27/04/2026
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শ্রীগুরুর কৃপায়, যখন সাধক নিজের দেহকে জ্যোতির্ময় প্রণবরূপে নিজের আত্মার সহিত অভিন্নরূপে দর্শন করিয়া পরমাত্ম-প্রণবে একীভূত হন, তখন আর কিছুই অবশিষ্ট থাকে না। তিনি সমস্ত সংসর্গবোধ বিস্মৃত হইয়া সম্পূর্ণ নিরাসক্ত হইয়া যান। তখন তিনি নিজের মধ্যেই পরম শান্তি অনুভব করেন। দ্বিতীয় কেহই নাই—তবে তিনি কার সঙ্গ কামনা করিবেন, এবং কিসেরই বা আকাঙ্ক্ষা করিবেন?
তিনি উপলব্ধি করেন যে ওঙ্কার-কম্পনই আদিদৈবিক, আধিভৌতিক ও আধ্যাত্মিক—এই সকলেরই মূল কারণ; এবং তিনি ওঙ্কার-নাদে নিমগ্ন হইয়া মুক্তিলাভ করেন। যতদিন দেহ থাকে, ততদিন মন নাদ ও জ্যোতির সহিত ক্রীড়া করে। বাহ্যদৃষ্টিতে তাঁহাকে দেহসহ দেখা যায়, কিন্তু প্রকৃতপক্ষে তিনি কেবল নাদেই অবস্থিত থাকেন, এবং সেই কারণে আকাশের ন্যায় সর্বব্যাপী ও নির্লেপ হইয়া যান।
— শ্রী শ্রী ঠাকুর সীতারামদাস ওঁকারনাথ দেব
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श्रीगुरु की कृपा से जब साधक अपने देह को ज्योतिर्मय प्रणवस्वरूप में अपने आत्मा के साथ अभिन्न रूप से देखता हुआ परमात्म-प्रणव में एकीभूत हो जाता है, तब अन्य कुछ भी शेष नहीं रहता। वह समस्त संग-बोध को भूलकर पूर्णतः निरासक्त हो जाता है। तब वह अपने आप में ही परम शांति का अनुभव करता है। जब द्वितीय कोई है ही नहीं, तब वह किसका संग चाहेगा और किस वस्तु की कामना करेगा?
वह अनुभव करता है कि ओंकार-नाद ही आदिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक—इन सबका मूल कारण है; और वह ओंकार-नाद में निमग्न होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। जब तक शरीर रहता है, तब तक उसका मन नाद और ज्योति के साथ क्रीड़ा करता है। यद्यपि वह देहधारी के रूप में दिखाई देता है, तथापि वास्तव में वह केवल नाद में ही स्थित रहता है, और इस प्रकार वह आकाश के समान सर्वव्यापी और निरुपाधि हो जाता है।
— श्री श्री ठाकुर सीतारामदास ओंकारनाथ देव