तो तुम्हारी गरीबी दूर हो गई है, तुम्हारे पास सब कुछ है। उस व्यक्ति ने कहा कि महाराज मेरे पास धन तो बहुत है, लेकिन मेरे जीवन में शांति नहीं है। आप कोई ऐसा उपाय बता दें, जिससे मेरा मन शांत हो जाए और मेरा सारा डर खत्म हो जाए। संत ने कहा कि ठीक है, वह मणी मुझे वापस दे दो। इसके लिए व्यक्ति ने मना कर दिया, उसने कहा कि महाराज मैं पारस पत्थर नहीं दे सकता, अब मैं फिर से गरीब नहीं बनना चाहता। आप मुझे कोई ऐसा सुख दीजिए जो अमीरी और गरीबी में बराबर मिलता रहे और मृत्यु के समय भी कम न हो।
संत ने कहा कि ऐसा सुख तो भगवान की निस्वार्थ भक्ति में ही मिल सकता है। जो लोग बिना किसी स्वार्थ के भक्ति करते हैं, वे अमीरी-गरीबी और मृत्यु के समय, हर हाल सुखी रहते हैं। जहां किसी भी तरह का स्वार्थ रहता है, वहां दुख हमेशा रहता है। दुखों से मुक्ति चाहते हैं तो भगवान का ध्यान करें, लेकिन बिना किसी स्वार्थ के।
*जय श्री राम*

11/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*🚩ब्राम्हण ही क्यों❓🚩*
"रावण को सीता का हरण करना था, उसने वेष बनाया ब्राह्मण का।"
"हनुमानजी को राम का भेद लेना था,उन्होंने वेष बनाया ब्राह्मण का।"
"कालनेमी ने हनुमानजी को उनके मार्ग से भटकाने की कोशिश की, उसने वेष बनाया ब्राह्मण का।"
"कर्ण को परशुराम जी से धनुर्वेद का ज्ञान लेना था, वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"श्रीकृष्ण को कर्ण को छलना था,वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"श्रीकृष्ण सहित भीमादि पांडवों को छल से जरासंध का वध करना था, वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"वरुण को राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेनी थी, वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"विश्वामित्र को राजा हरिश्चंद्र को छलना को था
वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"विष्णु को राजा बलि को छलना था, वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"अश्विनी कुमारों को च्यवन ऋषि की पत्नी सत्यवती की परीक्षा लेनी थी,वेश बनाया ब्राह्मण का।"
"अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव सहित कुंती तथा द्रौपदी ने कई बार ब्राह्मण का वेश धारण किया।"
*जब जब किसी को कोई समाजविरोधी, राष्ट्रविरोधी, पाप और क्रूर कर्म करना हुआ तो उसने ब्राह्मण का वेश ही धारण किया।*
क्यों❓
*क्योंकि ब्राह्मण नाम है एक भरोसे का।*
ब्राह्मण नाम है एक विश्वास का।।
*ब्राह्मण नाम है सत्य का।*
ब्राह्मण नाम है धर्म का।
*ब्राह्मण नाम है सबका कल्याण चाहने वाले का।*
ब्राह्मण नाम है सबको सुखी देखने वाले का।
*ब्राह्मण नाम है सबको साथ लेकर सन्मार्ग पर चलाने वाले का।*
ब्राह्मण नाम है राष्ट्रभक्ति, दूरदर्शिता, अध्ययन, लगन, ज्ञान, त्याग, तप, बलिदान, शील, धैर्य, निष्पक्षता, संतोष और संयम का।
*इसलिए ब्राह्मण का नाम, ब्राह्मण की प्रतिष्ठा का लाभ उठाना बहुत आसान था। उसके वेश से, उसके नाम से लोगों को मूर्ख बनाना आसान था। उसके नाम से लोगों को ठगना आसान था। आज भी यही हो रहा है...*
*ब्राह्मण कोइ जाति नहीं है, इस ब्रह्माण्ड की परिभाषा है। भरोसा तथा विश्वास का नाम है ब्राह्मण।*
इस लिए ब्राह्मण बनना या वेश धरने से पहले दस बार सोचे किसी की छवि बिगड़ना बहुत आसान है, लेकिन बनाने में वर्षों की तपस्या लग जाती है ।
*ॐ ब्राह्मण्य नमः*

09/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*अनेक देवी-देवताओं की मान्यता क्यों?*
गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्ट, दिव्य स्वरूप और इच्छित फल देने की सामर्थ्य जिसके पास है, उसे देवता कहते हैं। कहा जाता है कि हिंदू धर्म में अनगिनत देवी-देवता हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् के तीसरे अध्याय में याज्ञवल्क्य ने कहा है कि वास्तव में तो देव 33 ही हैं, जिनमें 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य, 1 देवराज इंद्र और 1 प्रजापति सम्मिलित हैं। अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य, द्यौ, चंद्रमा और नक्षत्र ये 8 वसु हैं, जिन पर सारी सृष्टि टिकी हुई है। पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेद्रियां और मन (आत्मा) ये 11 रुद्र हैं। संवत्सर के बारह माहों के सूर्यों को आदित्य कहा जाता है। मेघ, इंद्र है और प्रकृति रूप यज्ञमय सारा जीवन प्रजापति है।
वैसे अग्नि, पृथ्वी, वायु, अंतरिक्ष, आदित्य और द्यौ इन 6 देवों में ही सारा विश्व समा जाता है। किंतु आम लोगों में धारणा है कि 33 कोटि (करोड़) देवता होते हैं। कोटि शब्द के दो अर्थ श्रेणी और करोड़ लगाए जाते हैं। इसी वजह से 33 करोड़ की धारणा बनी होगी ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं।
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान् । एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः ॥ -ऋग्वेद 1/164/46
अर्थात् एक सत्स्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान् ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों से अनेक नामों से पुकारते हैं। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामों से याद करते हैं। सारा वैदिक वाङ्मय इसी प्रकार की घोषणाओं से भरा है, जिसमें एक ही तत्त्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों में ईश्वर को मान्यता दी गई है।
समाज में ब्रह्मा, विष्णु, महेश प्रधान देवता माने जाते हैं और लक्ष्मी सरस्वती तथा दुर्गा प्रधान देवियां हैं। सब देवों में श्रेष्ठ कौन है, उसके संबंध में एक कथा है-एक बार ऋषियों में विवाद होने लगा कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों में कौन देवता सबसे बड़ा है? इसके लिए ब्रह्मा के पुत्र भृगुजी को नियुक्त किया गया। भृगु सबसे पहले ब्रह्माजी के पास ब्रह्मा के लोक में पहुंचे, तो वे पुत्र को देखकर प्रसन्न हुए, लेकिन उसके प्रणाम, स्तुति वंदना न करने से ब्रह्मा क्रोधित होकर बिना कुछ बोले चले गए। फिर भृगुजी कैलास पर्वत पहुंचे, तो शिवजी ने अपने भाई को बड़ी प्रसन्नता से गले लगाने का प्रयास किया, तो भृगुजी ने उद्दंडता से कहा-'मैं आपसे नहीं मिलूंगा, क्योंकि आपने लोक एवं वेद मर्यादा का उल्लंघन किया है।' इस व्यवहार से शिव क्रोधित होकर त्रिशूल उठाकर उन्हें मारने दौड़े। फिर भृगुजी बैकुंठ लोक में पहुंचे। उस समय श्रीहरि विष्णु सोए हुए थे। भृगु बहुत देर तक खड़े रहे, किंतु जब विष्णु की निद्रा भंग न हुई तो क्रोधित होकर भृगु ने उनके वक्षस्थल पर लात मारी। विष्णु ने आंखें खोल दीं देखा तो सामने क्रोधित अवस्था में महर्षि भृगु खड़े थे। भगवान् ने भृगु के पांव पकड़े लिए और नम्र स्वर में बोले-"हे ऋषिवर! मेरा वक्ष कठोर है और आपके पांव कोमल। कहीं आपके पांव में चोट तो नहीं आई? भगवान् विष्णु के ऐसे प्रेममय व्यवहार को देखकर भृगु बहुत लज्जित हुए। भगवान् श्री हरि ने भृगु को ऊंचे आसन पर स्थान दिया और उनके पैर दबाए। इस व्यवहार से भृगुजी तृप्त हुए। उन्होंने ऋषियों के सम्मुख आकर कहा-"भगवान् विष्णु ही सब देवों में श्रेष्ठ हैं।
*जय श्री राम*

09/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*जानिए किस माला के जाप का क्या फल मिलता है...?*
भारतीय संस्कृति में पूजा-पाठ का बहुत अधिक महत्व है। किसी भी काम को करने से पहले पूजा-पाठ की जाती है जिससे कि आगे चल कर कोई समस्या उत्पन्न न हो। इसी साथ लोगों के मन में हर देवी-देवताओं के प्रति अपनी श्रृद्धा है जो अपने-अपने तरीके से व्यक्त करते है।
इसी तरह पूजा-पाठ के साथ-साथ तंत्र-मंत्र का भी विशेष महत्व है। यह आप अच्छी तरह जानते है कि तंत्र-मंत्र के पिता भगवान शिव है।
जिससे कि इन्हें हम लोग अपना आराध्य देव और उनके शक्ति स्वरूप मां दुर्गा को अपनी माता मानते हैं। भगवान शिव सभी की हर मनोकामना पूर्ण करते है। भगवान शिव ऐसे भगवान है जिसे प्रसन्न करना मुश्किल काम नही है।
देवी-देवताओं की पूजा-पाठ करने के लिए विभिन्न प्रकार के मालाओं का इस्तेमाल करते है, लेकिन हमें किस माला का किस देवी-देवता का जाप करना है यह नही जानते जिससे कि हमारी मनोकामना पू्र्ण नही होती। जानिए किस माला से किस मनोकामना की पूर्ति होती है।
1👉 रुद्राक्ष जिसे भगवान शिव का अंश माना जाता है। इससे शिव का जाप कर आससानी से मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती है। अगर आप शिव भगवान को प्रसन्न करना चाहते है तो रुद्राक्ष की माला से शिव के मंत्रों का जाप करे।
2👉 मां अम्बा की उपासना करने के लिए स्फटिक की माला से जप करना शुभ माना जाता है।
3👉 मां दुर्गा की उपासना लाल रंग के चंदन की माला, जिसे रक्त चंदन माला कहा जाता है, से करना चाहिए।
4👉 काली का आह्वान करने के लिए काली हल्दी या नील कमल की माला का प्रयोग करना है।
5👉 सूर्य के दोष और उन्हें प्रसन्न करने के लिए माणिक्य, गारनेट, बिल की लकड़ी की माला का उपयोग शुभ माना गया है।
6👉 मंगल ग्रह की शांति के लिए मंगल ग्रह के मंत्र के साथ मूंगे और लाल चंदन की माला से जाप करना चाहिए और वही बुध ग्रह के लिए पन्ने की बनी हुई की माला से जाप करना चाहिए।
7👉 बृहस्पति देव को प्रसन्न करने के लिए हल्दी या जीया पोताज और शुक्र के लिए स्फटिक की माला से जाप करें।
8👉 अगर आप बगलामुखी की साधना कर रहे हैं तो आपको पीली हल्दी या जीयापोता की माला का इस्तेमाल करना चाहिए।
9👉 लक्ष्मीमंत्र का जाप हमेशा कमलट्टे की माला से करना चाहिए। वहीं तुलसी और चंदन की माला से विष्णु भगवान के मंत्र का जाप करना चाहिए।
10👉 चंद्रमा की शांति के लिए आप जिस मंत्र का जाप कर रहे है उस मंत्र का जाप मोती की माला से करना चाहिए।
11👉 राहु के लिए गोमेद, चंदन और कच्चे कोयले की माला उपयोगी है, वहीं केतु के लिए लहसुनिया की माला शुभ माना जाता है।
12👉 अगर आप माता लक्ष्मी की उपासना धन प्राप्त करने के लिए उनकी लाल रंग के रेशमी धागे वाली 30 मनकों की माला से जाप करें,परंतु अगर आप अपनी कोई मनोकामना पूरी होते देखना चाहते हैं तो आपके लिए 27 रुद्राक्षों की माला उपयोगी है।
13👉 मोक्ष प्राप्ति या शांति के लिए किए जा रहे मंत्र जाप के लिए 108 रुद्राक्ष को सफेद धागें से पिरोंकर जाप करें। मनोकामना पूर्ण होगी।
*जय श्री राम*

04/11/2025

🙏संदेश🙏भास्कर🙏
*🚩🚩🔥हवन🔥🚩🚩*
मैं एक गृह प्रवेश की पूजा में गया। पंडित जी पूजा करा रहे थे।
पंडित जी ने सबको हवन में शामिल होने के लिए बुलाया। सबके सामने हवन सामग्री रख दी गई। पंडित जी मंत्र पढ़ते और कहते, “स्वाहा।”
लोग चुटकियों से हवन सामग्री लेकर अग्नि में डाल देते। गृह मालिक को स्वाहा कहते ही अग्नि में घी डालने की ज़िम्मेदीरी सौंपी गई।
हर व्यक्ति थोड़ी सामग्री डालता, इस आशंका में कि कहीं हवन खत्म होने से पहले ही सामग्री खत्म न हो जाए। गृह मालिक भी बूंद-बूंद घी डाल रहे थे। उनके मन में भी डर था कि घी खत्म न हो जाए।
मंत्रोच्चार चलता रहा, स्वाहा होता रहा और पूजा पूरी हो गई।
सबके पास बहुत सी हवन सामग्री बची रह गई। घी तो आधा से भी कम इस्तेमाल हुआ था।
हवन पूरा होने के बाद पंडित जी ने कहा कि आप लोगों के पास जितनी सामग्री बची है, उसे अग्नि में डाल दें। गृह स्वामी से भी उन्होंने कहा कि आप इस घी को भी कुंड में डाल दें।
एक साथ बहुत सी हवन सामग्री अग्नि में डाल दी गई। सारा घी भी अग्नि के हवाले कर दिया गया। पूरा घर धुंए से भर गया। वहां बैठना मुश्किल हो गया।
एक-एक कर सभी कमरे से बाहर निकल गए।
अब जब तक सब कुछ जल नहीं जाता, कमरे में जाना संभव नहीं था।काफी देर तक इंतज़ार करना पडा, सब कुछ स्वाहा होने के इंतज़ार में।
मेरी कहानी यहीं रुक जाती है।
उस पूजा में मौजूद हर व्यक्ति जानता था कि जितनी हवन सामग्री उसके पास है, उसे हवन कुंड में ही डालना है। पर सबने उसे बचाए रखा। सबने बचाए रखा कि आख़िर में सामग्री काम आएगी।
ऐसा ही हम करते हैं। यही हमारी फितरत है। हम अंत के लिए बहुत कुछ बचाए रखते हैं।
ज़िंदगी की पूजा खत्म हो जाती है और हवन सामग्री बची रह जाती है। हम बचाने में इतने खो जाते हैं कि जब सब कुछ होना हवन कुंड के हवाले है, उसे बचा कर क्या करना। बाद में तो वो सिर्फ धुंआ ही देगा।
संसार हवन कुंड है और जीवन पूजा। एक दिन सब कुछ हवन कुंड में समाहित होना है। अच्छी पूजा वही है, जिसमें हवन सामग्री का सही अनुपात में इस्तेमाल हो l
🙏जय श्री राम 🙏

03/11/2025

*संदेश*भास्कर*
*।। हम अपना नैतिक पलायन न करें ।।*
सनातन हिन्दू संस्कृति की एक अद्भुत विशेषता रही है सहिष्णुता। परंतु सहिष्णुता और तटस्थता में बड़ा अंतर है। सहिष्णुता का अर्थ है कि दूसरों के विचारों का सम्मान करना;
जबकि तटस्थता का अर्थ है कि सत्य और असत्य के बीच निर्णय न लेना।
हमारा समाज प्रायः “फेन्स पर बैठने” की आदत का शिकार रहा है। अर्थात् तब तक चुप रहना, जब तक कोई एक पक्ष विजयी न हो जाए। और जैसे ही कोई विजयी होता है, अधिकांश लोग उसके चरणों में झुक जाते हैं।
राम–रावण युद्ध इसका एक सजीव उदाहरण है।
रावण के पास असीम शक्ति थी । उसका रथ दिव्य था, उसकी नाभि में अमृत था, उसका पुत्र मेघनाद इंद्र तक को पराजित कर चुका था।
जब देवताओं ने इंद्र से राम की सहायता माँगी कि अपना रथ वे राम को दे दें तो इंद्र आरम्भ में मौन रहे। उन्हें भय था कि कहीं रावण जीत न जाए। यह वही फेन्स पर बैठना था ।धर्म और अधर्म के बीच तटस्थ रहने की प्रवृत्ति।
परंतु इतिहास ने सदा यह सिद्ध किया है कि धर्म के पक्ष में खड़ा होने वाले की ही जय होती है ।
राम, चूँकि नरलीला कर रहे थे को अपने पास सीमित संसाधन दिखाना था, पर उनका आधार सत्य था। और अंततः सत्य ने ही विजय प्राप्त की।
आज भी समाज में रावण रूपी शक्तियाँ सक्रिय हैं। वे, गौ-भक्षकों के रूप में , किताबियों के रूप में, नास्तिकों के रूप में , वेद निंदकों के रूप में असत्य, अधर्म, अन्याय, और स्वार्थ के रूप में।
हमें इनसे लड़ने के लिए तलवार नहीं, बल्कि साहस, सत्य और सक्रियता की आवश्यकता है।इसलिए हम फेन्स पर न बैठें।सत्य का साथ दें, धर्म के पक्ष में आवाज़ उठाएँ, और अपने कर्म से रावण रूपी आसुरी शक्तियों को निर्बल करते रहें।
हम अपना नैतिक पलायन न करें।
सभी सनातन धर्मावलंबियों को इसपे विचार करके चलना होगा
*जय श्री राम*

29/10/2025

*संदेश*भास्कर*
*माया की गठरी*
किसी गांव में एक संत घूमा करते थे। उनकी सफेद लंबी दाढ़ी थी और हाथ में एक मोटा डंडा।
चीथड़ों में लिपटा उसका ढीला—ढीला और झुर्रियों से भरा बुढ़ापे का शरीर। अपने साथ एक गठरी लिए रहते थे सदा। और गठरी पर बड़े—बड़े अक्षरों में लिख रखा था -
'माया'। वह बार—बार उस गठरी को खोलते भी थे। उसमें उन्होंने बड़े जतन से रंगीन रही कागज लपेट कर रख छोड़े थे।
कहीं मिल जाते रास्ते पर तो कागजों को इकट्ठा कर लेते। अपनी माया की गठरी में रख लेता। जिस गली से निकलते उसमें रंगीन कागज दिखते तो बड़ी सावधानी से उठा लेते।
सिकुड़नों पर हाथ फेरते, उनकी गड्डी बनाकर, जैसे कोई नोटों की गड्डी बनाता है, अपनी माया की गठरी में रख लेते। उनकी गठरी रोज बड़ी होती जाती थी।
लोग उन्हें समझाते कि पागल, यह कचरा क्यों ढोता है ?
वह हंसते और कहते कि खुद पागल हैं वे दूसरों को पागल बता रहे हैं।
कभी—कभी किसी दरवाजे पर बैठ जाते और कागजों को दिखा कर कहते, ये मेरे प्राण हैं। ये खो जाएं तो मैं एक क्षण जी न सकूंगा।
ये खो जाएं तो मेरा दिवाला निकल जाएगा। ये चोरी चले जाएं तो मैं आत्म-हत्या कर लूंगा। कभी कहते ये मेरे रुपये हैं, यह मेरा धन है।
इनसे मैं अपने गांव के गिरते हुए किले का पुन: निर्माण कराऊंगा। कभी अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेर कर स्वाभिमान से कहते उस किले पर हमारा झंडा फहराएगा और मैं राजा बनूंगा और कभी कहते किं इनको नोट ही मत समझो, इनकी ही मैं नावें बनाऊंगा। इन्हीं नावों में बैठ कर उस पार जाऊंगा और लोग हंसते और बच्चे हंसते औरते भी हंसती। और जब भी कोई जोर से हंसता तो वह कहते, चुप रहो। पागल हो और दूसरों को पागल समझते हो।
तभी गांव में एक ज्ञानी का आगमन हुआ। और उस ज्ञानी ने गाव के लोगों से कहा, इनको पागल मत समझो और इनकी हंसी मत उड़ाओ। इनकी पूजा करो नासमझो! क्योंकि यह जो गठरी ढो रहे है,
तुम्हारे लिए ढो रहे है। ऐसे ही कागज की गठरियां तुम ढो रहे हो। यह तुम्हारी मूढ़ता को प्रकट—करने के लिए इतना श्रम उठा रहे है। इनकी गठरी पर इन्होने 'माया' लिख रख छोड़ा है। कागज, कूड़ा—कचरा भरा है।
तुम क्या लिए घूम रहे हो..??
तुम भी सोचते हो कि महल बनाएंगे, उस पर झंडा फहराएंगे।नाव बनाएंगे, उस पार जाएंगे। सिकंदर बनेंगे कि नेपोलियन।
सारे ससार को जीत लेंगे। बड़े किले बनाएंगे कि मौत भी प्रवेश न कर सकेगी और जब यह ज्ञानी समझाने लगे लोगों को तो वहाँ खड़े वो संत हंसने लगे और उन्होने कहा कि मत समझाओ।
ये खाक समझेंगे। ये कुछ भी न समझेंगे। मैं वर्षों से समझाने की कोशिश कर रहा हूं। ये सुनते नहीं। ये मेरी गठरी देखते हैं, अपनी गठरी नहीं देखते। ये मेरे रंगीन कागजों को रंगीन कागज समझते हैं और जिन नोटों को इन्होंने तिजोडियो में भर रखा है, उन्हें असली धन समझते हैं। मुझे कहते हैं पागल, खुद पागल हैं।
यह पृथ्वी बड़ा पागलखाना है। इसमें से जागो। इसमें से जागो, इसमें से न जागे तो बार—बार मौत आएगी और बार—बार तुम वापस इसी पागलखाने में फेंक दिए जाओगे।
फिर—फिर जन्म! इसीलिए तो पूरब के मनीषी एक ही चिन्तन करते रहे हैं सदियों से— आवागमन से कैसे छुटकारा हो ?
कैसे मिटे जन्म ? कैसे मिटे मौत ?
मिटने का एक ही उपाय है। तुम्हारे भीतर कुछ ऐसा है जिसका न कभी जन्म हुआ और न कभी मृत्यु होती है।
तुम्हारे भीतर अजन्मा और अमृतस्वरूप कुछ पड़ा है और वही तुम्हारा हीरा है, उसे खोज लो। वही तुम्हारा धन हैं..!!
*जय श्री राम*

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