Shakti Peeth Shakumbhari Devi

Directions Website

Shakti Peeth Shakumbhari Devi According to legend, she appeared to end a severe drough

Shakumbhari Devi is a Hindu goddess of nourishment and abundance, a form of Mahadevi, who is depicted with fruits and vegetables symbolizing fertility and the provision of sustenance for all beings.

जय मां चंद्रघंटा🙏आज नवरात्रि का तीसरा दिन है. तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है. मां चं...
21/03/2026

जय मां चंद्रघंटा🙏

आज नवरात्रि का तीसरा दिन है. तीसरे दिन मां दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है. मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है. मान्यता है कि मां चंद्रघंटा की सच्ची निष्ठा से पूजा-अर्चना करने से जीवन में शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन आता है. ऐसे में आइए जानते हैं मां चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, मां का भोग, शुभ रंग और कथा और आरती.

मां चंद्रघंटा का स्वरूप :-

मां चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र की आकृति होती है, जो घंटी के आकार जैसी दिखाई देती है. इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है. देवी का यह स्वरूप शांति और वीरता का प्रतीक माना जाता है. माता सिंह की सवारी करती हैं. मां की 10 भुजाएं हैं, जिनमें वे खड्ग, धनुष, बाण और त्रिशूल जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं.

मां चंद्रघंटा पूजा विधि :-

मां चंद्रघंटा की पूजा करते समय श्रद्धा और भक्ति का भाव रखना बेहद जरूरी है. सुबह स्नान करने के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें. पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करें.
मां चंद्रघंटा की प्रतिमा या चित्र को चौकी पर स्थापित करें.
रोली, अक्षत, धूप, दीपक, फूल, मिठाई और गंगाजल रखें.
ऊं देवी चंद्रघंटायै नमः मंत्र का 108 बार जाप करें.
पूजा होने के बाद मां की आरती करनी चाहिए.
माता को खीर, दूध से बनी मिठाईयां और फल का भोग लगाएं.

मां चंद्रघंटा का प्रिय भोग :-

नवरात्रि के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध और दूध से बनी मिठाइयों का भोग लगाना अत्यंत शुभ माना जाता है. खासकर खीर, दूध से बने पेड़े या सफेद मिठाई अर्पित करने से मां प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं.

पूजा में चढ़ाने वाले फूल :-

मां चंद्रघंटा को गेंदा (मैरीगोल्ड) के फूल अति प्रिय माने जाते हैं. इसके अलावा कमल या सफेद पुष्प भी अर्पित किए जा सकते हैं. फूल अर्पित करते समय सच्चे मन से प्रार्थना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है.

शुभ रंग :-

नवरात्रि के तीसरे दिन का शुभ रंग ग्रे माना जाता है. इस रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में स्थिरता आती है.

पूजा का महत्व :-

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां चंद्रघंटा की पूजा करने से साधक के अंदर साहस, आत्मविश्वास और निर्भयता का विकास होता है. साथ ही जीवन की सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और सुख-समृद्धि का मार्ग खुलता है.

मां चंद्रघंटा का मंत्र :-

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता.
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

ध्यान मंत्र :-

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्.
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्.
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्.
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्.
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

मां चंद्रघंटा की आरती :-

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती
चंद्र तेज किरणों में समाती।
क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।
सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाएं।
मूर्ति चंद्र आकार बनाएं।
सन्मुख घी की ज्योति जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बाता।
पूर्ण आस करो जगदाता।
काचीपुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटूं महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

जय मां ब्रह्मचारिणी🙏आज यानी 20 मार्च, शुक्रवार को चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है. नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी...
20/03/2026

जय मां ब्रह्मचारिणी🙏

आज यानी 20 मार्च, शुक्रवार को चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है. नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है. मां ब्रह्मचारिणी के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में जलपात्र होता है. मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी का पूजन करने से मनचाहा वरदान मिलता है. मां भक्तों के दुखों को हरने वाली और मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं. आइए जानते हैं नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने की विधि, शुभ मुहूर्त, मां ब्रह्मचारिणी के मंत्र, कथा और आरती, साथ ही जानेंगे मां को किस चीज का भोग लगाया जाता है और उन्हें कौन सा रंग प्रिय है.

मां ब्रह्मचारिणी का ऐसा है स्वरूप :-

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है, जो विद्या और ज्ञान की देवी हैं। माता की कृपा से भक्तों को सफलता और विजय प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी सफेद रंग के वस्त्र धारण किए हुए हैं और उनके एक हाथ में अष्टदल की माला तो दूसरे हाथ में कमंडल सुशोभित है। देवी का रूप बहुत सशक्त, सुंदर और सरल है। मां ब्रह्माचारिणी को तपस्या, ज्ञान और वैराग्य अधिष्ठात्री कहा जाता है। देवी के हाथों में जो अक्षयमाला और कंमडल है उन्हें शास्त्रों, तंत्र-मंत्र और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक माना गया है। मान्यता है की मां जल्दी प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा अपने भक्तों पर हमेशा बनी रहती है। देवी का स्वभाव बहुत दयालु और शांत है। सच्चे मन से और विधि पूर्वक मां ब्रह्माचारिणी की पूजा करने से मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं। साथ ही, ज्ञान और विद्या के क्षेत्र में तरक्की मिलती है।

मां ब्रह्मचारिणी के भोग :-

नवरात्रि के दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री का भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है की देवी को यह भोग लगाने से मानसिक शांति प्राप्त होती है। इसके अलावा, साधक मां ब्रह्मचारिणी को पीले रंग के फल भी अर्पित कर सकते हैं क्योंकि, इस दिन पीले रंग का बहुत खास महत्व होता है। चीनी और मिश्री का भोग लगाने से जीवन में सकारात्मकता आती है और इससे स्वास्थ्य पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि :-

चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि करने के पश्चात साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात, गंगाजल से पूजा घर को शुद्ध कर लें।
नवरात्रि में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना अत्यंत उत्तम माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय रंग पीला माना गया है। ऐसे में पीले रंग के वस्त्र धारण करके माता की पूजा करनी चाहिए।
मां ब्रह्मचारिणी को सबसे पहले पंचामृत से स्नान कराएं। इसके लिए दही, दूध, घी, चीनी और शहद का प्रयोग किया जाता है। फिर, देवी को पीले रंग के फूल, वस्त्र, फल आदि अर्पित करें।
माता को रोली, कुमकुम से तिलक करें और पूजा में धूप व दीपक अवश्य प्रज्वलित करें। इसके बाद, माता को पंखा, दूध से बने मिष्ठान, बताशे आदि का भोग लगाएं।
हवन और आहुति के लिए आप अपनी श्रद्धा अनुसार लौंग, बताशे व हवन सामग्री अग्नि में अर्पित कर सकते हैं।
देवी की पूजा करने के साथ-साथ 'मां ब्रह्मचारिणी की जय' के जयकारे पूरे परिवार के साथ अवश्य लगाने चाहिए और मंत्रों का जाप भी करें।
व्रत कथा का पाठ और आरती के साथ-साथ माता को पान का पत्ता व सुपारी चढ़ाएं। इस दिन दुर्गा सप्तशती और दुर्गा चालीसा का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन कलश देवता और नवग्रह की पूजा भी अवश्य करनी चाहिए। इसके पश्चात, शाम के समय नवग्रह की पूजा भी जरूर करें।

मां ब्रह्मचारिणी पूजा मंत्र :-

दधाना करपद्माभ्याम्, अक्षमालाकमण्डलू,
देवी प्रसीदतु मयि, ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।
ओम ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:,
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।

मां ब्रह्मचारिणी की आरती :-

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।

जय मां शैलपुत्री🙏चैत्र नवरात्रि का पर्व आज से शुरू हो रहा है। चैत्र नवरात्रि का पर्व हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में...
19/03/2026

जय मां शैलपुत्री🙏

चैत्र नवरात्रि का पर्व आज से शुरू हो रहा है। चैत्र नवरात्रि का पर्व हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। नवरात्रि के 9 दिन विधि-विधान से मां दुर्गा के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है। मां के रूप नौ देवियों की दिव्य शक्ति प्रदान करने वाले हैं। ये समय शक्ति की उपासना और नई ऊर्जा के संचार का प्रतीक है। मां दुर्गा जब आती हैं तो चारों ओर खुशियां लाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता रानी की पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है और मां दुर्गा अपना आशीर्वाद सदैव बनाए रखती हैं। पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि का पर्व 19 मार्च से शुरू हो रहा है और इसका समापन 27 मार्च को राम नवमी के साथ होगा। इस चैत्र नवरात्रि पर, आइए हम इन संदेशों के माध्यम से अपने परिवार, मित्रों और शुभचिंतकों को शुभकामनाएं भेजें, ताकि उन पर भी मां जगदंबा की असीम कृपा बनी रहे।

मां शैलपुत्री का स्वरूप :-

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। देवी भागवत पुराण के अनुसार आदिशक्ति का यह प्रथम रूप शांत और तेजस्वी है। वृषभ पर सवार श्वेत वर्ण में मां के दाहिने हाथ में त्रिशुल है जो शक्ति का प्रतीक है। मां के बाएं हाथ में कमल का फूल पवित्रता को दर्शाता है। वहीं, मां के मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा का जन्म पर्वत राज हिमालय के घर हुआ था। इस वजह से मां के इस अवतार को शैलपुत्री कहा जाता है। जिसका अर्थ होता है पर्वत की पुत्री। मां की सवारी बैल होने से उन्हें वृषारुधा के नाम से भी जाता जाता है।

मां शैलपुत्री की पूजा विधि :-

नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ कपड़े पहनें।
चौकी को गंगाजल से शुद्ध करके उस पर मां शैलपुत्री की प्रतिमा स्थापित करें।
इसके बाद मां को सिंदूर, अक्षत और सफेद या लाल फूल अर्पित करें।
विधिपूर्वक कलश की स्थापना करें और घी का दीपक जलाएं।
मां शैलपुत्री की पूजा षोडशोपचार विधि से करें, जो 16 चरणों से होती है।
इसके बाद कपूर या घी के दीपक से मां शैलपुत्री की आरती उतारें।
इसके बाद पूजा में हुई गलती के लिए मां से क्षमा याचना करें।
पूजा के बाद पूजा के बाद दुर्गा स्तुति या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।

मां शैलपुत्री का भोग :-

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को सफेद रंग की वस्तुओं का भोग लगाना अत्यंत ही शुभ माना जाता है। मां को सफेद रंग की वस्तुएं प्रिय हैं। सफेद रंग को शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता इसलिए मां को गाय के दूध से बनी खीर या सफेद मिठाई का भोग लगाया जाता है। भोग बनाते समय गाय के घी का प्रयोग करना उत्तम माना गया है। मां को सफेद वस्तुओं का भोग लगाने से आरोग्य की प्राप्ति होती है।

मां शैलपुत्री का मंत्र :-

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्,
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता।
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम्,
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्।
या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:,
ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

मां शैलपुत्री की आरती :-

शैलपुत्री मां बैल पर सवार, करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी, तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे, जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू, दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी, आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो, सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के, गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं, प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अम्बे, शिव मुख चंद्र चकोरी अम्बे।
मनोकामना पूर्ण कर दो, भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।
जोर से बोलो जय माता दी, सारे बोले जय माता दी।

मां शैलपुत्री व्रत कथा :-

पौराणिक कथा के अनुसार, पूर्व जन्म में मां शैलपुत्री देवी सती के रुप में प्रकट हुई थीं। देवी सती प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया और उसके लिए सभी देवताओं को निमंत्रित भिजवाया। बस उन्होंने भगवान शिव को निमंत्रण नहीं भेजा। देवी सती पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ में जाना चाहती थीं। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि यज्ञ में सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया है, लेकिन हमें नहीं बुलाया गया। ऐसे में वहाँ जाना उचित नहीं है।
भगवान शिव के बार-बार समझाने के बाद भी देवी सती वहां जाने की जिद पर अड़ी रहीं। ऐसे में भगवान शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी। देवी सती जब अपने पिता के घर पहुंची तो मां ने उन्हें स्नेह दिया। इनकी माता को छोड़कर सभी ने उनका उपहास किया। बहनों की बातों में भी व्यंग झलक रहा था। भगवान शिव के प्रति तिरस्कार का भाव था। प्रजापति दक्ष ने भी उनके लिए सामने भगवान शिव के लिए अपशब्द कहें। अपने पिता द्वारा किए गए अपमान के चलते सती बहुत आहत हुईं। उस समय देवी सती ने खुद को अग्नि में जलाकर भस्म कर लिया।
भगवान शंकर को जब यह बात पता चली तो वह बहुत क्रोधित हो गए और और उन्होंने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके बाद, सती ने अगले जन्म में शैलराज हिमालय के घर जन्म लिया। इसीलिए उन्हें शैलपुत्री कहा गया। आगे चलकर उनका विवाह भगवान शिव से हुआ और वो दोबारा उनकी अर्धांगिनी बन गईं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा-अर्चना करने से जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
19/03/2026

चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

जय माता शक्तिपीठ शाकम्भरी देवी की जय🙏शाकुंभरी देवी हिंदू धर्म में पोषण और समृद्धि की देवी हैं, जो महादेवी का एक रूप हैं।...
19/03/2026

जय माता शक्तिपीठ शाकम्भरी देवी की जय🙏

शाकुंभरी देवी हिंदू धर्म में पोषण और समृद्धि की देवी हैं, जो महादेवी का एक रूप हैं। उन्हें फलों और सब्जियों के साथ चित्रित किया जाता है, जो उर्वरता और सभी प्राणियों के लिए जीविका प्रदान करने का प्रतीक हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, वे भीषण सूखे को समाप्त करने के लिए प्रकट हुईं।

जय मां कूष्मांडा 🙏25 सितंबर को आश्विन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गुरुवार का दिन है। चतुर्थी तिथि 25 सितंबर को पूरा दिन प...
25/09/2025

जय मां कूष्मांडा 🙏

25 सितंबर को आश्विन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गुरुवार का दिन है। चतुर्थी तिथि 25 सितंबर को पूरा दिन पूरी रात पार करके 26 तारीख की सुबह 9 बजकर 34 मिनट तक रहेगी। गुरुवार के दिन नवरात्र का चौथा दिन है। नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्माण्डा की पूजा की जाती है। अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कुष्माण्डा कुम्हड़े को कहा जाता है और कुम्हड़े की बलि इन्हें बहुत प्रिय है, जिसके कारण भी इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। माता का वाहन सिंह है। मां कुष्माण्डा की आठ भुजायें होने के कारण इन्हें अष्टभुजा वाली भी कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा नजर आता है तो आठवें हाथ में जप की माला। कहते हैं इस जप की माला में सभी सिद्धियों और निधियों का संग्रह है।

कुष्माण्डा देवी थोड़ी-सी सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न हो जाती हैं। जो साधक सच्चे मन से इनकी शरण में आता है उसे आसानी से परम पद की प्राप्ति हो जाती है। मां कुष्माण्डा को लाल रंग के फूल पसंद हैं। साथ ही परिवार में खुशहाली के लिये, अच्छे स्वास्थ्य के लिये और यश, बल तथा लंबी उम्र की प्राप्ति के लिये आज के दिन मां कुष्माण्डा की पूजा के साथ भजन, कीर्तन, कथा और मंत्रों का जप किया जाता है।

माता कुष्मांडा का प्रिय भोग :-

माता कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन माता की विधिवत पूजा के साथ ही उनका प्रिय भोग भी भक्तों को अर्पित करना चाहिए। माता कुष्मांडा को मालपुआ अतिप्रिय है इसलिए मालपुए का भोग इस दिन माता को लगाना चाहिए। इसके साथ ही दही और हलवे का भोग भी माता को लगा सकते हैं।

माता कुष्मांडा का प्रिय रंग :-

माता कुष्मांडा को हरा रंग अतिप्रिय है, इसलिए भक्तों को नवरात्रि के चौथे दिन हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए। इस दिन हरे रंग के कपड़े और अन्न का दान करने से भी माता का आशीर्वाद आपका प्राप्त होता है।

कैसे करें मां कूष्मांडा की पूजा :-

हिंदू मान्यता के अनुसार नवरात्रि के 9 दिन शक्ति की साधना के लिए बेहद शुभ माने गये हैं और इसका इंतजार शक्ति के साधक पूरे साल करते हैं, ताकि उन पर मां भगवती की कृपा बरसे. नवरात्रि का चौथा दिन मां कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है. सनातन मान्यता के अनुसार मां कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की थी. अष्टभुजा कूष्मांडा ने अपने दाएं हाथ में कमल, धनुष, बाण और कमंडल लिया हुआ है जबकि उनके बाएं हाथ में गदा, चक्र और जप माला है. आइए मां कूष्मांडा की पूजा की विधि और मंत्र के बारे में जानते हैं.

मां कूष्मांडा की पूजा करने के लिए साधक को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए. इसके बाद देवी कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद अपने पूजा घर में या फिर घर के ईशान कोड़ में एक चौकी पर पीले रंग का आसन बिछाकर उस पर माता की तस्वीर या मूर्ति रखें. इसके बाद उस मूर्ति या चित्र पर गंगाजल या पवित्र जल छिड़कें.

इसके बाद देवी कूष्मांडा की फल-फूल, रोली-चंदन, अक्षत, धूप-दीप, वस्त्र-मिठाई आदि अर्पित करते हुए विधि-विधान से पूजा करें. पूजा में माता को पीले रंग की मिठाई का ही भोग लगाएं और उसके बाद दुर्गा सप्तशती या फिर दुर्गा चालीसा का पाठ करें. पूजा के अंत में मां कूष्मांडा की आरती का पाठ करें और पूजा में भूल-चूक की माफी मांगते हुए अपने लिए मंगलकामना करें.

माता कुष्मांडा की कथा :-

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित माता कुष्मांडा की कथा के अनुसार, त्रिदेवों ने जब सृष्टि की रचना शुरू की तो उस समय ब्रह्मांड अंधकार से भरा था। चारों ओर अंधेरा और सन्नाटा था। तब त्रिदेवों ने मां दुर्गा से सहायता ली और माता दुर्गा के कुष्मांडा स्वरूप ने ब्रह्मांड की रचना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा के मुख मंडल पर बनी मुस्कान ने पूरे ब्रह्मांड में ऊजाला फैला दिया। माना जाता है कि माता कुष्मांडा एक मात्र देवी हैं जो सूर्य लोक में निवास करती हैं।

माता कुष्मांडा के मंत्र :-

ऊं कुष्माण्डायै नम:।
कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:।
'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं कुष्मांडायै नम:।
न्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्।।

आरती देवी कूष्माण्डा जी की :-

कूष्माण्डा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिङ्गला ज्वालामुखी निराली।
शाकम्बरी मां भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे।
सुख पहुंचाती हो माँ अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

जय मां चंद्रघंटा 🙏नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। यह रूप शांति...
24/09/2025

जय मां चंद्रघंटा 🙏

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। यह रूप शांति, साहस और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। बाघ पर सवार माँ का तेजस्वी रूप भक्तों को निर्भय बनाता है, वहीं उनका सौम्य स्वरूप शांति और सुख प्रदान करता है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप :-

स्वर्ण के समान चमकते शरीर वाली मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिससे इन्हें यह नाम प्राप्त हुआ। दस भुजाओं वाली देवी के हाथों में विभिन्न शस्त्र हैं और उनके गले में सफेद पुष्पों की माला रहती है। युद्ध के लिए सदा तत्पर होने पर भी इनका स्वरूप भक्तों के लिए करुणामयी और सौम्य है।

घंटे की ध्वनि से होती है रक्षा :-

मां के घंटे की ध्वनि से दुष्ट, दैत्य और राक्षस भयभीत रहते हैं। यही ध्वनि भक्तों को प्रेत-बाधा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है। विश्वास किया जाता है कि जैसे ही भक्त माँ का ध्यान करता है, वैसे ही यह दिव्य ध्वनि उसकी रक्षा के लिए गूंज उठती है।

साधना और आध्यात्मिक लाभ :-

मां चंद्रघंटा की साधना से साधक का मन ‘मणिपुर चक्र’ में प्रविष्ट होता है, जिससे उसे अलौकिक वस्तुओं का अनुभव होता है। ऐसे भक्त के शरीर से दिव्य प्रकाश का अदृश्य विकिरण प्रसारित होता है, जो आसपास के लोगों को भी शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

पूजा का महत्व और फल :-

मां चंद्रघंटा की आराधना करने से भक्त को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि का वरदान मिलता है। उनके आशीर्वाद से पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। साथ ही साधक में साहस, निर्भयता, विनम्रता और सौम्यता का विकास होता है। उसके व्यक्तित्व में तेज, आकर्षण और मधुरता स्वतः बढ़ जाती है।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि :-

नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में साफ-सुथरी जगह पर मां चंद्रघंटा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां की प्रतिमा रखें। दीपक जलाएं और गंगाजल से शुद्धिकरण करें।

पूजन के लिए घी, दूध, शहद, फूल (विशेषकर चमेली और पीले फूल), चंदन, सिंदूर, धूप, दीप, मिठाइयां, फल, नारियल, पान, सुपारी आदि सामग्री का उपयोग करें। मां को लाल वस्त्र और खीर का भोग अर्पित करें, क्योंकि मां को लाल रंग और दूध से बनी चीजें प्रिय हैं।

पूजन के बाद श्रद्धा और भक्ति भाव से देवी के मंत्रों का जप करें और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। शाम को पुनः आरती करें और मां को पुष्प और दीप अर्पित करें।

मां चंद्रघंटा का मंत्र :-

प्रार्थना मंत्र :-

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

पूजा मंत्र :- ओम देवी चन्द्रघण्टायै नमः

बीज मंत्र :- ऐं श्रीं शक्तयै नमः

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

मां चंद्रघंटा की आरती :-

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती।
क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालिक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।
सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाए।
मूर्ति चंद्र आकार बनाए।
सन्मुख घी की ज्योति जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बात।
पूर्ण आस करो जगदाता।
कांचीपुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटूं महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏23 सितंबर को नवरात्रि का दूसरा दिन है, जो तप की देवी मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। आइए इस लेख में...
24/09/2025

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏

23 सितंबर को नवरात्रि का दूसरा दिन है, जो तप की देवी मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। आइए इस लेख में मां ब्रह्मचारिणी की संपूर्ण पूजा विधि, प्रिय भोग, कथा, प्रभावशाली मंत्र और आरती, के बारे में जानते हैं ताकि आपकी दूसरे दिन की पूजा अच्छे से संपन्न हो सके।

23 सितंबर 2025 यानी आज शारदीय नवरात्रि के दूसरा दिन है। आज के दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।

मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप :-

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत और ज्योतिर्मय है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनके दाहिने हाथ में जप की माला (अक्षमाला) और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह तपस्विनी रूप भक्तों को निरंतर साधना और कर्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। देवी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति में तप, त्याग, और संयम जैसे गुणों का विकास होता है।

मां का यह स्वरूप ज्ञान, वैराग्य, संयम और तप का प्रतीक है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से देवी के इस स्वरूप की उपासना करता है, उसकी कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है और उसे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप, पूजा विधि, भोग, कथा, मंत्र और संपूर्ण आरती।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि :-

आज सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। देवी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें सफेद या पीले पुष्प, विशेषकर चमेली का फूल, रोली, अक्षत, और चंदन अर्पित करें। धूप और घी का दीपक जलाकर देवी के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें।

मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग :-

मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर (चीनी) और फलों का भोग अत्यंत प्रिय है। आप उन्हें चीनी, मिश्री या पंचामृत का भोग लगा सकते हैं। मान्यता है कि देवी को शक्कर का भोग लगाने से वे प्रसन्न होती हैं और परिवार के सभी सदस्यों को उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु (दीर्घायु) का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा :-

पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल और बेलपत्र खाकर खाकर तप किया और बाद में निर्जल और निराहार रहकर साधना की। उनकी इसी कठोर तपस्या के कारण उन्हें 'ब्रह्मचारिणी' नाम से जाना गया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई।

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र :-

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप करने से वो प्रसन्न होती हैं और ज्ञान तथा एकाग्रता का वरदान देती हैं।

बीज मंत्र :-

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

मां ब्रह्मचारिणी आरती :-

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।

जय मां शैलपुत्री 🙏नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री: शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है. आज नवरात्रि का पहला दिन ह...
24/09/2025

जय मां शैलपुत्री 🙏

नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री: शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है. आज नवरात्रि का पहला दिन है, जो कि मां शैलपुत्री को समर्पित होता है. इस दिन लोग घटस्थापना यानी कलश स्थापना भी करते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें और देवी को क्या भोग लगाएं.

नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है. देवी दुर्गा के शक्ति का पर्व आज 22 सितंबर से शुरू हो गया है. नवरात्रि के हर दिन देवी के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है. आज नवरात्रि का पहला दिन है, जो कि मां शैलपुत्री को समर्पित होता है. इस दिन लोग कलश स्थापना करते हैं, शैलपुत्री देवी की पूजा करते हैं, उनके मंत्र जाप करते हैं और मां शैलपुत्री की आरती करते हैं. इस लेख में हम आपको बताएंगे नवरात्रि के पहले दिन से जुड़ी सारी जरूरी जानकारी.

नवरात्रि में पहले दिन कौन से रंग के कपड़े पहनने चाहिए :-

नवरात्रि के दौरान आप हर दिन मां दुर्गा के नौ रूपों के अनुसार विभिन्न रंगों के कपड़े पहनने चाहिए. नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है और इस दिन सफेद रंग के कपड़े पहनने चाहिए. नवरात्रि के पहले दिन सफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है.

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें :-

स्नान और वस्त्र धारण:- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सफेद रंग के कपड़े धारण करें.

कलश स्थापना :- शुभ मुहूर्त में एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें. फिर मिट्टी में जौ बोकर वेदी तैयार कर कलश स्थापित करें.

अखंड ज्योति :- मां शैलपुत्री के सामने अखंड ज्योति प्रज्वलित करें.

गणेश पूजन :- सबसे पहले भगवान गणेश का आह्वान कर उन्हें चंदन, फूल अर्पित करें और उनका तिलक करें.

मां शैलपुत्री का आह्वान :- फिर हाथों में लाल फूल लेकर मां शैलपुत्री का आह्वान करें.

शृंगार :- माता को कुमकुम, अक्षत (चावल), सिंदूर, धूप, गंध, और फूल अर्पित करें.

मंत्र जाप :- पूजा के दौरान मां शैलपुत्री के मंत्रों का जप करें.

आरती :- घी का दीपक जलाकर मां शैलपुत्री की आरती करें और शंखनाद-घंटी बजाएं.

प्रसाद अर्पण :- नवरात्रि के पहले मां शैलपुत्री को गाय के दूध से बनी खीर या मीठे प्रसाद का भोग लगाएं.

क्षमा याचना :- पूजा संपन्न करने के बाद अपनी गलतियों की क्षमा मांगें और प्रसाद सभी में बांटें.

दुर्गा चालीसा या सप्तशती :- आप मां दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ भी कर सकते हैं.

नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री मंत्र क्या है :-

“ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः”.

शैलपुत्री स्तोत्र :-

‘वंदे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥’

‘या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’

शैलपुत्री का भोग क्या है :-

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को गाय के दूध और घी से बनी चीजें, जैसे खीर, रबड़ी, सफेद बर्फी, मावा के लड्डू और कद्दू के हलवे का भोग लगाना शुभ माना जाता है. मां शैलपुत्री को इन चीजों का भोग लगाने से घर में सुख-शांति आती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं.

मां शैलपुत्री की आरती :-

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

23/09/2025

Navratri का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जो देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में से दूसरा रूप हैं. इस दिन भक्तगण ज्ञान और तपस्या की देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे जीवन में धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. मां ब्रह्मचारिणी को गुड़हल और कमल के फूल बहुत प्रिय हैं, और उन्हें भोग में चीनी, मिश्री, और पंचामृत चढ़ाया जाता है

Address

Jasmor
Saharanpur
247121

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Shakti Peeth Shakumbhari Devi posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

Category