Karuna Prarthna Bhawan - Church, Rudrapur

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My New Songउसके तरकश में तीर बहुत हैंमुझ जैसे योद्धा वीर बहुत हैंमगर वो तो किसी एक को ढूंढता हैजो उसकी आज्ञा पर चले उसी ...
16/05/2025

My New Song

उसके तरकश में तीर बहुत हैं
मुझ जैसे योद्धा वीर बहुत हैं
मगर वो तो किसी एक को ढूंढता है
जो उसकी आज्ञा पर चले उसी को पूछता है

वो नहीं लेता किसी का सहारा
वो न किसी का पक्ष करता है
जो सही है उसकी नजर में
वो तो उसको ही चुनता है
वो जिसे अपना कहता उसे न कभी तजता है
उसके तरकश में तीर बहुत हैं
मुझ जैसे योद्धा वीर बहुत हैं

वो तो कमजोर को भी बलवंत करता है
अपने दास को अपनी आत्मा से भरता है
वो करता है शेरों के मुँह को बंद
जो ज्वालाओं को ठंडा करता है
वो जो हमें जयवंत से भी बढ़कर करता है
उसके तरकश में तीर बहुत हैं
मुझे जैसे योद्धा वीर बहुत हैं

प्रेरित, प्रचारक, शिक्षक, चरवाहे और नबी
हर कहीं फैले हैं उसके सेवक सभी
जान गवां देते हैं उसकी शहादत में
उसकी सेवा से पीछे कोई हटा नहीं
राजदूत यीशु प्रभु के हम कहलाएं तभी
उसके तरकश में तीर बहुत हैं
मुझ जैसे योद्धा वीर बहुत हैं
मगर वो तो किसी एक को ढूंढता है
जो उसकी आज्ञा पर चले उसी को पूछता है

- Ashok John #उसके #तरकश में तीर बहुत हैंमुझ जैसे योद्धा वीर बहुत हैंमगर वो तो किसी एक को ढूंढता हैजो उसकी आज्ञा पर चले उसी क.....

08/04/2025

चेतावनी

बाइबल में परमेश्वर के चुने हुए लोगों प्रेरित पतरस जैसे लोगों को भी गलती पर चिताया जाता था।
और शाऊल और दाऊद जैसे अभिशिक्त लोगों को चेतावनी दी जाती थी।
चेतावनी को माना भी जाता था। और न मानने वाले शाऊल जैसे लोग नष्ट भी हो जाते थे। क्योंकि अभिषेक नहीं बल्कि अभिषेक देने वाला परमेश्वर बड़ा होता है।

लेकिन दूसरी तरफ आज के लोग हैं जो गलती तो करते हैं मगर शाऊल की तरह यह नहीं चाहते कि कोई उन्हें सुधारे या चिताए।
बहाना ये कि परमेश्वर के चुने हुए पर दोष मत लगाओ, किसी का न्याय मत करो।

अगर ऐसा ही है तो क्या शाऊल अभिशिक्त नहीं था?
या दाऊद अभिशिक्त नहीं था?
क्या पतरस चुना हुआ, पवित्रात्मा पाया हुआ नहीं था?

जो अभिषेक का दुरुपयोग करेगा और परमेश्वर के वचन के साथ खिलवाड़ करेगा वह निश्चित रूप से दंड पाएगा।

बाइबल का सत्य यही है।
अपनी आँखें बंद करके बैठ जाने से बुराई टल नहीं जाएगी।

जो लोग हाथ रखकर दुआ करने के पैसे लेते हैं, अपने पैर के नीचे की मिट्टी लोगों को खिलाते हैं, अभिशिक्त तेल, पानी, साबुन इत्यादि वस्तुओं का व्यवसाय करते हैं, चर्च की औरतों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, चंगाई का झूठा दिखावा करते हैं, झूठी भविष्यवाणी करते हैं, इत्यादि इत्यादि; वे निश्चित रूप से दंड पाएंगे; चाहे फिर उनके आगे कितने ही बड़े टाइटल लगे हों, कितनी ही बड़ी उनकी मिनिस्ट्री हो, कितना भी अभिशिक्त क्यों न हों।

और अफसोस ये कि जो लोग जानकर भी उनका समर्थन करते हैं वे भी उनके ही जैसा दण्ड पाएंगे।

1 कुरिन्थयों 5:11
मेरा कहना यह है; कि यदि कोई भाई कहलाकर, व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देनेवाला, या पियक्कड़, या अंधेर करनेवाला हो, तो उसकी संगति मत करना; वरन् ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना।

https://youtu.be/outF7cJcwiY?si=lKbCPjdKDVjLOwkR
02/04/2025

https://youtu.be/outF7cJcwiY?si=lKbCPjdKDVjLOwkR

विनोद जॉन के साथ बाइबिल अध्यन चैनल में आपका स्वागत है. प्रभु येशु मसीह में बढ़ने और प्रतिदिन उनके साथ चलने के लिए हिं...

27/07/2024

उपवास और प्रार्थना

मसीही और गैर मसीही और यहूदी या अन्य कोई समाज हो सभी के धार्मिक जीवन में उपवास सहित प्रार्थना का बड़ा महत्व रहा है।

इसके अनेक उद्देश्य हो सकते हैं मगर हम बाइबल से समझने की कोशिश करेंगे कि उपवास का धार्मिक जीवन में क्या महत्व रहा है।

अगर हम पुराने नियम में देखें तो प्रायः उपवास पश्च्याताप और दुख के दिखाने का एक प्रतीक रहा है। परमेश्वर की दया को प्रात करने और अपने पाप पूर्ण व्यवहार के लिए दुख और प्रायश्चित को प्रगट करने का तरीका रहा है। उदाहरण देखें :

1 सैमुअल 7:6 तब वे मिस्‍पा में इकट्ठे हुए, और जल भरके यहोवा के सामने उंडेल दिया, और उस दिन उपवास किया, और वहाँ कहने लगे, “हम ने यहोवा के विरूद्ध पाप किया है।” और शमूएल ने मिस्‍पा में इस्राएलियों का न्‍याय किया।

2 सैमुअल 12:16 अत: दाऊद उस लड़के के लिये परमेश्‍वर से विनती करने लगा; और उपवास किया, और भीतर जाकर रात भर भूमि पर पड़ा रहा।

एस्तर 4:16 “तू जाकर शूशन के सब यहूदियों को इकट्ठा कर, और तुम सब मिलकर मेरे निमित्‍त उपवास करो, तीन दिन-रात न तो कुछ खाओ, और न कुछ पीओ। और मैं भी अपनी सहेलियों सहित उसी रीति उपवास करूँगी। और ऐसी ही दशा में मैं नियम के विरुद्ध राजा के पास भीतर जाऊँगी; और यदि नाश हो गई तो हो गई।”

यहूदियों द्वारा उपवास को एक धार्मिक रस्म के रूप में ठहरा दिया गया था। और वे लोग अन्य परंपराओं के साथ साथ उपवास को भी धार्मिक घमंड का विषय बना चुके थे। इसलिए परमेश्वर ने उपवास के संबंध में उनके सारे घमंड को तोड़ दिया और उन्हें निम्नलिखित निर्देश दिए :

यशायाह 58:5 जिस उपवास से मैं प्रसन्न होता हूँ अर्थात् जिसमें मनुष्‍य स्‍वयं को दीन करे, क्‍या तुम इस प्रकार करते हो? क्‍या सिर को झाऊ के समान झुकाना, अपने नीचे टाट बिछाना, और राख फैलाने ही को तुम उपवास और यहोवा को प्रसन्न करने का दिन कहते हो?

नए नियम के समय तक भी यहूदियों में इन पारंपरिक उपवास का संदर्भ प्राप्त होता है। यीशु मसीह की उपवास के बारे में की गई टिप्पणी ऐसा आभास देती है जैसे कि यीशु मसीह में होने के कारण हमें अब उपवास की आवश्यकता नहीं। वह हमारा प्रायश्चित है। और उसी ने हमारे लिए दुखों को उठा लिया। निम्नलिखित पद को देखें :

मति 9:15 यीशु ने उनसे कहा, “क्या बाराती, जब तक दुल्हा उनके साथ है शोक कर सकते हैं? पर वे दिन आएँगे कि दूल्हा उनसे अलग किया जाएगा, उस समय वे उपवास करेंगे।

लेकिन जब हम निम्नलिखित पद पढ़ते हैं तो हमें पुनः उपवास की आवश्यकता को याद दिलाया जाता है :

मति 17:21 पर यह जाति बिना प्रार्थना और उपवास के नहीं निकलती।

अतः इस दो विरोधाभाषी पदों की तुलना करने से हमें यह ज्ञात होता है कि परमेश्वर हमारे परंपरागत उपवासों में कोई रुचि नहीं रखता साथ ही अब हमें पापों के प्रायश्चित के लिए उपवास रखने की आवश्यकता नहीं है। बल्कि अब उपवास सेवकाई में विस्तार, सामर्थ और मार्गदर्शन के लिए रखा जाना चाहिए।
इसके उदाहरण हम नए नियम की अन्य पुस्तकों में भी देखते हैं :

प्रेरितों के काम 13:2-3 जब वे उपवास सहित प्रभु की उपासना कर रहे थे, तो पवित्र आत्मा ने कहा, “मेरे लिये बरनबास और शाऊल को उस काम के लिये अलग करो जिसके लिये मैंने उन्हें बुलाया है।”
तब उन्होंने उपवास और प्रार्थना करके और उन पर हाथ रखकर उन्हें विदा किया।

प्रेरितों के काम 14:23 और उन्होंने हर एक कलीसिया में उनके लिये प्राचीन ठहराए, और उपवास सहित प्रार्थना करके उन्हें प्रभु के हाथ सौंपा जिस पर उन्होंने विश्वास किया था।

इन पदों में हम देखते हैं कि उपवास सेवकाई में मार्गदर्शन, नियुक्ति, नए कार्य और वरदान इत्यादि की प्राप्ति के लिए रखे जाते थे। कहीं भी पापों से पाश्च्याताप या दुख प्रगट करने, क्षमा पाने के लिए या परंपरा को पूरा करने के लिए उपवास नहीं किया गया।

अतः आज हम जब उपवास करते हैं तो इन्हीं उद्देश्य के साथ करें। हमारा मकसद सेवकाई में उन्नति, मार्गदर्शन, नियुक्ति, सामर्थ, नई शुरुआत और स्वयं को दीन करना होना चाहिए।

प्रभु आपको आशीष दे!

06/07/2024

बीमारी के चार कारण

1. गलती से (गलत खानपान, चोट दुर्घटना इत्यादि) – इलाज या परहेज और सावधानी से ठीक हो जाते हैं

2. पाप के कारण – पश्चयात्ताप से ठीक हो सकते हैं
गिनती 12:10-11 तब वह बादल तम्‍बू के ऊपर से उठ गया, और मरियम कोढ़ से हिम के समान श्‍वेत हो गई। और हारून ने मरियम की ओर दृष्‍टि की, और देखा कि वह कोढ़िन हो गई है।
तब हारून मूसा से कहने लगा, “हे मेरे प्रभु, हम दोनों ने जो मूर्खता की वरन् पाप भी किया, यह पाप हम पर न लगने दे।

3. परमेश्वर की महिमा के लिए – प्रार्थना से ठीक हो जाते हैं
यूहन्ना 9:3 यीशु ने उत्तर दिया, “न तो इसने पाप किया था, न इसके माता पिता ने परन्तु यह इसलिए हुआ, कि परमेश्‍वर के काम उसमें प्रगट हों।

4. मृत्यु के लिए – प्रार्थना या दवा भी काम नहीं करती

मनुष्य जाति ही परमेश्वर का स्वरूप है।- Ashok John उत्पत्ति 1:26-28फिर परमेश्‍वर ने कहा, “हम मनुष्‍य* को अपने स्‍वरूप के ...
08/04/2024

मनुष्य जाति ही परमेश्वर का स्वरूप है।
- Ashok John

उत्पत्ति 1:26-28

फिर परमेश्‍वर ने कहा, “हम मनुष्‍य* को अपने स्‍वरूप के अनुसार* अपनी समानता में बनाएँ; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्‍वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्‍तुओं पर जो पृथ्‍वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।” (याकू 3:9)
तब परमेश्‍वर ने मनुष्‍य को अपने स्‍वरूप के अनुसार उत्‍पन्‍न किया, अपने ही स्‍वरूप के अनुसार परमेश्‍वर ने उसको उत्‍पन्‍न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्‍यों की सृष्‍टि की (मत्ती 19:4,मर 10:6,प्रेरि 17:29,1 कुरि 11:7,कुलु 3:10,1 तीमु 2:13)
और परमेश्‍वर ने उनको आशीष दी; और उनसे कहा, “फूलो-फलो, और पृथ्‍वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुंद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्‍वी पर रेंगनेवाले सब जन्‍तुओं पर अधिकार रखो।”

1. परमेश्वर ने ही मनुष्य को बनाया है।
2. नर और नारी दोनों को ही अपने स्वरूप में बनाया है।
3. सारे मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में हैं अतः मनुष्यों के साथ भेदभाव अनिश्वरीय है।
4. मनुष्यों को पृथ्वी के सभी जीव जंतुओं का अधिकारी और संरक्षक बनाया है।
5. जीव जंतुओं, वनस्पतियों तथा अन्य संसाधनों का संरक्षण न करना या उनका दुर्पयोग करना अनिश्वरीय कृत्य है।
6. एक जोड़े का जनसंख्या वृद्धि करना ईश्वर की ओर से नियुक्त था। यह कोई पापपूर्ण कार्य नहीं है। ईश्वर प्रदत्त और नियुक्त है।
7. संतानुत्पति पाप का परिणाम नहीं बल्कि पाप में गिरने से पहले ही परमेश्वर के द्वारा मनुष्य के लिए ठहराया गया था।
8. अब चूंकि मनुष्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। और पृथ्वी भर में मनुष्य भर गए हैं और कई देशों में जनसंख्या वृद्धि और भुखमरी और बच्चों पर से माता पिता का नियंत्रण छूटता जा रहा है तो ऐसे में अब हम अगर परिवार नियोजन का पालन करें तो यह परमेश्वर की पृथ्वी को भर देने की आज्ञा का उलंघन नहीं होगा क्योंकि वह आज्ञा तो बहुत समय पहले ही पूरी हो चुकी है।
9. अगर हमारे बच्चे हमारे नियंत्रण में नहीं तो इससे पता चलता है कि हम अपने परमेश्वर के नियंत्रण में नहीं हैं। अपने आप को हर समय परमेश्वर को समर्पित करना बहुत जरूरी है।
10. पाप, श्राप, बीमारियां, बुरी आदतें या फिर अच्छे गुण भी माता पिता से प्राप्त होते हैं। इसलिए यीशु मसीह के जैविक माता पिता नहीं थे। परमेश्वर ने बस माता मरियम की कोख का उपयोग किया था। इसलिए यीशु मसीह पूर्णतः पाप रहित थे। हमारे उद्धार और मुक्ति के लिए एक उपयुक्त और योग्य बलिदान।

https://youtu.be/8GEvht9tnmQ?si=z1I3uG2jP4Roh13BYeshu Ke Charno Meiयीशु के चरणों मेंFull Song Released Nowपूरा गीत सुनें...
05/04/2024

https://youtu.be/8GEvht9tnmQ?si=z1I3uG2jP4Roh13B

Yeshu Ke Charno Mei
यीशु के चरणों में
Full Song Released Now
पूरा गीत सुनें!

Singer, Writer & Composer - Reuben John*************************God Gifted him this song on 3rd October 2023 (at the age of 16 yr, 10 month and 13 day)******...

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26/03/2024

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Reuben's First Recorded Song

Ecclesiastes 5:1सुनने के लिये समीप जाना मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से अच्‍छा है
20/02/2024

Ecclesiastes 5:1
सुनने के लिये समीप जाना मूर्खों के बलिदान चढ़ाने से अच्‍छा है

10/02/2024

उत्पत्ति 12:2
और मैं तुझ से एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम महान करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा।

हमें बड़ा बनाने, आशीष देने, हमारा नाम महान बनाने या महिमा देने और हमें आशीष का श्रोत बनाने की जिम्मेदारी हमारे प्रभु परमेश्वर ने स्वयं अपने ऊपर ले ली है।

अब हमारा फर्ज क्या है??

हमारा फर्ज बस उसकी इच्छा पूरा करना, उसके मार्गदर्शन में चलना और कोई भी कार्य जो हम करते हैं उसे उसी की महिमा के लिए करना है।

जब सर्वशक्तिमान, राजाओं के राजा, प्रभुओं के प्रभु, सामर्थी परमेश्वर ने हमें महिमा, आदर, मान, सम्मान, रुतबा इत्यादि सब कुछ देने की पूर्ण जिम्मेदारी अपने ही ऊपर ले ली है, तो क्या आज भी हम ऐसे कामों में लगें हैं जिससे हम स्वयं खुश हो सकें, स्वयं महिमा पाएं, आगे बढ़ें, ऊंचे हो जाएं??

अगर ऐसा है तो हम प्रभु के द्वारा दी जाने वाली महिमा आदर मान को प्राप्त करने से चूक जाएंगे

यूहन्ना‬ ‭5:44‬
तुम जो एक दूसरे से आदर चाहते हो और वह आदर जो अद्वैत परमेश्वर की ओर से है, नहीं चाहते, किस प्रकार विश्वास कर सकते हो?

मत्ती‬ ‭6:33‬
इसलिये पहले तुम परमेश्‍वर के राज्य और उसके धर्म की खोज करो तो ये सब वस्तुएँ भी तुम्हें मिल जाएँगी।

Do We Work For Self, Self Glory Or For The Glory Of The Lord?

1 कुरिंथियों 10:31
इसलिए तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्‍वर की महिमा के लिये करो।

क्या आपकी सेवा, आपका गीत, आपकी आराधना, आपका संगीत, आपकी योग्यता, आपका प्रचार, आपकी विदेश यात्राएं, आपकी सुंदरता, आपका रुतबा, आपकी तंदुरुस्ती, आपका काबिलियत या आपका कुछ भी क्यों न हो; क्या उसका उद्देश्य आपकी खुद की खुशी और महिमा है या फिर आपके सर्वोच्च स्वामी परमेश्वर प्रभु यीशु मसीह के लिए हैं??

विचार करें!

02/12/2023
26/10/2023

क्या आप स्वयं को प्रेमरहित महसूस करते हैं?

प्रेम पाने की चाह नैसर्गिक है और सार्वभौमिक है। हर कोई चाहता है कि कोई उसे निःशर्त प्रेम करे। और ऐसे प्रेम की तलाश मनुष्य को अशांत कर देती है साथ ही वह विभिन्न तरीकों से उस प्रेम की आपूर्ति करने के प्रयत्न करता रहता है। और कई बार ऐसा भी होता है कि मनुष्य सच्चे प्रेम को पहचान ही नहीं पाता। क्योंकि हर मनुष्य के जीवन में कुछ ऐसे लोग जरूर होते हैं जो उसे निस्वार्थ रूप से और निःशर्त प्रेम करते हैं। मगर शायद उस प्रेम का प्रगटिकरण मनुष्य की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हो पाता और यह उस मनुष्य को सच्चे प्रेम की अनुपस्थिति जैसा महसूस होता है।
एक मां, एक पिता, कोई बहन, या भाई, बेटी या बेटा, या फिर पत्नी, दादा दादी, नाना नानी ये सब वे करीबी लोग होते हैं जिनमें से कोई न कोई हमें निस्वार्थ और सच्चा प्रेम जरूर करता है। लेकिन यह समस्या प्रेम करने या प्रेम पाने की ही नहीं है बल्कि प्रेम को समझने की विफलता भी एक समस्या ही है।
परमेश्वर का प्रेम सर्वोपरि है। वह तो निश्चित रूप से हमें निस्वार्थ, अटल, अनंत, सच्चा और निःशर्त प्रेम करता ही है। और उसने उस प्रेम का कुछ अंश हमारे आसपास के लोगों में और स्वयं हम में भी भर रखा है। हमें जरूरत है तो उस प्रेम को पहचानने की - उसका अंश अपने आस पास के लोगों में और उसकी पूर्णता परमेश्वर में।

सफन्‍याह‬ ‭3:17‭-‬18‬ - "तेरा प्रभु परमेश्‍वर तेरे मध्‍य में विराजमान है। वह महायोद्धा है। वही विजय प्रदान करता है। वह तुझसे प्रसन्न होगा, आनन्‍दित होगा। वह अपने प्रेम में तुझे पुन: संजीव करेगा। तुझे आनन्‍दित देख, उत्‍सव के दिन की तरह वह आनन्‍द-विभोर हो उठेगा।’ प्रभु कहता है, ‘मैं तुझसे विनाश को दूर करूंगा, जिससे तुझे उसके कारण अपमान न सहना पड़े।"

Do you feel unloved?

The desire to be loved is natural and universal. Everyone wants someone to love them unconditionally. And the search for such love makes a man restless and he keeps trying to supply that love in various ways. And sometimes it happens that a person is not able to recognize true love. Because in every human being's life there are some people who love him/her selflessly and unconditionally. But perhaps the manifestation of that love does not meet the man's expectations and it feels like the absence of true love to that man.
A mother, a father, a sister, or a brother, a daughter or a son, or a wife, grandparents, all these are those close people among whom someone or the other definitely loves us selflessly and truly. But the problem is not only about loving or receiving love, but failure to understand love is also a problem.
God's love is supreme. He definitely loves us selflessly, steadfastly, endlessly, truly and unconditionally. And he has instilled some part of that love in the people around us and in us too. What we need is to recognize that love – part of it in the people around us and its fullness in God.

Zephaniah 3:17-18 - "The Lord your God sits among you. He is a mighty warrior. He is the one who gives victory. He will be pleased with you, he will rejoice. He will revive you in his love. Seeing you happy, he will rejoice like a festival day.' The Lord says, 'I will remove destruction from you, so that you will not have to suffer humiliation because of it.'

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Singh Colony, Street No 1
Rudrapur
263153

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