Shree Harihar Kailas Gyanpeeth Nayas Rishikesh

Shree Harihar Kailas Gyanpeeth Nayas  Rishikesh हर हर महादेव

साल में केवल एक दिन खुलने वाला मन्दिर 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️उत्तराखंड राज्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खूबसूरती के लिए ...
28/08/2026

साल में केवल एक दिन खुलने वाला मन्दिर
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उत्तराखंड राज्य अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खूबसूरती के लिए दुनिया में मशहूर है इस राज्य को देवभूमि भी कहा जाता है क्योंकि यहां पहाड़ों में साक्षात भगवान के दर्शन होना आम बात है क्योंकि यहां हर पहाड़ पर कोई ना कोई मंदिर आपको जरूर मिल जाएगा और खास बात यह है की हर एक मंदिर की अपनी एक सुंदर ही गाथा होगी जिसे सुनकर या देखकर आपको इस बात का अंदाजा जरूर हो जाएगा की यहां के लोगों की आस्था अपने देवी देवताओं के लिए प्रसिद्ध क्यों है?

उत्तराखंड के पहाड़ों में बसा हर एक मंदिर अपने आप में एक रहस्य को समेटे हुए हैं यूं तो रोज ही हम अपने घरों में और मंदिरों में भगवान की पूजा पाठ करते हैं. मगर क्या आप जानते हैं कि उत्तराखंड राज्य में एक ऐसा मंदिर भी है जहां साल में सिर्फ एक बार पूजा होती है जहां बसे भगवान की पूजा 364 दिन नहीं बल्कि सिर्फ एक दिन की जाती है।

उत्तराखंड के चमोली जिले के उर्गम घाटी से लगभग 12 किलोमीटर की यात्रा तय करके आप पहुंचेंगे एक ऐसे रहस्यमय मंदिर के पास जो साल में सिर्फ एक बार ही खुलता है। मंदिर का नाम है वंसीनारायण मंदिर नाम सुनकर आपको यह प्रतीत हो सकता है कि यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित होगा मगर ऐसा नहीं है बल्कि यहां चतुर्भुज के रूप में विराजमान है भगवान विष्णु और उनके साथ भगवान शिव के लाल गणेश की सुंदर प्रतिमा तथा वन की रक्षा करने वाले वन देवियों की मूर्ति इस मंदिर में स्थापित है।

कैसे पड़ा वंसीनारायण नाम
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पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि वन देवियों शिव व विष्णु की संयुक्त रूप से मूर्तियां स्थापित होने के कारण इस मंदिर का नाम वंसीनारायण पड़ा है। लोक कथाओं के अनुसार यह भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडव पश्चाताप कर रहे थे तो उस दौरान वह इस मंदिर को इतना बड़ा बनना चाहते थे कि जहां से बद्री और केदार की एक साथ पूजा की जा सके मगर किसी कारण इस मंदिर का निर्माण सिर्फ रात को ही संपन्न हो सकता था लेकिन यह पूरा नहीं हो पाया आप जब मंदिर के पास जाएंगे तो वहां पर आज भी उस युग में भीम द्वारा लाए गए विशाल शिला खंड यहां देखने को मिलेंगे जो अपने आप में इस बात को बयां करते हैं कि इस मंदिर की आस्था पौराणिक काल से है।

साल में किस दिन खुलता है मंदिर?
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भाई बहन के पावन त्यौहार रक्षाबंधन के दिन इस मंदिर के कपाट साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं, इस दिन महिलाओं और कुंवारी लड़कियों का हुजूम वंसीनारायण भगवान के दर्शन के लिए उमड़ पड़ता है हालांकि भगवान की पूजा के लिए कोई लिंग भेद तो नहीं लेकिन ऐसा कहा जाता है की मंदिर के कपाट खुलते ही बड़ी मात्रा में महिलाएं भगवान बंसी नारायण के दर्शन के लिए पहुंचती है और राखी बांधकर उनसे अपने परिवार और अपने घर की सुख शांति की मनोकामना करती है।

रक्षाबंधनके दिन मंदिर खुलने की क्या है वजह?
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लोक कथाओं के अनुसार ऐसी मान्यता है कि राजा बलि का अहंकार चूर करने के लिए भगवान विष्णु ने जब वामन अवतार लिया कब तीन पग की जमीन मांग कर भगवान विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक भेज दिया लेकिन इसके बदले राजा बलि ने उन्हें अपने साथ वचन में बांध लिया और दिन-रात अपने साथ रहने का वचन भगवान विष्णु के वामन अवतार से लिया।

भगवान विष्णु ने राजा बलि को वचन दिया और पाताल लोक में जाकर उनके द्वारपाल बन गए. इधर अपने पति से दूर होने की वजह से माता लक्ष्मी परेशान हो गई इस समस्या का हल निकालने के लिए उन्होंने नारद मुनि की सहायता ली जिस पर नारद मुनि ने मां लक्ष्मी को बताया कि अगर आप पाताल लोक जाकर राजा बलि को रक्षा सूत्र बांध दें तो भगवान विष्णु वापस आ जाएंगे।

दूसरी और माँ लक्ष्मी को पाताल लोक का रास्ता मालूम नहीं था इसलिए उन्होंने नारद मुनि को साथ चलने के लिए कहा इसके बाद पाताल लोग पहुंच कर मां लक्ष्मी ने राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा। रक्षा सूत्र बांधने के बाद जब राजा बलि ने माँ लक्ष्मी से वचन मांगने को कहा तो उन्होंने वचन के बदले अपने पति की स्वतंत्रता मांगी इसके बाद राजा बलि ने देवी लक्ष्मी के पति को मुक्त कर दिया और इसी दिन वंसीनारायण की पूजा अर्चना मनुष्य द्वारा की गई यही वजह है कि सिर्फ 365 दिनों में से एक दिन रक्षाबंधन वाले दिन ही बंसी नारायण मंदिर के कपाट खुलते हैं।

एक मान्यता यह भी है कि इस मंदिर की पूजा 364 दिन स्वयं नारद मुनि करते हैं उनकी अनुपस्थिति में कलगोठ गांव के पुजारी ने एक दिन भगवान विष्णु की पूजा कर ली इसके बाद ऐसा कहा जाता है कि इसलिए वंशी नारायण मंदिर में हमेशा कलगोठ गांव के जाख ही देवता के पुजारी होते हैं।

कैसे पहुंचे इस अद्भुत मंदिर तक?
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वंसीनारायण मंदिर पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश से की जोशीमठ की करीब 255 किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी, जोशीमठ से 10 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद हेलंग घाटी से उर्गम घाटी तक के लिए जीप मिलती है और उर्गम घाटी पहुंचकर आप पैदल ट्रैकिंग करके बंसी नारायण मंदिर पहुंच सकते हैं।
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(((( कंजूस सेठ की पूर्ण निष्ठा ))))〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️एक कंजूस सेठ था। वह अपना जीवन बहुत ही कंजुसी से जिया करता था। जितन...
28/08/2026

(((( कंजूस सेठ की पूर्ण निष्ठा ))))
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एक कंजूस सेठ था। वह अपना जीवन बहुत ही कंजुसी से जिया करता था।
जितनी आवश्यकता होती है उससे भी कम वो खर्चा किया करता था।
एक दिन उसके मन में आया कि पूजा पाठ करना चाहिए। पर उसको फिर विचार आया कि यदि वो पूजा पाठ करेगा तो उसके लिए भी खर्चा करना होगा।
फिर उसने सोचा क्यों न पूजा पाठ मानसिक रूप से कर लिया जाय जिसमें कोई खर्चा नही आएगा।
उसने नित्य सुबह बाल कृष्ण को मानसिक रूप से स्नान करवाता उनको आसान पर विराजमान करता।
उनकी आरती उतारता और उनके लिए दूध गर्म करता और उसमें शक्कर मिला कर उनको भोग लगाता।
उसका ये नित्य का नियम था, इसमें वो किसी प्रकार की लापरवाही नही करता था।
वो सुबह उठ जाता और ये नित्य बाल कृष्णजी की मानसिक रूप से पूजा करता।
उसको बहुत ही बढ़िया लग रहा था क्योंकि उसको किसी भी प्रकार का कोई खर्चा नही लग रहा था और पूजा भी हो रही थी।
इस प्रकार उसको पूजा करते हुए काफी वर्ष बीत गए। कोई भी अपना दृढ़तापूर्वक अपने नियम का पालन करते है तो वो नियम सिद्ध हो जाता हैं।
एक दिन सेठजी को सुबह उठने में देरी हो गयी, अब वो जल्दबाजी में उठा और वो चिंतित हो उठा कि अभी तक भगवान को भोग नही लगाया।
उसने जल्दी से स्नान आदि से निवर्त हुआ और बालकृष्ण जी को मानसिक रूप से स्नान करवाया।
फिर उनको आसान दिया और मन ही मन उनको धूपबत्ती दिया आदि किया।
फिर मन ही मन रसोई में गया और दूध गर्म किया जल्दी से गिलास में रखा और उसमें शक्कर डाला।
वो सेठ जी रोज एक चम्मच शक्कर डालते थे लेकिन उस दिन जल्दबाजी के कारण 1 चम्मच की जगह 2 चम्मच शकर डाल दी।
अब सेठजी चिंतित होने लगे कि एक चम्मच की जगह दो चम्मच डाल दी, एक चम्मच का नुकसान हो गया, जबकि ये सब वो मन ही मन कर रहा था।
मानसिक पूजा में भी उसको एक चम्मच ज्यादा लग रहा था। अब वो मन ही मन उस एक चम्मच शकर को दूध से निकाल रहा था, और बालकृष्ण जी ये सब देख रहे थे थे।
अब बालकृष्ण जी से रहा नही गया और वो प्रकट हो गए, और उन्होंने सेठजी का हाथ पकड़ लिया और कहा..
"अरे भई तेरा जैसे भक्त मैने देखा नही जो मन ही मन भोग लगा रहा हैं और उसमें भी इतनी कंजुसी कर रहा है।
डाल दे 2 चम्मच शकर इसमें तेरा क्या जाता हैं" लेकिन मै तेरी भक्ति और पूर्ण विश्वास के कारण तुझ से प्रसन्न हूँ, तुझे अपनी पूर्णा भक्ति देता हूँ।
इस प्रकार उस सेठजी का जीवन धन्य हो गया और सेठ जी को भगवान की प्राप्ति हो गयी। क्योंकि सेठ जी को पूर्ण निष्ठा थी की भगवान ये दूध पीते हैं।
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मिट्टी के बर्तनों का उपयोग कर भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनाएं।〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️मिट्टी के अंदर मौजूद १८ प...
28/08/2026

मिट्टी के बर्तनों का उपयोग कर भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनाएं।
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मिट्टी के अंदर मौजूद १८ प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व भोजन को स्वादिष्ट एवं पौष्टिक बनती है।

हजारों वर्षों से हमारे यहाँ मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता आया है अभी कुछ वर्षों पूर्व तक गाँवों में वैवाहिक कार्यक्रमों में तो मिट्टी के बर्तन ही उपयोग में आते थे। घरों में दाल पकाने, दूध गर्म करने, दही जमाने, चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता रहा है। मिट्टी के बर्तन में जो भोजन पकता है उसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी नहीं होती जबकि प्रेशर कुकर व अन्य बर्तनों में भोजन पकाने से सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो जाते हैं जिससे हमारे भोजन की पौष्टिकता कम हो जाती है। भोजन को धीरे-धीरे ही पकना चाहिये तभी वह पौष्टिक और स्वादिष्ट पकेगा और उसके सभी सूक्ष्म पोषक तत्व सुरक्षित रहेंगे ।

महर्षि वागभट्ट जी के अनुसार भोजन को पकाते समय उसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलना आवश्यक है जबकि प्रेशर कुकर में पकाते समय भोजन को ना तो सूर्य का प्रकाश और ना ही पवन का स्पर्श मिल पाता, जिससे उसके सारे पोषक तत्व क्षींण हो जाते हैं । और प्रेशर कुकर एल्यूमीनियम का बना होता है जो कि भोजन पकाने के लिये सबसे घटिया धातु है क्योंकि एल्यूमीनियम भारी धातु होती है और यह हमारे शरीर से अपशिष्ट पदार्थ के रूप में बाहर नहीं निकल पाती है । इसी कारण एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग करने से कर्इ प्रकार के गंभीर रोग होते हैं जैसे अस्थमा, वात रोग, टी.बी. मधुमेह (डायबिटीज), पक्षाघात (पेरेलिसिस), स्मरण शक्ति का कम होना आदि! वैसे भी भाप के दबाव से भोजन उबल जाता है पकता नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार जो भोजन धीरे-धीरे पकता है वह भोजन सबसे अधिक पौष्टिक होता है । भोजन को शीघ्र पकाने के लिये अधिक तापमान का उपयोग करना सबसे हानिकारक है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 18 प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व चाहिए जो मिट्टी से ही आते है। जैसे- Calcium, Magnesium, Sulphur, Iron, Silicon, Cobalt, Gypsum आदि। मिट्टी के इन्ही गुणों और पवित्रता के कारण हमारे यहाँ पुरी के मंदिरों (उड़ीसा) के अलावा के मंदिरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों में प्रसाद बनता है। अधिक जानकारी के लिए पुरी के मंदिर की रसोई देखें।

एक बार आप भी अपने घर में मिट्टी की हांड़ी में सब्ज़ी पका कर देखिये आप खुद फर्क महसूस करेंगे।
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महाभारत में विदुर की सम्पूर्ण कथा  〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️धर्मराज का मानव रूपमहाभारत में अनेक महान योद्धा और राजा हुए, लेकिन...
28/08/2026

महाभारत में विदुर की सम्पूर्ण कथा
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धर्मराज का मानव रूप

महाभारत में अनेक महान योद्धा और राजा हुए, लेकिन विदुर ऐसे पात्र थे जिनकी शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि ज्ञान, नीति और धर्म में थी।

वे हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री थे, धृतराष्ट्र और पांडु के भाई थे तथा कौरव-पांडवों के चाचा थे। वे जानते थे कि आने वाले समय में हस्तिनापुर पर कितना बड़ा संकट आने वाला है, लेकिन दुर्भाग्य से उनकी धर्मपूर्ण सलाह को बार-बार अनसुना किया गया।

🌿 विदुर का दिव्य जन्म

बहुत समय पहले हस्तिनापुर के राजा शांतनु के वंश में विचित्रवीर्य नाम के राजा हुए। उनका विवाह अंबिका और अंबालिका से हुआ था। लेकिन विचित्रवीर्य की अकाल मृत्यु के बाद दोनों रानियाँ संतानहीन रह गईं।

वंश को आगे बढ़ाने के लिए सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास से नियोग द्वारा संतान उत्पन्न करने का अनुरोध किया।

सबसे पहले व्यास अंबिका के पास गए। व्यास का तेजस्वी और तपस्वी रूप देखकर अंबिका ने भय से अपनी आँखें बंद कर लीं। उनसे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ, जो जन्म से ही नेत्रहीन थे।

इसके बाद व्यास अंबालिका के पास गए। उन्हें देखकर अंबालिका का चेहरा भय के कारण पीला पड़ गया। उनसे पांडु का जन्म हुआ।

फिर जब तीसरी बार व्यास को बुलाया गया, तो अंबिका ने स्वयं जाने के बजाय अपनी एक दासी को उनके पास भेज दिया।

वह दासी भयभीत नहीं हुई। उसने अत्यंत सम्मान और शांत मन से महर्षि व्यास की सेवा की।

उसके गर्भ से एक अत्यंत बुद्धिमान बालक का जन्म हुआ—विदुर।

⚖️ विदुर कौन थे?

महाभारत की परंपरा के अनुसार विदुर वास्तव में धर्मराज अर्थात यमराज के अंशावतार माने जाते हैं।

कथा के अनुसार मांडव्य ऋषि को एक अन्यायपूर्ण दंड दिया गया था। उन्होंने धर्मराज से पूछा कि उन्हें यह दंड किस कर्म के कारण मिला। धर्मराज ने उनके बाल्यकाल के एक कर्म का उल्लेख किया।

मांडव्य ऋषि ने कहा कि इतने छोटे बालक के कर्म के लिए इतना कठोर दंड उचित नहीं था और उन्होंने धर्मराज को शाप दिया कि उन्हें मनुष्य योनि में जन्म लेना पड़ेगा।

इसी कारण धर्मराज ने विदुर के रूप में जन्म लिया—ऐसी महाभारत-परंपरा में कथा मिलती है।

👑 तीन भाई—धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर

इस प्रकार हस्तिनापुर को तीन अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्तित्व मिले—

धृतराष्ट्र — ज्येष्ठ, लेकिन जन्म से नेत्रहीन।

पांडु — योग्य और पराक्रमी राजा।

विदुर — अत्यंत बुद्धिमान, धर्मज्ञ और नीतिवान।

विदुर दासी के पुत्र होने के कारण स्वयं राजा नहीं बन सके, लेकिन उनकी बुद्धि और नीति के कारण वे हस्तिनापुर के सबसे महत्वपूर्ण सलाहकारों में से एक बन गए।

वे जानते थे कि केवल राजवंश में जन्म लेना महानता नहीं देता। मनुष्य को महान उसके कर्म और चरित्र बनाते हैं।

🏛️ विदुर बने हस्तिनापुर के महामंत्री

समय बीतता गया और विदुर अपनी बुद्धिमत्ता के कारण हस्तिनापुर के प्रमुख सलाहकार बन गए।

धृतराष्ट्र जब राजा बने, तब विदुर ने उन्हें हमेशा धर्म और न्याय का मार्ग दिखाने का प्रयास किया।

विदुर जानते थे कि राजा का सबसे बड़ा कर्तव्य अपने परिवार से अधिक प्रजा और न्याय के प्रति होता है।

लेकिन धृतराष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी उनका पुत्र-मोह था।

वे दुर्योधन के गलत कार्यों को जानते हुए भी उसके विरुद्ध कठोर निर्णय लेने में असमर्थ रहते थे।

विदुर बार-बार उन्हें समझाते—

यदि राजा अपने प्रिय व्यक्ति के अपराध को केवल इसलिए क्षमा करता रहे क्योंकि वह उसका अपना है, तो धीरे-धीरे पूरा राज्य अन्याय का शिकार हो जाता है।

👶 दुर्योधन के जन्म पर विदुर की चेतावनी

जब दुर्योधन का जन्म हुआ, तब अनेक अशुभ संकेत दिखाई देने की कथा महाभारत में मिलती है।

विदुर ने परिस्थितियों को देखकर धृतराष्ट्र को चेतावनी दी कि यदि एक पुत्र के कारण पूरे कुल पर संकट आने वाला हो, तो राजा को कठिन निर्णय लेने में भी पीछे नहीं हटना चाहिए।

लेकिन पुत्र-मोह में डूबे धृतराष्ट्र ने विदुर की बात नहीं मानी।

यही निर्णय आगे चलकर हस्तिनापुर के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ।

🔥 लाक्षागृह में पांडवों की रक्षा

दुर्योधन और उसके साथियों ने पांडवों को समाप्त करने के लिए लाक्षागृह की योजना बनाई।

वारणावत में पांडवों के रहने के लिए ऐसा भवन बनवाया गया था जिसमें ज्वलनशील पदार्थों का उपयोग किया गया था।

विदुर को इस षड्यंत्र की जानकारी हो गई।

वे सीधे सब कुछ कहकर पांडवों को सावधान नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने संकेतों में युधिष्ठिर को खतरे की सूचना दी।

विदुर की योजना से एक गुप्त सुरंग तैयार कराई गई, जिसके रास्ते पांडव उस भयंकर षड्यंत्र से बच निकलने में सफल हुए।

इस प्रकार विदुर ने बिना किसी युद्ध के पांडवों के जीवन की रक्षा की।

🦚 दुर्योधन के सामने विदुर की निर्भीकता

विदुर दुर्योधन से कभी भयभीत नहीं हुए।

जब दुर्योधन अन्यायपूर्ण योजनाएँ बनाता, विदुर खुलकर उसका विरोध करते।

वे जानते थे कि दुर्योधन का अहंकार धीरे-धीरे पूरे कुरुवंश को विनाश की ओर ले जा रहा है।

धृतराष्ट्र को वे बार-बार समझाते रहे कि—

अधर्म से प्राप्त विजय वास्तव में विजय नहीं होती।

लेकिन धृतराष्ट्र का पुत्र-मोह और दुर्योधन का अहंकार इतना बढ़ चुका था कि विदुर की नीतिपूर्ण बातें उनके कानों तक पहुँचती तो थीं, पर हृदय तक नहीं पहुँचती थीं।

🎲 द्यूत क्रीड़ा और द्रौपदी का अपमान

जब शकुनि की सहायता से पांडवों को जुए के खेल में बुलाया गया, तब विदुर ने इस योजना का विरोध किया।

उन्हें पता था कि यह खेल विनाश का कारण बनेगा।

द्यूत क्रीड़ा में पांडव अपना राज्य और सब कुछ हार गए। इसके बाद सभा में द्रौपदी का अपमान करने का प्रयास हुआ।

विदुर ने सभा में धर्म और न्याय की बात कही।

उन्होंने स्पष्ट किया कि अन्यायपूर्ण तरीके से किसी स्त्री को अपमानित करना पूरे कुरुवंश के लिए विनाश का कारण बन सकता है।

लेकिन उस सभा में उनकी धर्मपूर्ण आवाज दब गई।

🕊️ श्रीकृष्ण और विदुर

महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण स्वयं हस्तिनापुर गए।

उनका उद्देश्य था—कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध को रोकना और शांति स्थापित करना।

दुर्योधन चाहता था कि श्रीकृष्ण उसके महल में भोजन करें।

लेकिन श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का आतिथ्य स्वीकार नहीं किया।

वे अपने प्रिय भक्त विदुर के घर गए।

विदुर के घर में राजसी वैभव नहीं था, लेकिन वहाँ सच्चा प्रेम और भक्ति थी।

श्रीकृष्ण ने विदुर के प्रेम को स्वीकार किया।

यह प्रसंग बताता है कि भगवान के लिए बाहरी वैभव से अधिक महत्वपूर्ण भक्त का प्रेम और भाव होता है।

⚔️ विदुर ने युद्ध से स्वयं को अलग कर लिया

जब यह स्पष्ट हो गया कि दुर्योधन शांति के लिए तैयार नहीं है और युद्ध टलना कठिन है, तब विदुर ने हस्तिनापुर की राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया।

वे जानते थे कि जिस युद्ध को धर्म और विवेक से रोका जा सकता था, उसे अहंकार ने अनिवार्य बना दिया है।

उन्होंने तीर्थयात्रा का मार्ग अपनाया और सांसारिक राजनीति से दूरी बना ली।

📖 विदुर नीति

विदुर के ज्ञान का सबसे प्रसिद्ध भाग विदुर नीति है।

यह धृतराष्ट्र और विदुर के संवाद के रूप में सामने आती है।

इसमें विदुर ने राजा को बताया कि—

- सच्चा मित्र कौन होता है।
- बुद्धिमान और मूर्ख में क्या अंतर है।
- क्रोध मनुष्य का कैसे विनाश करता है।
- लोभ से व्यक्ति का विवेक कैसे नष्ट होता है।
- राजा को प्रजा के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए।
- कठिन परिस्थितियों में धर्म का पालन कैसे किया जाए।
- किन गुणों से मनुष्य सम्मान प्राप्त करता है।

विदुर नीति आज भी नीति, नेतृत्व और जीवन-मूल्यों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जाती है।

🌳 युद्ध के बाद विदुर का जीवन

महाभारत का भयंकर युद्ध समाप्त हुआ।

कौरवों का लगभग पूरा वंश नष्ट हो गया।

युधिष्ठिर हस्तिनापुर के राजा बने।

समय बीतने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने राजमहल छोड़कर वन का मार्ग अपनाया। विदुर भी उनके साथ वन में रहने लगे।

वहाँ उन्होंने सांसारिक जीवन से पूरी तरह विरक्त होकर तप और ध्यान में अपना समय बिताया।

🕉️ विदुर का देह त्याग

एक दिन युधिष्ठिर विदुर को देखने वन में पहुँचे।

उन्होंने देखा कि विदुर अत्यंत तपस्वी अवस्था में थे और संसार से लगभग पूरी तरह विरक्त हो चुके थे।

महाभारत की परंपरा में वर्णित है कि विदुर ने ध्यान की अवस्था में अपना शरीर त्याग दिया और उनकी दिव्य सत्ता युधिष्ठिर में समाहित हो गई।

यह उनके जीवन की अंतिम और रहस्यमय घटना मानी जाती है।

🌺 विदुर के जीवन की सबसे बड़ी सीख

विदुर के पास राजसिंहासन नहीं था, लेकिन उनके पास वह चीज थी जो बड़े-बड़े राजाओं के पास नहीं थी—धर्म का ज्ञान।

उन्होंने सत्ता से अधिक सत्य को महत्व दिया।

उन्होंने रिश्तों से अधिक न्याय को महत्व दिया।

उन्होंने भय से अधिक धर्म को महत्व दिया।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—

उन्होंने सही बात कहने से कभी समझौता नहीं किया, चाहे सामने राजा हो या राजकुमार।

इसी कारण महाभारत के असंख्य पात्रों के बीच विदुर आज भी बुद्धि, नीति, सत्य और धर्म के प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

#कृष्णा
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यशोदा की ममताकान्हा की ममता में इतनी मग्न हुईं कि छठ पूजने की परंपरा भूल गईं। भला हो सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली की, जिस...
28/08/2026

यशोदा की ममता

कान्हा की ममता में इतनी मग्न हुईं कि छठ पूजने की परंपरा भूल गईं। भला हो सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली की, जिसके ध्यान दिलाने पर लाला का छठ पूजन उनके जन्म लेने के 364वें दिन मां यशोदा ने किया।
घरों में शिशु के जन्म लेने के छठवें दिन छठ पूजने की परंपरा है। छठ पूजन के पश्चात संबंधित घर से सोबर समाप्त हो जाती है और इसके बाद जच्चा दैनिक कामकाज में जुट जाती है, लेकिन जगतपालक होने के बाद भी कन्हैया का छठ पूजन उनके पहले बर्थडे के एक दिन पहले यानि जन्म लेने के 364वें दिन हुआ था।
प्राचीन नंद किला मंदिर गोकुल के पुजारी नटवर जय भगवान बताते हैं, कान्हा के जन्म दिन के बाद यशोदा जी छठ पूजन की तैयारी में जुटी थीं कि इसी बीच राक्षसी पूतना गोकुल में कान्हा को मारने के उद्देश्य से आ धमकी। पूतना पूरे गोकुल में छह दिन के जितने भी शिशु मिले सबको मारने लगी। यह खबर मिलने के बाद मां यशोदा लाला को इस तरह दुबकाये-दुबकाये रहने लगीं कि लाला की भनक उनकी सखी-सहेलियों को भी नहीं लग पायी। वक्त गुजरने के साथ ही यशोदा जी छठ पूजन की बात भी भूल गयीं। कान्हा के जन्म दिन के एक साल पूर्ण होने के दो दिन पहले यशोदा जी ने गोकुल की सबसे बुजुर्ग गोपी चंद्रावली को बुलाया और लाला के जन्म दिन पर भोज का निमंत्रण सभी विप्रों को देने के लिये कहा। चालाक चंद्रावली ने कहा, यशोदा मैया लाला का छठ पूजन न होने की वजह से अभी तुम्हारे घर से सोबर नहीं निकली है। लिहाजा, विप्र कान्हा के जन्म दिन की खुशी में भोजन करने नहीं आएंगे। इस बुजुर्ग गोपी ने ही यशोदा जी को लाला के जन्म दिन के एक दिन पहले छठ पूजन करने का उपाय बताया। छठ पूजन के बाद कान्हा का पहला जन्म दिन मां यशोदा और नंद बाबा ने मनाया था।
प्रभु भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम मथुरा में तो नंदोत्सव की जबर्दस्त धूम इसके एक दिन बाद गोकुल में मचती है। गोकुल जैसी नंदोत्सव की धूम शायद ही पूरी दुनिया में कहीं मचती हो। जन्माष्टमी की मध्य रात्रि मथुरा में कान्हा के जन्म की खबर दूसरे दिन सुबह पाकर गोकुल के नर-नारी और बच्चे फूले नहीं समाते। प्रात: से ही गोकुल नगर के हर घर को बंदनवार और तोरणद्वारों से सजाया जाता है। नर हो या नारी या फिर बच्चे, खुशी से पागल हो, सब झूमते हैं। सबके मुख से '.यशोदा जायो लल्ला' और 'हाथी-घोड़ा, पालकी, जय कन्हैया लाल की' की गूंज निकलती है। नंद के आनंद भये जय कन्हैया लाल का गायन करते हैं। नंद किला मंदिर गोकुल के पुजारी छगन लाल बताते हैं, नंदोत्सव के मौके पर नंदबाबा माखन-मिश्री, लड्डू, पेड़ा, मेवा, चांदी आदि के सिक्के आदि का खजाना लुटाते हैं। वैसे तो नंदोत्सव गोकुल के सभी मंदिरों में मनता है लेकिन नंद भवन, गोकुल नाथ मंदिर, राजा ठाकुर मंदिर, यशोदा भवन और दाऊ जी मंदिर में इस अवसर पर छटा देखते ही बनती है।
पुजारी छगन लाल बताते हैं, नंदोत्सव के दिन पूर्वान्ह 11 से दो बजे तक गोकुल और आसपास के गांवों के लोग नंद चौक में एकत्रित होते हैं, यहां खजाना लुटाया जाता है। खजाना लूटने के लिये विदेशी श्रद्धालु भी आते हैं। और उनमें खजाना लूटने की होड़ मची रहती है। उनके हाथ में जो भी आता है वह उसे कान्हा का आशीर्वाद मानते है ॥

रक्षा बन्धन की पौराणिक कथाएं〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️हम उनसे लड़ लें, चाहे कितना ही झगड़ लें, लेकिन अंत में जितना प्यार हम उनसे ...
28/08/2026

रक्षा बन्धन की पौराणिक कथाएं
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हम उनसे लड़ लें, चाहे कितना ही झगड़ लें, लेकिन अंत में जितना प्यार हम उनसे करते हैं उसके सामने दुनिया की कोई भी मूल्यवान वस्तु बेकार है.... यही कहता है हर एक बहन का दिल अपने भाई के लिए। बचपन से बड़े होने तक और बाद में बहन की शादी के बाद अलग हो जाने पर भी बहन-भाई का प्यार कम नहीं होता। एक बहन का प्यार ऐसा है कि चाहे उसका भाई उसकी कोई बात ना माने, फिर भी वह आखिरी श्वास तक चाहेगी कि उसका भाई हमेशा खुश रहे।

भाई-बहन का प्यार। रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्यार की निशानी है, जिसे वर्षों से मनाया जा रहा है। भाई-बहन के विश्वास को बनाए रखने वाला यह त्यौहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। लेकिन इसे क्यों मनाते हैं इसके पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं।

विष्णु को पाने के लिए देवी लक्ष्मी ने मनाया था रक्षाबंधन का त्यौहार।
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पौराणिक काल से जुड़ी कहानी यह वह कहानी है जिसे भारतीय स्कूलों में रक्षाबंधन के समय काफी ज्यादा सुनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके अलावा भी हमारे इतिहास में ऐसी कई कहानियां दर्ज हैं जो रक्षाबंधन के त्यौहार की महत्ता दर्शाती हैं। यह कहानियां पौराणिक काल से जुड़ी हैं।

भगवान विष्णु। सबसे पहली कहानी भगवान विष्णु से संबंधित है, जिसके अनुसार राजा बालि ने जब 110 यज्ञ पूर्ण कर लिए तब देवताओं का डर बढ़ गया। उन्हें यह भय सताने लगा कि यज्ञों की शक्ति से राजा बलि स्वर्ग लोक पर भी कब्ज़ा कर लेंगे, इसलिए सभी देव भगवान विष्णु के पास स्वर्ग लोक की रक्षा की फरियाद लेकर पहुंचे।

राजा बलि। जिसके बाद विष्णुजी ब्राह्मण वेष धारण कर राजा बलि के समझ प्रकट हुए और उनसे भिक्षा मांगी। भिक्षा में राजा ने उन्हें तीन पग भूमि देने का वादा किया। लेकिन तभी बलि के गु्रु शुक्रदेव ने ब्राह्मण रुप धारण किए हुए विष्णु को पहचान लिया और बलि को इस बारे में सावधान कर दिया किंतु राजा अपने वचन से न फिरे और तीन पग भूमि दान कर दी।

एक पग में स्वर्ग। इस दौरान विष्णुजी ने वामन रूप में एक पग में स्वर्ग में और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। अब बारी थी तीसरे पग की, लेकिन उसे वे कहां रखें? वामन का तीसरा पग आगे बढ़ता हुआ देख राजा परेशान हो गए, वे समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें और तभी उन्होंने आगे बढ़कर अपना सिर वामन देव के चरणों में रखा और कहा कि तीसरा पग आप यहां रख दें।

पृथ्वी में रहने का अधिकार छीन लिया। इस तरह से राजा से स्वर्ग एवं पृथ्वी में रहने का अधिकार छीन लिया गया और वे रसातल लोक में रहने के लिए विवश हो गए। कहते हैं कि जब बलि रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा। इस वजह से मां लक्ष्मी, जो कि विष्णुजी की अर्धांगिनी थी वे परेशान हो गईं।

लक्ष्मी जी की परेशानी। भगवान के रसातल निवास से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा? इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आईं।

रक्षा-बंधन मनाया। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी, उस दिन से ही रक्षा-बंधन मनाया जाने लगा। आज भी कई जगहे इसी कथा को आधार मानकर रक्षाबंधन मनाया जाता है।

अगली कथा
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भविष्य पुराण की है जिसके अनुसार प्राचीन काल में एक बार बारह वर्षों तक देवासुर संग्राम होता रहा, जिसमें देवताओं की हार हो रही थी।

गुरु बृहस्पति। दुःखी और पराजित इन्द्र, गुरु बृहस्पति के पास गए। कहते हैं उस समय वहां इन्द्र की पत्नी शुचि भी मौजूद थीं। इन्द्र की व्यथा जानकर इन्द्राणी ने कहा, “हे स्वामी! कल ब्राह्मण शुक्ल पूर्णिमा है। मैं विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार करूंगी, उसे आप स्वस्तिवाचन पूर्वक ब्राह्मणों से बंधवा लीजिएगा। आप अवश्य ही विजयी होंगे।“

इन्द्राणी द्वारा बनाए रक्षाविधान। दूसरे दिन इन्द्र ने इन्द्राणी द्वारा बनाए रक्षाविधान का स्वस्तिवाचन पूर्वक बृहस्पति से रक्षाबंधन कराया, जिसके प्रभाव से इन्द्र सहित देवताओं की विजय हुई। तभी से यह ‘रक्षाबंधन’ पर्व ब्राह्मणों के माध्यम से मनाया जाने लगा। यह कथा पूर्णत: रक्षा से संबंधित ही पाई गई है, लेकिन अगली कथा पूरी तरह से रक्षा के साथ एक भाई के वचन को भी दर्शाती है।

महाभारत युग से जुड़ी कथा
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यह कथा महाभारत युग से जुड़ी है, जिसके भीतर ही दो विभिन्न कथाएं मौजूद हैं। जिसके अनुसार महाभारत में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध अपने चक्र से किया था। शिशुपाल का सिर काटने के बाद जब चक्र वापस कृष्ण के पास आया तो उस समय कृष्ण की अंगुली कट गई, तत्पश्चात उनकी अंगुली से रक्त बहने लगा। यह देखकर पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी से रहा नहीं गया और उसने तुरंत ही अपनी साडी़ का किनारा फाड़ कर कृष्ण की अंगुली में बांध दिया।

द्रौपदी को एक वचन दिया। परिणाम स्वरूप रक्त का बहाव रुक गया, लेकिन तभी श्रीकृष्ण ने भावुक होकर द्रौपदी को एक वचन दिया और कहा कि इस साड़ी की लाज वे रखेंगे और ताउम्र अपनी बहन की रक्षा करेंगे। इसी ऋण को चुकाने के लिए दु:शासन द्वारा चीरहरण करते समय कृष्ण ने द्रौपदी की लाज रखी।

श्रीकृष्ण एवं धर्मराज युधिष्ठिर की वार्तालाप
अगली कथा का वर्णन श्रीकृष्ण एवं धर्मराज युधिष्ठिर की वार्तालाप से प्राप्त होता है। एक बार महाराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा, “हे अच्युत! मुझे रक्षाबन्धन की वह कथा सुनाइए जिससे मनुष्यों की प्रेतबाधा और दुख दूर होता है।“

दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। इस पर भगवान बोले, “हे पाण्डव श्रेष्ठ! प्राचीन समय में एक बार देवों तथा असुरों में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ। संग्राम में देवराज इंद्र की पराजय हुई, जिस कारणवश देवता कान्ति विहीन हो गए।

इंद्र रणभूमि छोड़कर विजय की आशा को तिलांजलि देकर देवताओं सहित अमरावती चला गया। लेकिन पीछे से विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया और राजपद में घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता एवं मनुष्य यज्ञ कर्म न करें।

धर्म का नाश होने लगा सब लोग मेरी पूजा करें, जिसको इसमें आपत्ति हो वह राज्य छोड़कर चला जाए। दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ, वेद, पठन, पाठन तथा उत्सव समाप्त कर दिए गए। धर्म का नाश होने से देवों का बल घटने लगा। अब सभी इस परेशानी का हल चाहते थे इसलिए इंद्र स्वयं ही देवगुरु बृहस्पति के पास गए।

रक्षा विधान करने को कहा वे बोले, “हे गुरु! मैं शत्रुओं से घिरा हुआ प्राणान्त संग्राम करना चाहता हूं।“ इन्द्र को परेशान देख पहले तो बृहस्पति ने समझाया कि होनी बलवान होती है, जो होना है, होकर रहेगा, इसलिए आपका क्रोध करना व्यर्थ है। परंतु इंद्र की हठधर्मिता तथा उत्साह देखकर रक्षा विधान करने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रात:काल ही रक्षा का विधान सम्पन्न किया गया।

स्वयं गुरु ने उन्हें एक मंत्र प्रदान किया –

“येनवद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाममिवध्नामि रक्षे माचल माचल।।“

इस मन्त्रोच्चारण से देवगुरु ने श्रावणी के ही दिन रक्षा विधान किया। सहधर्मिणी इंद्राणी के साथ वृत्त संहारक इंद्र ने बृहस्पति की उस वाणी का अक्षरश: पालन किया और दानवों पर विजय प्राप्त की।

मंत्र का उच्चारण कहते हैं कि आज भी इसी मंत्र का उच्चारण करके कई लोग रक्षाबंधन का त्यौहार मनाते हैं। इस वर्ष रक्षाबंधन का त्यौहार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर 28 अगस्त को है।

इस वर्ष बने संयोग के अनुसार बहनों को चांदी की वस्तुएं, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद जैसे मोबाइल, लैपटॉप, आईपॉड, घड़ियां, एलसीडी आदि उपहार में देना शुभ फलदायी रहेगा। शुभ मुहूर्त में स्वर्ण का दान करना भाई-बहन की आयु में वृद्धि का कारक बताया गया है।
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श्रावण मास महात्म्य (तीसवाँ अध्याय) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸🌸〰️〰️🌸〰️〰️श्रावण मास माहात्म्य के पाठ एवं श्रवण का फलईश्वर बोले – हे सनत्क...
28/08/2026

श्रावण मास महात्म्य (तीसवाँ अध्याय)
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श्रावण मास माहात्म्य के पाठ एवं श्रवण का फल

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! मैंने आपसे श्रावण मास का कुछ-कुछ माहात्म्य कहा है, इसके सम्पूर्ण माहात्म्य का वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है. मेरी इस कल्याणी प्रिया सती ने दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर दग्ध करके पुनः हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया. श्रावण मास में व्रत करने के कारण यह मुझे पुनः प्राप्त हुई इसीलिए श्रावण मुझे प्रियकर है. यह मास न अधिक शीतल होता है और ना ही अधिक उष्ण (गर्म) होता है. राजा को चाहिए कि श्रावण मास में श्रौताग्नि से निर्मित श्वेत भस्म से अपने संपूर्ण शरीर को उदधूलित करके जल से आर्द्र भस्म के द्वारा मस्तक, वक्षःस्थल, नाभि, दोनों बाहु, दोनों कोहनी, दोनों कलाई, कंठ, सर और पीठ – इन बारह स्थानों में त्रिपुण्ड धारण करें।

“मानस्तोके.” मन्त्र से अथवा “सद्योजात.” आदि मन्त्र से अथवा षडाक्षर मन्त्र – ॐ नमः शिवाय – से भस्म के द्वारा शरीर को सुशोभित करें और शरीर में एक सौ आठ रुद्राक्ष धारण करें. कण्ठ में बत्तीस रुद्राक्ष, सर पर बाइस, दोनों कानों में बारह, दोनों हाथों में चौबीस, दोनों भुजाओं में आठ-आठ, ललाट पर एक और शिखा के अग्रभाग में एक रुद्राक्ष धारण करें. इस प्रकार से करके मेरा पूजन कर पंचाक्षर मन्त्र का जप करें।

हे विपेन्द्र ! श्रावण मास में जो ऐसा करता है वह मेरा ही स्वरुप है इसमें संदेह नहीं है. इस मास को मेरा अत्यंत प्रिय जानकर केशव की तथा मेरी पूजा करनी चाहिए. इस मास में मेरी अत्यंत प्रिय तिथि “कृष्णाष्टमी” (भारत के पश्चिमी प्रदेशों में युगादि तिथि के अनुसार मास का नामकरण होता है अतः श्रावण कृष्ण अष्टमी को भाद्रपद अष्टमी समझना चाहिए) पड़ती है, उस दिन भगवान् श्रीहरि देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे. हे सनत्कुमार ! यह मैंने आपको संक्षेप में बताया है, अब आप और क्या सुनना चाहते हैं !

सनत्कुमार बोले – हे पार्वतीपते ! आपने श्रावण मास का जो-जो कृत्य कहा, उन्हें सुनकर आनन्दसागर में निमग्न रहने के कारण और उनका वर्णन विस्तृत होने के कारण व्यवस्थित रूप से स्मृति नहीं बन पाई, अतः हे नाथ ! आप क्रम से सबको यथार्थ रूप से बताइए, सावधानी से सुनकर मैं भक्तिपूर्वक उन्हें धारण करूँगा।

ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! श्रावण मास की शुभ अनुक्रमणिका को आप सावधान होकर सुनिए. सर्वप्रथम शौनक का प्रश्न, तत्पश्चात सूतजी का उत्तर, श्रोता के गुण, आपके प्रश्न, श्रावण की व्युत्पत्ति, उसकी स्तुति, पुनः हे मुने ! आपका विस्तृत प्रश्न, इसके बाद नामकथन सहित आपके द्वारा की गई मेरी स्तुति, फिर क्रम से उद्देश्यपूर्वक मेरा उत्तर, पुनः आपका विशेष प्रश्न, उसके बाद नक्तव्रत की विधि, रुद्राभिषेक कथन, इसके बाद लक्षपूजा विधि, दीपदान, फिर किसी प्रिय वस्तु का परित्याग, पुनः रुद्राभिषेक करने तथा पंचामृत-ग्रहण करने से प्राप्त होने वाला फल, इसके बाद पृथ्वी पर शयन करने तथा मौनव्रत धारण करने का फल, तत्पश्चात मासोपवास में धारणा-पारणा की विधि, इसके बाद सोमाख्यान में लक्षरुद्रवर्ती विधि, पुनः कोटिलिंग-विधान, इसके बाद “अनौदन” नामक व्रत कहा गया है।

इसी व्रत में हविष्यान्न ग्रहण, पत्तल पर भोजन करना, शाकत्याग, भूमि पर शयन, प्रातःस्नान और दम तथा शम का वर्णन, उसके बाद स्फटिक आदि लिंगों में पूजा, जप का फल, उसके बाद प्रदक्षिणा, नमस्कार, वेदपरायण, पुरुषसूक्त की विधि, उसके बाद ग्रह यज्ञ की विधि, रवि-सोम-मंगल के व्रत का विस्तारपूर्वक वर्णन, पुनः बुध-गुरु का व्रत, इसके बाद शुक्रवार के दिन जीवन्तिका का व्रत, पुनः शनिवार को नृसिंह-शनि-वायुदेव और अश्वत्थ का पूजन – ये सब कहे गए हैं.
उसके बाद रोटक व्रत का माहात्म्य, औदुम्बर व्रत, स्वर्णगौरी व्रत, दूर्वागणपति व्रत, पंचमी तिथि में नाग व्रत, षष्ठी तिथि में सुपौदन व्रत, इसके बाद शीतला सप्तमी नामक व्रत, देवी का पवित्रारोपण, इसके बाद दुर्गाकुमारी की पूजा, आशा व्रत, उसके बाद दोनों एकादशियों का व्रत, पुनः श्रीहरि का पवित्रारोपण, पुनः त्रयोदशी तिथि को कामदेव की पूजा, उसके बाद शिवजी का पवित्रक धारण, पुनः उपाकर्म, उत्सर्जन तथा श्रवणा कर्म – इसका वर्णन किया गया है.
इसके बाद सर्पबलि, हयग्रीव-जन्मोत्सव, सभादीप, रक्षाबंधन, संकटनाशन व्रत, कृष्णजन्माष्टमी व्रत तथा उसकी कथा, पिठोर नामक व्रत, पोला नामक वृषव्रत,कुशग्रहण, नदियों का रजोधर्म, सिंह संक्रमण में गोप्रसव होने पर उसकी शान्ति, कर्क-सिंह संक्रमणकाल में तथा श्रावण मास में दान-स्नान-माहात्म्य, माहात्म्य-श्रवण, उसके बाद वाचकपूजा, इसके बाद अगस्त्य अर्घ्यविधि, फिर कर्मों तथा व्रतों के काल का निर्णय बताया गया है. जो श्रावण मास माहात्म्य का पाठ करता है अथवा इसका श्रवण करता है, वह इस मास में किये गए व्रतों का फल प्राप्त करता है।

हे सनत्कुमार ! आप इस शुभ अनुक्रम को अपने ह्रदय में धारण कीजिए. जो इस अध्याय को तथा श्रावण मास के माहात्म्य को सुनता है वह उस फल को प्राप्त करता है, जो फल सभी व्रतों का होता है. हे विप्रर्षे ! अधिक कहने से क्या लाभ है, श्रावण मास में जो विधान किया गया है, उनमें से किसी एक व्रत का भी करने वाला मुझे प्रिय है।

सूतजी बोले – हे शौनक ! शिवजी के अमृतमय इस उत्तम वचन का अपने कर्णपुट से पान करके सनत्कुमार आनंदित हुए और कृतकृत्य हो गए. श्रावण मास की स्तुति करते हुए तथा ह्रदय में शिवजी का स्मरण करते हुए वे देवर्षिश्रेष्ठ सनत्कुमार शंकर जी से आज्ञा लेकर चले गए. जिस किसी के समक्ष इस अत्यंत श्रेष्ठ रहस्य को प्रकाशित नहीं करना चाहिए. हे प्रभो ! आपकी योग्यता देखकर ही मैंने इसे आपसे कहा है।

|| इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वरसनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अनुक्रमणिकाकथन” नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ||
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