शिव ही सत्य है

शिव ही सत्य है शिव ही सत्य है सत्य ही शिव है 🚩 शिव ही सत्य है सिर्फ एक धार्मिक चैनल है शिव के प्रचार हेतु

30/08/2026

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दिव्य उत्पति की कहानी 🚩

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मगिरी पर्वत पर भयंकर अकाल के समय महर्षि गौतम ने वरुण देव से कभी न सूखने वाला अक्षय कुंड प्राप्त किया। इससे ईर्ष्या कर अन्य ऋषियों ने एक कपटपूर्ण षड्यंत्र रचा और गौतम ऋषि पर गौ-हत्या का झूठा कलंक लगा दिया।

इस महापाप के प्रायश्चित और शुद्धि के लिए गौतम ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए। ऋषि गौतम के अनुरोध पर शिवजी ने अपनी जटाओं से माता गंगा (गोदावरी) को पृथ्वी पर उतारा। गंगा माता और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव वहीं ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त रूप में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए।🙏

30/08/2026

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दिव्य उत्पति की कहानी 🚩

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मगिरी पर्वत पर भयंकर अकाल के समय महर्षि गौतम ने वरुण देव से कभी न सूखने वाला अक्षय कुंड प्राप्त किया। इससे ईर्ष्या कर अन्य ऋषियों ने एक कपटपूर्ण षड्यंत्र रचा और गौतम ऋषि पर गौ-हत्या का झूठा कलंक लगा दिया।

इस महापाप के प्रायश्चित और शुद्धि के लिए गौतम ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए। ऋषि गौतम के अनुरोध पर शिवजी ने अपनी जटाओं से माता गंगा (गोदावरी) को पृथ्वी पर उतारा। गंगा माता और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव वहीं ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त रूप में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए।🙏

30/08/2026

त्रियंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की दिव्य उत्पति की कहानी 🚩

पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रह्मगिरी पर्वत पर भयंकर अकाल के समय महर्षि गौतम ने वरुण देव से कभी न सूखने वाला अक्षय कुंड प्राप्त किया। इससे ईर्ष्या कर अन्य ऋषियों ने एक कपटपूर्ण षड्यंत्र रचा और गौतम ऋषि पर गौ-हत्या का झूठा कलंक लगा दिया।

इस महापाप के प्रायश्चित और शुद्धि के लिए गौतम ऋषि ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव प्रकट हुए। ऋषि गौतम के अनुरोध पर शिवजी ने अपनी जटाओं से माता गंगा (गोदावरी) को पृथ्वी पर उतारा। गंगा माता और देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव वहीं ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त रूप में त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा के लिए स्थापित हो गए।🙏

29/08/2026

🛕ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की मुख्य पौराणिक कथा विंध्याचल पर्वत से जुड़ी है। एक बार नारद जी के मुख से मेरु पर्वत की महानता सुनकर विंध्याचल को ईर्ष्या हुई। अपने को श्रेष्ठ बनाने की कामना से उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर छह महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी साक्षात् प्रकट हुए और वरदान दिया। तभी वहां उपस्थित देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, लोक-कल्याण के लिए महादेव ने अपने दिव्य स्वरूप को दो भागों में विभाजित कर दिया। प्रणव स्वरूप वाला पहला भाग ओंकारेश्वर और पार्थिव मूर्ति वाला दूसरा भाग ममलेश्वर (अमलेश्वर) कहलाया।🚩🙏

29/08/2026

🛕ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की मुख्य पौराणिक कथा विंध्याचल पर्वत से जुड़ी है। एक बार नारद जी के मुख से मेरु पर्वत की महानता सुनकर विंध्याचल को ईर्ष्या हुई। अपने को श्रेष्ठ बनाने की कामना से उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर छह महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी साक्षात् प्रकट हुए और वरदान दिया। तभी वहां उपस्थित देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, लोक-कल्याण के लिए महादेव ने अपने दिव्य स्वरूप को दो भागों में विभाजित कर दिया। प्रणव स्वरूप वाला पहला भाग ओंकारेश्वर और पार्थिव मूर्ति वाला दूसरा भाग ममलेश्वर (अमलेश्वर) कहलाया।🚩🙏

29/08/2026

🛕ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की मुख्य पौराणिक कथा विंध्याचल पर्वत से जुड़ी है। एक बार नारद जी के मुख से मेरु पर्वत की महानता सुनकर विंध्याचल को ईर्ष्या हुई। अपने को श्रेष्ठ बनाने की कामना से उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर छह महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी साक्षात् प्रकट हुए और वरदान दिया। तभी वहां उपस्थित देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, लोक-कल्याण के लिए महादेव ने अपने दिव्य स्वरूप को दो भागों में विभाजित कर दिया। प्रणव स्वरूप वाला पहला भाग ओंकारेश्वर और पार्थिव मूर्ति वाला दूसरा भाग ममलेश्वर (अमलेश्वर) कहलाया।🚩

29/08/2026

🛕ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की उत्पति की मुख्य पौराणिक कथा विंध्याचल पर्वत से जुड़ी है। एक बार नारद जी के मुख से मेरु पर्वत की महानता सुनकर विंध्याचल को ईर्ष्या हुई। अपने को श्रेष्ठ बनाने की कामना से उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर मिट्टी का शिवलिंग बनाकर छह महीने तक भगवान शिव की कठोर तपस्या की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी साक्षात् प्रकट हुए और वरदान दिया। तभी वहां उपस्थित देवताओं और ऋषियों की प्रार्थना पर, लोक-कल्याण के लिए महादेव ने अपने दिव्य स्वरूप को दो भागों में विभाजित कर दिया। प्रणव स्वरूप वाला पहला भाग ओंकारेश्वर और पार्थिव मूर्ति वाला दूसरा भाग ममलेश्वर (अमलेश्वर) कहलाया।🚩🙏

28/08/2026

🛕भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कहानी महाभारत काल से जुड़ी है।🚩
-पांडवों के प्रायश्चित की इच्छा महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों पर अपने ही भाइयों (कौरवों) और गुरुजनों की हत्या का पाप (गोत्र हत्या और ब्रह्म हत्या) लगा था।
-इस पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए निकले।भगवान शिव की परीक्षाभगवान शिव पांडवों से रुष्ट (नाराज) थे और उन्हें इतनी आसानी से दर्शन नहीं देना चाहते थे। जब पांडव काशी पहुंचे, तो शिव जी वहां से अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र (उत्तराखंड) में आ गए।
-महिष (भैंसे) का रूप पांडव भी शिव जी को खोजते हुए केदार क्षेत्र पहुंच गए। पांडवों को आया देख भगवान शिव ने वहां चर रहे भैंसों के झुंड में महिष (भैंसे) का रूप धारण कर लिया ताकि पांडव उन्हें पहचान न सकें।
-भीम की चतुराई पांडवों को संदेह हुआ कि शिव जी इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला दिए। सभी गाय-भैंसें भीम के पैरों के नीचे से निकल गईं, लेकिन भगवान शिव रूपी भैंसा पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुआ। भीम समझ गए कि यही शिव जी हैं।
-ज्योतिर्लिंग की स्थापना जैसे ही भीम भैंस रूपी शिव को पकड़ने के लिए झपटे, वैसे ही वह भैंसा भूमि में अंतर्ध्यान (धंसने) होने लगा। भीम ने फुर्ती से भैंसे की पीठ का त्रिकोणीय भाग (कूबड़) मजबूती से पकड़ लिया। पांडवों के इस दृढ़ निश्चय और भक्ति को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर पांडवों को सभी पापों से मुक्त कर दिया।तभी से, भगवान शिव का वह त्रिकोणीय पीठ का भाग वहां शिला रूप (ज्योतिर्लिंग) में स्थापित हो गया, जिसे आज हम केदारनाथ के नाम से पूजते हैं।🙏

28/08/2026

🛕भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कहानी महाभारत काल से जुड़ी है।🚩
-पांडवों के प्रायश्चित की इच्छा महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों पर अपने ही भाइयों (कौरवों) और गुरुजनों की हत्या का पाप (गोत्र हत्या और ब्रह्म हत्या) लगा था।
-इस पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए निकले।भगवान शिव की परीक्षाभगवान शिव पांडवों से रुष्ट (नाराज) थे और उन्हें इतनी आसानी से दर्शन नहीं देना चाहते थे। जब पांडव काशी पहुंचे, तो शिव जी वहां से अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र (उत्तराखंड) में आ गए।
-महिष (भैंसे) का रूप पांडव भी शिव जी को खोजते हुए केदार क्षेत्र पहुंच गए। पांडवों को आया देख भगवान शिव ने वहां चर रहे भैंसों के झुंड में महिष (भैंसे) का रूप धारण कर लिया ताकि पांडव उन्हें पहचान न सकें।
-भीम की चतुराई पांडवों को संदेह हुआ कि शिव जी इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला दिए। सभी गाय-भैंसें भीम के पैरों के नीचे से निकल गईं, लेकिन भगवान शिव रूपी भैंसा पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुआ। भीम समझ गए कि यही शिव जी हैं।
-ज्योतिर्लिंग की स्थापना जैसे ही भीम भैंस रूपी शिव को पकड़ने के लिए झपटे, वैसे ही वह भैंसा भूमि में अंतर्ध्यान (धंसने) होने लगा। भीम ने फुर्ती से भैंसे की पीठ का त्रिकोणीय भाग (कूबड़) मजबूती से पकड़ लिया। पांडवों के इस दृढ़ निश्चय और भक्ति को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर पांडवों को सभी पापों से मुक्त कर दिया।तभी से, भगवान शिव का वह त्रिकोणीय पीठ का भाग वहां शिला रूप (ज्योतिर्लिंग) में स्थापित हो गया, जिसे आज हम केदारनाथ के नाम से पूजते हैं।🙏

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