28/08/2026
🛕भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना की कहानी महाभारत काल से जुड़ी है।🚩
-पांडवों के प्रायश्चित की इच्छा महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों पर अपने ही भाइयों (कौरवों) और गुरुजनों की हत्या का पाप (गोत्र हत्या और ब्रह्म हत्या) लगा था।
-इस पाप से मुक्ति पाने के लिए पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए निकले।भगवान शिव की परीक्षाभगवान शिव पांडवों से रुष्ट (नाराज) थे और उन्हें इतनी आसानी से दर्शन नहीं देना चाहते थे। जब पांडव काशी पहुंचे, तो शिव जी वहां से अंतर्ध्यान होकर हिमालय के केदार क्षेत्र (उत्तराखंड) में आ गए।
-महिष (भैंसे) का रूप पांडव भी शिव जी को खोजते हुए केदार क्षेत्र पहुंच गए। पांडवों को आया देख भगवान शिव ने वहां चर रहे भैंसों के झुंड में महिष (भैंसे) का रूप धारण कर लिया ताकि पांडव उन्हें पहचान न सकें।
-भीम की चतुराई पांडवों को संदेह हुआ कि शिव जी इसी झुंड में छिपे हैं। तब भीम ने विशाल रूप धारण किया और दो पहाड़ों पर अपने पैर फैला दिए। सभी गाय-भैंसें भीम के पैरों के नीचे से निकल गईं, लेकिन भगवान शिव रूपी भैंसा पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुआ। भीम समझ गए कि यही शिव जी हैं।
-ज्योतिर्लिंग की स्थापना जैसे ही भीम भैंस रूपी शिव को पकड़ने के लिए झपटे, वैसे ही वह भैंसा भूमि में अंतर्ध्यान (धंसने) होने लगा। भीम ने फुर्ती से भैंसे की पीठ का त्रिकोणीय भाग (कूबड़) मजबूती से पकड़ लिया। पांडवों के इस दृढ़ निश्चय और भक्ति को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर पांडवों को सभी पापों से मुक्त कर दिया।तभी से, भगवान शिव का वह त्रिकोणीय पीठ का भाग वहां शिला रूप (ज्योतिर्लिंग) में स्थापित हो गया, जिसे आज हम केदारनाथ के नाम से पूजते हैं।🙏