श्री भक्तमाल

श्री भक्तमाल भक्त, भक्ति ,भगवंत , गुरु चतुर नाम वपु एक
इनके पद वंदन किये , नाशै विघ्न अनेक

संत महिमासन्त तुकाराम की पत्नी छतपर खड़ी देख रही थी कि उसके पति गन्ने का एक झारा लिये आ रहे हैं। वह नीचे आकर उनकी प्रतीक...
05/01/2026

संत महिमा

सन्त तुकाराम की पत्नी छतपर खड़ी देख रही थी कि उसके पति गन्ने का एक झारा लिये आ रहे हैं। वह नीचे आकर उनकी प्रतीक्षा करने लगी।

तुकाराम के हाथ में केवल एक गन्ना देखकर वह आपे से बाहर हो गायी, उसने खींचकर गन्ना तुकाराम की पीठ पर जड़ दिया। तुकाराम अचानक के प्रहार से देहली की चौखट से टकरा गये, सिर से खून बहने लगा।

खून पोंछकर उठकर बोले- 'हे दयामयी ! तू कितनी अच्छी है, जिस गन्ने को तोड़ने की जहमत मुझे उठानी पड़ती, उसके दो टुकड़े तूने कर दिये, ले एक तू खा, एक मैं खाऊँ।'

रावणका पद-प्रहार सहकर भी विभीषण ने इतना ही कहा-आप मेरे पिता के समान हैं, आप राम की शरण में जाकर ही चैन से रह सकेंगे।

भृगुने भगवान् विष्णु को छातीपर पद-प्रहार किया, परंतु विष्णु उनका पैर सहलाने लगे, कहा- ऋषिवर ! मेरी छाती तो वज्र के समान है, आपके पैर कोमल हैं, चोट लग गयी होगी।

भगवान् बुद्ध को जब एक व्यक्ति ने आधे घण्टे तक गालियाँ दीं तो वे बोले- मुझे दूसरे गाँव जाना है। यदि और गालियाँ बच गयी हों, तो कल मैं यहीं पर इसी समय आऊँगा, आदमी पानी-पानी हो गया।

रामकृष्ण परमहंस एक भक्त के यहाँ भोजन के लिये निमन्त्रित थे, किंतु बहुत देर तक भी जब उस व्यक्ति ने उनकी सार-सम्हाल नहीं की, तो उनके साथी ने कहा- चलिये महाराज ! यहाँ से चलते हैं, परमहंस बोले- इतनी रात को खाना कहाँ खाऊँगा, तिस पर गाड़ीका किराया तीन रुपया कहाँ से दूँगा, इतने में ही भक्तको अपनी गलती का अहसास हुआ, वह दौड़ा हुआ आया और क्षमा-याचना की। रामकृष्ण हँसने लगे।

रमण महर्षि के आश्रममें कुछ चोरों ने आकर महर्षि की पिटाई की और धन सम्प्पति बताने को कहा। सुबह पुलिस के पूछने पर वे इतना ही बोले- कुछ नादान रात में को आये थे। हसते हुए बोले- उन्होंने मेरी पूजा भी की, किंतु मुझे उनके प्रति कोई शिकायत नहीं

सन्त एकनाथ गोदावरी में स्नान किया करते थे, इससे चिढ़कर एक पठान ने उनके ऊपर एक सौ आठ बार थूका। सन्त ने कहा आज गोदावरी में स्नान का खूब अवसर मिला। पठानने लज्जित होकर क्षमा माँगी।

दक्षिण के सन्त तिरुवल्लुवर को धोती की गाँठ ले जाते देखकर एक उद्दण्ड युवकने आवाज लगायी। ऐ बूढ़े ! क्या है गाँठमें?

सन्तने कहा धोतियाँ हैं, दिखा, एक की कीमत क्या है? बीस रुपये, उसने धोती के दो टुकड़े कर दिये। पूछा अब ? दस रुपये, वह टुकड़े करता रहा और सन्त शान्ति से कीमत बताते रहे। सन्त की शान्तिने युवक को रुला दिया, उसने सन्त से क्षमा माँगी।

सुकरात पत्नी के भुनभुनानेके बाद भी जब अपनी मित्रमण्डली से बात करना बन्द नहीं किये, तो पत्नी ने गन्दा पानी उन पर उड़ेल दिया। सन्त।ने हँसते हुए कहा- गरजने के पश्चात् बादल बरसते भी हैं, मित्रमण्डली हक्की-बक्की रह गयी। उन्होंने सन्त की महानताका परिचय पाया।

एकनाथ महाराज के गाँव में एक बार शर्त लगी कि जो कोई महाराज।को क्रोध दिला देगा, उसे दो सौ रुपये मिलेंगे। दूसरे दिन एक व्यक्ति नाथ के घर जाकर उनकी पत्नी की गोदी में चढ़कर बैठ गये।

महाराज पूर्ववत् भजन करते रहे। थोड़ी देर में उनकी पत्नी गिरिजाबाई दीपक में घी डालने को झुकीं कि वह व्यक्ति उछलकर उनकी पीठ पर सवार हो गया। नाथ ने कहा-देखना, इसको, कहीं गिर न पड़े, चोट न लग जाय। पत्नी ने जवाब दिया- आप बेफिक्र रहें। मुझे हरि पण्डित (पुत्र)-को इस तरह पीठ पर लादे-लादे कार्य करने।का अभ्यास है, व्यक्ति शर्मिन्दा होकर भाग खड़ा हुआ।

कहते हैं कि अक्रोधी मानवों के शरीर से ताजे गुलाब-सी भीनी-भीनी गन्ध निकलती रहती है। राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह ऐसे ही महामानव थे। धरा ऐसे सन्त-महापुरुषोंको पाकर सनाथ होती है।

जड़भरत जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। उनके पिता ...
25/12/2025

जड़भरत

जड़भरत के पिता उन्हें पंडित बनाना चाहते थे, किंतु बहुत प्रयत्न करने पर भी वे एक भी श्लोक याद न कर सके। उनके पिता ने उन्हें जड़ समझ लिया। पिता की मृत्यु के पश्चात माँ भी चल बसी। कुटुंब में रह गये भाई और भाभियाँ, जड़भरत के साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। जड़भरत इधर-उधर मजदूरी करते थे। जो कुछ मिल जाता था, खा लिया करते थे और जहाँ जगह मिलती थी, सो जाया करते थे। सुख-दु:ख और मान-सम्मान को एक समान समझते थे। भाईयों ने जब देखा कि उनके छोटे भाई के कारण उनकी अप्रतिष्ठा हो रही है, तो उन्होंने उन्हें खेती के काम में लगा दिया। जड़भरत रात-दिन खेतों की मेड़ों पर बैठकर खेतों की रखवाली करने लगे। वे शरीर से बड़े स्वस्थ और हट्टे-कट्टे थे।

एक दिन राजा रहूगण पालकी पर बैठकर, आत्मज्ञान की शिक्षा लेने के लिए कपिल मुनि के पास जा रहे थे। मार्ग में पालकी के एक कहार की मृत्यु हो गई। राजा रहूगण ने अपने सेवकों से कहा कि वे कोई दूसरा कहार खोजकर लाएं। रहूगण के सेवक किसी दूसरे कहार की खोज में निकल पड़े। उनकी दृष्टि खेत की मेड़ पर बैठे हुए जड़भरत पर पड़ी। सेवक उन्हें पकड़कर ले गए।

जड़भरत ने बिना कुछ आपत्ति किए हुए, कहारों के साथ पालकी कंधे पर रख ली और बहुत संभल-संभल कर चलने लगे। उनके पैरों के नीचे कोई जीव दब न जाए इसलिए उनके पैर डगमगा उठते थे। इससे राजा रहूगण को झटका लगता था, उन्हें कष्ट होता था। राजा रहूगण ने कहारों से कहा, तुम लोग किस तरह चल रहे हो? संभलकर, सावधानी के साथ क्यों नहीं चलते?’
कहारों ने उत्तर दिया, ‘महाराज, हम तो सावधानी के साथ चल रहे हैं, किंतु यह नया कहार हमारे चलने में विघ्न पैदा करता है। इसके पैर रह-रह कर डगमगा उठते हैं।’
राजा रहूगण ने जड़भरत को सावधान करते हुए कहा, तुम ठीक से क्यों नहीं चलते? देखने में तो हट्टे-कट्टे मालूम होते हो। क्या पालकी लेकर ठीक से चला नहीं जाता? सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करो, नहीं तो दंड दूँगा।’
रहूगण का कथन सुनकर जड़भरत मुस्करा उठे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘आप शरीर को दंड दे सकते हैं, पर मुझे नहीं दे सकते, मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ। मैं दंड और पुरस्कार दोनों से परे हूँ। दंड देने की तो बात ही क्या, आप तो मुझे छू भी नहीं सकते।’

जड़भरत की ज्ञान भरी वाणी सुनकर रहूगण विस्मय की लहरों में डूब गए। उन्होंने आज्ञा देकर पालकी नीचे रखवा दी। पालकी से उतरकर कहा, ‘महात्मन, मुझे क्षमा कीजिए। कृपया बताइए आप कौन हैं? कहीं आप वे कपिल मुनि ही तो नहीं हैं जिनके पास मैं आत्मज्ञान की शिक्षा लेने जा रहा था?’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन! मैं न तो कपिल मुनि हूँ और न कोई ॠषि हूँ। मैं पूर्वजन्म में एक राजा था। मेरा नाम भरत था। मैंने भगवान श्रीहरि के प्रेम और भक्ति में घर-द्वार छोड़ दिया था। मैं हरिहर क्षेत्र में जाकर रहने लगा था। किंतु एक मृग शिशु के मोह में फँसकर मैं भगवान को भी भूल गया। मृगशिशु का ध्यान करते हुए जब शरीर त्याग किया, तो मृग का शरीर प्राप्त हुआ।
मृग का शरीर प्राप्त होने पर भी भगवान की अनुकंपा से मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर बड़ा दु:खी हुआ कि मैंने कितनी अज्ञानता की थी! एक मृगी के बच्चे के मोह में फँसकर मैंने भगवान श्रीहरि को भुला दिया था। राजन, जब मैंने मृग शरीर का त्याग किया, तो मुझे यह शरीर प्राप्त हुआ। यह शरीर प्राप्त होने पर भी मेरा पूर्व-जन्म का ज्ञान बना रहा। मैं यह सोचकर कि मेरा यह जन्म व्यर्थ न चला जाए, अपने को छिपाए हुए हूँ। मैं दिन-रात परमात्मारूपी आत्मा में लीन रहता हूँ, मुझे शरीर का ध्यान बिलकुल नहीं रहता।
राजन! इस जगत में न कोई राजा है न प्रजा, न कोई अमीर है, न कोई ग़रीब, न कोई कृषकाय है, न कोई स्थूलकाय, न कोई मनुष्य है, न कोई पशु। सब आत्मा ही आत्मा हैं। ब्रह्म ही ब्रह्म हैं।
‘राजन, मनुष्य को ब्रह्म की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए। यही मानव-जीवन की सार्थकता है। यही श्रेष्ठ ज्ञान है, और यही श्रेष्ठ धर्म है।’

रहूगण जड़भरत से अमृत ज्ञान पाकर तृप्त हो गए। उन्होंने जड़भरत से निवेदन किया, ‘महात्मन! मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।’
जड़भरत ने उत्तर दिया, ‘राजन जो मैं हूँ, वही आप हैं। न कोई गुरु है, न कोई शिष्य। सब आत्मा हैं, ब्रह्म हैं।’

जड़भरत जब तक संसार में रहे, अपने आचरण और व्यवहार से अपने ज्ञान को प्रकट करते रहे। जब अंतिम समय आया, तो चिरनिद्रा में सो गए, ब्रह्म में समा गए।

यह सारा जगत ब्रह्म से निकला है और ब्रह्म में ही समा जाता है। ब्रह्म की इस लीला को जो समझ पाता है, उसी को जगत में सुख और शांति प्राप्त होती है।

श्रील जीव गोस्वामी जी तिरोभाव दिवसश्रील जीव गोस्वामी का जन्म पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568 को बंगाल के रामकेलि ग्राम में ...
24/12/2025

श्रील जीव गोस्वामी जी
तिरोभाव दिवस

श्रील जीव गोस्वामी का जन्म पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1568 को बंगाल के रामकेलि ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम वल्लभ था, किन्तु भगवान श्रीचैतन्य महाप्रभु जी ने उनको अनुपम नाम दिया था।

श्री सनातन गोस्वामी और श्री रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ (अनुपम) गोस्वामी, ये तीनों भाई नवाब हुसैन शाह के दरबार में उच्च पदासीन थे। बादशाह की सेवाओं के बदले इन लोगों को अच्छा भुगतान होता था, जिसके कारण इनका जीवन अत्यंत सुखमय था। श्री जीव, श्रीरूप गोस्वामी और श्रीसनातन गोस्वामी के भतीजे थे और श्री रूप गोस्वामी जी से दीक्षा ग्रहण की थी।

आपका बाल्य काल से ही भगवद् अनुराग देखा जाता है । आप बचपन में अपने मित्रों के साथ श्रीकृष्ण पूजा सम्बन्धित खेल छोड़ कर और कोई खेल नहीं खेलते थे। स्वयं कृष्ण-बलराम जी की मूर्ति बना कर उनकी चन्दन, पुष्प, इत्यादि से पूजा करते, उन्हें रत्न-जड़ित सुन्दर-सुन्दर वस्त्र, अलंकार पहनाते तथा अत्यन्त उल्लासपूर्ण हृदय से बिना पलक झपकाये दर्शन करते तथा साष्टांग प्रणाम करते तो इस प्रकार लगता मानो सोने की मूर्ति धूलि में पड़ी हो । इसके अलावा बहुत प्रकार की मिठाईयाँ श्रीकृष्ण-बलराम को भोग लगाते तथा सभी बालकों के साथ प्रेमानन्द में प्रसाद पाते।

एक रात्रि जब श्रील रूप गोस्वामी सो रहे थे तब ठाकुर श्री राधा दामोदर ने उन्हें स्वप्न में यह आदेश दिया कि तुम अपने शिष्य व मेरे भक्त जीव गोस्वामी के लिए दामोदर स्वरूप को प्रकट करो। तुम मेरे प्रकट विग्रह को मेरी नित्य सेवा हेतु जीव गोस्वामी को दे देना। इस घटना के तुरन्त बाद जब रूप गोस्वामी यमुना स्नान करके आ रहे थे तो उन्हें रास्ते में श्याम रंग का विलक्षण शिलाखण्ड प्राप्त हुआ। तत्पश्चात ठाकुर श्रीराधादामोदर ने उन्हें अपने प्रत्यक्ष दर्शन देकर शिलाखण्ड को दामोदर स्वरूप प्रदान किया। यह घटना माघ शुक्ल दशमी, संवत् 1599(सन् 1542) की है। यह दिन वृंदावन में ठाकुर श्री राधा दामोदर प्राकट्य महोत्सव के रूप में अत्यन्त धूमधाम के साथ मनाया जाता है।स्वप्नादेश के अनुसार श्रीरूप गोस्वामी ने दामोदर विग्रह को अपने शिष्य श्रीजीव गोस्वामी को नित्य सेवा हेतु दे दिया। श्रीजीव गोस्वामी ने इस विग्रह को विधिवत् ठाकुर श्रीराधादामोदर मंदिर के सिंहासन पर विराजित कर दिया।

एक बार सम्राट अकबर ने गंगा श्रेष्ठ है या यमुना,इस वितर्क को जानने के लिए जीव गोस्वामी को अपने दरबार में बडे ही सम्मान के साथ बुलाया। इस पर उन्होंने शास्त्रीय प्रमाण देते हुए यह कहा कि गंगा तो भगवान का चरणामृत है और यमुना भगवान् श्रीकृष्ण की पटरानी। अतएव यमुना, गंगा से श्रेष्ठ है।इस तथ्य को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया।

श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी जी के अप्रकट होने के बाद श्रील जीव गोस्वामी जी को सोत्कल गौड़ मथुरा मण्डल के गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के सर्वश्रेष्ठ आचार्य पद पर अधिष्ठित (नियुक्त) किया गया था। श्रील कृष्ण दास कविराज गोस्वामी जी ने आपके प्रकटकाल में ही श्रीचैतन्य चरितामृत की रचना की थी। श्री चैतन्य चरितामृत की रचना के बाद ही श्रील जीव गोस्वामी पाद ने गौड़ देश से आये श्रीनिवास, श्रीनरोत्तम तथा दुःखी कृष्णदास को प्रचारक के उपयुक्त देख कर, इन तीनों को यथाक्रम आचार्य, ठाकुर तथा श्यामानन्द नाम (उपाधियाँ) देकर स्वरचित व गोस्वामियों के ग्रन्थों के साथ नाम-प्रेम के प्रचार के लिये गौड़ देश में भेजा था ।

श्री जीव गोस्वामी के द्वारा रचित ग्रंथ "सर्व संवादिनी", "षट्संदर्भ" एवं "श्री गोपाल चम्पू" आदि विश्व प्रसिद्ध हैं। षट् संदर्भ न केवल गौडीय सम्प्रदाय का अपितु विश्व वैष्णव सम्प्रदायों का अनुपम दर्शन शास्त्र है।

गौडीय वैष्णव सम्प्रदाय की बहुमूल्य मुकुटमणि श्रील जीव गोस्वामी का पौष शुक्ल तृतीया, संवत् 1653(सन् 1596) को आज ही के दिन वृंदावन में निकुंज गमन हुआ।वे ६५ वर्ष तक श्री वृंदावन में वास करते हुए ८५ वर्ष तक इस धरा धाम पर प्रकट रहे। वृंदावन में श्री राधादामोदर मंदिर के पीछे श्रील जीव गोस्वामी जी का समाधि मन्दिर है। इसके अलावा श्रीराधाकुण्ड के किनारे तथा श्रीललिता-कुण्ड के पास आपकी भजन कुटी आज भी विद्यमान है।

श्री जगन्नाथ भगवान गीतगोविंद सुनने की उत्सुकता(भाव विभोर कथा)एक समय की बात है, गीत गोविंद गीत उड़ीसा के लोगों के बीच बहु...
24/12/2025

श्री जगन्नाथ भगवान गीतगोविंद सुनने की उत्सुकता
(भाव विभोर कथा)

एक समय की बात है, गीत गोविंद गीत उड़ीसा के लोगों के बीच बहुत प्रसिद्ध था।
पुरी के पास एक छोटे से गाँव में पद्मा नाम की एक लड़की रहती थी। वह एक माली की बेटी थी और गीत गोविंद गाने में बहुत माहिर थी।
एक दिन जब पद्मा बगीचे से बैंगन तोड़ रही थी, तो वह बहुत मधुर स्वर में गीत गोविंद का पाठ कर रही थी।
जब भगवान जगन्नाथ ने गीत गोविंद का यह गीत सुना तो वे इतने आकर्षित हो गए कि वे स्वयं को मंदिर में रोक नहीं सके।
वे तुरन्त ही वेदी छोड़कर बगीचे में चले गये, जहां पद्मा गा रही थी।
भगवान जगन्नाथ उस लड़की का गायन सुनते हुए उसके पीछे-पीछे चले।
वे गीतगोविन्द के इस गीत से इतने मंत्रमुग्ध हो गये कि स्वयं को भूल गये।
जब वे उस लड़की के पीछे चल रहे थे तो बैंगन के पेड़ के कांटों से उनकी धोती फट गई।
उनके वस्त्र का ऊपरी टुकड़ा जमीन पर गिर गया, लेकिन भगवान् गीतगोविन्द सुनने में इतने तल्लीन थे कि उन्हें इसका ध्यान ही नहीं रहा।

कुछ देर बाद पद्मा ने अपनी टोकरी बैंगन से भर ली और बगीचे से चली गई।

पद्मा का गायन सुनकर भगवान जगन्नाथ पूरी तरह संतुष्ट होकर मंदिर लौट आये।

अगली सुबह पुजारी अपनी प्रातःकालीन सेवा करने आये।

जब उन्होंने मंदिर का द्वार खोला तो वे यह देखकर बहुत आश्चर्यचकित हुए कि भगवान जगन्नाथ का वस्त्र फटा हुआ था और उनके ऊपर का वस्त्र गायब था।

कपड़े के टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे।

ऐसा लग रहा था मानो भगवान ने पिछली शाम को कपड़े ही नहीं पहने थे।

यह देखकर पुजारी बहुत चिंतित हो गए और तुरंत राजा को इसकी सूचना दी।

किसी को समझ नहीं आ रहा था कि यह कैसे हुआ।

सभी लोग इसे बहुत अशुभ मानते थे।

राजा ने उपवास करना शुरू कर दिया और भगवान के सामने गिरकर उनसे प्रार्थना की कि वे उनकी सेवा में हुई किसी भी गलती को क्षमा कर दें।

भगवान जगन्नाथ ने राजा को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, "हे राजन! चिंता मत करो। मुझे अपने महान भक्त जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंद गीत सुनने का बहुत शौक है। कल रात एक गाँव की लड़की थी जो बहुत अच्छे से गीत गोविंद का जाप कर रही थी। मैं उसके गीत से मोहित हो गया और उसे सुनने के लिए मंदिर से बाहर चला आया। जब मैं उसके पीछे-पीछे बैंगन के बगीचे में जा रहा था, तो बैंगन के पेड़ों पर लगे कांटों से मेरा कपड़ा फट गया। अनजाने में मैंने अपने कपड़े का ऊपरी टुकड़ा बैंगन के बगीचे में ही छोड़ दिया है। आपको बिल्कुल भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। इसमें आपका कोई दोष नहीं है। लेकिन मेरी आपसे प्रार्थना है कि कृपया उस लड़की को हर दिन लाएँ और मेरे सोने से पहले मंदिर में मेरे सामने गीत गोविंदा गाएँ।"

राजा ने तुरन्त ही लोगों को लड़की को खोजने के लिए भेजा। जब वे उसके घर पहुंचे, तो उन्हें बगीचे में भगवान जगन्नाथ के वस्त्र का ऊपरी टुकड़ा पड़ा मिला।

जब राजा ने यह सुना तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ: इससे यह बात पुष्ट हो गई कि भगवान कल रात उसके बगीचे में गये थे।

राजा पद्मा से प्रतिदिन गीत गोविंद सुनने की भगवान की इच्छा पूरी करना चाहते थे। वे स्वयं पद्मा के घर गए और उसे अपने स्वप्न के बारे में बताया तथा भगवान की इच्छा के बारे में भी बताया कि वे पद्मा को गाते हुए सुनना चाहते हैं।

उन्होंने उससे कहा कि अगर उसे कोई आपत्ति न हो तो वह पुरी आकर रह सकती है। उसके और उसके परिवार के सदस्यों के लिए पुरी में रहने की सभी सुविधाएँ जुटाई जाएँगी। फिर वह भगवान जगन्नाथ के सामने प्रतिदिन गीत गोविंद गा सकती है।

यह सुनकर वह लड़की बहुत खुश हुई। वह कितनी भाग्यशाली थी कि भगवान उसे स्वयं गीत गोविंदा गाते हुए सुनना चाहते थे!

और इसलिए पद्मा अपने परिवार के सदस्यों के साथ भगवान जगन्नाथ की सेवा करने के लिए पुरी जाने के लिए सहमत हो गईं।

वे सभी पुरी आए और राजा से मिले। राजा ने उन्हें पुरी में रहने की सभी सुविधाएँ दीं और पद्मा को भगवान जगन्नाथ के सामने गीत गोविंद का जाप करने की विशेष सेवा दी।

उस समय से जगन्नाथ मंदिर में भगवान के विश्राम से पहले गीत गोविंद का पाठ करने की प्रथा शुरू की गई।

राजा जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंद को बहुत सम्मान देते थे। उन्होंने इस गीत को गाने का समय निश्चित किया और गाने की विधि भी निर्धारित की। इस सेवा के लिए राजा ने एक विशेष आदेश दिया और उसे स्थायी आदेश के रूप में पत्थर पर उकेरा गया।

उस दिन के बाद से, सबसे भाग्यशाली लड़की पद्मा ने भगवान जगन्नाथ के विश्राम करने से पहले मध्य रात्रि की आरती के दौरान भगवान के सामने प्रतिदिन गीत गोविंद गाना शुरू कर दिया।

पद्मा को देव दासी, या भगवान की दासी के रूप में जाना जाने लगा।

श्री सुदामादास जी महाराज            श्रीसुदामादास जी महाराज जी का जन्म बिहार के गोपालगंज ज़िले के छिपाया फ़ार्म नामक गाँ...
17/12/2025

श्री सुदामादास जी महाराज

श्रीसुदामादास जी महाराज जी का जन्म बिहार के गोपालगंज ज़िले के छिपाया फ़ार्म नामक गाँव में हुआ था ।

इनका यज्ञोपवीत पाँच वर्ष की आयु में ही हो गया था । यद्यपि ये मेधावी बालक थे किंतु कक्षा पाँच तक ही पढ़े । अपने अधिकतर समय में मटिहानी के सीताराम मंदिर में हनुमानचालीसा एवं श्रीरामचरितमानस जी का पाठ करते। आसपास सत्संग कीर्तन होता तो मंजीरा ले कर बड़े उत्साह से आनन्दमग्न होते । चौदह वर्ष की आयु में मंदिर के महंत श्री रामसेवकदास जी से राम मंत्र मिला और सात आठ वर्ष के बाद वैराग्य के मार्ग पर निकल पड़े ।
यात्रायें आरंभ की और प्रथम यात्रा में माता जानकी के जनमस्थान जनकपुर पहुँचे । वहाँ 6 माह रहे और चौरासी कोस परिक्रमा की । फिर भगवान श्रीराम के जन्मस्थान अयोध्या पहुँचे । वहाँ मणिराम दास जी की छावनी में रहे और अन्य स्थानों पर भी श्री अयोध्या जी के । श्री अयोध्या जी रहकर नित्य एक लाख सीताराम नाम जप और रामायण का नित्य पाठ करते । वही रहकर साधु संतों की सेवा में सलंग्न हुए और तन मन प्राण से दिन रात सेवा करते ।
एक दिन मणिरामदास जी की छावनी में स्वामी दामोदर जी मंडली द्वारा प्रस्तुत राधाकृष्ण लीला देखी और अनायास ही रासबिहारी जी को और खिंच गये । श्रीकृष्ण को ये श्रीराम जी से अलग नहीं देखते थे । किंतु राधाकृष्ण लीला देख सन् 1926 में सदैव के लिए वृंदावन आ गये । वृंदावन आ कर अनेकों स्थानों पर रहे किंतु मुख्यतः राम मंदिर ज्ञान गुदड़ी में निवास करते हुए प्रसिद्ध सिद्धप्रेमी संत श्रीजगन्नाथदास भक्तमाली जी से भक्तमाल श्रवण की और सीखी । कुछ वर्ष पश्चात् जहां अब वर्तमान की सुदामा कुटी है , वहाँ पर श्रीराम कुमार दास जी महाराज जी के साथ निवास किया जहां तब केवल फूस की कुटिया थी । यह स्थान परिक्रमा मार्ग पर यमुना किनारे होने से वहाँ इन्हें अनेकों साधु संतों के दर्शनों का लाभ मिलता । नित्य प्रातः यमुना स्नान करके भजन के बाद यमुना के पार जा कर आसपास के गाँवों से मधुकरी माँग कर लाते और साधु संतों को पवाते । गाय के गोबर और लकड़ी एकत्र कर स्वयं प्रसाद भी बनाते और निष्काम भाव से साधु संतों की सेवा करते । निरंतर नाम जप करते हुए सेवा करते और अजपा जप होने लगा ।
कुछ समय पश्चात संत श्री रामकुमारदास जी ने सुदामा कुटीर पूज्य महाराज जी को सौंप दी । इनकी साधु सेवा सब सराहते और दिन प्रतिदिन बढ़ती ही गई । यह हमेशा कहते कि सब श्रीकृष्ण करते हैं और अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् इस सूत्र को जीवन में उतारे हुए सेवा करते ।
एक बार 125 साधु संत के लिए प्रसाद बना और जैसे ही उनको पवाने के बाद स्वयं परिकर सहित प्रसाद को बैठे तो 50 साधु और आ गये ।रसोईघर में ज़्यादा प्रसाद नहीं था 5-10 मूर्तियों से अधिक । सभी सेवक चिंतित हुए । आश्रम में सेवकों को चिंताग्रस्त देख सुदामादास जी स्वयं रसोईघर गये और सभी भोजन पत्र भर भर कर देने लगे और सबको तृप्त किया गया । बाद में सेवकों ने अस्चार्यपूर्वक ये चमत्कार पूछा तो उन्होंने बताया कि सब राम जी की कृपा है ।
जब एक समय श्री यमुना जी का जलस्तर बहुत बाढ़ गया था और बाढ़ की स्थिति बन गई थी जिससे आश्रम भी प्रभावित होता तो इन्होंने यमुना जी की पूजा अर्चना की और उसी दिन यमुना जी 12 मीटर पीछे चली गई थी और अगले दिवस कई सौ मीटर तक ।
एक समय ये बिहारी जी के दर्शन को गये तो उस समय तक बिहारी जी की शयन आरती हो विश्राम करा दिया गया था । पूज्य महाराज जी वहाँ कुछ समय तक बैठे दण्डवत कर और निराश हो वापिस आश्रम लौट आये । जब अगली सुबह भगवान के जप और ध्यान को बैठे तो इन्होंने अति मधुर प्रिय वाणी सुनी _ “ बाबा , बाबा ! मैं आया हूँ । कल आप दर्शन नहीं पा सके । अब आँखें खोलो और दर्शन करो ।” जैसे ही पूज्य महाराज जी ने आँखें खोली तो त्रिभंगी ललित मुद्रा में बांसुरी और ग्वालछड़ी लिए हुए मयूरमुकुट धारण किए हुए श्री कृष्ण के साक्षात दर्शन किए । इनका हृदय प्रेम से भर गया । दल वृंदावन में रहना सफल हो गया था । साधु संतों की सेवा के आशीर्वाद से मानव शरीर धारण करने का सर्वोत्तम लक्ष्य पा लिया था । अब कुछ बाक़ी नहीं रह गया था ।
इनके जीवन के अनेकों अनुभव है । इनके श्री विग्रह श्री कौशलकिशोर जी इनके साथ लीला करते थे । उनमें से एक लीला है कि एक रात्रि को ये काँपते हुए जागे । अपने ऊपर मोटे गरम कंबल वस्त्र होते हुए इतना ठंड से काँपना इनको आश्चर्यचकित कर रहा था । इनको तभी अनुभव हुआ कि इनके श्रींविग्रह ठंड में ठिठुर रहे हैं । ये तभी उठे और जब मंदिर में पहुँचे तो देखा कि आज पुजारी जी कंबल उढ़ाना भूल गए थे । इन्होंने क्षमा याचना करते हुए भूमि पर पड़े हुए गरम वस्त्र से श्री विग्रह को ढका और फिर आ कर वापिस लत गये ।
रामानन्द जयंती जो इतने उत्साह से मनायी जाती है , इस उत्सव का इतने बड़े स्तर पर मनाने का श्रेय इन्हें ही जाता है । श्री अग्रदास जी का उत्सव , भक्तमाल जी प्राकट्य उत्सव , हनुमान जयंती और तुलसीदास जी उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है । सन् 1972 में सीताराम जी के बड़े विग्रह स्थापित किए गए । जब आयु बढ़ने लगी तो इन्होंने सेवा अपने शिष्यों को सौंप दी और स्वयं यमुना के किनारे एकांत स्थान पर भजन करने चले गये । वहाँ भी भक्त पहुँच गये इनके लिय एक मंदिर , 50 साधुओं के रहने का स्थान और गौशाला निर्मित कर दी । सुदामादास जी वहाँ से भी एकांत में भजन के लिए निकल गये और प्रेम सरोवर पर नितांत एकांत में भजन करने लगे और वहाँ भी प्रेमी भक्तों ने इन को ढूँढ लिया । एकांत भजन की प्रीति से ये ऋषिकेश चले गये और वहाँ गंगा किनारे भजन किया । वहाँ भी इनके लिए लक्ष्मण झूला पर आश्रम निर्माण कर दिया । किंतु सभी स्थानों पर साधु सेवा , गौ सेवा और भजन कीर्तन और सत्संग ही निरंतर चलता ।
साधु संतों की सेवा , गौ सेवा जैसी इन्होंने की , वैसा और उदाहरण दुर्लभ है । सन् 2006 में श्रावण कृष्ण द्वादशी पर 106 वर्ष की आयु में भगवान के धाम को प्रस्थान किया ।

07/12/2025

SHYAM RAS I KHATU DHAM I SHRI SHYAM BHAKTI BHAV I SHYAM BHAJAN I SHYAM BABA BHAJAN I KRISHAN BHAJAN I SUPERHIT BHAJAN I EVERGREEN BHAJAN I TOP TEN BHAJAN I B...

नरसी मेहता गुजरात के एक बहुत बड़े श्री कृष्ण भक्त थे। उनके भजन आज भी न केवल गुजरात में,बल्कि सारे भारत में बड़ी श्रद्धा ...
29/11/2025

नरसी मेहता गुजरात के एक बहुत बड़े श्री कृष्ण भक्त थे। उनके भजन आज भी न केवल गुजरात में,बल्कि सारे भारत में बड़ी श्रद्धा और आदर के साथ गए जाते हैं। उनका जन्म काठियावाड़ के जूनागढ़ शहर में बड़नगरा जाति की नागर- ब्राह्मण- कुल में हुआ था। बचपन में ही उन्हें कुछ साधुओं का सत्संग प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप उनके हृदय में श्री कृष्ण भक्ति का उदय हुआ। वह निरंतर भक्त -साधुओं के साथ रहकर श्री कृष्णा और गोपियों की लीला के गीत गाने लगे। धीरे-धीरे भजन कीर्तन में ही उनका अधिकांश समय बीतने लगा।
यह बात उनके परिवार वालों को पसंद नहीं थी, उन्हें बहुत समझाने का प्रयास किया गया परंतु कोई लाभ न हुआ। एक दिन उनकी भौजाई ताना मारते हुए कहा;'ऐसी भक्ति उमड़ी है तो भगवान से मिलकर क्यों नहीं आते?'इस ताने ने नरसी पर जादू का काम किया। वह घर से उसी क्षण निकल पड़े और जूनागढ़ से कुछ दूर श्री महादेव जी के पुराने मंदिर में जाकर वहां शंकर जी की उपासना करने लगे। कहते हैं, उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शंकर उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें भगवान श्री कृष्ण के गोलक में ले जाकर गोपियों की रासलीला का अद्भुत दृश्य दिखलाया। वह गोलोक की लीला को देखकर मुग्ध हो गए। उनका निम्नलिखित पद तो बहुत ही प्रसिद्ध है। प्रेमी भक्त बड़ा विभोर होकर इसका गान करते हैं;
वैष्णव जन तो तेने कहिए,जो पीर पराई जाणे रे।
परदु:खे उपकार करे तोय, मन अभिमान न आणे रे।।

भक्त नरसी मेहता जन्म दिवस विशेष
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गुजराती साहित्य के आदि कवि संत नरसी मेहता का जन्म 1414 ई. में जूनागढ़ (सौराष्ट्र) के निकट, तलाजा ग्राम में एक नागर ब्राह्मण परिवार में हुआ था। माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। इसलिए अपने चचेरे भाई के साथ रहते थे। अधिकतर संतों की मंडलियों के साथ घूमा करते थे और 15-16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह हो गया। कोई काम न करने पर भाभी उन पर बहुत कटाक्ष करती थी। एक दिन उसकी फटकार से व्यथित नरसिंह गोपेश्वर के शिव मंदिर में जाकर तपस्या करने लगे। मान्यता है कि सात दिन के बाद उन्हें शिव के दर्शन हुए और उन्होंने कृष्णभक्ति और रासलीला के दर्शनों का वरदान मांगा। इस पर द्वारका जाकर रासलीला के दर्शन हो गए। अब नरसिंह का जीवन पूरी तरह से बदल गया। भाई का घर छोड़कर वे जूनागढ़ में अलग रहने लगे। उनका निवास स्थान आज भी ‘नरसिंह मेहता का चौरा’ के नाम से प्रसिद्ध है। वे हर समय कृष्णभक्ति में तल्लीन रहते थे। उनके लिए सब बराबर थे। छुआ-छूत वे नहीं मानते थे और हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन किया करते थे। इससे बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, पर वे अपने मत डिगे नहीं।

पिता के श्राद्ध के समय और विवाहित पुत्री के ससुराल उसकी गर्भावस्था में सामग्री भेजते समय भी उन्हें दैवी सफलता मिली थी। जब उनके पुत्र का विवाह बड़े नगर के राजा के वजीर की पुत्री के साथ तय हो गया। तब भी नरसिंह मेहता ने द्वारका जाकर प्रभु को बारात में चलने का निमंत्रण दिया। प्रभु श्यामल शाह सेठ के रूप में बारात में गए और ‘निर्धन’ नरसिंह के बेटे की बारात के ठाठ देखकर लोग चकित रह गए। हरिजनों के साथ उनके संपर्क की बात सुनकर जब जूनागढ़ के राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो कीर्तन में लीन मेहता के गले में अंतरिक्ष से फूलों की माला पड़ गई थी। निर्धनता के अतिरिक्त उन्हें अपने जीवन में पत्नी और पुत्र की मृत्यु का वियोग भी झेलना पड़ा था। पर उन्होंने अपने योगक्षेम का पूरा भार अपने इष्ट श्रीकृष्ण पर डाल दिया था। जिस नागर समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया था अंत में उसी ने उन्हें अपना रत्न माना और आज भी गुजरात में उनकी वह मान्यता है।

भक्त नरसी मेहता के जीवन से जुड़ी कुछ अद्भुद चमत्कारिक घटनाएं
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एक समय नरसिंह की ध्योती की शादी थी। नरसिंह की लड़की उन्हें शगुन के तोर पर गुड देते हुए बोली की पिता जी आप ने शादी में जरुर आना है। नरसिंह बहुत गरीब थे उन्होंने कहा की बेटी मेरे पास तो शादी में देने के लिये कुछ भी नहीं है। मैं आ जाऊंगा लेकिन भगवान का नाम ही लूँगा। जब नरसिंह जी ध्योती की शादी में पहुंचे तो किसी स्त्री ने उन की समधनि ने पूछा की लड़की के मामा और नाना में आये है, उन्होंने कन्यादान में क्या दिया है। आगे से समधनि ने मजाक में कह दिया की दो भाठे दिये हैं।
यह सुन कर नरसिंह शर्मिंदा हो गये और भगवान को याद कर उन्हें उसकी इज्जत बचाने को कहने लगे। तभी भगवान बैल गाडी लाद कर सामान की लाए। भगवान लड़की के लिये लाल सूट, चुनरी, विवाह की सारी जरी (कपडे), गहना, मोती, हीरे, घोड़े, पालकी तथा अनेक तरह के उपहार ले कर आए। नरसिंह जी ने खुशी खुशी भात (नानकशक) दिया। तभी दोनों भाठे धूं धूं कर टूट गये और सभी देख कर हैरान रह गये की दोनों भाठे सोने और चांदी से भरे थे। और इस तरह भगवान ने अपार सामग्री देकर अपने प्रिय भगत नरसिंह की लाज रख ली।

सावळ शाह सेठ की कथा
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एक बार द्वारका को जाने वाले कुछ साधु नरसिंह जी के पास आये और उन्हें पांच सौ रूपये देते हुए कहा की आप काफी प्रसिद्ध व्यक्ति हो आप अपने नाम की पांच सौ रुपयों की हुंडी लिख कर दे दो हम द्वारका में जा कर हुंडी ले लेंगे। पहले तो नरसिंह जी ने मना करते हुए कहा की मैं तो गरीब आदमी हूँ, मेरे पहचान का कोई सेठ नहीं जो तुम्हे द्वारका में हुंडी दे देगा, पर जब साधु नहीं माने तो उन्होंने कागज ला कर पांच सौ रूपये की हुंडी द्वारका में देने के लिये लिख दी और देने वाले (टिका) का नाम सांवल शाह लिख दिया।

(हुंडी एक तरह के आज के डिमांड ड्राफ्ट के जैसी होती थी। इससे रास्ते में धन के चोरी होने का खतरा कम हो जाता था। जिस स्थान के लिये हुंडी लिखी होती थी, उस स्थान पर जिस के नाम की हुंडी हो वह हुंडी लेने वाले को रकम दे देता था। )

द्वारका नगरी में पहुँचने पर संतों ने सब जगह पता किया लेकिन कहीं भी सांवल शाह नहीं मिले। सब कहने लगे की अब यह हुंडी तुम नरसीला से हि लेना।
उधर नरसिंह जी ने उन पांच सौ रुपयों का सामान लाकर भंडारा देना शुरू कर दिया। जब सारा भंडारा हो गया तो अंत में एक वृद्ध संत भोजन के लिये आए। नरसिंह जी की पत्नी ने जो सारे बर्तन खाली किये और जो आटा बचा था उस की चार रोटियां बनाकर उस वृद्ध संत को खिलाई। जैसे ही उस संत ने रोटी खाई वैसे ही उधर द्वारका में भगवान ने सांवल शाह के रूप में प्रगट हो कर संतों को हुंडी दे दी।

आचार्य जी अन्न्देव की छोटी आरती में भी इस बात का प्रमाण देते हैं। जैसे
रोटी चार भारजा घाली, नरसीला की हुंडी झाली।

(भारजा – पत्नी, घाली- डाली, देना, झाली- हो गई)

सांवल शाह एक सेठ का भेष बनाकर संतों के सामने आए और भरे चौक में संतों को हुंडी के रूपये दिये। द्वारका के सभी सेठ देखते ही रह गये।

तीर्थ यात्रा की कथा
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एक समय नरसिंह और उनके भाई तीर्थ यात्रा पर जाते समय एक जंगल में से गुजर रहे थे। दोनों बहुत थक चुके थे और भूख भी बहुत लगी थी। कुछ दुरी पर एक गाँव दिखाई दिया। उस गाँव के कुछ लोग इन दोनों के पास आये और कहा की अगर आप कहें तो हम आप के लिये खाना ले आते हैं, पर लेकिन हम शुद्र (नीच) जाती के हैं। नरसिंह जी ने उन्हें कहा की सभी परमेश्वर की संतान हैं आप तो हरि के जन हैं मुझे आप का दिया भोजन खाने में कोई आपत्ति नहीं। नरसिंह ने खुशी से भोजन खाया लेकिन उनके भाई ने भोजन खाने से इनकार कार दिया। चलने से पहले नरसिंह जब गाँव वालों का धन्यवाद करने के लिये उठे तो उन्हें कहीं भी गाँव नजर नहीं आया।

नरसी जी ने गिरवी रखा मूंछ का बाल
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नरसी मेहता भगवान कृष्ण के महान भक्त थे। वे बहुत बड़े दानी भी थे और श्रीकृष्ण के नाम पर उन्होंने अपना सर्वस्व दान कर दिया। उनकी भक्ति के प्रताप से नानी बाई का मायरा भरने स्वयं श्रीकृष्ण को आना पड़ा। नरसी जी के जीवन पर आधारित एक कथा भी है, जो बताती है कि वे कितने बड़े दानवीर थे और सत्य के प्रति उनकी कैसी निष्ठा थी।

एक बार नरसीजी साधु-संतों के साथ किसी तीर्थस्थल के मंदिरों में दर्शन कर रहे थे। वे अपनी धन-संपत्ति दान कर चुके थे। अब भगवान का नाम ही उनकी सबसे बड़ी संपत्ति था।

मंदिर से बाहर आते ही उन्हें याचकों ने घेर लिया और धन-भोजन आदि मांगने लगे। पास में एक पैसा नहीं और यहां याचकों की भीड़ लगी थी! किसे क्या दें? नरसीजी चिंतित हो गए। तभी उन्हें एक उपाय सूझा।

धन नहीं है तो क्या हुआ? अब भी उनके पास गिरवी रखने योग्य एक वस्तु थी। उनका मानना था कि पुरुष की मूंछ भी उसकी प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान का प्रतीक होती हैं। इसलिए वे एक साहूकार के पास गए और अपनी मूंछ का एक बाल गिरवी रख आए।

साहूकार ने इसके बदले उन्हें धन दे दिया और नरसीजी ने वह संपूर्ण धन याचकों को दान कर दिया। यह दृश्य नरसीजी के नगर का एक व्यक्ति भी देख रहा था। उसने सोचा, क्यों न मैं भी नरसी की तरह अपना एक बाल गिरवी रख दूं और काफी धन हासिल कर लूं!

वह साहूकार के पास गया और बोला, मेरी मूंछ का एक बाल गिरवी रखकर मुझे भी उतनी उतना दे दीजिए जितना आपने नरसी को दिया है।

साहूकार ने कहा, ठीक है आप मूंछ का बाल दीजिए। अभी आपको धन दे दूंगा।

उस व्यक्ति ने मूंछ का बाल दिया, लेकिन साहूकार बोला- यह तो सीधा नहीं है। कोई और बाल दीजिए।
वह व्यक्ति एक के बाद एक बाल उखाड़कर देता रहा लेकिन साहूकार हर बार कोई खोट निकाल देता। आखिरकार उसका धैर्य जवाब दे गया।

वह बोला- आपको मेरी उस पीड़ा की परवाह नहीं जो मूंछ का बाल उखाड़ने से मुझे हो रही है। हर बार नया बाल उखाड़ने से मेरी आंखों में आंसू भी आ गए लेकिन आप मेरा कष्ट नहीं समझ सकते।

साहूकार बोला- भाई, तुम्हारी मूंछ का बाल इस योग्य नहीं कि उसे गिरवी रखकर एक कौड़ी भी दी जाए। मैंने नरसी को भी इसी तरह परखा था, हर बाल में कोई कमी निकाल देता, लेकिन न जाने वह किस मिट्टी से बना मानव था!

उसकी आंखों में आंसू आ गए परंतु वह अपने संकल्प से नहीं डिगा। उसके लिए दीन-दुखियों के आंसू ज्यादा मूल्यवान थे। इसीलिए मैंने उसकी मूंछ के सिर्फ एक बाल के लिए काफी धन दे दिया और वह उसने मेरी आंखों के सामने दान कर दिया। ऐसे भक्त को साहूकार तो क्या भगवान भी कभी मना नहीं कर सकता।

भक्त नरसी की ऐसी दानशीलता के बारे में जानकर उस व्यक्ति की आंखें खुल गईं। वह नरसीजी की महानता और साहूकार की सूझबूझ को प्रणाम कर वहां से चला गया।
साभार~

आपने चित्त स्थिर होनेका उपाय पूछा, सो ठीक है। चित्त स्थिर करनेके कुछ उपाय नीचे लिखे जाते हैं। जो उपाय जैचे, उसे काममें ल...
20/11/2025

आपने चित्त स्थिर होनेका उपाय पूछा, सो ठीक है। चित्त स्थिर करनेके कुछ उपाय नीचे लिखे जाते हैं। जो उपाय जैचे, उसे काममें लाना चाहिये।

() यदि आप एक भी उपायको कटिबद्ध होकर काममें लायेंगे तो उससे बड़ा लाभ हो सकता है। उपाय ये हैं-

(1) जहाँ-जहाँ चित्त जाय, वहाँ-वहाँसे उसको हटाकर भगवान्में लगाना चाहिये।

(2) जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँ मनसे भगवान्‌का नाम बाँचना चाहिये। सर्वत्र भगवान्‌का नाम लिखा हुआ देखना चाहिये। जिस प्रकार हनुमान्जीने प्रत्येक वस्तुमें भगवन्नाम देखा था, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यके रोम-रोममें, प्रत्येक वस्तुके अणु-अणुमें भूषणमें रलकी तरह भगवान्‌के नामको जड़ा हुआ देखनेकी चेष्टा करनी चाहिये। ऐसा अभ्यास करनेसे मन स्थिर हो सकता है।

(3) जहाँ-जहाँ मनकी गति हो, वहाँ-वहाँ गोपियोंकी तरह भगवान्‌की मनोमोहिनी मूर्तिको देखना चाहिये। अपने मनको दृढ़तापूर्वक यह समझा देना चाहिये कि मेरे इष्टदेव सर्वत्र है, जहाँ भी जाओगे वहीं तुम्हें उनके दर्शन होंगे। ऐसा अभ्यास करनेसे आप-से-आप मन स्थिर हो जायगा।

(4) जहाँ-जहाँ जो कुछ भासता है, वह सब नाशवान् है ऐसा समझना चाहिये। प्रतिक्षण मनके द्वारा इस बातका चिन्तन करना चाहिये कि संसारकी समस्त वस्तुएँ क्षणभङ्गुर है, केवल सच्चिदानन्दधन श्रीनारायणदेव ही सत्तावान् हैं और वे सर्वत्र व्याप्त हैं।

(5) श्वास बाहर आनेपर उसे बाहर ही रोककर हृदयमें स्थित सुषुम्ना नाड़ीमें राम-नामका जप सुनना चाहिये। उसको सुननेका अभ्यास करनेसे राम-नामके जपका अनुभव होने लगेगा। फिर उसका ध्यान होने लगेगा और इस प्रकार मन स्थिर हो जायगा। श्वास रोकते समय इसका ध्यान रखना चाहिये कि शक्तिसे अधिक श्वास न रोका जाय।

(6) जोर-जोरसे भगवत्रामका कीर्तन करना चाहिये। उसका ऐसा अभ्यास करना चाहिये कि कीर्तनका तार न टूटने पावे।

और भी बहुत-से उपाय है। आप इन उपायोंका अभ्यास करके देख लीजिये। जो अनुकूल पड़े, उसीका अभ्यास करनेसे ठीक रहेगा। पहले-पहल अभ्यास करनेवालेके लिये दूसरे तीसरे नम्बरके उपाय ठीक हैं।

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