Shakti Peeth Shakumbhari Devi

Shakti Peeth Shakumbhari Devi According to legend, she appeared to end a severe drough

Shakumbhari Devi is a Hindu goddess of nourishment and abundance, a form of Mahadevi, who is depicted with fruits and vegetables symbolizing fertility and the provision of sustenance for all beings.

जय मां कूष्मांडा 🙏25 सितंबर को आश्विन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गुरुवार का दिन है। चतुर्थी तिथि 25 सितंबर को पूरा दिन प...
25/09/2025

जय मां कूष्मांडा 🙏

25 सितंबर को आश्विन शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि गुरुवार का दिन है। चतुर्थी तिथि 25 सितंबर को पूरा दिन पूरी रात पार करके 26 तारीख की सुबह 9 बजकर 34 मिनट तक रहेगी। गुरुवार के दिन नवरात्र का चौथा दिन है। नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्माण्डा की पूजा की जाती है। अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। संस्कृत भाषा में कुष्माण्डा कुम्हड़े को कहा जाता है और कुम्हड़े की बलि इन्हें बहुत प्रिय है, जिसके कारण भी इन्हें कुष्माण्डा के नाम से जाना जाता है। माता का वाहन सिंह है। मां कुष्माण्डा की आठ भुजायें होने के कारण इन्हें अष्टभुजा वाली भी कहा जाता है। इनके सात हाथों में कमण्डल, धनुष, बाण, कमल, अमृत से भरा कलश, चक्र तथा गदा नजर आता है तो आठवें हाथ में जप की माला। कहते हैं इस जप की माला में सभी सिद्धियों और निधियों का संग्रह है।

कुष्माण्डा देवी थोड़ी-सी सेवा और भक्ति से ही प्रसन्न हो जाती हैं। जो साधक सच्चे मन से इनकी शरण में आता है उसे आसानी से परम पद की प्राप्ति हो जाती है। मां कुष्माण्डा को लाल रंग के फूल पसंद हैं। साथ ही परिवार में खुशहाली के लिये, अच्छे स्वास्थ्य के लिये और यश, बल तथा लंबी उम्र की प्राप्ति के लिये आज के दिन मां कुष्माण्डा की पूजा के साथ भजन, कीर्तन, कथा और मंत्रों का जप किया जाता है।

माता कुष्मांडा का प्रिय भोग :-

माता कुष्मांडा की पूजा नवरात्रि के चौथे दिन की जाती है। इस दिन माता की विधिवत पूजा के साथ ही उनका प्रिय भोग भी भक्तों को अर्पित करना चाहिए। माता कुष्मांडा को मालपुआ अतिप्रिय है इसलिए मालपुए का भोग इस दिन माता को लगाना चाहिए। इसके साथ ही दही और हलवे का भोग भी माता को लगा सकते हैं।

माता कुष्मांडा का प्रिय रंग :-

माता कुष्मांडा को हरा रंग अतिप्रिय है, इसलिए भक्तों को नवरात्रि के चौथे दिन हरे रंग के कपड़े पहनने चाहिए। इस दिन हरे रंग के कपड़े और अन्न का दान करने से भी माता का आशीर्वाद आपका प्राप्त होता है।

कैसे करें मां कूष्मांडा की पूजा :-

हिंदू मान्यता के अनुसार नवरात्रि के 9 दिन शक्ति की साधना के लिए बेहद शुभ माने गये हैं और इसका इंतजार शक्ति के साधक पूरे साल करते हैं, ताकि उन पर मां भगवती की कृपा बरसे. नवरात्रि का चौथा दिन मां कूष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है. सनातन मान्यता के अनुसार मां कूष्मांडा ने ब्रह्मांड की रचना की थी. अष्टभुजा कूष्मांडा ने अपने दाएं हाथ में कमल, धनुष, बाण और कमंडल लिया हुआ है जबकि उनके बाएं हाथ में गदा, चक्र और जप माला है. आइए मां कूष्मांडा की पूजा की विधि और मंत्र के बारे में जानते हैं.

मां कूष्मांडा की पूजा करने के लिए साधक को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान-ध्यान करना चाहिए. इसके बाद देवी कूष्मांडा की विधि-विधान से पूजा और व्रत करने का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद अपने पूजा घर में या फिर घर के ईशान कोड़ में एक चौकी पर पीले रंग का आसन बिछाकर उस पर माता की तस्वीर या मूर्ति रखें. इसके बाद उस मूर्ति या चित्र पर गंगाजल या पवित्र जल छिड़कें.

इसके बाद देवी कूष्मांडा की फल-फूल, रोली-चंदन, अक्षत, धूप-दीप, वस्त्र-मिठाई आदि अर्पित करते हुए विधि-विधान से पूजा करें. पूजा में माता को पीले रंग की मिठाई का ही भोग लगाएं और उसके बाद दुर्गा सप्तशती या फिर दुर्गा चालीसा का पाठ करें. पूजा के अंत में मां कूष्मांडा की आरती का पाठ करें और पूजा में भूल-चूक की माफी मांगते हुए अपने लिए मंगलकामना करें.

माता कुष्मांडा की कथा :-

धार्मिक ग्रंथों में वर्णित माता कुष्मांडा की कथा के अनुसार, त्रिदेवों ने जब सृष्टि की रचना शुरू की तो उस समय ब्रह्मांड अंधकार से भरा था। चारों ओर अंधेरा और सन्नाटा था। तब त्रिदेवों ने मां दुर्गा से सहायता ली और माता दुर्गा के कुष्मांडा स्वरूप ने ब्रह्मांड की रचना की। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा के मुख मंडल पर बनी मुस्कान ने पूरे ब्रह्मांड में ऊजाला फैला दिया। माना जाता है कि माता कुष्मांडा एक मात्र देवी हैं जो सूर्य लोक में निवास करती हैं।

माता कुष्मांडा के मंत्र :-

ऊं कुष्माण्डायै नम:।
कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:।
'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं कुष्मांडायै नम:।
न्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्।।

आरती देवी कूष्माण्डा जी की :-

कूष्माण्डा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥
पिङ्गला ज्वालामुखी निराली।
शाकम्बरी मां भोली भाली॥
लाखों नाम निराले तेरे।
भक्त कई मतवाले तेरे॥
भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥
सबकी सुनती हो जगदम्बे।
सुख पहुंचाती हो माँ अम्बे॥
तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥
माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥
तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥
मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥
तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

जय मां चंद्रघंटा 🙏नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। यह रूप शांति...
24/09/2025

जय मां चंद्रघंटा 🙏

नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा का विशेष महत्व है। यह रूप शांति, साहस और कल्याण का प्रतीक माना जाता है। बाघ पर सवार माँ का तेजस्वी रूप भक्तों को निर्भय बनाता है, वहीं उनका सौम्य स्वरूप शांति और सुख प्रदान करता है।

मां चंद्रघंटा का स्वरूप :-

स्वर्ण के समान चमकते शरीर वाली मां चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिससे इन्हें यह नाम प्राप्त हुआ। दस भुजाओं वाली देवी के हाथों में विभिन्न शस्त्र हैं और उनके गले में सफेद पुष्पों की माला रहती है। युद्ध के लिए सदा तत्पर होने पर भी इनका स्वरूप भक्तों के लिए करुणामयी और सौम्य है।

घंटे की ध्वनि से होती है रक्षा :-

मां के घंटे की ध्वनि से दुष्ट, दैत्य और राक्षस भयभीत रहते हैं। यही ध्वनि भक्तों को प्रेत-बाधा और नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखती है। विश्वास किया जाता है कि जैसे ही भक्त माँ का ध्यान करता है, वैसे ही यह दिव्य ध्वनि उसकी रक्षा के लिए गूंज उठती है।

साधना और आध्यात्मिक लाभ :-

मां चंद्रघंटा की साधना से साधक का मन ‘मणिपुर चक्र’ में प्रविष्ट होता है, जिससे उसे अलौकिक वस्तुओं का अनुभव होता है। ऐसे भक्त के शरीर से दिव्य प्रकाश का अदृश्य विकिरण प्रसारित होता है, जो आसपास के लोगों को भी शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

पूजा का महत्व और फल :-

मां चंद्रघंटा की आराधना करने से भक्त को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख और समृद्धि का वरदान मिलता है। उनके आशीर्वाद से पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। साथ ही साधक में साहस, निर्भयता, विनम्रता और सौम्यता का विकास होता है। उसके व्यक्तित्व में तेज, आकर्षण और मधुरता स्वतः बढ़ जाती है।

मां चंद्रघंटा की पूजा विधि :-

नवरात्रि के तीसरे दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा के लिए घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में साफ-सुथरी जगह पर मां चंद्रघंटा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर मां की प्रतिमा रखें। दीपक जलाएं और गंगाजल से शुद्धिकरण करें।

पूजन के लिए घी, दूध, शहद, फूल (विशेषकर चमेली और पीले फूल), चंदन, सिंदूर, धूप, दीप, मिठाइयां, फल, नारियल, पान, सुपारी आदि सामग्री का उपयोग करें। मां को लाल वस्त्र और खीर का भोग अर्पित करें, क्योंकि मां को लाल रंग और दूध से बनी चीजें प्रिय हैं।

पूजन के बाद श्रद्धा और भक्ति भाव से देवी के मंत्रों का जप करें और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। शाम को पुनः आरती करें और मां को पुष्प और दीप अर्पित करें।

मां चंद्रघंटा का मंत्र :-

प्रार्थना मंत्र :-

पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥

पूजा मंत्र :- ओम देवी चन्द्रघण्टायै नमः

बीज मंत्र :- ऐं श्रीं शक्तयै नमः

स्तुति मंत्र :-

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

मां चंद्रघंटा की आरती :-

जय मां चंद्रघंटा सुख धाम।
पूर्ण कीजो मेरे सभी काम।
चंद्र समान तुम शीतल दाती।
चंद्र तेज किरणों में समाती।
क्रोध को शांत करने वाली।
मीठे बोल सिखाने वाली।
मन की मालिक मन भाती हो।
चंद्र घंटा तुम वरदाती हो।
सुंदर भाव को लाने वाली।
हर संकट मे बचाने वाली।
हर बुधवार जो तुझे ध्याये।
श्रद्धा सहित जो विनय सुनाए।
मूर्ति चंद्र आकार बनाए।
सन्मुख घी की ज्योति जलाएं।
शीश झुका कहे मन की बात।
पूर्ण आस करो जगदाता।
कांचीपुर स्थान तुम्हारा।
करनाटिका में मान तुम्हारा।
नाम तेरा रटूं महारानी।
भक्त की रक्षा करो भवानी।

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏23 सितंबर को नवरात्रि का दूसरा दिन है, जो तप की देवी मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। आइए इस लेख में...
24/09/2025

जय माँ ब्रह्मचारिणी 🙏

23 सितंबर को नवरात्रि का दूसरा दिन है, जो तप की देवी मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित है। आइए इस लेख में मां ब्रह्मचारिणी की संपूर्ण पूजा विधि, प्रिय भोग, कथा, प्रभावशाली मंत्र और आरती, के बारे में जानते हैं ताकि आपकी दूसरे दिन की पूजा अच्छे से संपन्न हो सके।

23 सितंबर 2025 यानी आज शारदीय नवरात्रि के दूसरा दिन है। आज के दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जाती है। 'ब्रह्म' का अर्थ है तपस्या और 'चारिणी' का अर्थ है आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।

मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप :-

मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत और ज्योतिर्मय है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और उनके दाहिने हाथ में जप की माला (अक्षमाला) और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह तपस्विनी रूप भक्तों को निरंतर साधना और कर्तव्य पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। देवी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति में तप, त्याग, और संयम जैसे गुणों का विकास होता है।

मां का यह स्वरूप ज्ञान, वैराग्य, संयम और तप का प्रतीक है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से देवी के इस स्वरूप की उपासना करता है, उसकी कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है और उसे जीवन के हर क्षेत्र में सफलता मिलती है। आइए जानते हैं मां ब्रह्मचारिणी का दिव्य स्वरूप, पूजा विधि, भोग, कथा, मंत्र और संपूर्ण आरती।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधि :-

आज सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। देवी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं। इसके बाद उन्हें सफेद या पीले पुष्प, विशेषकर चमेली का फूल, रोली, अक्षत, और चंदन अर्पित करें। धूप और घी का दीपक जलाकर देवी के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करें।

मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग :-

मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर (चीनी) और फलों का भोग अत्यंत प्रिय है। आप उन्हें चीनी, मिश्री या पंचामृत का भोग लगा सकते हैं। मान्यता है कि देवी को शक्कर का भोग लगाने से वे प्रसन्न होती हैं और परिवार के सभी सदस्यों को उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु (दीर्घायु) का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।

मां ब्रह्मचारिणी की कथा :-

पौराणिक कथा के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल और बेलपत्र खाकर खाकर तप किया और बाद में निर्जल और निराहार रहकर साधना की। उनकी इसी कठोर तपस्या के कारण उन्हें 'ब्रह्मचारिणी' नाम से जाना गया और उनकी मनोकामना पूर्ण हुई।

मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र :-

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा के दौरान इन मंत्रों का जाप करने से वो प्रसन्न होती हैं और ज्ञान तथा एकाग्रता का वरदान देती हैं।

बीज मंत्र :-

ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः॥

या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

मां ब्रह्मचारिणी आरती :-

जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।

ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।

ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।

जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।

कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।

उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।

रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।

आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।

ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।

भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।

जय मां शैलपुत्री 🙏नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री: शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है. आज नवरात्रि का पहला दिन ह...
24/09/2025

जय मां शैलपुत्री 🙏

नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री: शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शुरू हो गया है. आज नवरात्रि का पहला दिन है, जो कि मां शैलपुत्री को समर्पित होता है. इस दिन लोग घटस्थापना यानी कलश स्थापना भी करते हैं. चलिए आपको बताते हैं कि नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें और देवी को क्या भोग लगाएं.

नवरात्रि का पर्व हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसे पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है. देवी दुर्गा के शक्ति का पर्व आज 22 सितंबर से शुरू हो गया है. नवरात्रि के हर दिन देवी के अलग-अलग स्वरूप की पूजा की जाती है. आज नवरात्रि का पहला दिन है, जो कि मां शैलपुत्री को समर्पित होता है. इस दिन लोग कलश स्थापना करते हैं, शैलपुत्री देवी की पूजा करते हैं, उनके मंत्र जाप करते हैं और मां शैलपुत्री की आरती करते हैं. इस लेख में हम आपको बताएंगे नवरात्रि के पहले दिन से जुड़ी सारी जरूरी जानकारी.

नवरात्रि में पहले दिन कौन से रंग के कपड़े पहनने चाहिए :-

नवरात्रि के दौरान आप हर दिन मां दुर्गा के नौ रूपों के अनुसार विभिन्न रंगों के कपड़े पहनने चाहिए. नवरात्रि का पहला दिन मां शैलपुत्री को समर्पित है और इस दिन सफेद रंग के कपड़े पहनने चाहिए. नवरात्रि के पहले दिन सफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है.

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा कैसे करें :-

स्नान और वस्त्र धारण:- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सफेद रंग के कपड़े धारण करें.

कलश स्थापना :- शुभ मुहूर्त में एक चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर मां दुर्गा की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें. फिर मिट्टी में जौ बोकर वेदी तैयार कर कलश स्थापित करें.

अखंड ज्योति :- मां शैलपुत्री के सामने अखंड ज्योति प्रज्वलित करें.

गणेश पूजन :- सबसे पहले भगवान गणेश का आह्वान कर उन्हें चंदन, फूल अर्पित करें और उनका तिलक करें.

मां शैलपुत्री का आह्वान :- फिर हाथों में लाल फूल लेकर मां शैलपुत्री का आह्वान करें.

शृंगार :- माता को कुमकुम, अक्षत (चावल), सिंदूर, धूप, गंध, और फूल अर्पित करें.

मंत्र जाप :- पूजा के दौरान मां शैलपुत्री के मंत्रों का जप करें.

आरती :- घी का दीपक जलाकर मां शैलपुत्री की आरती करें और शंखनाद-घंटी बजाएं.

प्रसाद अर्पण :- नवरात्रि के पहले मां शैलपुत्री को गाय के दूध से बनी खीर या मीठे प्रसाद का भोग लगाएं.

क्षमा याचना :- पूजा संपन्न करने के बाद अपनी गलतियों की क्षमा मांगें और प्रसाद सभी में बांटें.

दुर्गा चालीसा या सप्तशती :- आप मां दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ भी कर सकते हैं.

नवरात्रि का पहला दिन शैलपुत्री मंत्र क्या है :-

“ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः”.

शैलपुत्री स्तोत्र :-

‘वंदे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥’

‘या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥’

शैलपुत्री का भोग क्या है :-

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री को गाय के दूध और घी से बनी चीजें, जैसे खीर, रबड़ी, सफेद बर्फी, मावा के लड्डू और कद्दू के हलवे का भोग लगाना शुभ माना जाता है. मां शैलपुत्री को इन चीजों का भोग लगाने से घर में सुख-शांति आती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं.

मां शैलपुत्री की आरती :-

शैलपुत्री मां बैल असवार। करें देवता जय जयकार।
शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।
पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।
ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।
सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।
उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।
घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।
श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।
जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।
मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।

23/09/2025

Navratri का दूसरा दिन माता ब्रह्मचारिणी को समर्पित है, जो देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में से दूसरा रूप हैं. इस दिन भक्तगण ज्ञान और तपस्या की देवी को प्रसन्न करने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे जीवन में धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है. मां ब्रह्मचारिणी को गुड़हल और कमल के फूल बहुत प्रिय हैं, और उन्हें भोग में चीनी, मिश्री, और पंचामृत चढ़ाया जाता है

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