19/07/2022
गुरु तीनों ही है। ब्रह्मा भी है,विष्णु भी है और महेश भी है।
गुरुर् देवो महेश्वरः—
महेश्वर जब प्रलयंकर होते हैं,प्रलय जब करते हैं भगवान शंकर तो पांच मुँह के हो जाते हैं। ऐसे तो एक मुंह के हैं पर जब प्रलय करते हैं तो पंचानन हो जाते हैं।
पांच प्रलय गुरु तुम्हारे जीवन में करता है।
सबसे पहले विकारों का प्रलय करता है—
जीवन से विकार की निवृत्ति हो, वो चाहे आहार रूप में हो, चाहे वो व्यवहार रूप में है और चाहे वो विचार रूप में है। इन विकारों की निवृत्ति महेश्वर रूपी गुरु का पहला मुँह है। विकारों की निवृत्ति। पहले विकारों की निवृत्ति करता है फिर आकार को निवृत्त करता है।
दूसरा आकार की निवृत्ति—
आकार का मतलब है अपनी स्वरूपाऽसक्ति,अपनी देहाऽसक्ति। आकार का अर्थ है- अपनी परिकल्पना।
एक बहुत बड़ी रूपवती थी, सब उसपर मुग्ध होते थे पर वो बुद्ध पर मुग्ध थी। कहती थी बुद्ध!सब मेरे पास चलकर आते हैं और मैं तुम्हारे पास चलकर आती हूँ,तुम मुझे देखते भी नहीं? बुद्ध बोले- आऊँगा, तु मुझे बुलाने लायक तो बन जा।
एकदिन बीमार पड़ी, शरीर पर कोढ़ चुचाने लगा,बदबू आती थी। मोहल्ले वालों ने मुहल्ले से निकाल दिया, गांव वाले ने गांव से निकाल दिया। बाहर पड़ी थी अकेली प्यासी थी, सोचती थी जब प्यासी होती तो बड़ेबड़े केवड़े के जल स्वर्णपात्रों में आ जाते थे,आज अकेली पड़ी हूँ। तभी दूर से आवाज आई- सुन्दरी! वो चौंकी; कौन?देखा, तो सामने से महात्मा बुद्ध चले आ रहे थे। बोले- अब तु किसी को भी बुलाने लायक नहीं रही तो अब मैं तेरे जीवन में उपस्थित हुआ हूँ। जब कोई नहीं होता, तब मैं आ जाता हूँ।
आकार से मुक्त कर देता है। यहाँ धोती पहना, तिलक कण्ठी पहना बैठा होगा वैष्णव होगा तो क्या कोई पहचानेगा? सब पूछेंगे,क्या हुआ? इसको कहते हैं- आकार से निवृत्ति। विकारों की प्रलय करता है। आकार की प्रलय करता है गुरु। बड़े बड़ो के आकार बदल जाते हैं।
तीसरा, गुरु प्रकार से मुक्त करता है—
सारे प्रकार समाज के समाप्त हो गए, गुरु की शरणागत होने से। कोई दस हजार करोड़ रूपये का होगा तो कोई दस रूपये का होगा।
नाऽहम् वर्णी न च नरपति॥ न वर्ण बचा,न आश्रम बचा। सारे प्रकारों से मुक्त कर दिया। न पंजाबी बचा, न हरियाणवी बचा, न मध्य प्रदेशी बचा।
जीवेर स्वरूपे होय नित्य कृष्णदास॥
बड़े बड़े प्रकारों से मुक्त कर देता है। बकरी और सिंघ साथ में बैठ जाते हैं गुरु की शरण में।साथ बैठ जाते हैं सर्प और मूषक,साथ बैठ जाते हैं सिंह और नन्दी। प्रकार समाप्त हो गया।
चौथा, गुरु व्यवहार से भी मुक्त कर देता है—
मुक्त कर देते हैं। कृष्ण ने अर्जुन का आकार भी बदला,विकार भी दूर किया,प्रकार भी दूर किया। बड़े प्रकारों में फंसा था,ये मेरा, ये उसका ये गुरु खड़ा है,ये भाई खड़ा है। स्यालासम्बन्धिनस्तथा॥ और व्यवहार से भी मुक्त किया।
सर्व धर्मान् परित्यज्य॥
धर्मान् इति व्यवहारान्। बहुचनात्मक है। व्यवहार से मुक्त करता है। सारे व्यवहार से मुक्त करता है ये बड़े का व्यवहार,ये छोटे का व्यवहार,ये वृद्ध का व्यवहार,ये स्त्री का व्यवहार,ये पुरुष का व्यवहार पर सब व्यवहार समाप्त हो गया।
धीरेधीरे गुरु तुम्हारे जीवन में व्यवहार की प्रलय कर देगा। फिर नहीं बैठा जाएगा भीड़ में। उसका वो शिवत्व तुम्हारे भीतर व्यवहार की प्रलय कर देगा। और अंतिम
संस्कार से भी मुक्त कर देता है—
अब कोई संस्कार नहीं। बड़ेबड़े संस्कार गुरु जीव को उसके लौकिक संस्कारों से मुक्त कर देता है। उसके व्यवहारिक संस्कार को मुक्त कर देता है।
और जब ये पांचों चीज मुक्त हो जाय तो संसार से भी मुक्त हो जाओगे। ये पांच चीज ही संसार है। विकार संसार है,
प्रकृतिम् विकृतिम् महादात्यः प्रकृति विकृतिः सप्तः
षोडश कस्तुः विकारो न प्रकृति न विकृतिः पूरुषः॥
सांख्य कहता है।
संसार विकार है।
संसार आकार है।
कर्मेन्द्रियां ज्ञानेन्द्रियाँ आकार हैं।
संसार प्रकार है।
रजोगुण,तमोगुण,सतोगुण प्रकार है।
संसार व्यवहार है।
बड़े बड़े प्रकार के व्यवहारों में जीव उलझा हुआ है।
देहेस्थिमांसरुधिरो भिमतं त्यजत्वम्
धर्मम् भजस्व सतताम् त्यज लोक धर्मान्
सेवत्ससाधुपुरुषाम् जेहि काम् तृष्णाम्॥
संसार संस्कार है।
पूर्व जन्म का, वर्तमान समय का।
इस तरह गुरु पांच प्रकार से संसार का प्रलय करता है।
गुरुर् देवो महेश्वरः॥