28/11/2022
सुप्रभात,
सहस्त्रों वर्षों से सनातन ऋषियों, मुनियों और साधकों ने इहलोक और परलोक की परमादरणीय विभूतियों के सुतीक्ष्ण मार्गदर्शन से पूर्व जन्मों के अपूर्त ऋणानुबंधों के आधार पर अगले जन्म के लिए परिवार, इतरेजन और मार्गदर्शक गुरु की प्राप्ति हेतु सरल व सुलभ प्रक्रिया श्रुति परंपरा के अनुसार अपने सुपात्र शिष्यों के माध्यम से साधारण जनमानस और समाज को दिशा दिखाने हेतु प्रदान की थी जिसे कालांतर में विभिन्न श्रुतियों, स्मृतियों तथा अन्य आध्यात्मिक ग्रंथों में संकलन उपरांत संचित भी किया गया था परंतु विभिन्न धर्मों, पंथों व मतों में ईश्वर के सगुण निर्गुण स्वरूप के संदर्भ में द्वैत अद्वैत विचारधारा के परस्पर विवाद व विदेशी आक्रमणकारियों के उत्पातों के फलस्वरूप ये पद्धतियां लुप्तप्राय हो गई थीं तथापि सम्राट कालअशोक के अष्ट प्रधानों की अगली संततियों के उत्तराधिकारियों द्वारा पूर्व में ली गई कालजयी शपथ के निर्वाहनवश इनका ज्ञान भली भांति संरक्षित रखा जा पाया।
वर्ष 1618 उपरांत इन सभी रहस्यों को विभिन्न मनीषियों और स्वामियों ने दैवदैविक कृपा अनुरूप गूढ़ भाषा में शब्दांतरालजाल पद्धति अनुसार लिपिबद्ध करने के प्रयासों को पुनर्जीवित किया और ये पद्धतियां सामान्य जनमानस को स्त्रोत, श्लोक, अभंग और आरतियों के रूप में प्रसाद स्वरूप वितरित कीं गईं परंतु उनका वास्तविक अर्थ, उपयोग और शब्दब्रह्म ऊर्जा के प्रवाह, संचयन व उत्सर्जन की विधियां केवल विशेष रूप से चुने गए साधक अवस्था के पात्र लोगों को ही बताई गईं।
आज भी सामान्य जनमानस द्वारा उच्चारित विभिन्न आरतियो, स्त्रोतो तथा अभंगों में छुपे हुए शब्दब्रह के रहस्य को केवल सदगुरु के कृपा आशीर्वाद से ही जाना जा सकता है।
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।।शुभम् भवतु।।