29/05/2026
रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटते हैं तो उनके स्वागतार्थ अयोध्यावासियों के साथ गुरु वशिष्ठ भी खड़े हैं l उन्हें देखते ही भगवान दौड़कर उनके पैरों को पकड़ लेते हैं और उनका परिचय देते हुए अपने मित्रों से कहते हैं कि 'गुरु वशिष्ठ कुल पूज्य हमारे, इनकी कृपा दनुज रन मारे' और गुरु वशिष्ठ से अपने मित्रों का परिचय देते हुए कहते हैं कि 'ये सब सखा सुनहु मुनि मेरे, भये समर सागर के बेरे' अर्थात् इन मित्रों की सहायता से ही मैंने युद्ध रूपी समुद्र पार किया है l राम की इस विनम्रता को देखकर समस्त अयोध्यावासी आश्चर्यचकित रह जातें है l रावण जैसे महाप्रतापी योद्धा को जीतने का कोई अहंकार नहीं, सारा श्रेय बानर भालुवो और गुरु वशिष्ठ को l
इस प्रसंग का अभिप्राय यह है कि किसी कार्य को करने के लिए छोटे - बड़े सभी सहयोगी जिम्मेदार हैं और यह कार्य किसी की कृपा के द्वारा ही होता है l जो कर्ता के रूप में वहां उपस्थित न रहते हुए भी अपनी कृपा की वृष्टि करता रहता है I
महाभारत के बाद भी जब बर्बरीक के कटे सिर से पूछा गया कि महाभारत युद्ध में सबसे बड़ा वीर कौन था तो उसने यही बताया था कि मैंने तो सभी वीरों को केवल मरते हुए देखा, मारने वाले तो एक मात्र सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण थे l
श्री चैनराम बाबा की समाधि स्थली पर महाविष्णु यज्ञ छोटे बड़े सभी लोगों के सहयोग से निर्विघ्न समाप्त हो गया I सभी लोगों को उनके अथक परिश्रम के लिए बधाई l श्री चैन राम बाबा जी की जय 🙏