26/01/2024
आज संपूर्ण राष्ट्र अपना 75वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। यह अवसर है एक ऐसे उत्साहित कर देने वाले घटनाक्रम का जिसके विधि और विधान से संपूर्ण राष्ट्र एक जुटता के बंधन में बंधा हुआ है।
रामराज्य की विधि या धर्म सम्मत मर्यादा एक ऐसी समग्र राज्य व्यवस्था से बनी थी है जिसमें सामाजिक जीवन का प्रत्येक कोना धर्म के चार चरणों- सत्य, सोच, दया और दान पर अवलंबित होता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने एक चौपाई में भगवान श्री राम के सशक्त रूप के विषय में वर्णित करते हुए कहा है कि -
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥
भावार्थ-शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥
यह एक ऐसी चतुष्पाद व्यवस्था है जो राज्य और समाज के सभी आधारभूत घटकों को सच्ची श्रद्धा से ओत-प्रोत करते हुए सबकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है।
रामायण काल में देव, असुर, राक्षस, दानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, मानव आदि के अलग-अलग राज्य हुआ करते थे। वाल्मीकि रामायण से पता चलता है कि उस काल में वैदिक व्यवस्था अपने चरम पर थी। लोग चार आश्रमों का पालन करते थे। कुटुम्ब की भावना और प्रजा की रक्षा उस काल के राजा दायित्व होते थे। रामायण काल में श्रम विभाजन की दृष्टि से समाज चार भागों में विभाजित था। इसमें हर वर्ण की बातों को सम्मान मिलता था। प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को आश्रम में अध्ययन करने, जीवन यापन करने और वर्ण चयन करने की छूट थी।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामराज्य को कुछ इस प्रकार समझाया है...
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।
राम-राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।।
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं।।
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।
धर्म अपने चारों चरणों (सत्य शौच दया और दान) से जगत् में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं हैं। पुरुषऔर स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी है।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना।।
छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है न और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणों से हीन ही है।।
महार्षि वाल्मीकि रामायण कहते हैं "राघव! आपके राज में सभी लोग निरोग दिखाई देते हैं। बूढ़े प्राणियों के पास भी मृत्यु नहीं फटकती है। स्त्रियां बिना कष्ट के प्रसव करती हैं। सभी मनुष्यों के शरीर हृष्ट–पुष्ट दिखाई देते हैं। मेघ अमृत के समान जल गिराते हुए समय पर वर्षा करते हैं। हवा ऐसी चलती है कि इसका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है।
#बगही_धाम परिवार की ओर से आप सभी को 75वें राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
🚩जय सियाराम 🚩