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25/10/2025

शास्त्रों मे वर्णित कुछ समस्या विशेष के लिए अनुष्ठान -:1)रोग नाश के लिए -: नाम त्रयी का निरंतर जप (अच्युत, अनंत, गोविंद)...
05/10/2025

शास्त्रों मे वर्णित कुछ समस्या विशेष के लिए अनुष्ठान -:

1)रोग नाश के लिए -: नाम त्रयी का निरंतर जप (अच्युत, अनंत, गोविंद)
2) विद्या प्राप्ति के लिए -: प्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र
3) तंत्र मंत्र से रक्षा के लिए -: राम रक्षा स्तोत्र
4) अकाल मृत्यु की निवृत्ति के लिए -: मृत्युंजय स्तोत्र
5) लक्ष्मी प्राप्ति के लिए -: शिव तांडव स्तोत्र, श्रीसूक्त पाठ
6) डिप्रेशन रोग -: मयूरेश स्तोत्र
7) वात रोग -: हनुमान बहुक
8) खुद के घर की प्राप्ति के लिए -: सर्व संपतकर ढूंढी राज विनायक स्तोत्र
9) शत्रु पीढ़ा या कहीं भी फँस जाने पर, संकट में, वन मे भयग्रस्त होने पर -: दुर्गा जी के 32 नाम, बजरंगबाण
10) मृत्यु तुल्य कष्ट की निवृत्ति के लिए- अमोघ शिव कवच, महामृत्युंजय मंत्र जप।
11) सर्वमनोकामना पूर्ति के लिए -: हनुमान चालीसा
12) जिन लोगों को एसा लगता है कि हमारी भगवान सुन नहीं रहे उनके लिए -: विनय पत्रिका

शास्त्रों मे वर्णित कुछ समस्या विशेष के लिए अनुष्ठान -:1)रोग नाश के लिए -: नाम त्रयी का निरंतर जप (अच्युत, अनंत, गोविंद)...
05/10/2025

शास्त्रों मे वर्णित कुछ समस्या विशेष के लिए अनुष्ठान -:

1)रोग नाश के लिए -: नाम त्रयी का निरंतर जप (अच्युत, अनंत, गोविंद)
2) विद्या प्राप्ति के लिए -: प्रज्ञा विवर्धन कार्तिकेय स्तोत्र
3) तंत्र मंत्र से रक्षा के लिए -: राम रक्षा स्तोत्र
4) अकाल मृत्यु की निवृत्ति के लिए -: मृत्युंजय स्तोत्र
5) लक्ष्मी प्राप्ति के लिए -: शिव तांडव स्तोत्र, श्रीसूक्त पाठ
6) डिप्रेशन रोग -: मयूरेश स्तोत्र
7) वात रोग -: हनुमान बहुक
8) खुद के घर की प्राप्ति के लिए -: सर्व संपतकर ढूंढी राज विनायक स्तोत्र
9) शत्रु पीढ़ा या कहीं भी फँस जाने पर, संकट में, वन मे भयग्रस्त होने पर -: दुर्गा जी के 32 नाम, बजरंगबाण
10) मृत्यु तुल्य कष्ट की निवृत्ति के लिए- अमोघ शिव कवच, महामृत्युंजय मंत्र जप।
11) सर्वमनोकामना पूर्ति के लिए -: हनुमान चालीसा
12) जिन लोगों को एसा लगता है कि हमारी भगवान सुन नहीं रहे उनके लिए -: विनय पत्रिका

जय महाकाल संग मा कामख्याअलख उर्धवि प्रणामकोख बंधन खोलना:- अघोर में कोख बंधन को गोइक क्रिया से खोला जाता है।किसी भी स्त्र...
23/11/2023

जय महाकाल संग मा कामख्या
अलख उर्धवि प्रणाम

कोख बंधन खोलना:- अघोर में कोख बंधन को गोइक क्रिया से खोला जाता है।किसी भी स्त्री के लिए सबसे बड़े दुखो में से एक है बांझ होना ।और ये हमारे समाज मे एक श्राप की तरहः उसपर छाया रहता है सब उसको हेय दृष्टि से देखते है।इसका दुख केवल वही स्त्री समझ सकती है।कुछ दुष्ट प्रवर्ति के लोग,परिवारजन,ओर तांत्रिक किसी लालच या फिर किसी के वंश को रोकने हेतु ये क्रिया कर देते है।इसके उपरांत पति पत्नी की सम्पूर्ण जांच सछि आने पर भी गर्भ ही धारण न करना या गर्भ धारण होने पर भी खराब हो जाता है।
इसका उपचार केवल यही गोहिक क्रिया है

चार चोकुट बारह राजा,गंधर्व बजाए रात का बाजा
काला आसन 7 चोटी माटी,8 घड़ी ओर मावस की राती
52 भोग 84 दाना, काली माटी अस्थि का माना
11 गोले 26 बाती, देके भोग 52 की आरती
कुम्भ कबीला हाकी जागे,रात के वासी रात को भागे
आवे मसानी राज वा बोले, मंत्र बोल कर कोख वा खोले।
अलख प्रणाम।

11/11/2023

05/11/2023

तंत्र में श्वेतार्क गणेश का उपयोग और महत्त्व ।

घर में श्वेतार्क गणेश की प्रतिमा रखने से
सुख-समृद्धि बनी रहती है।

भगवान गणेश के अनेक रूपों में से एक चमत्कारी रूप है सफेद आंकड़े के गणेश। यही श्वेतार्क गणेश कहलाते हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार आंकड़े के गणेशजी की पूजा से धन, सुख-सौभाग्य, ऐश्वर्य और सफलता प्राप्त होती है। यदि श्वेतार्क गणेशजी की प्रतिमा तिजोरी में रखी जाए तो स्थाई लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। घर में रिद्धि-सिद्धि की कृपा बनी रहती है। हर काम में लाभ प्राप्त होता है।

आंकड़े के गणेश से जुड़ी जानकारियां

शास्त्रों के अनुसार श्वेतार्क गणेशजी आंकड़े के पौधे की जड़ में प्रकट होते हैं। आंकड़े को आक का पौधा भी कहा जाता है। इस पौधे के फूलों को शिवलिंग पर भी अर्पित किया जाता है। आंकडे के पौधे की एक दुर्लभ प्रजाति है सफेद आंकड़ा। इसी सफेद आंकड़े की जड़ में श्वेतार्क गणपति की प्रतिकृति निर्मित होती है। इस पौधे की पहचान यह है कि इसके फूल सफेद होते हैं। किसी भी पौधे की जड़ में गणपति की प्रतिकृति बनने में कई वर्षों का समय लगता है। बाजार में पूजन सामग्रियों की दुकानों से श्वेतार्क गणेश प्राप्त किए जा सकते हैं।
सफेद आंकड़े की जड़ प्राप्त होने के बाद इसकी बाहरी परतों को कुछ दिनों तक पानी में भिगोया जाता है। जब सफेद आंकड़े की इस जड़ पानी में से निकाला जाता है तो भगवान गणेश के शरीर
की बनावट इसमें दिखाई देने लगती है।

श्वेतार्क गणेश से जुड़ी खास बातें और उपाय

सफेद आंकड़े के हर पौधे की जड़ में गणेश की सूंड जैसा आकार रहता
है। इसकी जड़ के तने में गणेशजी के शरीर, आस-पास की शाखाओं में
भुजाएं और सूंड जैसी आकृति दिखाई देती है। कुछ पौधों की जड़ में बैठे हुए गणेश की मूर्ति जैसी भी दिखाई देती है।
आंकड़े में गणेशजी का वास पुराने समय से कई पेड़-पौधों की पूजा की जाती रही है। इनमें पीपल, आंवला, वट वृक्ष मुख्य हैं। शास्त्रों के अनुसार बिल्व के वृक्ष
में शिव का वास होता है और आंकड़े के पौधे में श्रीगणेश का वास होता है। आंकड़े की जड़ में दिखाई देने वाली श्रीगणेश की आकृति इस बात का प्रमाण है। कार्यों में सफलता के लिए आंकड़े के गणेशजी की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। यह गणेशजी का प्राकृतिक व चमत्कारी स्वरूप है। मान्यता है कि जिस परिवार में आंकड़े के गणेश की रोज पूजा होती है, वहां दरिद्रता, रोग व परेशानियां का वास नहीं
होता है। इस गणेश प्रतिमा की पूजा करने से सुख व सफलता के साथ ही
भरपूर धन व वैभव प्राप्त है। सफेद आंकड़े की जड़ मिलने पर उसकी
सफाई कर साफ जल से स्नान कराना चाहिए।

श्वेतार्क गणेश की पूजन विधि

श्वेतार्क गणपति की प्रतिमा को पूर्व दिशा की तरफ ही स्थापित करना चाहिए
पूजन में लाल कनेर के पुष्प अवश्य इस्तेमाल में लाएं। एक लकड़ी के चौके या पाटे पर एक पीला वस्त्र बिछाएं । उस पर एक प्लेट रखे वव प्लेट पर कुमकुम या सिंदूर से अष्टदल बनायें इसके ऊपर फूल बिछाकर आसन दें व श्वेतार्क गणपति को विराजमान करें फिर पंचोपचार या षोडशोपचार पूजन करें और इस मंत्र का 1 माला जप करें

“ॐ पंचाकतम् ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा”

से पूजन करें और इसके पश्चात इस मंत्र

“ॐ ह्रीं पूर्वदयां ॐ ह्रीं फट् स्वाहा”

मंत्र से हवन कर 108 आहुति दें। लाल कनेर के पुष्प, शहद तथा शुद्ध गाय के घी से आहुति देने का विधान है। इसके बाद गणपति कवच का तीन बार पाठ करें अथार्वशिर्ष का 11 पाठ करें ततपश्चात11 माला जप नीचे लिखे मँत्र का करेँ और प्रतिदिन कम से 1 माला करेँ
"ॐ गँ गणपतये नमः"
का जप करें।
अब
“ॐ ह्रीं श्रीं मानसे सिद्धि करि ह्रीं नमः”
मंत्र बोलते हुए लाल कनेर के पुष्पों को नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें।

वैसे आयुर्वेद मेँ भी इसका प्रयोग चर्म रोगों, पाचन समस्याओं, पेट के रोगों, ट्यूमरों, जोड़ों के दर्द, घाव और दाँत के दर्द को दूरकरने में किया जाता है। इस पेड़ का दूध गंजापन दूर करने और बाल गिरने को रोकनेवाला है। इसके फूल, छाल और जड़ दमेऔर खाँसी को दूर करने वाले माने गए हैं।
धार्मिक दृष्टि से श्वेत आक को कल्प वृक्ष की तरह वरदायक वृक्ष माना गयाहै। श्रद्धा पूर्वक नतमस्तक होकर इस पौधे से कुछ माँगने पर ये माँगने वाले की इच्छा पूरी करता है। यह भी कहा गया है कि इसप्रकार की इच्छा शुद्ध होनी चाहिए। ऐसी आस्था भी है कि इसकी जड़ को पुष्य नक्षत्र में विशेष विधिविधान के साथ जिस घर में स्थापित किया जाता है वहाँ स्थायी रूप से लक्ष्मी का वास बना रहता है और धन धान्य की कमी नहीं रहती।

तन्त्र शास्त्र में भी श्वेतार्क गणपति की पूजा का विशेष विधान बताया गया है. तन्त्र शास्त्र अनुसार घर में इस प्रतिमा को स्थापित करने से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती है. इस प्रतिमा का नित्य पूजन करने से भक्त को धन-धान्य की प्राप्ति होती है तथा लक्ष्मी जी का निवास होता है. इसके पूजन द्वारा शत्रु भय समाप्त हो जाता है. श्वेतार्क प्रतिमा के सामने नित्य गणपति जी का मन्त्र जाप करने से गणश जी का आशिर्वाद प्राप्त होता है तथा उनकी कृपा बनी रहती है.

15/08/2023

हिन्दू धर्म में चरणामृत का क्या महत्व है ?अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है, क्या कभी ...
05/07/2023

हिन्दू धर्म में चरणामृत का क्या महत्व है ?

अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है, क्या कभी हमने ये जानने की कोशिश की कि चरणामृतका क्या महत्व है?चरणामृत की हमारे हिन्दू धर्म में बहुत मान्यता है , इसका सम्बन्ध भगवान श्री कृष्ण और राधा जी के साथ में जुड़ा हुआ है। आइये इस पोस्ट के माद्यम से इसके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने का प्रयास करते है।
चरणामृत का अर्थ:-इसका अर्थ होता है होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना। ऐसा माना जाता है कि दोनों को ही पीने से व्यक्ति के भीतर जहां सकारात्मक भावों की उत्पत्ति होती है वहीं यह सेहत से जुड़ा मामला भी है। नकारात्मक प्रभावों से छुटकारा मिलता है।

शास्त्रों में कहा गया है:-

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।

विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।

“अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।

जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता” जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है।

नाथ योगीयो की नादी जनेऊ नाथ सम्प्रदाय के योगी अपने गले में काले उन से निर्मीत जनेऊ धारण करते हैं जो तीन नाडी,१. इडा२.पिं...
29/12/2022

नाथ योगीयो की नादी जनेऊ

नाथ सम्प्रदाय के योगी अपने गले में काले उन से निर्मीत जनेऊ धारण करते हैं जो तीन नाडी,
१. इडा
२.पिंगळा
३.सूषुमना
का प्रतीक मानी जाती है,
जिसे बनाने की विधी काफी जटील होती हैं ।
काली भेड के ऊन के रेशो को कात कर पतला धागा बनाया जाता है।
उस प्रकार 16 तंतुओ को आपस में गुंथ कर 12 ½ हाथ लंबी जनेऊ तैयार करने में कईं दिनो या महीनो तक का समय लगता है ।
बनाते समय नाथ योगी 'जनेऊ मंत्र' का जाप भी करते है ।
पुर्ण होने के उपरांत उसे जोडने के लिये एक गांठ लगाई जाती है जिसे 'ब्रह्म गांठ' कहा जाता है.
योगियो में ऐसी मान्यता है की
नादी जनेऊ धारण करने वाले योगी पर
गुरु गोरक्षनाथ जी
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर,
64 योगिनी
52 वीर
84 सिद्ध
9 नाथ की कृपा सदैव बनी रहती है ।
जनेऊ में गांठ लगाने के बाद
उसमें पवित्री, मुंगा, स्फटीक, रुद्राक्ष तथा नादी को जोडा जाता है ।
1) पवित्री :- पराशक्ती - पवित्रता

-चिदानंद - अर्धमात्रा

2) मुंगा :- ब्रह्मा जी - उत्पत्ति - रजोगुण -
ब्रह्मानंद - 'अ' कार - ब्रह्म ग्रंथी

3) स्फटीक :- विष्णु जी -स्थिति - सतोगुण -
महानंद - 'उ' कार - विष्णु ग्रंथी

4) रुद्राक्ष :- शिवजी - संहार - तमोगुण -
कैवल्यानंद - 'म' कार - रुद्र ग्रंथी

5) नादी :- ब्रह्मनाद -
(नादी और पवित्री लकड़ी, पीतल, हाथी दांत, चांदी, स्वर्ण, सफ्टिक इत्यादि से बनाई जाती है । )

नादी जनेऊ के पुर्ण रुप से तैयार होने पर
चोटी दीक्षा के समय नादी जनेऊ गुरु द्वारा शिष्य को पहनाई जाती है ।
साथ ही में सदगुरू द्वारा अपने नये बने चेले को गुरुमंत्र तथा नादी आदेश (नाद उठाना, ॐकार उठाना) करने की रिती समझाई जाती है,
नादी द्वारा जो नाद प्रगट होता है
उसे अनहद नाद का स्थुल स्वरुप माना गया है ।
नाथ योगी अपने गुरुदेव, ईष्टदेव, समाधी तथा धुणे के सामने नाद बजाकर आदेश करते हैं ।
जो शिष्य नादी जनेऊ धारण नही करते वह सिर्फ मंत्र बोलकर 'शंभु आदेश' करते है ।
योगी अपने गुरुदेव केे मार्गदर्शन मे रहकर योग के नियमो का पालन करते हुए नित्य साधना तथा ध्यान और
नाद अनुसंधान द्वारा भौतिक से पार होकर अलौकिक अनुभव करते हुए परमतत्व की और बढते हुए
अंत में समाधी द्वारा शुन्य अवस्था को प्राप्त कर
सिद्ध हो जाता है ।

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