29/12/2022
नाथ योगीयो की नादी जनेऊ
नाथ सम्प्रदाय के योगी अपने गले में काले उन से निर्मीत जनेऊ धारण करते हैं जो तीन नाडी,
१. इडा
२.पिंगळा
३.सूषुमना
का प्रतीक मानी जाती है,
जिसे बनाने की विधी काफी जटील होती हैं ।
काली भेड के ऊन के रेशो को कात कर पतला धागा बनाया जाता है।
उस प्रकार 16 तंतुओ को आपस में गुंथ कर 12 ½ हाथ लंबी जनेऊ तैयार करने में कईं दिनो या महीनो तक का समय लगता है ।
बनाते समय नाथ योगी 'जनेऊ मंत्र' का जाप भी करते है ।
पुर्ण होने के उपरांत उसे जोडने के लिये एक गांठ लगाई जाती है जिसे 'ब्रह्म गांठ' कहा जाता है.
योगियो में ऐसी मान्यता है की
नादी जनेऊ धारण करने वाले योगी पर
गुरु गोरक्षनाथ जी
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर,
64 योगिनी
52 वीर
84 सिद्ध
9 नाथ की कृपा सदैव बनी रहती है ।
जनेऊ में गांठ लगाने के बाद
उसमें पवित्री, मुंगा, स्फटीक, रुद्राक्ष तथा नादी को जोडा जाता है ।
1) पवित्री :- पराशक्ती - पवित्रता
-चिदानंद - अर्धमात्रा
2) मुंगा :- ब्रह्मा जी - उत्पत्ति - रजोगुण -
ब्रह्मानंद - 'अ' कार - ब्रह्म ग्रंथी
3) स्फटीक :- विष्णु जी -स्थिति - सतोगुण -
महानंद - 'उ' कार - विष्णु ग्रंथी
4) रुद्राक्ष :- शिवजी - संहार - तमोगुण -
कैवल्यानंद - 'म' कार - रुद्र ग्रंथी
5) नादी :- ब्रह्मनाद -
(नादी और पवित्री लकड़ी, पीतल, हाथी दांत, चांदी, स्वर्ण, सफ्टिक इत्यादि से बनाई जाती है । )
नादी जनेऊ के पुर्ण रुप से तैयार होने पर
चोटी दीक्षा के समय नादी जनेऊ गुरु द्वारा शिष्य को पहनाई जाती है ।
साथ ही में सदगुरू द्वारा अपने नये बने चेले को गुरुमंत्र तथा नादी आदेश (नाद उठाना, ॐकार उठाना) करने की रिती समझाई जाती है,
नादी द्वारा जो नाद प्रगट होता है
उसे अनहद नाद का स्थुल स्वरुप माना गया है ।
नाथ योगी अपने गुरुदेव, ईष्टदेव, समाधी तथा धुणे के सामने नाद बजाकर आदेश करते हैं ।
जो शिष्य नादी जनेऊ धारण नही करते वह सिर्फ मंत्र बोलकर 'शंभु आदेश' करते है ।
योगी अपने गुरुदेव केे मार्गदर्शन मे रहकर योग के नियमो का पालन करते हुए नित्य साधना तथा ध्यान और
नाद अनुसंधान द्वारा भौतिक से पार होकर अलौकिक अनुभव करते हुए परमतत्व की और बढते हुए
अंत में समाधी द्वारा शुन्य अवस्था को प्राप्त कर
सिद्ध हो जाता है ।