Shakti Peeth Shakumbhari Devi

Shakti Peeth Shakumbhari Devi Shakti Peeth Shakumbhri Devi ,Shakumbhri herself and another one, Bhura-Dev temple Jasmour village a

28/06/2025

शाकुंभरी देवी माता के यहां नदी का पानी बहुत ज्यादा आ रहा है। कृपया माता के दर्शन के लिए कुछ दिनों बाद आएं,
मौसम ठीक होने और नदी का पानी उतारने का इंतज़ार करे (28-6-25)

राम नवमी 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं🙏
06/04/2025

राम नवमी 2025 की हार्दिक शुभकामनाएं🙏

जय मां सिद्धिदात्री🙏चैत्र नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के मां सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा होती है। इस दिन मां की विधि...
06/04/2025

जय मां सिद्धिदात्री🙏

चैत्र नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के मां सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा होती है। इस दिन मां की विधिपूर्वक आरती करने से घर में खुशहाली आती है। मां सिद्धिदात्री की आरती में शामिल होने से जीवन में शुभता का आगमन होती है। कहते हैं कि माता रानी की आरती में भक्ति भाव से शामिल होना चाहिए। ऐसे में इस तिथि पर सुबह स्नान के बाद देवी के सामने घी का दीपक जलाएं।

मां सिद्धिदात्री का स्वरूप :

मां सिद्धिदात्री का स्वरूप दिव्य और सुशोभित है. उनकी चार भुजाए हैं. जिसमें शंख, चक्र, गदा और कमल का फूल माता ने धारण किए हैं. मां सिद्धिदात्री का वाहन सिंह है, माता के कमल पुष्प पर भी विराजमान होती है. मान्यताएं हैं कि मां सिद्धिदात्री अपने साधकों और भक्तों को सिद्धियों का आशीर्वाद देती हैं. भौतिक सुख-संपत्ति की प्राप्ति के साथ ही मोक्ष की प्राप्ति का भी माता वरदान देती हैं.

मां सिद्धिदात्री का भोग :

मां सिद्धिदात्री को भोग के रूप में तिल और मेवे से बनाए गए व्यंजन अर्पित करें. यह माता का प्रिय भोग है.

मां सिद्धिदात्री शुभ रंग :

नवरात्रि की नवमी तिथि पर अगर बैंगनी या जामुनी रंग पहनें तो यह अति शुभ माना जाएगा. मां सिद्धिदात्री का यह प्रिय रंग है.

मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि :

चैत्र नवरात्रि की नवमी तिथि पर सुबह जल्दी उठे और स्नान ध्यान कर साफ कपड़े धारण करें.
अब घर के पूजा स्थल को भी अच्छे से साफ और शुद्ध कर लें.
एक साफ आसन पर लाल वस्त्र बिछाएं और मां सिद्धिदात्री की मूर्ति या चित्र को उस पर स्थापित कर लें.
अब पूजा सामग्री एक एक कर माता को अर्पित करें. जैसे फूल, अक्षत आदि.
दीपक, अगरबत्ती और पुष्प माता को अर्पित करें और मन ही मन माता को प्रणाम करें.
इसके बाद मां सिद्धिदात्री को उनका प्रिय अर्पित करें.
मां सिद्धिदात्री के मंत्रों का मन ही मन जाप कर लें.
अब माता की आरती के साथ पूजा का समापन करें.

मां सिद्धिदात्री का मंत्र :

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥

मां सिद्धिदात्री का बीज मंत्र :

ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:।

मां सिद्धिदात्री की कथा :

पौराणिक मान्यताएं हैं कि असुरों के अत्याचार से जब देवताओं ने त्राहिमाम किया और भगवान शिव व विष्णु से सहायता मांगी. वहीं, देवताओं के तेज से एक शक्ति सामने आई जिसे मां सिद्धिदात्री के रूप में जाना गया है. मां सिद्धिदात्री की कृपा से ही शिव जी ने सिद्धियों को प्राप्ति की. सिद्धिदात्री देवी की ही कृपा थी कि शिवजी का आधा शरीर देवी का हो गया और आधे में शिव जी का शरीर और इस तरह अर्द्धनारीश्वर रूप प्रकट हुआ.

मां सिद्धिदात्री की आरती :

जय सिद्धिदात्री मां, तू सिद्धि की दाता।
तू भक्तों की रक्षक, तू दासों की माता।
तेरा नाम लेते ही मिलती है सिद्धि।
तेरे नाम से मन की होती है शुद्धि।
कठिन काम सिद्ध करती हो तुम।
जभी हाथ सेवक के सिर धरती हो तुम।
तेरी पूजा में तो ना कोई विधि है।
तू जगदम्बे दाती तू सर्व सिद्धि है।
रविवार को तेरा सुमिरन करे जो।
तेरी मूर्ति को ही मन में धरे जो।
तू सब काज उसके करती है पूरे।
कभी काम उसके रहे ना अधूरे।
तुम्हारी दया और तुम्हारी यह माया।
रखे जिसके सिर पर मैया अपनी छाया।
सर्व सिद्धि दाती वह है भाग्यशाली।
जो है तेरे दर का ही अम्बे सवाली।
हिमाचल है पर्वत जहां वास तेरा।
महा नंदा मंदिर में है वास तेरा।
मुझे आसरा है तुम्हारा ही माता।
भक्ति है सवाली तू जिसकी दाता।

जय मां महागौरी🙏नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की उपासना की जाती है। अष्टमी तिथि पर मां महागौरी...
05/04/2025

जय मां महागौरी🙏

नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की उपासना की जाती है। अष्टमी तिथि पर मां महागौरी की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवी महागौरी भगवान शिव की अर्धांगिनी हैं और उनके साथ ही विराजमान रहती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि इस शुभ दिन पर मां महागौरी की पूजा कैसे की जाती है, कौन से मंत्रों का जाप किया जाता है और उन्हें क्या भोग अर्पित किया जाता है...

मां महागौरी का स्वरूप :

पौराणिक कथाओं के अनुसार मां महागौरी श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनका रंग अत्यंत गौरवर्ण होता है। चार भुजाओं वाली इस देवी को ‘श्वेतांबरधरा’ भी कहा जाता है। उनकी छवि अत्यंत शांत, कोमल और तेजस्वी मानी जाती है। एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू, तीसरे हाथ में अभय मुद्रा और चौथे हाथ में वरमुद्रा होती है। माना जाता है कि वे भक्तों को अन्नपूर्णा का वरदान देती हैं।

मां महागौरी की पूजा का महत्व :

मां महागौरी की उपासना से मनुष्य के सभी पाप और बाधाएं समाप्त हो जाती हैं. इनकी कृपा से मानसिक शांति, सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है. विशेष रूप से महिलाओं के लिए इनकी पूजा बेहद फलदायी मानी जाती है.

मां महागौरी का मंत्र :

1. बीज मंत्र:

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्यै नमः.

2. स्तुति मंत्र:

श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः.
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा.

मां महागौरी की पूजा विधि :

1. प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. सफेद रंग पहनना शुभ माना जाता है.
2. मां महागौरी की प्रतिमा या चित्र को गंगाजल से शुद्ध करें.
3. मां को सफेद पुष्प, कुमकुम, अक्षत, धूप और दीप अर्पित करें.
4. पंचमेवा, नारियल और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाएं.
5. मां महागौरी के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें.
6. हवन कर, कन्या पूजन करें और जरूरतमंदों को भोजन कराएं.
7. अंत में मां की आरती करें और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करें.

मां महागौरी की आरती :

जय महागौरी जगत की माया.
जय उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा.
महागौरी तेरा वहा निवास॥

चन्द्रकली और ममता अम्बे.
जय शक्ति जय जय मां जगदम्बे॥

भीमा देवी विमला माता.
कौशिक देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा.
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

मां महागौरी की आरती
जय महागौरी जगत की माया.
जय उमा भवानी जय महामाया॥

हरिद्वार कनखल के पासा.
महागौरी तेरा वहा निवास॥

चन्द्रकली और ममता अम्बे.
जय शक्ति जय जय मां जगदम्बे॥

भीमा देवी विमला माता.
कौशिक देवी जग विख्यता॥

हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा.
महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा॥

जय मां कालरात्रि🙏चैत्र नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा का विधान है। इस दिन उनकी विधिपूर्ण आ...
05/04/2025

जय मां कालरात्रि🙏

चैत्र नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा का विधान है। इस दिन उनकी विधिपूर्ण आरती करने से घर में सुख और शांति बनी रहती है। मां कालरात्रि की आरती में शामिल होने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ऐसा कहा जाता है कि देवी की आरती में श्रद्धापूर्वक शामिल होने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

मां कालरात्रि का स्वरूप और महत्व :

मां कालरात्रि का स्वरूप अत्यंत भयानक है, लेकिन वे भक्तों के लिए बेहद दयालु हैं. इनका रंग गहरा काला है और उनके गले में मुंड माला सुशोभित होती है. उनकी चार भुजाएं होती हैं-एक हाथ में खड्ग, दूसरे में लोहे की लौटी, तीसरा वरद मुद्रा और चौथा अभय मुद्रा में रहता है. वे गर्दभ (गधे) पर सवार होती हैं. मान्यता है कि इनकी पूजा करने से निडरता आती है और बुरी शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है.

मां कालरात्रि की कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार दैत्य असुर शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने जब तीनों लोकों में हाहाकार मचा रखा था. तब इससे चिंतित होकर सभी देवगण भगवान शिव जी के पास गए. देवताओं की गुहार सुनकर भोलेनाथ जी ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने को कहा. भगवान शिव की बात मानकर पार्वती माता ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध कर दिया. लेकिन जैसे ही दुर्गा मां ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए. इसे देख दुर्गा माता ने अपने तेज से कालरात्रि को उत्पन्न किया. इसके बाद जब देवी दुर्गा ने रक्तबीज को मारा तो उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को कालरात्रि ने अपने मुख में भर लिया और सबका गला काटते हुए रक्तबीज का वध कर दिया.

मां कालरात्रि की पूजा विधि :

1. सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को शुद्ध करें.
2. मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित करें.
3. दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती लगाएं.
4. लाल फूल, गुड़, कुमकुम, चंदन और अक्षत अर्पित करें.
5. मां कालरात्रि का ध्यान करें और नीचे दिए गए मंत्र का जाप करें.
6. विशेष रूप से लाल चंपा के फूल अर्पित करने से माता प्रसन्न होती हैं.
7. रुद्राक्ष की माला से मंत्रों का जाप करने से विशेष फल प्राप्त होता है.
8. अंत में मां की आरती करें और प्रसाद वितरण करें.

बीज मंत्र :

ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्र्यै नमः।।

ध्यान मंत्र :

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्त शरीरिणी॥
वामपादोल्लसल्लोह लताकण्टकभूषणा।
वर्धन मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥

मां कालरात्रि की आरती :

कालरात्रि जय जय महाकाली.
काल के मुंह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा.
महाचंडी तेरा अवतारा॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा.
महाकाली है तेरा पसारा॥

खड्ग खप्पर रखने वाली.
दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा.
सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी.
गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदन्ता और अन्नपूर्णा.
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे ना बीमारी.
ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवे.
महाकाली मां जिसे बचावे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह.
कालरात्रि मां तेरी जय॥

जय मां कात्यायनी🙏मां दुर्गा का छठा रूप मां कात्यायनी हैं। आज नवरात्रि के छठवें दिन उनकी पूजा होती है। ऋषि कात्यायन के घर...
04/04/2025

जय मां कात्यायनी🙏

मां दुर्गा का छठा रूप मां कात्यायनी हैं। आज नवरात्रि के छठवें दिन उनकी पूजा होती है। ऋषि कात्यायन के घर जन्म होने से उनका नाम कात्यायनी पड़ा। मां कात्यायनी की पूजा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पर विजय प्राप्‍त करने की शक्ति मिलती है। नवरात्रि में देवी कात्यायनी की पूजा का खास महत्व होता है। मान्यता है कि नवरात्रि में देवी कात्यायनी की पूजा करने से माता भक्तों को साहस और शक्ति देती हैं। साथ ही यह भी माना जाता है कि कुंवारे लड़के और लड़कियां मां कात्‍यायिनी की पूजा पूरे विधि विधान से करते हैं, तो उन्‍हें सुयोग्‍य जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं मां कात्‍यायिनी का स्‍वरूप कैसा है, जानें उनकी पूजा का महत्‍व, पूजाविधि, भोग, मंत्र और आरती।

मां कात्यायनी की पूजा का महत्‍व :

ब्रजभूमि में देवी कात्यायनी की पूजा होती है। ब्रज की कन्याओं ने श्रीकृष्ण के प्रेम के लिए इनकी आराधना की। श्रीकृष्ण ने भी देवी कात्यायनी की पूजा की थी। देवी कात्यायनी को मधु वाला पान बहुत पसंद है। उन्हें फल, मिठाई और शहद वाला पान प्रसाद के रूप में चढ़ाना चाहिए। गीता में भी बताया गया है कि राधारानी और गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए कात्यायनी पीठ में पूजा की थी। माता ने उन्हें वरदान दिया, लेकिन, भगवान कृष्ण एक थे और गोपियां अनेक, इसलिए, यह संभव नहीं था। भगवान कृष्ण ने देवी के इस वरदान को पूरा करने के लिए सभी गोपियों के लिए महारास किया।

मां कात्यायनी का स्‍वरूप :

मां कात्यायनी सुनहरे वर्ण वाली चमत्‍कारिक देवी हैं। उनकी चार भुजाएं हैं और वे रत्नों से सजी हैं। वह शेर पर सवार रहती हैं और हमेशा हमला करने के लिए तैयार रहती हैं। उनका तेज सभी देवताओं के तेज से मिलकर बना है। देवी कात्यायनी भक्तों को अभय और वरदान देती हैं। मां कात्यायनी दाहिनी ओर ऊपर वाले हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। नीचे वाले हाथ से वे उन्हें वरदान देती हैं। बायीं ओर के ऊपर वाले हाथ में उन्होंने चंद्रहास नाम की तलवार पकड़ी है। नीचे वाले हाथ में कमल का फूल है।

मां कात्यायनी का भोग :

मां कात्यायनी को पीला रंग बहुत पसंद है, इसलिए भक्त उन्हें पीले रंग की मिठाई अर्पित करते हैं। यह माना जाता है कि ऐसा करने से मां प्रसन्न होती हैं। इसके साथ ही, मां को शहद से बने हलवे का भोग भी लगाया जाता है। आप सूजी का हलवा बनाकर उसमें शहद मिलाकर भी मां को अर्पित कर सकते हैं, ऐसा करने से मां कात्यायनी की कृपा प्राप्त होती है।

मां कात्यायनी का मंत्र :

कात्यायनी महामाये, महायोगिन्यधीश्वरी।
नन्दगोपसुतं देवी, पति मे कुरु ते नमः।।

स्तुति मंत्र :

या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां कात्यायनी की पूजाविधि :

आज मां कात्यायनी की पूजा का दिन है। भक्त सूर्योदय से पहले स्नान करके, पीले या लाल वस्त्र पहनकर मां की आराधना करते हैं और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करके, कलश का पूजन किया जाता है। मां कात्यायनी को वस्त्र अर्पित करके, घी का दीपक जलाया जाता है। रोली का तिलक, अक्षत, धूप और पीले फूल मां को चढ़ाए जाते हैं। उसके बाद पान के पत्ते पर शहद और बताशे में लौंग रखकर मां का भोग लगाया जाता है। अंत में कपूर जलाकर मां कात्यायनी की आरती की जाती है।

मां कात्यायनी की आरती :

जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।
जय जगमाता, जग की महारानी।
बैजनाथ स्थान तुम्हारा।
वहां वरदाती नाम पुकारा।
कई नाम हैं, कई धाम हैं।
यह स्थान भी तो सुखधाम है।
हर मंदिर में जोत तुम्हारी।
कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी।
हर जगह उत्सव होते रहते।
हर मंदिर में भक्त हैं कहते।
कात्यायनी रक्षक काया की।
ग्रंथि काटे मोह माया की।
झूठे मोह से छुड़ाने वाली।
जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।
जय जगमाता, जग की महारानी।
अपना नाम जपाने वाली।
बृहस्पतिवार को पूजा करियो।
ध्यान कात्यायनी का धरियो।
हर संकट को दूर करेगी।
भंडारे भरपूर करेगी।
जो भी मां को भक्त पुकारे।
कात्यायनी सब कष्ट निवारे।
जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।
जय जगमाता, जग की महारानी।

जय मां स्कंदमाता🙏चैत्र नवरात्रि का आज पांचवा दिन है और नवरात्रि के पांचवे दिन मां दुर्गा की पांचवी शक्ति स्कंदमाता की पू...
03/04/2025

जय मां स्कंदमाता🙏

चैत्र नवरात्रि का आज पांचवा दिन है और नवरात्रि के पांचवे दिन मां दुर्गा की पांचवी शक्ति स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है. आज पूरे दिन सर्वार्थ सिद्धि योग, रवि योग और आयुष्मान योग बना रहेगा, जिससे माता की पूजा और भी फलदायी रहेगी. मां दुर्गा के सभी स्वरूपों में स्कंदमाता को सबसे ज्यादा ममतामयी माना गया है. माता के इस स्वरूप की पूजा करने से बुद्धि का विकास और ज्ञान की प्राप्ति होती है. स्कंद कुमार यानी कार्तिकेय भगवान की माता होने के कारण पार्वतजी को स्कंद माता कहा गया. मान्यता है कि निसंतान दंपत्ति सच्चे मन से माता के इस स्वरूप की पूजा अर्चना करें और व्रत करें तो संतान सुख की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं नवरात्रि 2025 के पांचवे दिन की जाने वाली माता स्कंदमाता का स्वरूप, भोग, आरती और मंत्र…

ऐसा है माता का स्वरूप :

स्कंदमाता के इस स्वरूप में भगवान स्कंद 6 मुख वाले बालरूप में माता की गोद में विराजमान हैं. भगवान स्कंद के 6 मुख होने के कारण इन्हें षडानन नाम से भी जाना जाता है. स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं. दायीं हाथ की तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुई हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है. वहीं बायीं वाली भुजा वरमुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में श्वेत कमल फूल है. माता का वाहन सिंह और यह कमल के आसन पर भी स्कंद को लेकर विराजमान रहती हैं.

स्कंदमाता पूजा का महत्व :

स्कंद माता सिंह की सवारी के अलावा कमल के फूल पर भी विराजती हैं इसलिए माता को पद्मासना भी कहा जाता है. जो भी भक्त सच्चे मन से माता की पूजा अर्चना करता है, मां उसके मन की सभी इच्छाओं को पूरी करती हैं. माता की कृपा से मूढ़ भी ज्ञान हो जाता है और अज्ञानी भी ज्ञान की प्राप्ति करता है. संतान की प्राप्ति के लिए स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए. माता रानी की पूजा के समय लाल कपड़े में पीले चावल, एक नारियल, सुहाग का सामान, लाल फूल को बांधकर माता के पास रख दें, ऐसा करने से घर में जल्द किलकारियां गूंजने लगती हैं. माता की उपसना करने से भक्तों की सारी इच्छाएं पूरी होती हैं और मोक्ष का मार्ग सुलभ हो जाता है. सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक कांतिमय और अलौकिक तेज हो जाता है. बताया जाता है कि कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएं माता की कृपा से ही संभव हुई थीं.

देवी स्कंदमाता की कथा :

पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नाम का एक राक्षस था, उसने तपस्या कर ब्रह्मा जी से अमरता का वरदान प्राप्त कर लिया. लेकिन ब्रह्मा जी ने कहा कि जो इस संसार में आया है उसे एक ना एक दिन जाना पड़ता है. ब्रह्मा जी की बात सुनकर तारकासुर ने यह वरदान मांग लिया कि उसका वध सिर्फ भगवान शिव का पुत्र ही कर सकता है. जिसके बाद तारकासुर ने चारों ओर हाहाकार मचा दिया. धीरे- धीरे उसका आतंक बहुत बढ़ गया था. लेकिन तारकासुर का अंत कोई नहीं कर सकता था. क्योंकि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय के हाथों की उसका अंत संभव था. तब देवताओं के कहने पर भगवान शिव ने साकार रूप धारण कर माता पार्वती से विवाह किया. जिसके बाद मां पार्वती ने अपने पुत्र स्कंद यानी कार्तिकेय को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करने के लिए स्कंदमाता का रूप धारण किया. स्कंदमाता से युद्ध का प्रशिक्षण लेने के बाद कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया.

देवी स्कंदमाता की पूजा विधि :

चैत्र नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा करने के लिए सबसे पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें. इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थान में चौकी पर स्कंदमाता की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें. गंगाजल से शुद्धिकरण करें फिर एक कलश में पानी लेकर उसमें कुछ सिक्के डालें और उसे चौकी पर रखें. अब पूजा का संकल्प लें.
इसके बाद स्कंदमाता को रोली-कुमकुम लगाकर नैवेद्य अर्पित करें. अब धूप-दीपक से मां की आरती और मंत्र जाप करें. स्कंद माता को सफेद रंग बहुत प्रिय है. इसलिए भक्त सफेद रंग के कपड़े पहनकर मां को केले का भोग लगाएं. मान्यता है कि ऐसा करने से मां सदा निरोगी रहने का आशीर्वाद देती हैं.

स्कंदमाता का प्रिय भोग और रंग :

धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी स्कंदमाता का प्रिय भोग केला है. स्कंदमाता की पूजा में केले के साथ खीर का भोग लगाना शुभ होता है. इसके अलावा स्कंदमाता की पूजा में पीला और सफेद रंग धारण करना शुभ होता है.

मां स्कंदमाता का मंत्र :

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

ध्यान मंत्र :

या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

स्कंदमाता की आरती :

जय तेरी हो स्कंदमाता
पांचवा नाम तुम्हारा आता
सब के मन की जानन हारी
जग जननी सब की महतारी
तेरी ज्योत जलाता रहू में
हरदम तुम्हे ध्याता रहू मै
कई नामो से तुझे पुकारा
मुझे एक है तेरा सहारा
कही पहाड़ो पर है डेरा
कई शेहरो मै तेरा बसेरा
हर मंदिर मै तेरे नजारे
गुण गाये तेरे भगत प्यारे
भगति अपनी मुझे दिला दो
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो
इन्दर आदी देवता मिल सारे
करे पुकार तुम्हारे द्वारे
दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये
तुम ही खंडा हाथ उठाये
दासो को सदा बचाने आई
चमन की आस पुजाने आई
जय तेरी हो स्कंदमाता

जय मां कुष्मांडा🙏नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है और इस दिन विधि-विधान से मां दुर्गा की आराधना होती...
03/04/2025

जय मां कुष्मांडा🙏

नवरात्रि के चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाती है और इस दिन विधि-विधान से मां दुर्गा की आराधना होती है। भक्त उन्हें भोग में मिठाई, फल और मालपुआ अर्पित करते हैं। मान्यता है कि मां कुष्मांडा की पूजा से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। देवी पुराण के अनुसार, विद्यार्थियों को नवरात्रि में मां कुष्मांडा की पूजा अवश्य करनी चाहिए। इससे उनकी बुद्धि का विकास होता है।

मां कुष्मांडा आठ भुजाओं वाली दिव्य शक्ति हैं, उन्हें परमेश्वरी का रूप माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि मां कुष्मांडा की पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं और जिन काम में रुकावट आती है, वे भी बिना किसी बाधा के पूरे हो जाते हैं। मां कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों को सुख और सौभाग्य मिलता है। देवी पुराण में बताया गया है कि विद्यार्थियों को नवरात्रि में मां कुष्मांडा की पूजा जरूर करनी चाहिए। मां दुर्गा उनकी बुद्धि का विकास करने में सहायक होती हैं।

मां का नाम कुष्‍मांडा क्‍यों पड़ा :

देवी कुष्मांडा, दुर्गा मां का चौथा रूप हैं। देवी भागवत पुराण में उनकी महिमा का वर्णन है। माना जाता है कि उन्होंने अपनी हल्की मुस्कान से ब्रह्मांड बनाया था। इसलिए उन्हें कुष्मांडा देवी कहा जाता है। सृष्टि के आरम्भ में अंधकार था, जिसे मां ने अपनी हंसी से दूर किया। उनमें सूर्य की गर्मी सहने की शक्ति है। इसलिए, उनकी पूजा करने से भक्तों को शक्ति और ऊर्जा मिलती है।

ऐसा है मां कुष्‍मांडा का रूप :

मां कुष्मांडा का स्वरूप बहुत ही खास है। उन्हें दिव्य और अलौकिक माना जाता है। वह शेर पर सवार होती हैं। उनकी आठ भुजाएं हैं जिनमें अस्त्र होते हैं। मां कुष्मांडा हमें जीवन शक्ति देती हैं। मां कुष्मांडा शेर पर सवारी करती हैं। उनकी आठ भुजाओं में अलग-अलग चीजें हैं। इन भुजाओं में उन्होंने कमंडल, कलश, कमल और सुदर्शन चक्र पकड़ा हुआ है। मां का यह रूप हमें जीवन शक्ति प्रदान करने वाला माना गया है। मां का यह रूप हमें जीने की शक्ति देता है। मां कुष्मांडा का रूप बहुत ही दिव्य है। यह हमें शक्ति और प्रेरणा देता है।

मां कुष्‍मांडा का भोग :

मां कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि में होती है और इस दौरान भक्त मां को प्रसन्न करने के लिए कई तरह के उपाय करते हैं। मां कुष्‍मांडा की पूजा में पीले रंग का केसर वाला पेठा रखना चाहिए और उसी का भोग लगाएं। यानी मां को केसर वाला पीला पेठा चढ़ाना चाहिए और उसे ही प्रसाद के रूप में बांटना चाहिए। कुछ लोग सफेद पेठे के फल की बलि भी देते हैं। इसके अलावा, मालपुआ और बताशे भी चढ़ाए जाते हैं।

मां कुष्‍मांडा का पूजा मंत्र :-

ऊं कुष्माण्डायै नम:

बीज मंत्र: कुष्मांडा :-

ऐं ह्री देव्यै नम:

ध्यान मंत्र :-

या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां कुष्‍मांडा की पूजाविधि :

नवरात्रि के चौथे दिन, सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर पूजा की तैयारी करें। मां कुष्मांडा के व्रत का संकल्प लें। सबसे पहले गंगाजल से पूजा के स्थान को पवित्र करें और फिर लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं। उस पर मां की प्रतिमा स्थापित करें और मां कुष्मांडा का ध्यान करें। पूजा में पीले वस्त्र, फूल, फल, मिठाई, धूप, दीप, नैवेद्य और अक्षत अर्पित करें। सारी सामग्री अर्पित करने के बाद मां की आरती करें और भोग लगाएं। अंत में क्षमा याचना करें और ध्यान लगाकर दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।

मां कुष्‍मांडा की आरती :

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

जय मां चंद्रघंटा 🙏नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की अराधना की जाती है। मां को देवी दुर्गा के नौ रूपों में से एक मा...
01/04/2025

जय मां चंद्रघंटा 🙏

नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की अराधना की जाती है। मां को देवी दुर्गा के नौ रूपों में से एक माना जाता है। उनका नाम सिर पर स्थित चंद्रमा के आकार के घंटे (घंटिका) से उत्पन्न हुआ है। इनका रूप अत्यंत भव्य और डरावना होता है। वे राक्षसों और असुरों का संहार करने के लिए जानी जाती हैं। उनका स्वरूप और उपासना विशेष रूप से नवरात्रि के दौरान प्रमुख होती है।

देवी चंद्रघंटा का स्वरूप :

देवी चंद्रघंटा का रूप अत्यंत सुंदर और सशक्त है। उनका रूप घमंड और क्रोध से परे होता है। उनका चेहरा शांत और सौम्य है, जैसे कि चंद्रमा की चांदनी रात में शांति का आभास होता है। उनके माथे पर स्थित चंद्रमा के आकार का घंटा, उनके शांति और शक्ति के संयोजन का प्रतीक है। देवी चंद्रघंटा को भगवान शिव की शक्ति के रूप में पूजा जाता है।

चंद्रघंटा के 4 हाथ होते हैं, जिनमें से एक में वे एक घंटा पकड़े हुए हैं, जो उनके नाम का प्रतीक है। दूसरे हाथ में एक धनुष और तीसरे हाथ में बाण होते हैं, जो युद्ध और संघर्ष के समय उनकी वीरता और साहस का प्रतीक हैं। चौथे हाथ में देवी एक त्रिशूल पकड़े हुए हैं, जो शक्ति, नियंत्रण और धैर्य का प्रतीक है। उनके वाहन सिंह का प्रतीक है जो साहस और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि :

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जागें: प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें.
इसके पश्चात, मां को लाल और पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें.
फिर मां को कुमकुम और अक्षत अर्पित करें.
मां चंद्रघंटा को पीला रंग विशेष रूप से प्रिय है, इसलिए पूजा में पीले रंग के फूलों और वस्त्रों का उपयोग करें.
मां को पीले रंग की मिठाई और दूध से बनी खीर का भोग अर्पित करें.
पूजा के दौरान मां के मंत्रों का जाप करें.
साथ ही दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अंत में मां चंद्रघंटा की आरती करें.
इन सभी विधियों का विधिपूर्वक पालन करने से मां चंद्रघंटा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं.

चंद्रघंटा स्वरूप का स्तोत्र पाठ :

आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

मां चंद्रघंटा का मंत्र :

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

ध्यान मंत्र :

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्.
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्.
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्.
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

मां चंद्रघंटा की आरती :

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।

चंद्र समान तुम शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती।

क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।

मन की मालक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।

सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।

हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।

मूर्ति चंद्र आकार बनाएं।
सन्मुख घी की ज्योत जलाएं।

शीश झुका कहे मन की बाता।
पूर्ण आस करो जगदाता।

कांची पुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।

नाम तेरा रटू महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏आज, यानी सोमवार 31 मार्च को चैत्र नवरात्रि का दूसरा है. नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के ब्रह्म...
01/04/2025

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏

आज, यानी सोमवार 31 मार्च को चैत्र नवरात्रि का दूसरा है. नवरात्रि के दूसरे दिन देवी दुर्गा के ब्रह्मचारिणी रूप की पूजा की जाती है. मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत पवित्र और दिव्य है. मां का वर्णन शास्त्रों में ऐसी देवी के रूप में किया गया है, जो साधना और तपस्या की प्रेरणा देने वाली हैं. मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में जलपात्र होता है. मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन मां शैलपुत्री का पूजन करने से मनचाहा वरदान मिलता है. आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि, भोग, मंत्र, शुभ रंग और कथा.

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता ब्रह्मचारिणी हिमालय और देवी मैना की पुत्री हैं, जिन्होंने नारद मुनि के कहने पर भगवान शंकर की कठिन तपस्या की थी और इसके प्रभाव से ही उन्होंने भोलेनाथ को पति के रूप में प्राप्त किया था। इसके साथ ही कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि तपस्या के दौरान देवी ने तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए थे। वे हर दुख सहकर भी शंकर जी की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने बिल्व पत्र का भी त्याग कर दिया था। फिर कई हजार वर्षों तक उन्होंने निर्जल व निराहार रहकर तपस्या की, जब उन्होंने पत्तों को खाना छोड़ा तो उनका नाम अपर्णा पड़ गया। घोर तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीर्ण हो गया।

जिसे देखकर देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताकर सराहना की और कहा कि ''हे देवी आपकी तपस्या जरूर सफल होगी''। फिर कुछ समय के बाद ऐसा ही हुआ। बता दें, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से सर्वसिद्धि की प्राप्ति होती है।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि :

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए सबसे पहले सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहन लें.
मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के समय सफेद या गुलाबी रंग के शुद्ध वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है.
घर के मंदिर को अच्छी तरह साफ कर लें.
मंदिर में मां की प्रतिमा या चित्र को रखें.
मां की प्रतिमा को कुमकुम, अक्षत और भोग लगाएं.
मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र का जाप करें.
इसके बाद, मां के चरणों में पुष्प अर्पित कर आरती गाएं.

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र :

ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:

ब्रह्मचारयितुम शीलम यस्या सा ब्रह्मचारिणी।
सच्चीदानन्द सुशीला च विश्वरूपा नमोस्तुते

या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

दधाना कर मद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

मां ब्रह्मचारिणी का भोग :

मां ब्रह्मचारिणी को मीठे पकवानों का भोग अर्पित किया जाता है. विशेष रूप से मां को दूध, मिश्री से बनी मिठाइयों या पंचामृत का भोग लगाना शुभ माना जाता है.

मां ब्रह्मचारिणी शुभ रंग (Maa Brahmacharini ka Shubh Rang)
चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन का शुभ रंग गुलाबी होता है.

मां ब्रह्मचारिणी की आरती :

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।

जय मां शैलपुत्री🙏आज से मां भगवती के त्योहार की शुरुआत हो गई है. चैत्र नवरात्रि का पहला दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंक...
30/03/2025

जय मां शैलपुत्री🙏

आज से मां भगवती के त्योहार की शुरुआत हो गई है. चैत्र नवरात्रि का पहला दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन मां शैलपुत्री की उपासना की जाती है. मां शैलपुत्री नवरात्रि की पहली देवी हैं और उन्हें पर्वतों की पुत्री कहा जाता है. मां शैलपुत्री का जन्म पर्वत राज हिमालय के घर में हुआ था. वह भगवान शिव की पत्नी पार्वती का ही एक रूप हैं. मां शैलपुत्री की उपासना से भक्तों को शक्ति और साहस प्राप्त होता है.

देवी का स्वरूप : शैलपुत्री देवी का स्वरूप पहाड़ों की पुत्री के रूप में होता है. नवरात्रि की शुरुआत देवी शैलपुत्री की पूजा से होती है. देवी को पर्वत की बेटी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि संस्कृत में पुत्री का अर्थ है 'बेटी' और शैल का अर्थ है 'चट्टान' या पर्वत (शैल+पुत्री = शैलपुत्री). मां शैलपुत्री नंदी पर सवार होती हैं और उनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में कमल होता है. इस दिन भक्त देवी शैलपुत्री को शुद्ध देशी घी या उससे बने भोजन का भोग लगाते हैं, ताकि उन्हें स्वस्थ जीवन का आशीर्वाद मिले. उसका पसंदीदा रंग सफेद है.

कपड़े : शैलपुत्री देवी की पूजा के लिए सफेद रंग के कपड़े पहन सकते हैं.

भोग : शैलपुत्री देवी को गुड़ और चने का भोग लगाया जाता है.

मां शैलपुत्री की पूजा विधि :

लाल फूल: मां शैलपुत्री को लाल फूल चढ़ाने से भक्तों को शक्ति और साहस प्राप्त होता है.

लाल चुनरी: मां शैलपुत्री को लाल चुनरी चढ़ाने से भक्तों को सुख और समृद्धि प्राप्त होती है.

मंत्र जाप: मां शैलपुत्री के मंत्र का जाप करने से भक्तों को मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है.

मां शैलपुत्री की उपासना करने से भक्तों को शक्ति, साहस, सुख, और समृद्धि प्राप्त होती है.

शैलपुत्री पूजा मंत्र :

1- ॐ शं शैलपुत्री देव्यै नम:
2- सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।
3- ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।
4- या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
5- नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ का जप करें.

मां शैलपुत्री की आरती :

जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया,
जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया.

तुम्हारी महिमा अपरम्पार,
तुम्हारी शक्ति अनंत है,
तुम्हारी कृपा से हमें शक्ति मिलती है,
तुम्हारी कृपा से हमें साहस मिलता है.

जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया,
जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया.

तुम्हारी पूजा से हमें पवित्रता मिलती है,
तुम्हारी पूजा से हमें शुद्धता मिलती है,
तुम्हारी कृपा से हमें जीवन की सच्चाई मिलती है,
तुम्हारी कृपा से हमें जीवन की गति मिलती है.

जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया,
जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया.

तुम्हारी महिमा को हमेशा याद रखेंगे,
तुम्हारी शक्ति को हमेशा सम्मान देंगे,
तुम्हारी कृपा से हमें जीवन की सफलता मिलेगी,
तुम्हारी कृपा से हमें जीवन की सुख-समृद्धि मिलेगी.

जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया,
जय शैलपुत्री मैया, जय शैलपुत्री मैया.

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