Shree Harihar Kailas Gyanpeeth Nayas Rishikesh

Shree Harihar Kailas Gyanpeeth Nayas  Rishikesh हर हर महादेव

🕉श्री हरिहरो विजयतेतराम🕉  🌄सुप्रभातम🌄🗓आज का पञ्चाङ्ग🗓🌻गुरुवार, २८ मई २०२६🌻सूर्योदय: 🌄 ०५:३८सूर्यास्त: 🌅 ०७:१०चन्द्रोदय: ...
27/05/2026

🕉श्री हरिहरो विजयतेतराम🕉
🌄सुप्रभातम🌄
🗓आज का पञ्चाङ्ग🗓
🌻गुरुवार, २८ मई २०२६🌻

सूर्योदय: 🌄 ०५:३८
सूर्यास्त: 🌅 ०७:१०
चन्द्रोदय: 🌝 १६:४०
चन्द्रास्त: 🌜२७:३१
अयन 🌘 उत्तरायणे (उत्तर गोले)
ऋतु: 🌞 ग्रीष्म
शक सम्वत: 👉 १९४८ (पराभव)
विक्रम सम्वत: 👉 २०८३ (रौद्र)
मास 👉 (प्रथम अधिक) ज्येष्ठ
पक्ष 👉 शुक्ल
तिथि 👉 द्वादशी (०७:५६ से त्रयोदशी)
नक्षत्र 👉 चित्रा (०८:०८ से स्वाती)
योग 👉 वरीयान् (२७:५५ से परिघ)
प्रथम करण 👉 बालव (०७:५६ तक)
द्वितीय करण 👉 कौलव (२०:५१ तक)
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॥ गोचर ग्रहा: ॥
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सूर्य 🌟 वृष
चंद्र 🌟 कन्या (०९:०७ से)
मंगल 🌟 मेष (अस्त, पश्चिम , मार्गी)
बुध 🌟 वृष (उदित, पश्चिम, मार्गी)
गुरु 🌟 मिथुन (उदित, पूर्व, मार्गी)
शुक्र 🌟 मिथुन (उदित, पश्चिम, मार्गी)
शनि 🌟 मीन (उदय, पश्चिम, मार्गी)
राहु 🌟 कुम्भ
केतु 🌟 सिंह
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शुभाशुभ मुहूर्त विचार
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अभिजित मुहूर्त 👉 ११:४६ से १२:४२
अमृत काल 👉 २४:५५ से २६:४१
विजय मुहूर्त 👉 १४:३३ से १५:२९
गोधूलि मुहूर्त 👉 १९:१० से १९:३०
सायाह्न सन्ध्या 👉 १९:११ से २०:१२
निशिता मुहूर्त 👉 २३:५४ से २४:३४
राहुकाल 👉 १३:५९ से १५:४३
राहुवास 👉 दक्षिण
यमगण्ड 👉 ०५:१७ से ०७:०१
दुर्मुहूर्त 👉 ०९:५५ से १०:५१
होमाहुति 👉 शनि
दिशाशूल 👉 दक्षिण
अग्निवास 👉 पाताल (०७:५६ से पृथ्वी)
चन्द्र वास 👉 पश्चिम
शिववास 👉 कैलाश पर (०७:५६ से नन्दी पर)
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☄चौघड़िया विचार☄
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॥ दिन का चौघड़िया ॥
१ - शुभ २ - रोग
३ - उद्वेग ४ - चर
५ - लाभ ६ - अमृत
७ - काल ८ - शुभ
॥रात्रि का चौघड़िया॥
१ - अमृत २ - चर
३ - रोग ४ - काल
५ - लाभ ६ - उद्वेग
७ - शुभ ८ - अमृत
नोट👉 दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
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शुभ यात्रा दिशा
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पश्चिम-दक्षिण (दही का सेवन कर यात्रा करें)
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तिथि विशेष
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प्रदोष व्रत, गृह प्रवेश मुहूर्त प्रातः ०५:३५ से ०७:१८ तक, वाहन क्रय-विक्रय मुहूर्त प्रातः १०:४२ से दोपहर ०३:४९ तक आदि।
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आज जन्मे शिशुओं का नामकरण
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आज ०८:०८ तक जन्मे शिशुओ का नाम चित्रा नक्षत्र के चतुर्थ चरण अनुसार क्रमशः (रि) नामाक्षर से तथा इसके बाद जन्मे शिशुओ का नाम स्वाती नक्षत्र के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ चरण अनुसार क्रमशः (रू, रे, रो, ता) नामाक्षर से रखना शास्त्र सम्मत है।
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उदय-लग्न मुहूर्त
वृषभ - २८:३६ से ०६:३१
मिथुन - ०६:३१ से ०८:४६
कर्क - ०८:४६ से ११:०७
सिंह - ११:०७ से १३:२६
कन्या - १३:२६ से १५:४४
तुला - १५:४४ से १८:०५
वृश्चिक - १८:०५ से २०:२४
धनु - २०:२४ से २२:२८
मकर - २२:२८ से २४:०९+
कुम्भ - २४:०९+ से २५:३५+
मीन - २५:३५+ से २६:५८+
मेष - २६:५८+ से २८:३२+
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पञ्चक रहित मुहूर्त
चोर पञ्चक - ०५:१७ से ०६:३१
शुभ मुहूर्त - ०६:३१ से ०७:५६
रोग पञ्चक - ०७:५६ से ०८:०८
शुभ मुहूर्त - ०८:०८ से ०८:४६
मृत्यु पञ्चक - ०८:४६ से ११:०७
अग्नि पञ्चक - ११:०७ से १३:२६
शुभ मुहूर्त - १३:२६ से १५:४४
रज पञ्चक - १५:४४ से १८:०५
शुभ मुहूर्त - १८:०५ से २०:२४
चोर पञ्चक - २०:२४ से २२:२८
शुभ मुहूर्त - २२:२८ से २४:०९+
रोग पञ्चक - २४:०९+ से २५:३५+
शुभ मुहूर्त - २५:३५+ से २६:५८+
शुभ मुहूर्त - २६:५८+ से २८:३२+
रोग पञ्चक - २८:३२+ से २९:१७+
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आज का राशिफल
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मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ)
आज का दिन आपके लिए सुख-समृद्धि दायक रहेगा। आज आप जिस भी कार्य को करने का मन बनाएंगे आरम्भ में लाभ-हानि को लेकर भ्रम पैदा होगा परन्तु शीघ्र ही स्थिति स्पष्ट होने लगेगी। आज लाभ कमाने के लिए आपको जोखिम लेना ही पड़ेगा इसका परिणाम आपके पक्ष में ही रहेगा। व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़ी महिलाओ को पदोन्नति के साथ प्रोत्साहन के रूप में आर्थिक सहायता भी मिल सकती है। सामाजिक कार्यो में रुचि ना होने पर भी सम्मिलित होना पड़ेगा मान-सम्मान बढेगा। परिजनों का मार्गदर्शन आज प्रत्येक क्षेत्र पर काम आएगा। प्रेम प्रसंगों में निकटता रहेगी।

वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
आज के दिन आपकी वैचारिक स्थिति प्रखर रहेगी सार्वजनिक कार्यो में सम्मानित होंगे आपकी छवि भी बुद्धिमानो जैसी बनेगी। परन्तु आर्थिक रूप से इसका लाभ नही ले पाएंगे। कार्य व्यवसाय मंदा रहने से उदासीनता आएगी। आज आपका मन भी एक जगह केंद्रित नही रहेगा। धैर्य से कार्य करते रहें संध्या तक संतोषजक लाभ अवश्य मिलेगा पारिवार में भी आपके विचारो की प्रशंसा होगी लेकिन केवल व्यवहार मात्र के लिए ही। आर्थिक विषयो को लेकर किसी से विवाद ना करें धन डूबने की आशंका है। गृहस्थ में प्रेम स्नेह तो मिलेगा परन्तु स्वार्थ सिद्धि की भावना भी अधिक रहेगी। महिलाये अधिक बोलने की समस्या से ग्रस्त रहेंगी।

मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा)
आज का दिन आपको धैर्य से बिताने की सलाह है। आज आप निरंतर मिल रही असफलता अथवा कलह-क्लेश के वातावरण से क्षुब्ध होकर अनुचित कदम उठा सकते है जिसका स्वयं एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा पर गलत प्रभाव पड़ेगा। परिजनों की असंतोषी प्रवृति के कारण घरेलू वातावरण आज लगभग अशांत ही रहेगा। कार्य क्षेत्र पर सहकर्मी अथवा अन्य लोगो के आश्रित रहना पड़ेगा फिर भी जरूरत के अनुसार लाभ अवश्य हो जायेगा। किसी भी महत्त्वपूर्ण निर्णय को लेने से पहले एक बार लाभ हानि की समीक्षा अवश्य करें।महिलाये आज व्यवहार संयमित रखें मान हानि की संभावना है। आडम्बर के ऊपर खर्च होगा।

कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो)
आज के दिन आपको धन लाभ के योग बन रहे है लेकिन आज आपके बनते कार्यो में टांग अड़ाने वालो का भी सामना करना पड़ेगा। व्यवसायी वर्ग आज निवेश का जोखिम ले सकते है अवश्य लाभ होगा। शेयर सट्टे आदि कार्यो में धन दुगुना होकर मिलेगा। परिवार में सुख के साधनों की वृद्धि होगी इसपर खर्च भी अधिक रहेगा। आध्यत्म अथवा साधना क्षेत्र से जुड़े जातको को साधना में सिद्धि की दिव्य अनुभूति होगी। नौकरी पेशा लोगो का आज काम के समय भी मन इधर उधर ज्यादा भटकेगा। मन में चल रही कामना अतिशीघ्र पूर्ण होने के योग है। ध्यान रहे आज किसी भी कार्य में आलस्य किया तो दोबारा अवसर नही मिल सकेगा।

सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे)
आज आपका संतोषी स्वभाव आपको बेवजह की उलझनों से दूर रखेगा फिर भी आज किसी के दबाव में आकर आपको कोई अप्रिय कार्य करना पड़ेगा मन में इसका पश्चाताप भी रहेगा। आमदनी आज स्थिर रहेगी संचित कोष से खर्च चलाने पड़ेंगे। मित्र परिचितों के साथ संध्या के समय मौज शौक पूरे करेंगे परन्तु रंग में भंग पड़ने वाली स्थिति बन सकती है सतर्क रहें। विपरीत लिंगीय वर्ग से आकर्षण बढेगा। प्रेम प्रसंगों में नजदिकी आएगी। संताने जिद पर अड़ेंगी जिससे घर मे अशांति फैलेगी। असंयमित दिनचार्य के कारण स्वास्थ्य प्रतिकूल होने की संभावना है। बुजुर्गो की चिंता रहेगी।

कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
आज का दिन आपको मिला जुला फल देगा। मन आज मनोरंजन की ओर अधिक आकर्षित रहेगा इसपर फिजूल खर्ची करने से पीछे नही हटेंगे। कार्य व्यवसाय से आर्थिक लाभ पाने के लिये ज्यादा परिश्रम करना पड़ेगा। स्वास्थ्य में कमी रहेगी कमजोरी अथवा पेट संबंधित व्याधि परेशान करेगी। घर एवं व्यवसाय में तालमेल बैठाने के कारण दुविधा में रहेंगे। एक कार्य को करने के चक्कर मे अन्य आयवश्यक कार्य अधूरे रहेंगे। सरकारी अथवा किसी भी प्रकार के जमीन-जायदाद संबंधित कार्य मे उलझने पड़ेंगी यथा संभव आज टालें। आध्यात्मिक गतिविधियों में भाग लेने से थोड़ी मानसिक शांति मिलेगी। धन के व्यवहारों में जबरदस्ती ना करें।

तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
आज आपका ध्यान मनोरंजन पर अधिक रहेगा आज आपकी मानसिकता भी कम परिश्रम से अधिक लाभ पाने की रहेगी।इसके कारण कार्यो पर उचित ध्यान नही दे पाएंगे परन्तु फिर भी आकस्मिक लाभ के योग बन रहे है। दौड़ धूप अधिक रहने से शारीरिक शिथिलता बनेगी। मध्यान के बाद किसी अभीष्ट सिद्धि के योग बन रहे है आलस्य ना करें अन्यथा लाभ से वंचित रह सकते है। प्रियजनों के साथ आनंद के क्षण बिताने का समय मिलेगा। घर मे स्थिति सामान्य रहेगी। आज आर्थिक मामलों के प्रति बेपरवाह भी रहेंगे। आवश्यक कार्य संध्या से पहले करले इसके बाद विविध हानि के योग बनने लगेंगे।

वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू)
आज परिस्थितियां आपकी आशाओ के आज का दिन भी आपके लिए शुभफलदायी रहेगा। पुरानी रुकी योजना आज सिरे चढ़ने से राहत मिलेगी। कार्य क्षेत्र पर आज प्रतिस्पर्धा कम रहने से इसका लाभ उठायेंगे आज का दिन आर्थिक रूप से मजबूती प्रदान करेगा। व्यापार विस्तार की योजना सफल रहेगी। नौकरी पेशा जातक अधिकारी वर्ग से आसानी से काम निकाल सकेंगे। सामाजिक क्षेत्र हो या पारिवारिक अथवा अन्य सभी जगह आपकी जय होगी। अपरिचित भी आपसे संपर्क बनाने को उत्सुक रहेंगे। महिलाओं का स्वभाव अधिक नखरे वाला रहेगा इस वजह से हास्य की पात्र भी बनेंगी।

धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे)
आज अधूरे कार्यो को पूर्ण करने का दिन है अगर आज आलस्य किया तो बाद में पछताना पड़ेगा। सभी प्रकार के कागजी अथवा सरकारी कार्य अधिकारी वर्ग की मेहरबानी से निर्विघ्न पूर्ण होंगे। कार्य व्यवसाय से भी आशानुकूल लाभ मिल सकेगा। आज आपका मन लंबी यात्रा की योजना बनाएगा शीघ्र ही इसके फलीभूत होने की सम्भवना है। चल- अचल संपत्ति से लाभ होगा। प्रतिस्पर्धी आज आपके आगे ज्यादा देर नही टिक पाएंगे। हृदय में आज कोमलता अधिक रहेगी परोपकार के लिए प्रेरित होंगे। महिलाओ का जिद्दी स्वभाव कुछ समय के लिये घर पर अशांति कर सकता है। फिर भी पिछले कुछ दिनों की तुलना में आज शान्ति अनुभव करेंगे।

मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी)
अनुकूल रहेंगी। लेकिन आज आपका सनकी स्वभाव कुछ ना कुछ हानि भी करायेगा। धन संबंधित कार्य आपकी व्यवहार शून्यता के कारण उलझेंगे परन्तु शीघ्र ही किसी के सहयोग मिलने से सुलझ जाएंगे। कार्य व्यवसाय से प्रारंभिक परिश्रम के बाद दोपहर के समय से धन की आमद शुरू हो जाएगी जो संध्या तक रुक रुक कर चलती रहेगी। मितव्ययी रहने के कारण खर्च भी हिसाब से करेंगे। महिलाये किसी मनोकामना पूर्ति से उत्साहित होंगी। महिला वर्ग से कोई भी काम निकालना आसान रहेगा मना नही कर सकेंगी। दाम्पत्य सुख में भी वृद्धि होगी। पर्यटन की योजना बनेगी।

कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा)
आज के दिन भी सुख शांति की कमी रहेगी। आज आप जिस भी कार्य को करेंगे उसमे भाग दौड़ अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक करनी पड़ेगी। सेहत में उतारचढ़ाव बना रहेगा। स्नायु तंत्र कमजोर रहने से विविध समस्या उपजेगी। काम धंधा आज लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक करायेगा। धन को लेकर मन विचलित रहेगा। आज आप अपने जीवनी की समीक्षा भी करेंगे जिससे मन हीनभावना से ग्रस्त रहेगा। व्यावसायिक अथवा अन्य पारिवारिक-धार्मिक कारणों से यात्रा के योग बनेंगे अगर संभव हो तो यात्रा आज ना ही करें वाहन से चोटादि का भय है। सेहत अचानक खराब हो सकती है। चक्कर-वमन अथवा अन्य पेट मस्तिष्क संबंधित समस्या खड़ी होगी।

मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची)
आज के दिन आप लापरवाह अधिक रहेंगे फिर भी लाभ आज किसी ना किसी रूप में अवश्य हो जाएगा। कार्य व्यवसाय में अव्यवस्था सुधारने में मध्यान तक व्यस्त रहेंगे सहकर्मीयो की मनमानी व्यवहार के कारण क्रोध आएगा फिर भी स्थिति बिगड़ने नही देंगे। आर्थिक रूप से दिन शुभ रहेगा परन्तु हाथ खुला होने से ज्यादा देर टिकेगा नही। उधारी के व्यवहार ज्यादा ना बढ़ाएं अन्यथा उलझने बढ़ेंगी। सामाजिक व्यवहार दिखावा मात्र ही रहेंगे। परिवार में सुख शान्ति की अनुभूति होगी लेकिन महिला वर्ग का स्वभाव अचानक बदल सकता है सतर्क रहें। घर मे शान्ती बनाये रखने के लिए परिजनों की आवश्यकता पूर्ति करनी पड़ेगी।
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(((((((( सबके दाता राम॥ ))))))))🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱मलूकदास जी कर्मयोगी संत थे. स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक...
27/05/2026

(((((((( सबके दाता राम॥ ))))))))🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱🌺🌱

मलूकदास जी कर्मयोगी संत थे. स्वाध्याय, सत्संग व भ्रमण से उन्होंने जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया उसका मुकाबला किताबी ज्ञान नहीं कर सकता. औरंगजेब जैसा पशुवत मनुष्य भी उनके सत्संग का सम्मान करता था.
शुरू में संत मलूकदास जी नास्तिक थे. उनके गांव में एक साधु आए और आकर टिक गए. साधुजी लोगों को रामायण सुनाते थे. प्रतिदिन सुबह-शाम गांव वाले उनका दर्शन करते और उनसे राम कथा का आनंद लेते.
संयोग से एक दिन मलूकदास भी राम कथा में पहुंचे. उस समय साधु महाराजा ग्रामीणों को श्रीराम की महिमा बताते कह रहे थे- श्रीराम संसार के सबसे बड़े दाता है. वह भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं.
मलूकदास ने भी साधु की यह बात सुनी पर उनके पल्ले नहीं पड़ी. उन्होंने अपना विरोध जताते तर्क किया- क्षमा करे महात्मन ! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, कोई काम न करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे ?
साधु ने पूरे विश्वास के साथ कहा- अवश्य देंगे. उनकी दृढता से मलूकदास के मन में एक और प्रश्न उभरा तो पूछ बैठे- यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब ? साधु ने दृढ़ता के साथ कहा- तब भी श्रीराम भोजन देंगे !
बात मलूकदास को लग गई. अब तो श्रीराम की दानशीलता की परीक्षा ही लेनी है. पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए. चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पेड़ थे. कंटीली झाड़ियां थीं. दूर-दूर तक फैले जंगल में धीरे-धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुप गया.
चारों तरफ अंधेरा फैल गया, मगर न मलूकदास को भोजन मिला, न वह पेड़ से ही उतरे. सारी रात बैठे रहे.
अगले दिन दूसरे पहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी. वह सतर्क होकर बैठ गए. थोड़ी देर में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे. वे सब उसी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े. उन्होंने भोजन का मन बनाया.
उसी समय जब एक अधिकारी थैले से भोजन का डिब्बा निकाल रहा था, शेर की जबर्दस्त दहाड़ सुनाई पड़ी. दहाड़ का सुनना था कि घोड़े बिदककर भाग गए.
अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देखा, फिर भोजन छोड़ कर वे भी भाग गए. मलूकदास पेड़ से ये सब देख रहे थे. वह शेर की प्रतीक्षा करने लगे. मगर दहाड़ता हुआ शेर दूसरी तरफ चला गया.
मलूकदास को लगा, श्रीराम ने उसकी सुन ली है अन्यथा इस घनघोर जंगल में भोजन कैसे पहुंचता ? मगर मलूकदास तो मलूकदास ठहरे. उतरकर भला स्वयं भोजन क्यों करने लगे ! वह तो भगवान श्रीराम को परख रहे थे.
तीसरे पहर में डाकुओं का एक बड़ा दल उधर से गुजरा. पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बर्तनों में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के रूप में पड़े भोजन को देख कर डाकू ठिठक गए.
डाकुओं के सरदार ने कहा- भगवान श्रीराम की लीला देखो. हम लोग भूखे हैं और भोजन की प्रार्थना कर रहे थे. इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन भेज दिया. इसे खा लिया जाए तो आगे बढ़ें.
मलूकदास को हैरानी हुई कि डाकू भी श्रीराम पर इतनी आस्था रखते हैं कि वह भोजन भेजेंगे. वह यह सब सोच ही रहे थे कि उन्हें डाकुओं की बात में कुछ शंका सुनाई पड़ी.
डाकू स्वभावतः शकी होते हैं. एक साथी ने सावधान किया- सरदार, इस सुनसान जंगल में इतने सजे-धजे तरीके से सुंदर बर्तनों में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्यमय लग रहा है. कहीं इसमें विष न हो.
यह सुनकर सरदार बोला- तब तो भोजन लाने वाला आस पास ही कहीं छिपा होगा. पहले उसे तलाशा जाए. सरदार के आदेश पर डाकू इधर-उधर तलाशने लगे. तभी एक डाकू की नजर मलूकदास पर पड़ी.
उसने सरदार को बताया. सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं. उसने घुड़ककर कहा- दुष्ट ! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है ! चल उतर.
सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गए मगर उतरे नहीं. वहीं से बोले- व्यर्थ दोष क्यों मंढ़ते हो ? भोजन में विष नहीं है. सरदार ने आदेश दिया- पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ. झूठ-सच का पता अभी चल जाता है.
आनन-फानन में तीन-चार डाकू भोजन का डिब्बा उठाए पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखा कर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया. मलूकदास ने स्वादिष्ट भोजन कर लिया. फिर नीचे उतरकर डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया.

डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया. वह स्वयं भोजन से भाग रहे थे लेकिन प्रभु की माया ऐसी रही कि उन्हें बलात भोजन करा दिया. इस घटना के बाद मलूकदास ईश्वर पक्के भक्त हो गए.

शिक्षा👇
आपके कर्म शुद्ध हैं. आपने कभी किसी का अहित करने की मंशा नहीं रखी तो ईश्वर आपके साथ सबसे ज्यादा प्रेमपूर्ण भाव रखते हैं, चाहे आप उन्हें भजें या न भजें.
आपके कर्म अच्छे हैं तो आप यदि मलूकदास जी की तरह प्रभु की परीक्षा लेने लगे तो भी वह इसका बुरा नहीं मानते. आपके सत्कर्मों का सम्मान करते स्वयं परीक्षा देने आ जाते हैं. छोटे-बड़े की भावना ईश्वर में नहीं होती. ये विकार तो मनुष्य को क्षीण करते हैं.
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(((((((((( जय जयश्रीराधे))))))))))
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श्रीमहाभारतम् 〰️〰️🌼〰️〰️।। श्रीहरिः ।।* श्रीगणेशाय नमः *।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।(सम्भवपर्व) द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायःअर्...
27/05/2026

श्रीमहाभारतम्
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।। श्रीहरिः ।।
* श्रीगणेशाय नमः *
।। श्रीवेदव्यासाय नमः ।।

(सम्भवपर्व)

द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

अर्जुन के द्वारा लक्ष्यवेध, द्रोण का ग्राह से छुटकारा और अर्जुन को ब्रह्मशिर नामक अस्त्र की प्राप्ति...(दिन 400)
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अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः । मुञ्चस्वेत्यब्रवीत् पार्थं स मुमोचाविचारयन् ।। ८ ।।

अर्जुनके यों कहनेपर द्रोणाचार्यके शरीरमें (हर्षातिरेकसे) रोमांच हो आया और वे अर्जुनसे बोले, 'चलाओ बाण'! अर्जुनने बिना सोचे-विचारे बाण छोड़ दिया ।। ८ ।।

ततस्तस्य नगस्थस्य क्षुरेण निशितेन च ।
शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः ।। ९ ।।

फिर तो पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने चलाये हुए तीखे क्षुर नामक बाणसे वृक्षपर बैठे हुए उस गीधका मस्तक वेगपूर्वक काट गिराया ।। ९ ।।

तस्मिन् कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम् । मेने च द्रुपदं संख्ये सानुबन्धं पराजितम् ।। १० ।।

इस कार्यमें सफलता प्राप्त होनेपर आचार्यने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उन्हें यह विश्वास हो गया कि राजा द्रुपद युद्धमें अर्जुनद्वारा अपने भाई-बन्धुओंसहित अवश्य पराजित हो जायेंगे ।। १० ।।

कस्यचित् त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः । जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ ।। ११ ।।

भरतश्रेष्ठ ! तदनन्तर किसी समय आंगिरसवंशियोंमें उत्तम आचार्य द्रोण अपने शिष्योंके साथ गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये ।। ११ ।।

अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः ।
ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः ।। १२ ।।

वहाँ जलमें गोता लगाते समय कालसे प्रेरित हो एक बलवान् जलजन्तु ग्राहने
द्रोणाचार्य की पिंडली पकड ली ।। १२ ।।

स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान् सर्वानचोदयत् । ग्राहं हत्वा मोक्षयध्वं मामिति त्वरयन्निव ।। १३ ।।

वे अपनेको छुड़ानेमें समर्थ होते हुए भी मानो हड़बड़ाये हुए अपने सभी शिष्योंसे बोले- 'इस ग्राह को मारकर मुझे बचाओ' ।। १३ ।।

तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः ।
अवार्यैः पञ्चभिर्ग्रहं मग्नमम्भस्यताडयत् ।। १४ ।।

उनके इस आदेशके साथ ही बीभत्सु (अर्जुन) ने पाँच अमोघ एवं तीखे बाणोंद्वारा पानीमें डूबे हुए उस ग्राहपर प्रहार किया ।। १४ ।।

इतरे त्वथ सम्मूढास्तत्र तत्र प्रपेदिरे । तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम् ।। १५ ।।

विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत् तदा । स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः ।। १६ ।।

ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः ।
अथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम् ।। १७ ।।

परंतु दूसरे राजकुमार हक्के-बक्के-से होकर अपने-अपने स्थानपर ही खड़े रह गये। अर्जुनको तत्काल कार्यमें तत्पर देख द्रोणाचार्यने उन्हें अपने सब शिष्योंसे बढ़कर माना और उस समय वे उनपर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुनके बाणोंसे ग्राहके टुकड़े-टुकड़े हो गये और वह महात्मा द्रोणकी पिंडली छोड़कर मर गया। तब द्रोणाचार्यने महारथी महात्मा अर्जुनसे कहा- ।। १५-१७ ।।

गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम् । अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम् ।। १८ ।।

'महाबाहो ! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहारके साथ बता रहा हूँ। यह सब अस्त्रोंसे बढ़कर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो' ।। १८ ।।

न च ते मानुषेष्वेतत् प्रयोक्तव्यं कथंचन । जगद् विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम् ।। १९ ।।

'मनुष्योंपर तुम्हें इस अस्त्रका प्रयोग किसी भी दशामें नहीं करना चाहिये। यदि किसी अल्प तेजवाले पुरुषपर इसे चलाया गया तो यह उसके साथ ही समस्त संसारको भस्म कर सकता है ।। १९ ।।

असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते।
तद् धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम ।। २० ।।

'तात! यह अस्त्र तीनों लोकोंमें असाधारण बताया गया है। तुम मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर इस अस्त्रको धारण करो और मेरी यह बात सुनो ।। २० ।।

बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन ।
तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे ।। २१ ।।

'वीर! यदि कोई अमानव शत्रु तुम्हें युद्धमें पीड़ा देने लगे तो तुम उसका वध करनेके लिये इस अस्त्रका प्रयोग कर सकते हो' ।। २१ ।।

तथेति सम्प्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः ।
जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः ।
भविता त्वत्समो नान्यः पुमॉल्लोके धनुर्धरः ।। २२ ।।

तब अर्जुनने 'तथास्तु' कहकर वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्रको ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोणने अर्जुनसे पुनः यह बात कही- 'संसारमें दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर न होगा' ।। २२ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रोणग्राहमोक्षणे द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १३२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रोणाचार्यका ग्राहसे छुटकारा नामक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३२ ।।

क्रमशः...
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संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️काशीखण्ड (उत्तरार्ध)ब्रह्माजी का दिवोदास की सहायता से काशी में यज्ञ करना और...
27/05/2026

संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण
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काशीखण्ड (उत्तरार्ध)

ब्रह्माजी का दिवोदास की सहायता से काशी में यज्ञ करना और दशाश्वमेध तीर्थ की महिमा...(भाग 1)
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स्कन्दजी कहते हैं- मुने ! जब अंशुमाली सूर्य त्रिभुवनमोहिनी काशीपुरीको चले गये, तब मन्दराचल पर्वतपर विराजमान भगवान् शिव पुनः इस प्रकार विचार करने लगे 'अहो! अभीतक वहाँसे लौटकर न तो योगिनियाँ आयीं और न अबतक सूर्यदेव ही आये। काशीका समाचार भी मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हो गया, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। अब काशीकी वार्ता जाननेके लिये किसको यहाँसे भेजूं? वहाँकी बातोंको ठीक-ठीक जाननेमें ब्रह्माजी ही समर्थ हैं।' यह विचारकर ब्रह्माजीको बुलाकर महादेवजीने कहा- 'कमलोद्भव ! मैंने काशीका समाचार जाननेके लिये पहले तो योगिनियोंको भेजा था, फिर सूर्यदेवको भी प्रस्थापित किया था, किंतु अभीतक वे वहाँसे लौट नहीं रहे हैं। अतः अब आप जाइये, आपका मार्ग कल्याणमय एवं उसका भविष्य मंगलमय हो।'

भगवान् शिवकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके ब्रह्माजी काशीपुरीको गये। काशीका दर्शन करके ब्रह्माजीका मन हर्षोल्लाससे भर गया। वे वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण करके राजा दिवोदाससे मिले और हाथमें जल और अक्षत लेकर राजाके लिये स्वस्तिवाचन किया। राजाने उनके चरणों में प्रणाम किया। राजा दिवोदासने अभ्युत्थान और आसन आदिके द्वारा मुनिका यथावत् सत्कार किया और उनके शुभागमनका कारण पूछा।

तब ब्राह्मणने कहा- राजन् ! मैं बहुत समय पहलेका पुराना हूँ, दीर्घकालसे यहाँ रहता हूँ। तुम मुझे नहीं जानते, परंतु मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूँ। तुम्हारा पहला नाम रिपुंजय है। मैंने सैकड़ों ऐसे राजा देखे हैं जो छहों शत्रुओंको जीत चुके थे। सुशील, सत्त्वसम्पन्न, वेद-शास्त्रोंके पारंगत विद्वान्, राजनीतिकुशल, दया और उदारतामें निपुण, सत्यव्रतपरायण, पृथ्वीके समान क्षमाशील तथा समुद्रसे भी अधिक गम्भीर थे। परंतु राजर्षे ! तुम्हारे भीतर जो परम पवित्र दो-तीन सद्गुण हैं, वे उन राजाओंमें प्रायः मुझे देखनेको नहीं मिले हैं। तुम प्रजाजनोंको अपने कुटुम्बके लोगोंकी भाँति मानते हो। ब्राह्मण तुम्हारे देवता हैं और तुम बड़े-बड़े तपस्वी लोगोंके तपमें सहायक होते हो। ये बातें जैसी तुम्हारे भीतर हैं, वैसी औरोंमें नहीं देखी जातीं। अतः अन्य राजा तुम्हारे समान नहीं हैं। दिवोदास! तुम अपने सद्‌गुणोंके कारण धन्य हो, मान्य हो तथा सत्पुरुषोंके द्वारा भी आदरणीय हो। तुम्हारे डरसे देवता भी कुमार्ग में जानेका साहस नहीं करते। हम धन आदिकी कामनाओंसे रहित ब्राह्मण हैं, हमें किसीकी स्तुति-प्रशंसासे क्या प्रयोजन है। किंतु क्या करें, तुम्हारे सद्गुण ही हम-जैसे लोगोंको भी स्तुतिमें लगा देते हैं। राजन् ! मैं इस समय यहाँ यज्ञ करना चाहता हूँ और इस कार्यमें तुम्हें सहायक बनाना चाहता हूँ। तुम्हारी यह राजधानी कर्मभूमिमें सबसे अधिक उत्तम है। न्याय और सन्मार्गपर चलनेवाले पुरुषोंद्वारा जो धन संचय किया गया हो, उसका काशीमें सद्धर्मके कार्यमें उपयोग करना चाहिये; अन्यथा वह धन क्लेशका ही कारण होता है। भूपाल ! सबको ज्ञान प्रदान करनेवाले त्रिनेत्रधारी शिवको छोड़कर दूसरा कोई भी काशीकी उत्तम महिमाको यथार्थ रूपसे नहीं जानता। मैं समझता हूँ, तुम परम धन्य हो जो कि सैकड़ों जन्मोंके पुण्यसे काशीपुरीका पालन कर रहे हो। 'काशी तीनों लोकोंका सार है, काशी तीनों वेदोंका सार है, काशी त्रिवर्ग - धर्म, अर्थ और कामसे परे सब पुरुषार्थीका सारभूत मोक्ष है।' ऐसा महर्षियोंने निर्णय किया है। भगवान् विश्वनाथके अनुग्रहसे ही तुम्हारे द्वारा इस पुरी का पालन हो रहा है।

क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी
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आनन्दरामायणम्〰️〰️🌼🌼〰️〰️श्रीसीतापतये नमःश्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटी...
27/05/2026

आनन्दरामायणम्
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श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकि महामुनि कृत शतकोटि रामचरितान्तर्गतं ('ज्योत्स्ना' हृया भाषा टीकयाऽटीकितम्)

(जन्मकाण्डम्)

सप्तमः सर्गः

(राम-लक्ष्मण आदि का लव-कुश के साथ युद्ध)...(दिन 268)
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उसी समय सबके देखते ही देखते लव ब्रह्मास्त्र से छूट गया और भुजाएँ तथा ताल ठोंकता हुआ दौड़ने लगा। उसको देखकर वहाँ के सारे नर-नारी अपने-अपने कलसों को छोड़-छोड़कर भाग गये। उसके उस विकराल रूप को देखकर बहुतों की धोतीयाँ खुल गयीं। कई एक को तो मारे डर के पेशाब टट्टी तक हो गयी ॥ १०५ ॥ १०६ ॥

उघर कुश बच्चों की तरह खेलता-कूदता गङ्गाजी के किनारे गया। वहाँ उसने देखा कि बहुत से लोग पानी भर रहे हैं। उनसे कुछ से पूछा- तुमलोग इतना पानी क्यों भरे लिये जा रहे हो ? ॥ १०७ ॥

उन्होंने कहा-लव को मारने के लिए। यह सुनकर कुश अपने आश्रम पर गया और धनुष-बाण लेकर लव को छुड़ाने के लिए राम की यज्ञशाला के समीप जा पहुंचा और घनुष कि भीषण टंकोर किया ॥ १०८ ॥ १०६ ॥

कुश के धनुष की टंकोर सुनकर लव कुछ देर के लिए शान्त खड़ा हो गया और कुश से युद्ध करने के लिए लक्ष्मण के सामने जा पहुँचे ।। ११० ॥

लक्ष्मण को देखकर कुश ने कहा- तुमने और राम ने लब तथा सीता के साथ बड़ा छल किया है। उसी का बदला लेने के लिए में आया हूँ। मुझको लव की तरह साधारण बालक न समझना । तुम लोगों की वीरता स्त्री और छोटे-छोटे बच्चों पर ही चल सकती है, यह में जानता हूँ। सीता के क्लेशरूपी धधकती अग्नि में तुम्हारा बल जल चुका है। अब अपना उपहास कराने के लिए मेरे सामने लड़ने को व्यर्थ आये हो। अच्छा, पदि तुम्हारी यही इच्छा है तो वाल्मीकि कि सिखायी विद्या आज मैं तुम्हें और राम को दिखाता हूँ। ऐसा कहकर कुश ने लक्ष्मण के साथ तुमुल युद्ध प्रारम्भ कर दिया ।। १११-११४ ॥

लक्ष्मण ने कुश पर जितने बाण चलाये, वे सब व्यर्थ गये। रामायण की भविष्यवाणी से कुश को ज्ञात हो चुका था कि अब लक्ष्मण के सिवाय और कोई वीर बाकी बचा ही नहीं है कि जिसके साथ युद्ध करके मारने की आवश्यकता हो। यह सोचकर क्षात्र धर्म के अनुसार उसने चाचा को मारने में कोई अपराध न समझकर उन्हें मारने के लिए गारुडास्त्र का प्रयोग किया ॥ ११५ ॥ ११६ ॥

उस गारुडास्त्र को अपने ऊपर आते देखकर लक्ष्मण सिटपिटा गये। उनको सारी चातुरी भूल गयी और मूर्छित होकर रथ से पृथ्वी पर गिर पड़े। लक्ष्मण को रथ से गिरते देखकर राम दीक्षित होते हुए भी धनुष-बाण लेकर दौड़े और लक्ष्मण को बचाने के लिए उन्होंने कुश के छोड़े हुए गारुडास्त्र पर अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। ब्रह्मास्त्र के पहुंचने पर गारुडास्त्र आकाश में ही ठंढा हो गया। ११७-१२० ।।

क्रमशः...
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🌿 पौराणिक भगवद्भक्त शुकदेव – एक दिव्य जीवन कथा 🌿महान ऋषि शुकदेव, महर्षि वेदव्यास के तेजस्वी पुत्र माने जाते हैं। उनकी उत...
27/05/2026

🌿 पौराणिक भगवद्भक्त शुकदेव – एक दिव्य जीवन कथा 🌿

महान ऋषि शुकदेव, महर्षि वेदव्यास के तेजस्वी पुत्र माने जाते हैं। उनकी उत्पत्ति और जीवन से जुड़ी अनेक अद्भुत कथाएँ प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं, जो उनके असाधारण व्यक्तित्व और वैराग्य को दर्शाती हैं।

कथा के अनुसार, वेदव्यास ने एक ऐसे पुत्र की कामना की थी जो पृथ्वी, जल, वायु और आकाश के समान धैर्यवान और तेजस्वी हो। इस हेतु उन्होंने सुमेरु पर्वत पर कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया कि उन्हें अद्वितीय तेज से युक्त पुत्र प्राप्त होगा।

शुकदेव के जन्म के विषय में एक प्रसिद्ध कथा यह भी है कि एक समय अरणि मंथन करते हुए व्यासदेव के तेज से उनका जन्म हुआ। जन्म लेते ही वे बारह वर्ष के बालक के समान दीप्तिमान थे, उनके शरीर से अग्नि जैसी निर्मल आभा निकल रही थी। देवताओं ने पुष्पवर्षा की और स्वयं शिव-पार्वती ने उनका उपनयन संस्कार सम्पन्न कराया।

जन्म से ही उनका मन संसार से विरक्त था। वे न धर्म, अर्थ, काम में आसक्त हुए, बल्कि केवल मोक्ष की साधना में लीन रहे। एक समय उन्होंने अपने पिता से मोक्ष का मार्ग पूछा। व्यासदेव ने उन्हें उपदेश दिया कि जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए विषयों में आसक्ति छोड़कर आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।

पिता की आज्ञा मानकर वे मिथिला पहुँचे, जहाँ राजा राजा जनक से उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया। जनक ने उन्हें बताया कि गुरु के बिना ज्ञान संभव नहीं और आत्मज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है। उन्होंने समत्व, वैराग्य और अंतर्मुखी साधना का महत्व समझाया।

शुकदेव की परीक्षा भी ली गई—उन्हें भोग-विलास के बीच रखा गया, परंतु वे अचल रहे। उनके मन में न आकर्षण उत्पन्न हुआ, न विकार। इससे सिद्ध हुआ कि वे पूर्णतः ब्रह्मज्ञान में स्थित हैं।

एक अन्य कथा के अनुसार, वे गर्भ में ही बारह वर्षों तक रहे और वहीं उन्होंने वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। जब बाहर आने को कहा गया तो उन्होंने माया के भय से मना कर दिया। अंततः भगवान श्रीकृष्ण के आश्वासन पर ही वे जन्म लेने को तैयार हुए।

जन्म लेते ही उन्होंने माता-पिता को प्रणाम किया और तुरंत वन की ओर प्रस्थान कर दिया। उनका वैराग्य इतना प्रबल था कि वे किसी बंधन में नहीं बँधे।

शुकदेव वही महान ऋषि हैं जिन्होंने राजा परीक्षित को सात दिनों में श्रीमद्भागवत का अमृतमय ज्ञान सुनाया। उनका जीवन पूर्ण विरक्ति, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत संगम है।

उनकी कथा हमें यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान वही है जो मनुष्य को संसार के बंधनों से मुक्त कर परमात्मा की ओर ले जाए।

🌼 जय श्री राधे 🌼

सोलह पौराणिक कथाएं〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ पिता के वीर्य और माता के गर्भ के बिना जन्मे पौराणिक पात्रों की〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️...
27/05/2026

सोलह पौराणिक कथाएं
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पिता के वीर्य और माता के गर्भ के बिना जन्मे पौराणिक पात्रों की
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हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि में कई ऐसे पात्रों का वर्णन है जिनका जन्म बिना माँ के गर्भ और पिता के वीर्य के हुआ था।

1👉 धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म कि कथा :
हस्तिनापुर नरेश शान्तनु और रानी सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। शान्तनु का स्वर्गवास चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बाल्यकाल में ही हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण भीष्म ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उन्हें राजगद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ ही काल में गन्धर्वों से युद्ध करते हुये चित्रांगद मारा गया। इस पर भीष्म ने उनके अनुज विचित्रवीर्य को राज्य सौंप दिया। अब भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उन्हीं दिनों काशीराज की तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का स्वयंवर होने वाला था।
उनके स्वयंवर में जाकर अकेले ही भीष्म ने वहाँ आये समस्त राजाओं को परास्त कर दिया और तीनों कन्याओं का हरण कर के हस्तिनापुर ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह अपना तन-मन राज शाल्व को अर्पित कर चुकी है। उसकी बात सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवा दिया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया।
राजा शाल्व ने अम्बा को ग्रहण नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर लौट कर आ गई और भीष्म से बोली, “हे आर्य! आप मुझे हर कर लाये हैं अतएव आप मुझसे विवाह करें।”किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अम्बा रुष्ट हो कर परशुराम के पास गई और उनसे अपनी व्यथा सुना कर सहायता माँगी। परशुराम ने अम्बा से कहा, “हे देवि! आप चिन्ता न करें, मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।”
परशुराम ने भीष्म को बुलावा भेजा किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। इस पर क्रोधित होकर परशुराम भीष्म के पास पहुँचे और दोनों वीरों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अभूतपूर्व योद्धा थे इसलिये हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। आखिर देवताओं ने हस्तक्षेप कर के इस युद्ध को बन्द करवा दिया। अम्बा निराश हो कर वन में तपस्या करने चली गई।विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग विलास में रत हो गये किन्तु दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, “पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।” माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, “माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।”यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। तब उन्हें अपने ज्येष्ठ पुत्र वेदव्यास का स्मरण किया।स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, “हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम नियोग विधि से उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।” वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, “माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वो मेरे सामने से निवस्त्र हॉकर गुजरें जिससे की उनको गर्भ धारण होगा।”सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका और फिर छोटी रानी छोटी रानी अम्बालिका गई पर अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, “माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा ”यह जानकार इससे माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, “माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।” इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।
समय आने पर अम्बिका के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ।

2. कौरवों के जन्म की कथा 👉
एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर आए। गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को वरदान मांगने को कहा। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलवान सौ पुत्र होने का वर मांगा।
समय पर गांधारी को गर्भ ठहरा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रहा। इससे गांधारी घबरा गई और उसने अपना गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के समान एक मांस पिण्ड निकला।महर्षि वेदव्यास ने अपनी योगदृष्टि से यह सब देख लिया और वे तुरंत गांधारी के पास आए। तब गांधारी ने उन्हें वह मांस पिण्ड दिखाया। महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा कि तुम जल्दी से सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का प्रबंध कर दो तथा इस मांस पिण्ड पर जल छिड़को।जल छिड़कने पर उस मांस पिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। व्यासजी ने कहा कि मांस पिण्डों के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद ही खोलना। इतना कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांस पिण्डों से पहले दुर्योधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई।

3. पांडवों के जन्म की कथा 👉
पांचो पांडवो का जन्म भी बिना पिता के वीर्य के हुआ था। एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों – कुन्ती तथा माद्री – के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया।
मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, “राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।”इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, “हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़” उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, “नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।” पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, “राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।”
ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, “हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?” कुन्ती बोली, “हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ।
आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।” इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी।
वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।
एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

4. कर्ण के जन्म की कथ👉
कर्ण का जन्म कुन्ती को मिले एक वरदान स्वरुप हुआ था। जब वह कुँआरी थी, तब एक बार दुर्वासा ऋषि उसके पिता के महल में पधारे। तब कुन्ती ने पूरे एक वर्ष तक ऋषि की बहुत अच्छे से सेवा की।
कुन्ती के सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होनें अपनी दिव्यदृष्टि से ये देख लिया कि पाण्डु से उसे सन्तान नहीं हो सकती और उसे ये वरदान दिया कि वह किसी भी देवता का स्मरण करके उनसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है। एक दिन उत्सुकतावश कुँआरेपन में ही कुन्ती ने सूर्य देव का ध्यान किया। इससे सूर्य देव प्रकट हुए और उसे एक पुत्र दिया जो तेज़ में सूर्य के ही समान था, और वह कवच और कुण्डल लेकर उत्पन्न हुआ था जो जन्म से ही उसके शरीर से चिपके हुए थे। चूंकि वह अभी भी अविवाहित थी इसलिये लोक-लाज के डर से उसने उस पुत्र को एक बक्से में रख कर गंगाजी में बहा दिया।

5. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुधन के जन्म की कथा👉
दशरथ अधेड़ उम्र तक पहुँच गये थे लेकिन उनका वंश सम्हालने के लिए उनका पुत्र रूपी कोई वंशज नहीं था। उन्होंने पुत्र कामना के लिए अश्वमेध यज्ञ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने का विचार किया। उनके एक मंत्री सुमन्त्र ने उन्हें सलाह दी कि वह यह यज्ञ अपने दामाद ऋष्यशृंग या साधारण की बोलचाल में शृंगि ऋषि से करवायें।
दशरथ के कुल गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ थे। उनके सारे धार्मिक अनुष्ठानों की अध्यक्षता करने का अधिकार केवल धर्म गुरु को ही था। अतः वशिष्ठ की आज्ञा लेकर दशरथ ने शृंगि ऋषि को यज्ञ की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया।शृंगि ऋषि ने दोनों यज्ञ भलि भांति पूर्ण करवाये तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के दौरान यज्ञ वेदि से एक आलौकिक यज्ञ पुरुष या प्रजापत्य पुरुष उत्पन्न हुआ तथा दशरथ को स्वर्णपात्र में नैवेद्य का प्रसाद प्रदान करके यह कहा कि अपनी पत्नियों को यह प्रसाद खिला कर वह पुत्र प्राप्ति कर सकते हैं। दशरथ इस बात से अति प्रसन्न हुये और उन्होंने अपनी पट्टरानी कौशल्या को उस प्रसाद का आधा भाग खिला दिया। बचे हुये भाग का आधा भाग (एक चौथाई) दशरथ ने अपनी दूसरी रानी सुमित्रा को दिया। उसके बचे हुये भाग का आधा हिस्सा (एक बटा आठवाँ) उन्होंने कैकेयी को दिया। कुछ सोचकर उन्होंने बचा हुआ आठवाँ भाग भी सुमित्रा को दे दिया। सुमित्रा ने पहला भाग भी यह जानकर नहीं खाया था कि जब तक राजा दशरथ कैकेयी को उसका हिस्सा नहीं दे देते तब तक वह अपना हिस्सा नहीं खायेगी।अब कैकेयी ने अपना हिस्सा पहले खा लिया और तत्पश्चात् सुमित्रा ने अपना हिस्सा खाया। इसी कारण राम (कौशल्या से), भरत (कैकेयी से) तथा लक्ष्मण व शत्रुघ्न (सुमित्रा से) का जन्म हुआ।

6. पवन पुत्र हनुमान के जन्म कि कथा👉
पुराणों की कथानुसार हनुमान की माता अंजना संतान सुख से वंचित थी। कई जतन करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस दुःख से पीड़ित अंजना मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा सरोवर के पूर्व में एक नरसिंहा आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहां जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करना पड़ेगा तब जाकर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी।
अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु का ही भक्षण किया तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से खुश होकर उसे वरदान दिया जिसके परिणामस्वरूप चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा को अंजना को पुत्र की प्राप्ति हुई। वायु के द्वारा उत्पन्न इस पुत्र को ऋषियों ने वायु पुत्र नाम दिया।

7. हनुमान पुत्र मकरध्वज के ज़न्म की कथा👉
हनुमान वैसे तो ब्रह्मचारी थे फिर भी वो एक पुत्र के पिता बने थे हालांकि यह पुत्र वीर्य कि जगाह पसीनें कि बूंद से हुआ था। कथा कुछ इस प्रकार है जब हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुंचे और मेघनाद द्वारा पकड़े जाने पर उन्हें रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी थी और हनुमान ने जलती हुई पूंछ से लंका जला दी।जलती हुई पूंछ की वजह से हनुमानजी को तीव्र वेदना हो रही थी जिसे शांत करने के लिए वे समुद्र के जल से अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने पहुंचे। उस समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी जिसे एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ।जिसका नाम पड़ा मकरध्वज। मकरध्वज भी हनुमानजी के समान ही महान पराक्रमी और तेजस्वी था उसे अहिरावण द्वारा पाताल लोक का द्वार पाल नियुक्त किया गया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई। तत्पश्चात मकरध्वज ने अपनी उत्पत्ति की कथा हनुमान को सुनाई। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त किया।

8. द्रोणाचार्य के जन्म की कथा👉
द्रोणाचार्य कौरव व पाण्डव राजकुमारों के गुरु थे। द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ इसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है- एक समय गंगा द्वार नामक स्थान पर महर्षि भरद्वाज रहा करते थे। वे बड़े व्रतशील व यशस्वी थे। एक दिन वे महर्षियों को साथ लेकर गंगा स्नान करने गए। वहां उन्होंने देखा कि घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही है। उसे देखकर उनके मन में काम वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। तब उन्होंने उस वीर्य को द्रोण नामक यज्ञ पात्र (यज्ञ के लिए उपयोग किया जाने वाला एक प्रकार का बर्तन) में रख दिया। उसी से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। द्रोण ने सारे वेदों का अध्ययन किया। महर्षि भरद्वाज ने पहले ही आग्नेयास्त्र की शिक्षा अग्निवेश्य को दे दी थी।
अपने गुरु भरद्वाज की आज्ञा से अग्निवेश्य ने द्रोणाचार्य को आग्नेयास्त्र की शिक्षा दी। द्रोणाचार्य का विवाह शरद्वान की पुत्री कृपी से हुआ था।

9. ऋषि ऋष्यश्रृंग के जन्म की कथा👉
ऋषि ऋष्यश्रृंग महात्मा काश्यप (विभाण्डक) के पुत्र थे। महात्मा काश्यप बहुत ही प्रतापी ऋषि थे। उनका वीर्य अमोघ था और तपस्या के कारण अन्त:करण शुद्ध हो गया था। एक बार वे सरोवर में पर स्नान करने गए।
वहां उर्वशी अप्सरा को देखकर जल में ही उनका वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य को जल के साथ एक हिरणी ने पी लिया, जिससे उसे गर्भ रह गया। वास्तव में वह हिरणी एक देवकन्या थी। किसी कारण से ब्रह्माजी उसे श्राप दिया था कि तू हिरण जाति में जन्म लेकर एक मुनि पुत्र को जन्म देगी, तब श्राप से मुक्त हो जाएगी।
इसी श्राप के कारण महामुनि ऋष्यश्रृंग उस मृगी के पुत्र हुए। वे बड़े तपोनिष्ठ थे। उनके सिर पर एक सींग था, इसीलिए उनका नाम ऋष्यश्रृंग प्रसिद्ध हुआ।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था।

10. कृपाचार्य व कृपी के जन्म की कथा👉
कृपाचार्य महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे। उनके जन्म के संबंध में पूरा वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। उसके अनुसार- महर्षि गौतम के पुत्र थे शरद्वान। वे बाणों के साथ ही पैदा हुए थे। उनका मन धनुर्वेद में जितना लगता था, उतना पढ़ाई में नहीं लगता था। उन्होंने तपस्या करके सारे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए।
शरद्वान की घोर तपस्या और धनुर्वेद में निपुणता देखकर देवराज इंद्र बहुत भयभीत हो गए। उन्होंने शरद्वान की तपस्या में विघ्न डालने के लिए जानपदी नाम की देवकन्या भेजी। वह शरद्वान के आश्रम में आकर उन्हें लुभाने लगी। उस सुंदरी को देखकर शरद्वान के हाथों से धनुष-बाण गिर गए। वे बड़े संयमी थे तो उन्होंने स्वयं को रोक लिया, लेकिन उनके मन में विकार आ गया था।
इसलिए अनजाने में ही उनका शुक्रपात हो गया।
उनका वीर्य सरकंडों पर गिरा था, इसलिए वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। उसी समय संयोग से राजा शांतनु वहां से गुजरे। उनकी नजर उस बालक व बालिका पर पड़ी।
शांतनु ने उन्हें उठा लिया और अपने साथ ले आए। बालक का नाम रखा कृप और बालिका नाम रखा कृपी। जब शरद्वान को यह बात मालूम हुई तो वे राजा शांतनु के पास आए और उन बच्चों के नाम, गोत्र आदि बतलाकर चारों प्रकार के धनुर्वेदों, विविध शास्त्रों और उनके रहस्यों की शिक्षा दी। थोड़े ही दिनों में कृप सभी विषयों में पारंगत हो गए। कृपाचार्य को कुरुवंश का कुलगुरु नियुक्त किया गया।

11. द्रौपदी व धृष्टद्युम्न के जन्म की कथा
द्रोणाचार्य और द्रुपद बचपन के मित्र थे। राजा बनने के बाद द्रुपद को अंहकार हो गया। जब द्रोणाचार्य राजा द्रुपद को अपना मित्र समझकर उनसे मिलने गए तो द्रुपद ने उनका बहुत अपमान किया। बाद में द्रोणाचार्य ने पाण्डवों के माध्यम से द्रुपद को पराजित कर अपने अपमान का बदला लिया। राजा द्रुपद अपनी पराजय का बदला लेना चाहते थे था इसलिए उन्होंने ऐसा यज्ञ करने का निर्णय लिया, जिसमें से द्रोणाचार्य का वध करने वाला वीर पुत्र उत्पन्न हो सके। राजा द्रुपद इस यज्ञ को करवाले के लिए कई विद्वान ऋषियों के पास गए, लेकिन किसी ने भी उनकी इच्छा पूरी नहीं की। अंत में महात्मा याज ने द्रुपद का यज्ञ करवा स्वीकार कर लिया। महात्मा याज ने जब राजा द्रुपद का यज्ञ करवाया तो यज्ञ के अग्निकुण्ड में से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। इसके बाद उस अग्निकुंड में से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई। वह अत्यंत ही सुंदर थी। ब्राह्मणों ने उन दोनों का नामकरण किया। वे बोले- यह कुमार बड़ा धृष्ट(ढीट) और असहिष्णु है। इसकी उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई है, इसलिए इसका धृष्टद्युम्न होगा। यह कुमारी कृष्ण वर्ण की है इसलिए इसका नाम कृष्णा होगा। द्रुपद की पुत्री होने के कारण कृष्णा ही द्रौपदी के नाम से विख्यात हुई।

12. राधा के जन्म की कथा👉
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार एक बार गोलोक में किसी बात पर राधा और श्रीदामा नामक गोप में विवाद हो गया। इस पर श्रीराधा ने उस गोप को असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब उस गोप ने भी श्रीराधा को यह श्राप दिया कि आपको भी मानव योनि में जन्म लेना पड़ेगा। वहां गोकुल में श्रीहरि के ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छाया रूप उनके साथ रहेगा। भूतल पर लोग आपको रायाण की पत्नी ही समझेंगे, श्रीहरि के साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा। जब भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का समय आया तो उन्होंने राधा से कहा कि तुम शीघ्र ही वृषभानु के घर जन्म लो। श्रीकृष्ण के कहने पर ही राधा व्रज में वृषभानु वैश्य की कन्या हुईं। राधा देवी अयोनिजा थीं, माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं हुई। उनकी माता ने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था। उन्होंने योगमाया की प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया परंतु वहां स्वेच्छा से श्रीराधा प्रकट हो गईं।

13. राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के जन्म की कथा👉
रामायण के अनुसार इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक प्रसिद्ध राजा हुए। उनकी दो रानियां थीं- केशिनी और सुमति। दीर्घकाल तक संतान जन्म न होने पर राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे। तब महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को साठ हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथा दूसरी से एक वंशधर पुत्र होगा।कालांतर में सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया। राजा उसे फेंक देना चाहते थे किंतु तभी आकाशवाणी हुई कि इस तूंबी में साठ हजार बीज हैं। घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। समय आने पर उन मटकों से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।
देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है। यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया। ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोली राजा सगर के 60 हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए।

14. जनक नंदिनी सीता के जन्म की कहानी👉
भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म भी माता के गर्भ से नहीं हुआ था। रामायण के अनुसार उनका जन्म भूमि से हुआ था। वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में राजा जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते हैं कि-

अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा।

अर्थात्- एक दिन मैं यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्र भाग से जोती गई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल द्वारा खींची गई रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमश: बढ़कर सयानी हुई।

15. मनु व शतरूपा के जन्म की कहानी👉
धर्म ग्रंथों के अनुसार मनु व शतरूपा सृष्टि के प्रथम मानव माने जाते हैं। इन्हीं से मानव जाति का आरंभ हुआ। मनु का जन्म भगवान ब्रह्मा के मन से हुआ माना जाता है। मनु का उल्लेख ऋग्वेद काल से ही मानव सृष्टि के आदि प्रवर्तक और समस्त मानव जाति के आदि पिता के रूप में किया जाता रहा है। इन्हें ‘आदि पुरूष’ भी कहा गया है। वैदिक संहिताओं में भी मनु को ऐतिहासिक व्यक्ति माना गया है। ये सर्वप्रथम मानव थे जो मानव जाति के पिता तथा सभी क्षेत्रों में मानव जाति के पथ प्रदर्शक स्वीकृत हैं। मनु का विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न शतरूपा से हुआ था।धर्मग्रंथों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है। उत्तानपाद जिसके घर में ध्रुव पैदा हुआ था, इन्हीं का पुत्र था। मनु स्वायंभुव का ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत पृथ्वी का प्रथम क्षत्रिय माना जाता है।
इनके द्वारा प्रणीत ‘स्वायंभुव शास्त्र’ के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्र और पुत्री का समान अधिकार है। इनको धर्मशास्त्र का और प्राचेतस मनु अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

16. राजा पृथु के जन्म की कथा👉

पृथु एक सूर्यवंशी राजा थे, जो वेन के पुत्र थे। वाल्मीकि रामायण में इन्हें अनरण्य का पुत्र तथा त्रिशंकु का पिता कहा गया है। ये भगवान विष्णु के अंशावतार थे। स्वयंभुव मनु के वंशज अंग नामक प्रजापति का विवाह मृत्यु की मानसी पुत्री सुनीथा से हुआ था। वेन उनका पुत्र हुआ। सिंहासन पर बैठते ही उसने यज्ञ-कर्मादि बंद कर दिये। त्र+षियों ने मंत्रपूत कुशों से उसे मार डाला। सुनिथा ने पुत्र का शव सुरक्षित रखा, जिसकी दाहिनी जंघा का मंथन करके त्र+षियों ने एक नाटा और छोटा मुखवाला पुरुष उत्पन्न किया। उसने ब्राह्मणों से पूछा, कि ``मैं क्या करूं?'' ब्राह्मणों ने ``निषीद'' (बैठ) कहा। इसलिए उसका नाम निषाद पड़ा। उस निषाद द्वारा वेन के सारे पाप कट गये। बाद में ब्राह्मणों ने वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम पृथु तथा स्त्री का नाम अर्चि हुआ। अर्चि पृथु की पत्नी हुई। यह लक्ष्मी का अवतार थी। पृथु का राज्याभिषेक हुआ।

वेन के पापाचरणों से पृथ्वी धन-धान्यहीन हो गई थी। प्रजा का क्लेश मिटाने के लिए पृथु अपना अजगर लेकर पृथ्वी के पीछे पड़े तो वह कांप उठी और गौ-रूप धारण कर शरण के लिए भागी, पर कहीं भी उसे रक्षा नहीं मिली। उसने राजा से प्रार्थना की कि वह अपने उदर में पचे धन-धान्य को दूध के रूप में दे देगी, बशर्ते कि एक बछड़ा दें। स्वायंभुव मनु को बछड़ा बनाकर पृथ्वी दुही गयी। अंत में राजा ने पृथ्वी को कन्या-रूप में ग्रहण किया। पृथु बड़े धर्मात्मा एवं भगवद्भक्त थे। इन्होंने ब्रह्मावर्त प्रदेश में पुण्यतोया सरस्वती के तट पर सौ यज्ञ किये। सौवां यज्ञ चलते समय ईर्ष्यालु इंद्र ने इनका अश्व चुरा लिया तो ये कुपित हों गये और धनुष पर अपना बाण चढ़ा लिया। ऋषियों के मना करने पर भी वे इंद्र को होम करने लगे तो ब्रह्मा ने उन्हें रोका। इस पर धर्मात्मा पृथु ने अपना यज्ञ ही रोक लिया। पृथु ने प्रयाग को निवासभूमि बना लिया। स्वयं सनकादि इनके यहां उपस्थित हुए।

अंतिम दिनों में पृथु अर्चि सहित तपस्या के लिए वन में चले गये। वहां योग-ध्यान में शरीर-त्याग किया। पृथु तथा अर्चि के पांच पुत्र हुए थे - विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक। अर्चि पति की चिता पर चढ़कर सती हुई थी।

एक पृथु था वृष्णिवंश के चित्ररथ का पुत्र, जो विदूर का भाई था। कृष्ण ने इसे मथुरापुरी के उत्तरी द्वार की रक्षा पर नियुक्त किया था। प्रभास तीर्थ में यादव-वंश के अंत के समय यह भी परस्पर कलह में मारा गया।
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