श्री भक्तमाल

श्री भक्तमाल भक्त, भक्ति ,भगवंत , गुरु चतुर नाम वपु एक
इनके पद वंदन किये , नाशै विघ्न अनेक

श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमाजैमिनिजी कहते हैं- तदन...
16/07/2026

श्रीजगन्नाथजीकी रथयात्रा, गुण्डिचा-महोत्सव तथा पुनः मन्दिरप्रवेश सम्बन्धी यात्रा एवं उत्सवकी महिमा

जैमिनिजी कहते हैं- तदनन्तर श्रद्धासे युक्त प्रस्तुत किये हुए उपचारोंद्वारा बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राजीका पूजन करे। उसके बाद जैसे पहले मन्दिरसे ले आते समय उत्सव किया गया था, उसी प्रकार महान् उत्सव करके उन सब भगवत्स्वरूपोंको पुनः दक्षिणाभिमुख ले जाय।

*उस समय जो मनुष्य दक्षिणाभिमुख जाते हुए श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राका दर्शन करता है, वह स्नान-दर्शनजनित समस्त पुण्य-फलको प्राप्त करता है।*

मन्दिरके समीप पहुँचनेपर बलभद्र और सुभद्राके साथ जगन्नाथजीकी आरती उतारकर मन्दिरके भीतर प्रवेश करावे और फिर किसी प्रकार उन्हें न देखे।

ज्येष्ठ मासके शुक्लपक्षमें जो पूर्णिमा आती है, उसमें ज्येष्ठा नक्षत्रके एक ही अंशमें चन्द्रमा और बृहस्पति हों, बृहस्पतिका ही दिन हो और शुभ योग भी हो तो वह महाज्येष्ठी पूर्णिमा कहलाती है, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है।

महाज्येष्ठी पूर्णिमा महापुण्यमयी तथा भगवान्‌की प्रीतिको बढ़ानेवाली है। उसमें करुणासिन्धु देवेश्वर जगन्नाथजीका पूजन और उनके स्नानका दर्शन करके मनुष्य पापराशिसे मुक्त हो जाता है।

वैशाखके शुक्लपक्षमें जो पापनाशिनी तीज आती है, उसमें रोहिणी नक्षत्रका योग होनेपर राजा पवित्रभावसे संकल्पपूर्वक एक आचार्यका वरण करे। फिर जिन्होंने काष्ठ कर्म देखा और जाना हो, ऐसे एक या तीन बढ़इयोंसे पूर्वोक्त प्रकारसे श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीके लिये तीन रथ तैयार करावे, जिनमें बैठनेके लिये सुन्दर आसन हों और जो सुन्दर कलापूर्ण ढंगसे बनाये गये हों। रथोंका निर्माण हो जानेपर राजा शास्त्रोक्त विधिसे मन्त्रके अनुसार पूर्ववत् उनकी प्रतिष्ठा करे। मार्गका भलीभाँति संस्कार करावे। मार्गके दोनों ओर फूलोंके गुच्छे, माल्य, सुन्दर वस्त्र, चॅवर, गुल्मलता आदि और फूलोंके द्वारा मण्डल बनावे। देखनेपर ऐसा मालूम हो कि वहाँ सुन्दर फूलोंसे सुशोभित वन-पंक्ति शोभा पा रही है। रास्तेकी भूमि बराबर कर देनी चाहिये। वहाँ कीचड़ नहीं रहना चाहिये, जिससे भगवान्‌का रथ सुखपूर्वक चल सके। पग-पगपर रास्तेके दोनों पार्थोंमें दिशाओंको सुगन्धित करनेवाले धूपपात्र रखे जायँ। सड़कपर चन्दनके जलका छिड़काव हो। नगाड़ा और ढक्का आदि बाजे बजाये जायें। सोने-चाँदीके ध्वज, जिनके बीचमें चित्रकारी की गयी हो, लगाये जायँ और उनपर पताकाएँ फहराती रहें। भूमिपर बहुत-सी वैजयन्ती मालाएँ बिछी हों।अनेकों कसे कसाये हाथी घोड़े प्रस्तुत किये जायें, जिनका भलीभाँति श्रृंगार किया गया हो। इस प्रकार सामग्री एकत्र करके उत्तम भक्तिसे युक्त राजा महान् उत्सव करे।

आषाढ़के शुक्लपक्षमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त द्वितीया तिथि आनेपर उसमें अरुणोदयके समय भगवान्‌की पूजा करे। ब्राह्मणों, वैष्णवों, तपस्वी और यतियोंके साथ स्वयं भी हाथ जोड़कर राजा देवाधिदेव भगवान्से यात्राके लिये निवेदन करे -'प्रभो ! आपने पूर्वकालमें राजा इन्द्रद्युम्नको जैसी आज्ञा दी है उसके अनुसार रथसे गुण्डिचामण्डपके प्रति विजययात्रा कीजिये। आपकी कृपा कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे दसों दिशाएँ पवित्र हों तथा स्थावर जंगम समस्त प्राणी कल्याणको प्राप्त हों। आपने यह अवतार लोगोंके ऊपर दयाकी इच्छासे ग्रहण किया है। इसलिये भगवन् ! आप प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीपर चरण रखकर पधारिये।'

पुण्डरीकाक्ष०' इत्यादि मन्त्रका उच्च स्वरसे जप करें। सूत, मागध आदि हर्षमें इसके बाद कुछ लोग मंगलगीत गावें। कोई जय-जयकार करें और 'जितं ते भरकर भगवान्के पवित्र यशका गान करें। भगवान्‌के दोनों पार्श्वमें सुवर्णमय दण्डसे सुशोभित व्यजनोंकी पंक्ति धीरे-धीरे डुलती रहे। कृष्णागरुकी धूपसे सम्पूर्ण दिशाएँ और वहाँका आकाश सुवासित रहे। झाँझ, करताल, वेणु, वीणा, माधुरिका आदि वाद्य गोविन्दकी इस विजययात्राके समय मधुर स्वरसे बजते रहें। इस प्रकार उत्सव आरम्भ होनेपर बलभद्र, श्रीकृष्ण और सुभद्राको ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लोग धीरे-धीरे पैर रखते हुए ले जायें। बीच-बीचमें रूईदार बिछौनोंपर उन्हें विश्राम करावें और इस प्रकार उन सबको रथपर ले जायें। फिर उस उत्तम रथको घुमाकर बलभद्र, कृष्ण तथा सुभद्राको सुन्दर चंदोवायुक्त मण्डपसे सुशोभित रथमें विराजमान करें। उन सबको रूईदार गद्दोंपर बैठाकर भक्तिपूर्वक भाँति-भाँतिके वस्त्र, आभूषण और मालाओंसे विभूषित करें। नाना प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा भी करें।

उस समय रथपर विराजमान होकर यात्रा करते हुए श्रीजगन्नाथजीका जो लोग भक्तिपूर्वक दर्शन करते हैं, उनका भगवान्के धाममें निवास होता है। भगवान् श्रीहरिके उस उत्सवका माहात्म्य क्या बतलाऊँ। जिनके नामका संकीर्तन करनेमात्रसे सौ जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है, रथमें स्थित हो महावेदीकी ओर जाते हुए उन पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्राजीका दर्शन करके मनुष्य अपने करोड़ों जन्मोंके पापोंका नाश कर लेता है। मेघोंके द्वारा जलकी वर्षाके संयोगसे रथका मार्ग जब कीचड़युक्त हो जाता है, उस समय भी वह श्रीकृष्णकी दिव्यदृष्टि पड़नेसे समस्त पापोंका नाश करनेवाला होता है। उस पंकिल रथमार्गमें जो उत्तम वैष्णव भगवान्‌को साष्टांग प्रणाम करते हैं, वे अनादिकालसे अपने ऊपर चढ़े हुए पापपंकको त्याग कर मुक्त हो जाते हैं। जो भगवान् वासुदेवके आगे जय शब्दका उच्चारण करते हुए स्तुति करते हैं, वे भाँति-भाँतिके पापोंपर निःसन्देह विजय पा जाते हैं। जो श्रेष्ठपुरुष वहाँ नृत्य करते और गाते हैं, वे उत्तम वैष्णवोंके संसर्गसे मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। जो भगवान्‌के नामोंका कीर्तन करता हुआ उस यात्रामें साथ-साथ जाता है तथा गुण्डिचा नगरको जाते हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर भक्तिपूर्वक 'जय कृष्ण, जय कृष्ण, जय कृष्ण' का उच्चारण करता है, वह माताके गर्भमें निवास करनेका दुःख कभी नहीं भोगता। जो मनुष्य रथके आगे खड़ा होकर चूँवर, व्यजन, फूलके गुच्छों अथवा वस्त्रोंसे भगवान् पुरुषोत्तमको हवा करता है, वह ब्रह्मलोकमें जाकर मोक्ष पाता है। जो पवित्र सहस्रनामका पाठ करते हुए रथकी प्रदक्षिणा करते हैं, वे भगवान् विष्णुके समान होकर वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं। जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके उद्देश्यसे दान देता है, उसका वह थोड़ा भी दान मेरुदानके समान अक्षय फल देनेवाला होता है। जो भगवान्के आगे रहकर उनके मुखारविन्दका दर्शन करते हुए पग-पगपर प्रणाम करते हैं और मार्गकी धूलि या कीचड़में लोटते हैं, वे क्षणभरमें मुक्तिरूपी फलको पाकर श्रीविष्णुके उत्तम धाममें जाते हैं।

इस प्रकार बलभद्र और सुभद्राके साथ भगवान् श्रीकृष्ण उत्तम रथपर विराजमान हो चारों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए और अपने अंगोंका स्पर्श करके बहनेवाली वायुके द्वारा समस्त देहधारियोंके पापोंका नाश करते हुए यात्रा करते हैं।

–‘संक्षिप्त स्कंदपुराण वैष्णव खण्ड’ गीताप्रेस गोरखपुर की पुस्तकसे साभार

।। जय श्री राम।।         गुरु पद पंकज सेवा।        तीसरि भक्ति अमान।।श्री राम जी शबरी माता को तीसरी भक्ति का वर्णन सुनात...
17/04/2026

।। जय श्री राम।।
गुरु पद पंकज सेवा।
तीसरि भक्ति अमान।।

श्री राम जी शबरी माता को तीसरी भक्ति का वर्णन सुनाते हैं। गुरुदेव के चरणों में निष्कपट प्रेम होना गुरु देव के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होना यही तीसरी भक्ति है।(गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भक्ति अमान )

गुरु देव के वचनों पर विश्वास रखना वाला
भक्त वहस में नहीं उलझता है ,उसे तो अपने गुरुदेव के वचनों पर पूर्ण विश्वास होता है।संत कहते हैं समाज में अधिकांश होता यही है। कई लोग होते हैं जो तरह तरह की बातें करके व्यक्ति के मन में संदेह पैदा कर देते हैं।

साधक को चाहिए कि अपने गुरुदेव के द्वारा जो सीख जो मंत्र उसे दिया गया है उसके प्रति सच्ची निष्ठा और भक्ति के साथ पूर्ण श्रद्धा होना चाहिए।माता पार्वती को जब उनके गुरुदेव नारद जी ने यह उपदेश दिया कि तुम भगवान शिव को वर के रूप में पाने के लिए तपस्या करो।

माता पार्वती ने पूर्ण श्रद्धा से भगवान शिव की आराधना की सप्त ऋषियों ने माता पार्वती को अनेक प्रकार का प्रलोभन दिया कि हम तुम्हारा विवाह भगवान विष्णु से करा देंगे जो कि तीनों
लोकों के स्वामी हैं,तुम नारद जी के बह कावे में आकर क्यों व्यर्थ में शिव जी के
लिए तपस्या कर रही हो शिवजी के पास क्या है कुछ भी नहीं।

माता पार्वती ने सप्तर्षियों से यही कहा मुनि वरों आप अपना काम करो जगत में
और भी अनेक विवाह योग्य वर कन्या है
तुम जाकर उनका विवाह कराओ। माता
पार्वती अपने पथ से विचलित नहीं हुई।

दीक्षा प्राप्त व्यक्ति के पास भी अनेक लोग आकर उन्हें ज्ञान देते हैं कि तुम्हारा यह मार्ग ठीक नहीं है तुम हमारे साथ चलो। जिन लोगों को अपने गुरुदेव के वचनों पर भरोसा नहीं होता है वह लोग भ्रमित होकर अपना मार्ग बदल लेते हैं।

पहले वाला मार्ग छोड़ देते हैं और दूसरा मार्ग उन्हें मिलता नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कहीं के नहीं रहते हैं। अपने गुरुदेव के वचनों पर पूर्ण श्रद्धा होना चाहिए। गुरुदेव के वचनों को ब्रह्म वाक्य मानना चाहिए। कपट रखने वालों की क्या स्थिति होती है यह उदाहरण काग भुशुण्डि जी ने अपने अनुभव के आधार पर पक्षी राज गरुड़ जी को सुनाया। जिसका वर्णन मानस के उत्तर कांड में मिलता है।

कागभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को अपनी कहानी सुनाई की मैं विपत्ति का मारा हुआ एक बार उज्जैन नगरी गया। वहां
रहकर मैंने भगवान शंकर की आराधना की।वहीं पर एक ब्राह्मण देवता वेद विधि से सदा भगवान शिव की पूजा करते थे।

ब्राह्मण देवता बड़े दयालु थे, मुझ पर उनको दया आई अपने पास रख लिया।
और पुत्र की भांति मुझसे स्नेह रखते थे।
पुत्र की भांति जानकर मुझे पढ़ाते थे।
गुरुदेव के द्वारा दिए गए मंत्रों का मैं
उच्चारण करता मेरे हृदय में अहंकार बढ़ गया। मुझे लगने लगा मैं भी ज्ञानी हो गया हूं। मेरे गुरु जी मेरे इस भाव को पहचान गए उन्होंने मुझे बहुत समझाया।

कागभुशुण्डि जी कहते हैं मेरा अभिमान बड़ा हुआ था गुरुजी मेरे व्यवहार से दुखी तो थे पर गुरु जी को कभी क्रोध नहीं आता था। मैं उनकी बातों का विरोध करता पर गुरुजी मुझे बार-बार ज्ञान की ही शिक्षा देते थे यह गुरु की महानता थी।

मेरा अहंकार इतना बढ़ गया कि मैं गुरु जी को कुछ नहीं समझता था। गुरुजी वृद्धावस्था में थे उनकी वाणी भी थक चुकी थी। मैं तरुण था इसलिए मेरी वाणी भी मधुर थी लोग मेरी वाणी सुनकर बड़े प्रभावित होते थे।

काग भूसुंडी जी कहते हैं गरुड जी मेरा अज्ञान इतना हावी हो गया कि मुझे लगने लगा कि गुरु जी कुछ नहीं जानते हैं मैं गुरु जी से आगे निकल चुका हूं।सब लोग मुझे गुरुजी से भी अधिक समझने लगे हैं
मेरे मन में यह अभिमान आ गया।

देखो श्री राम जी ने सबरी माता को उपदेश दिया है उसमें यही बात कही है कि शिष्य को अपने मन में सम्मान की मान की इच्छा नहीं रखना चाहिए। बिना
मान सम्मानकी इच्छा रखते हुए निष्कपट प्रेम रखना चाहिए।पर कागभुशुण्डि जी कह रहे हैं कि मैं सम्मान पाकर प्रशन्न होने लगा।

एक बार तो गजब ही हो गया। मैं भगवान शिव के मंदिर में बैठकर शिव नाम जप रहा था। मैंने देखा कि गुरुजी आ रहे हैं उठकर प्रणाम करना पड़ेगा इसलिए अपने नेत्र बंद कर लिए ताकि गुरुजी को लगे की ध्यान में बैठा हुआ है। मैंने अपने
गुरुजी के साथ यह कपट किया।

मेरे इस कृत्य को देखकर गुरु जी को तो क्रौध नहीं आया क्योंकि गुरुजी दयालु थे
पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा अपमान है। भगवान शंकर मेरे इस कृत्य को सहन नहीं कर पाए।

मंदिर में आकाशवाणी हुई अरे हतभग्य
मूर्ख अभिमानी, तेरे गुरु को क्रोध नहीं आया क्योंकि उन्हें ज्ञान है।पर मैं तुझे दण्ड दूंगा। यदि मैं तुझे दण्ड नहीं देता हूं तो वेद मार्ग ही भ्रष्ट हो जाएगा। तूने आज
अपने गुरु का अपमान किया है।

आकाशवाणी ने कहा रे मूर्ख तू अपने गुरु के आगमन पर भी अजगर की भांति बैठा रहा अपने गुरु का जरा भी सम्मान नहीं किया जा तेरा जन्म अब अजगर योनि में ही होगा। किसी पेड़ के खोखले में जाकर रहना तेरी यही सजा है।

श्री तुलसीदास जी महाराज वर्णन करते हुए कहते हैं आकाशवाणी सुनकर गुरु जी ने हाहाकार किया। दंडवत प्रणाम करते हुए गुरुदेव भगवान शिव के चरणों में गिर गए और विनती करने लगे। है शम्भु इस बालक को क्षमा कर दीजिए।

यह अज्ञानी जीव आपकी माया के वशीभूत होकर आपकी महिमा को जान नहीं पाया। इस पर क्रौध न कीजिए कुछ
ऐसी कृपा कीजिए कि कुछ ही समय में यह श्राप से मुक्त हो जाए। गुरुदेव की प्रार्थना पर फिर से आकाश वाणी हुई
एवमस्तु ऐसा ही हो।

संत व्याख्या करते हुए कहते हैं कि गुरु देव की कृपा की यह महिमा है।आज के समय में गुरु जी की जगह कोई और होता तो यही कहता भगवान आपने जो किया अच्छा किया इसे ऐसी ही सजा मिलना थी यह है ही इसी लायक पर गुरु तो गुरु होता है।

कागभुशुण्डि जी ने आगे वर्णन किया कि
मुझे श्राप तो मिला पर मैं गुरु देव की प्रार्थना के प्रभाव से शीघ्र ही श्राप से मुक्त हो गया। मुझे शरीर छोड़ने में भी कोई परेशानी नहीं आई। जन्म का और मरण का कोई दुख नहीं होता था सब दुख मिट गए।

गरुड़ जी ने पूछा क्या तुम्हें कोई दुख नहीं रहा। कागभुशुण्डि जी कहते हैं एक दुख आज भी है । कौनसा? कागभुशुण्डि जी ने कहा गुरु जी का कोमल स्वभाव जिनका मैंने अपमान किया था वह दुःख
आज भी मुझे सूल की भांति चुभा करता है।

इस कथा में मुख्य बात क्या है? गुरुदेव के अपमान का फल क्या मिला? इसीलिए शंकर भगवान भी यही कहते हैं कि मेरा भक्त वही जो गुरु का सम्मान करें
जो गुरु का सम्मान नहीं करें वह मेरा भक्त नहीं है । भले ही मेरे मंदिर में बैठकर मेरा नाम ले पर मुझसे वरदान नहीं मुझसे श्राप ही मिलेगा।

तो शंकर जी का भी यही कहना है कि जो गुरु का भक्त वह मेरा भक्त और श्री राम जी भी यही कहते हैं जो गुरुदेव का भक्त वह मेरा भक्त । इसीलिए श्री राम जी कहते हैं शबरी माता तीसरी भक्ति है
गुरु पद पंकज सेवा।
तीसरी भक्ति अमान।।

इस तरह भगवान ने शबरी माता को तीसरी भक्ति का उपदेश दिया।अब चौथी
भक्ति का वर्णन आता है, चौथि भगति मम गुन गन करहि कपट तजि गान इसका वर्णन अगली पोस्ट में।। जय श्री राम।।

।। जय श्री राम।।प्रथम भक्ति संतन कर संगा।दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।भगवान की यह दूसरी भक्ति इसमें भी बड़ी सुंदर बात है भग...
17/04/2026

।। जय श्री राम।।
प्रथम भक्ति संतन कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

भगवान की यह दूसरी भक्ति इसमें भी बड़ी सुंदर बात है भगवान की कथा में रति तो हो पर कामना न हो।रति का पति काम है, और जहां रति होगी वहां काम तो होगा।कामना के कारण ही रति होती है पर कहा गया है की कथा में रती तो हो पर काम नहीं होना चाहिए।

जिनके श्रवण समुद्र समाना।
कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।।
भरहि निरंतर होहिं न पूरे।
तिन्ह के हियं तुम्ह कहुं गृह रुरे।।

भगवान की कथा सुनने में जिनके कान समुद्र के समान हो जाए, जिस प्रकार समुद्र में नदियां समाती जाती है समाती जाती है, पर समुद्र कभी भरता नहीं है।
इसी प्रकार भगवान की कथा सुनते जाएं सुनते जाएं ऐसी मन में रती होना चाहिए।
कि भगवान की कथा सुनते सुनते कभी मन तृप्त न हो इसी को भगवान की कथा में रति होना कहा गया है।

भगवानकी कथा में रति किस प्रकार होना चाहिए महात्मा जी एक भक्त की कथा सुनाते हैं।हजारीबाग जिलेके एक गांव में ब्राह्मण वंशमें एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया राम टहल पांडे, घर में बड़ी खुशियां मनाई गई जन्म के कुछ समय पश्चात माता पिता दोनों चल बसे।

भाई भोजाई ने उस बालक का लालन पालन किया। चेचक निकली चेचक में उसके दोनों नेत्र चले गए ।दुर्भाग्य ने फिर भी पीछा नहीं छोड़ा कुछ दिन बाद भाई भी चला गया अब विधवा भाभी और रामटहल पांडे दोनों ही रह गए।

घर में गरीबी आई तो रिश्तेदारों ने भी मुंह मोड़ लिया।परिस्थिति अनुकूल थी तब तक तो लोग उन्हें पांडे जी कहते थे पर परिस्थिति प्रतिकूल होते ही लोग उन्हें टहलवा कहने लगे।

रामटहल पांडे पर भगवान की ऐसी कृपा थी कि भगवान की कथा सुनने का उन्हें व्यसन हो गया भगवान की कथा के प्रति उन्हें रति हो गई।श्रीमद् भागवत की कथा हो रही थी व्यास जी कथा करते थे ।पांडे जी भी कथा में जाते बैठकर भगवान की कथा सुनते और प्रभु प्रेम में आंसू बहाते थे ।

कथा श्रवण करने के पश्चात एक दिन पांडे जी ने व्यास जी से कहा मुझे आपके साथ रख लो मुझसे जितनी बनेगी उतनी आपकी सेवा करता रहूंगा। अंधा आदमी हूं,पर फिर भी मैं आपके कपड़े धो दिया करूंगा और छोटा मोटा काम कर दिया करुंगा।मुझे आपकी कथा सुनने को मिलती रहेगी।

व्यासजी ने कहा पांडेजी आप तो भगवान की कथा सुनते रहो सेवा करने वाले तो और भी बहुत से लोग हैं, वह सेवा करेंगे।गांवसे चार मील दूर कथा हो रही थी पांडे जी सुबह ही पहुंच जाते थे। एक दिन बड़ी भयंकर गर्जना हुई और पानी बरसने लगा

पांडे जी की भाभी ने सोचा आज शायद देवर कथा में नहीं जाएंगे, इसलिए भोजन नहीं बनाया। रामटहल पांडे तैयार होकर आ गए भाभी से पूंछा भाभी भोजन तैयार हो गया?।भाभी ने कहा आज भोजन नहीं बनाया मैंने सोचा आप आज जाओगे नहीं पानी गिर रहा है।

पांडे जी रूठ कर चल दिए लाठी हाथ में चार मील दूर गांव था रास्ता भटक गए एक कुंए में गिर गए।अब पांडे जी मन ही मन भगवान से कहते हैं। भगवान मैंने आज तक तुमसे कभी शिकायत नहीं की।

तुमने मेरे माता-पिता छीन लिए भाई छीन लिया गरीबी दे दी मुझे कोई शिकायत नहीं है।पर आज आपसे शिकायत है आज आपने मुझसे आपकी कथा भी छीन ली इस तरह कह कर रोने लगे।

अपने भक्त के भाव को देखकर भगवान एक साधारण व्यक्ति के रूप में प्रकट हो गए और कहा ।अरे पांडे जी आप कुंए में कैसे गिर गए?। मेरा हाथ पकड़ो मैं तुम्हें बाहर निकाल दूंगा।

राम टहल पांडे ने कहा मैं अंधा आदमी हूं मुझे आपका हाथ दिखाई नहीं दे रहा है, पर आपको तो मेरा हाथ दिखाई दे रहा है आप ही मेरा हाथ पकड़ लो पर तुम्हें रस्सी की जरूरत तो पड़ेगी यह कुआ है।

भगवान ने कहा कुआं नहीं यह तो एक गड्ढा है लाओ आपका हाथ मुझे दो।भगवान ने हाथ पकड़ कर पांडे जी को बाहर निकाल लिया और उनके हाथ में पुष्प देते हुए कहा आप मेरी और से यह पुष्प कथा में चढ़ा देना।

पांडे जी ने कहा भाई आप कथा में नहीं चलोगे?। भगवान ने कहा अभी कथा प्रारंभ नहीं हुई है, व्यास जी का स्वास्थ्य गड़बड़ हो गया है इसलिए कथा देर से प्रारंभ होगी। पांडे जी ने कहा सायद हमारे लिए ही कथा लेट हुई है।

भगवान ने कहा मैं श्रोताओं को बुलाने जा रहा हूं। राम टहल पांडे के पहुंचने से पहले ही उनकी भाभी भोजन लेकर कथा पांडाल में पहुंच गई भोजन रख दिया। व्यास जी व्यास पीठ पर आकर बैठे तब तक पांडे जी भी वहां पहुंच गए।

व्यास जी ने कहा भैया पहले भोजन कर लो आपकी भाभी भोजन रख कर गई है।
मेरे लिए भी एक पान लेकर आई थी मैंने पान खाया मैं अब बिल्कुल स्वस्थ हो गया हूं।पांडे जी ने बताया कि मैं गड्ढे में गिर गया था किसी दयालु व्यक्ति ने मुझे बाहर निकाला है।पांडे जी ने भी भोजन किया।

कथा समाप्ति के बाद राम टहल पांडे बर्तन लेकर भाभी के पास गए और कहा भाभी मुझे क्षमा कर दो मैं कथा में लेट हो रहा था इसलिए थोड़ा क्रौधित हो गया था
तुम नहीं जाती तो मुझे बड़ी कठिनाई होती मैं भूखा रहता।

भाभी बोली मैं तो कहीं गई ही नहीं। दूसरे
दिन पांडे जी ने आकर व्यास जी से कहा कि कल कथा में हमारी भाभी तो आई ही नहीं थी फिर हमारे लिए भोजन लेकर कौन आया था?।

व्यास जी की आंखें सजल हो गई। व्यास जी ने कहा वह परमात्मा ही हो सकता है जिन्होंने मुझे पान खिलाकर स्वास्थ्य कर दिया और भाभी का रूप बनाकर तुम्हें भोजन करा गया।

ऐसे दयालु प्रभु अपने भक्तों के कारण किसी भी रूप में आकर उनकी सहायता कर देते हैं।शबरी माता से भगवान कहते हैं जिन्हें मेरी कथा में रति हो ऐसे भक्तों के मैं वश में रहता है।

संत कहते हैं भगवान की कथा यदि सुनने को न भी मिले यदि मन में यह चिंतन बना
रहे हैं कि भगवान की ऐसी कृपा हो जाए कि मुझे भगवान को कथा श्रवण करने का अवसर मिल जाए तो भगवान की कथा के प्रति चिंतन भी कल्याण कर देता है।

भगवान शबरी माता से कहते हैं यह मेरी दूसरी भक्ति है।(दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ) आगे तीसरी भक्ति का वर्णन है
(गुरु पद पंकज सेवा।) इसे हम अगले प्रसंग में पढ़ेंगे।।जय श्री राम।।

।। जय श्री राम।।केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी।अधम जाति मैं जड़ मति भारी।।शबरी माता हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ी है।क...
17/04/2026

।। जय श्री राम।।
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी।
अधम जाति मैं जड़ मति भारी।।

शबरी माता हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़ी है।कहती हैं प्रभु मैं तो नीच जाति की मूढ़ बुद्धि हूं मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करुं।मैं तो अधम से भी अधम हूं।

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउं एक भगति कर नाता।।

श्री राम जी शबरी माता से कहते हैं मैं तो केवल एक भक्ति का नाता मानता हूं।जाति पांति कुल धर्म मान बड़ाई धन बल
चतुराई सब कुछ जिसके पास है यदि उसके पास मेरी भक्ति नहीं है तो यह सब उसी तरह व्यर्थ है,जैसे बिना जल के बादल।

भगति हीन नर सोहइ कैसा।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।

भगवान श्री राम जी शबरी माता को अपनी नवधा भक्ति का उपदेश देते हुए कहते हैं, माता यह मेरी नौ प्रकार की भक्ति है ।तुम इसे ध्यान पूर्वक सुनो और अच्छी तरह इसे हृदय में धारण करो।

नवधा भगति कहउं तोहि पाहीं।
सावधान सुनु धरु मन माहीं।।

श्री राम जी पहली भक्ति का वर्णन करते हैं। क्या है पहली भक्ति? पहली भक्ति है संतो का संग।अब यहां ध्यान देने वाली बात है।दो शब्द आते हैं संगी और साथी
इन दोनों शब्दों में एक अंतर है।संग का सम्बन्ध मन से है।और साथी का सम्बन्ध तन से है।

(प्रथम भक्ति संतन करि संगा।। )

संगी और साथी यह दो अलग-अलग शब्द है। साथी बहुत से लोग हो सकते हैं, पर संगी कोई कोई ही होते हैं।संग कहते हैं आसक्ति को, और आसक्ति मन में होती है। जो मन से मिले उसे बोलते हैं संगी और जो तन से मिले उसे बोलते हैं साथी ।

तो संत का साथ नहीं संत का संग हो।
(प्रथम भक्ति संतन करि संगा )संत के साथ मन का संग हो। ऐसे तो संतो के साथ मच्छर भी रहते हैं,। संत के साथ रहने वाले संत का ही खून पीते हैं। प्रायः
ऐसे बहुत से लोग संत के साथ रहते हैं और कहते हैं हम संत के संग रहते हैं।

महापुरुष कहते हैं ऐसे लोग धोखे में ना रहे,। जो कहते हैं हम संत के संग हैं वह
संत के संग नहीं संत के साथ है संग नहीं है। संग उसे कहते हैं जिसके बिना रहा न जाए। जगत से जुड़ा हुआ संग संत से जुड़ जाए वह संग कहलाता है।

संत के संग से सब बात बन जाती है।संतो
के पास ऐसी युक्तियां होती है कि कल्याण होगा ही। एक परिवार वाले महात्मा जी के पास गए और कहा महाराज हमारा बेटा इसको किसी तरह समझाओ।

महात्मा ने कहा क्या हाल है तुम्हारे बेटे का इसे क्या समझाएं ?। परिवार वाले बोले महाराज कोई पाप ऐसा नहीं बचा जो इसने नहीं किया । नशा करता है जुएं खेलता है और भगवान का नाम तो कभी धोखे से भी नहीं लेता है कुछ ऐसा उपाय बता दो कि इसका कल्याण हो जाए।

संत ने कहा चलो ठीक है बुलाया उसको
वह लड़का संतों के पास आया और बोला
महाराज मैं जो कुछ करता हूं वह सब ठीक है। मैं जो कुछ भी करता हूं उसे छोड़ नहीं सकता, और आपकी कोई बात में मानूंगा नहीं।

संतों ने कहा कोई बात नहीं तुम्हें जो करना है सो करो पर क्या तुम हमसे मित्रता करोगे?। उसने कहा मेरे काम मे यदि तुम वाधा नहीं डालोगे तो मुझे मित्रता करने में कोई परेशानी नहीं है।

संत ने उसे अपना मित्र बना लिया।अब वह जो भी कुछ करता है उसे करने देते
कभी रोकते नहीं थे।संत एक दिन उसे साथ में लेकर वन में घूमने गए। संत ने कहा तुमसे हमारी मित्रता है तो हमारी एक बात मान लो।

वह बोला कौन सी बात?। संत ने कहा एक बार राम कहदो। वह बोला एक बार राम कहने से क्या होगा?। संत ने कहा होगा नहीं होगा वह मुझ पर छोड़ दो। उसने विचार किया एक बार राम कहने में क्या बिगड़ता है उसने कह दिया राम।

संत ने कहा बस बन गया काम अब एक काम करना,। इस नाम के बदले कोई कुछ मांगने को कहे तो कुछ मांगना मत।
कह देना नाम के बदले जो मिलने का हो वह मिल जाए बस।वह बोला ठीक है।
महात्मा ने परिवार वालों से कहा अब चिंता मत करो इसका कल्याण होगा महात्मा चले गए।

अब कुछ समय बाद उस व्यक्ति की मृत्यु हुई नरक में पहुंचा। यमराज ने कहा कि इसने जिंदगी भर पाप किए हैं केवल एक महात्मा के कहने से इसने एक बार राम कहा है। चित्रगुप्त जी ने कहा इससे पूछ लो की नाम के बदले में क्या चाहता है।
नाम के बदले जो कुछ मिलता हो इसे दे दो फिर तो इसे नरक भोगना ही है।

यमराज ने उससे पूछा कि बता नाम के बदले में क्या चाहता है?। अब उसे महात्मा जी के द्वारा कही गई बात याद आ गई की नाम के बदले यदि तुमसे कोई मांगने को कहे तो मांगना मत। उसने कहा मैं कुछ नहीं मांगूंगा नाम के बदले जो मिलता हो वह दे दो।।

नाम के बदले क्या मिलता है यह हिसाब किताब यमराज के यहां तो हो नहीं सकता। यमराज ने कहा हमारे यहां यह हिसाब नहीं होता है चलो ब्रह्मा जी के पास चलते हैं। यमराज जी उसको लेकर ब्रह्मा जी के पास गए।

ब्रह्मा जी ने कहा नाम का क्या फल है यह हिसाब तो हमारे यहां भी नहीं है। शंकर भगवान के पास चलो शंकर भगवान ही दिन रात भगवान का नाम जपते हैं। शायद उनको पता होगा। शंकर भगवान के पास गए तो शंकर भगवान ने भी यही कहा कि भगवान का नाम तो मैं लेता हूं पर एक नाम लेने का क्या फल है यह तो मैं भी नहीं जानता।

अब उन्होंने यह तय किया कि अब जिसका नाम है उसी के पास इसे लेकर चला जाए राम जी का नाम है राम जी के पास ही चल कर पूछते हैं कि आपका एक नाम लेने का क्या फल है। राम जी के पास गए और राम जी से पूछा कि आपके एक नाम लेने का फल क्या है।?

राम जी ने कहा नाम तो हमारा ही है लेकिन हमारे एक नाम लेने का फल क्या है यह तो मैं भी नहीं जानता। तो उन्होंने कहा फिर इसे फल क्या मिलना चाहिए?
भगवान ने कहा यह हमारे धाम में आ गया है इसलिए अब इसे यहीं रहने दो यही फल है।

संत का संग व्यक्ति का कल्याण करता है। जिन्होंने भी संतों की शरणागति स्वीकार की है उसका उद्धार हुआ है।इस तरह श्री राम जी ने शबरी माता को अपनी प्रथम भक्ति संतन करि संगा का
उपदेश दिया। अब दूसरी भक्ति का वर्णन आता है ।(दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ) इसका वर्णन अगली पोस्ट में।। जय श्री राम।।

।। जय श्री राम।।गुरु के बचन प्रतीति न जेही।सपनेहुं सुगम न सुख सिधि तेंही।।जिनको अपने गुरुदेव के वचनों पर विश्वास नहीं हो...
17/04/2026

।। जय श्री राम।।
गुरु के बचन प्रतीति न जेही।
सपनेहुं सुगम न सुख सिधि तेंही।।

जिनको अपने गुरुदेव के वचनों पर विश्वास नहीं होता है, उन्हें स्वप्न में भी सुख की प्राप्ति नहीं होती है, और ना ही सिद्धि प्राप्त होती है। सबरी माता को अपने गुरुदेव के वचनों पर पूर्ण विश्वास था। गुरुदेव कहकर गए हैं कि एक दिन राम जी तुम्हारी कुटिया में आयेंगे।

शबरी माता को यह तो विश्वास था कि राम जी आएंगे, किंतु यह नहीं पता था कि राम जी कब आएंगे।उन्हें लगता था हो सकता है आज ही आ जाएं,य आते ही होंगे।इसलिए प्रतिदिन रास्ता बुहारती है।

विचार करती है कि रास्ता तो बुहार दिया किंतु राम जी के चरण तो बहुत कोमल हैं कहीं राम जी के चरणों में कंकर न लग जाए कांटे ना चुभ जाए, इसलिए प्रतिदिन मार्ग में फूल बिछाती है।

फिर मन में विचार करती है कि मैं राम जी को बिठाऊंगी कहां?। बैठने के लिए केले के पत्तों का आसान बनाती है ,तुम्बी मैं जल भर कर रख देती है।दोने में मीठे मीठे फल चखचख कर रखती है।प्रतीक्षा करती है कि बस राम जी आते ही होंगे।

शबरी माता कुटिया के भीतर जातीहै,फिर मन में विचार आता है कि कहीं ऐसा ना हो मैं कुटिया में ही रह जाऊं और राम जी यहां आकर निकल जाए मैं उनके दर्शन ही नहीं कर पाऊं, इसलिए वह तुरंत कुटिया से बाहर आ जाती है। कभी भीतर जाती है कभी बाहर आती है।

शबरी माता का यह क्रम राम जी की प्रतीक्षा में कई वर्षों तक चलता रहा। 15 वर्ष की अवस्था से लेकर 85 वर्ष की अवस्था तक शबरी माता राम जी की प्रतीक्षा करती रही । कमर झुक गई थी आंखों से भी ठीक से दिखाई नहीं देता था।

पद्म पुराण के अनुसार शबरी माता ने
10000 वर्षों तक साधना करते हुए राम जी की प्रतीक्षा की। और एक दिन ऐसा आया कि राम जी शबरी माता की कुटिया के पास पहुंचे। रामजी के दर्शन के लिए वहां रह रहे साधु सन्यासी आए।

राम जी ने उन साधू सन्यासियों से पूंछा शबरी जी का आश्रम कहां है? महात्मा लोगों ने कहा वह पगली सबरी? उसे तो हम सब पागल कहते हैं ,।वह हमेशा पागलपन ही किया करती है। उससे तुम्हें क्या काम है? ।

राम जी ने कहा आप तो पता बता दीजिए वह हमारी माताजी है मुझे उनसे काम है। महात्मा लोगों को यह सुनकर बड़ाआश्चर्य होता है वह राम जी को शबरी माता के आश्रम का पता बताते हैं।

सबरी देखि राम गृहं आए।
मुनि के बचन समुझि जियं भाए।।

शबरी माता ने देखा कि राम जी आ रहे हैं। गुरुदेव ने जैसा राम जी का स्वरूप बताया था बिल्कुल राम जी वैसे ही है।
कमल के समान नेत्र विशाल भुजा सिर पर जटाओं का मुकुट हृदय पर वन माला
सांवले और गोरे शरीर के दोनों भाई शबरी जी के आश्रम की ओर आ रहे हैं।

शबरी माता मन में विचार करती है कि क्या मैं जाकर प्रभु के चरणों में लिपट जाऊ?। फिर मन में ख्याल आता है नहीं नहीं वह मुझसे अपरिचित है कहीं मुझे राक्षसी ना समझ लें,। कहीं मेरे कुरूप की परछांई उनके ऊपर ना पड़ जाए।

(प्रेम मगन मुख वचन ना आवा )

शबरी माता प्रेम में इतनी मग्न हो गई कि कुछ कह भी नहीं सकती और कुछ कर भी नहीं सकती।वह एक ही स्थान पर खड़ी हो गई। और विचार करने लगी कि
मैं इनकी मोहिनी छवि को अपने नेत्रों में बसा कर नेत्र बंद कर लेती हूं। शबरी जी ने कुछ समय ऐसा ही किया। फिर मन में विचार आया कि अब तक तो चले गए होंगे।

जैसे ही शबरी जी ने नेत्र खोले तो श्री राम जी लक्ष्मण जी उनके सामने खड़े थे।
शबरी जी तो दोनों भाइयों के दर्शन करके उनके चरणों में गिर गई, चरणों से लिपट गई। जल लेकर श्री राम जी लक्ष्मण जी के चरण धोए। फिर सुंदर आसन पर दोनों भाइयों को बैठाया ।

सादर जल ले चरण पखारे।
पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

शबरी माता ने स्वादिष्ट और रसीले कंदमूल फल लाकर श्री राम जी को दिए श्री राम जी ने बार-बार प्रशंसा करते हुए प्रेम सहित उन फलों को खाया श्री राम जी तृप्त हुए।

कंद मूल फल सुरस अति
दिए राम कहुं आनि
प्रेम सहित प्रभु खाए
बारंबार बखानि।।

श्री राम जी ने भोजन तो अनेक जगह किया कौशल्या माता के हाथ का भोजन भी किया, गुरु माता अरुंधति जी के हाथ का भोजन भी किया, ससुराल में सुनैना जी के हाथ का भोजन भी किया श्री
जानकी जी के हाथ का भोजन भी किया

पर जब सब ने श्री राम जी से भोजन की प्रशंसा के बारे मे पूंछा तो श्री राम जी ने
प्रशंसा तो सभी के यहां कि की पर कहा कि शबरी माता के भोजन से मैं बहुत तृप्त हुआ। स्वाद तो सब जगह था पर शबरी माता के भोजन का स्वाद निराला था वह स्वाद तो कभी जा ही नहीं सकता है।

तब तंह कहि
सबरी के फलन की
रुचि माधुरी न जाई।
जानत प्रीति नीति रघुराई।।

श्री राम जी आगे शबरी माता को नवधा भक्ति का उपदेश करते हैं। बड़ा सुंदर प्रसंग है। इसे अगले प्रसंग में अवश्य पढ़िए। जय श्री राम।।

।।जय श्री राम।।रामहि केवल प्रेम पिआरा।जानि लेउ कोई जाननिहारा।।माता शबरी को  तो बचपन से ही सभी से बड़ा प्रेम था चाहे कोई ...
17/04/2026

।।जय श्री राम।।
रामहि केवल प्रेम पिआरा।
जानि लेउ कोई जाननिहारा।।

माता शबरी को तो बचपन से ही सभी से बड़ा प्रेम था चाहे कोई जीव जंतु हो प्राणी हो य पशु पक्षी।और रामजी को तो केवल प्रेम ही प्यारा है रामहि केवल प्रेम पियारा।
माता शबरी बाल्यावस्था में ही पक्षियों से बातें किया करती थी,शबरीके माता पिता ने शबरी में अलौकिक प्रतिभा को देखा।

उनके माता-पिता ने कुछ वयस्क होने की अवस्था में, उनका विवाह किसी अपने समाज बिरादरी वाले युवक के साथ तय किया कि इसका विवाह हो जायेगा तो संसार में उलझ कर यह अपने संस्कारों में ढल जायेगी।

जैसा की भील जातियों में प्रथा होती है ।बारात का स्वागत भोजन में पशु पक्षी का मांस आदि परोसकर किया जाता है। इस उद्देश्य से शबरी के पिता ने पशु पक्षियों को एकत्रित करके रखा कि विवाह में बारातियों के स्वागत के लिए इन पशु पक्षियों का उपयोग किया जाएगा ।

माता शबरी का विवाह तय हुआ। शबरी की माता अपनी पुत्री को दुल्हन के रूप में तैयार करने लगी तब शबरी ने यह प्रश्न किया ?आप मुझे तैयार क्यों कर रही हो? और यह पशुओं को क्यों एकत्रित करके रखा है?

उनकी माता ने बताया कि अब तुम्हारा विवाह होने वाला है और इन पशुओं का भोजन बनाया जाएगा यह सुनकर माता शबरी को बड़ा दुख हुआ। उन्होंने तुरंत निश्चय कर लिया मैं ऐसा नहीं होने दूंगी।

अवसर पाकर उन्होंने जितने भी पशु पक्षी और जानवर केद थे उनको कैद रखने वाले फाटक के द्वार को खोल दिये सब पशु पक्षी और जानवर भाग गए व उड़ गए। शबरी ने भी गृह त्याग कर दिया वह घर से भाग गई,वन में आ गई।

वन में आकर महात्माओं का दर्शन किया अब वह महात्माओं से आश्रय पाने का आग्रह करती है। उस समय की लोक मान्यताओं के कारण सभी संत उससे कहते हैं कि एक तो तुम स्त्री हो और दूसरे तुम सूद्रा हो हम तुम्हें आश्रम में आवास नहीं दे सकते ।

अब तो शबरी जी के लिए बड़ी कठिनाई हो गई घर में रह नहीं सकती आश्रम में रहने को स्थान नहीं मिल रहा है।वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर आंसू बहाती है प्रार्थना करती है है प्रभु अब आप ही मुझे कोई उपाय सुझाएं कि मैं क्या करूं

(सुमिरत नाम हृदय अस आवा )

भगवान के नाम का सुमिरन करते हुए हृदय में ऐसी भावना आई की सेवा करो। पर सेवा कैसे करूं प्रभु? आश्रम में तो प्रवेश ही नहीं मिल रहा हैं।प्रेरणा हुई कि सब सो जाएं तब सेवा करो ।

रात्रि के समय सब सो जाते तब सबरी जी आश्रम में प्रवेश करती है झाड़ू लगाती है सफाई करती संविधा की आवश्यकता पूर्ति कर देती। जानती थी इसलिए भगवान के पूजन के लिए पुष्प दल लाकर रख देती है।

आश्रम के संत महात्मा जागते तब तक वह चली जाती थी।अब लोग प्रतिदिन देखते की ऐसी सेवा करने वाला कौन है? सेवा तो दिखती है पर सेवक नहीं दिखता है ,।

ब्रह्मचारी जागकर रात में उसे पकड़ने की चेष्टा करने लगे।वह जानना चाहते थे कि
यह सेवा करने वाला कौन है।एक दिन एक कृषकाय बालिका को लकड़ी का गट्ठर गिराकर भागते हुए किसी ब्रह्मचारी ने देख लिया ।

ब्रह्मचारी ने कहा ठहरो कौन हो तुम?। शबरी कांपने लगी रोने लगी वह ब्रह्मचारी उसे महाराज जी के पास ले गए।आश्रम के अधिपति मतंग ऋषि थे ।शबरी जी ने रोते हुए मतंग ऋषि को अपनी सारी व्यथा सुनाई ।

शबरी जी ने कहा कि गुरुदेव भगवान का प्रेम मुझे घर में नहीं रहने देता है और संसार की परंपरा मुझे आश्रम में नहीं रहने देती है इसलिए मैं चुपचाप सेवा करके चली जाती थी मेरा अपराध क्षमा कीजिए ।

उस आश्रम के अधिपति मतंग ऋषि ने जब शबरी की व्यथा सुनी तो नेत्र सजल हो गए ह्रदय भाव से भर गया ।महर्षि मतंग ने कहा बेटी मैंने तुम्हें बेटी कहा है आज से तुम इसी आश्रम में रहो।पिता के घर बेटी के रहने में कोई आपत्ति नहीं है। यह ब्रह्मचारी लोग सेवा करेंगे तुम आराम से यही रहकर भगवान का भजन करो।

अब तो सबरी जी बड़ी प्रसन्न हुई। आश्रय मिल गया आवास मिल गया ।किंतु सबरी जी ने कहा महाराज आपका विरोध होगा जो परंपरा का पालन करने वाले लोग हैं वह तो विरोध करेंगे कि इस तरह का तो कहीं उल्लेख नहीं है जैसा यह कर रहे हैं।

मतंग ऋषि ने एक ही बात कही।मेरा नाम मतंग है और मतंग हाथी को भी कहते हैं। मतंग हाथी भौंकने वालों की कभी पर वाह नहीं करता है। कितने भी कुत्ते भोकैं पर मतंग अपनी मस्ती में झूमता हुआ जाता है। मैं भी अपनी मस्ती में ही झूमता हुआ जा रहा हूं ।

अब तो सबरी जी का जीवन बड़ी दिव्यता में बीतने लगा। किंतु संसार का तो नियम है महर्षि मतंग के जीवन का अंतिम समय आया वह प्राणायाम के परायण होकर देह त्याग करने लगे, ब्रह्मचारियों को पता लगा सब शोक में डूब गए।

सबरी जी को यह ज्ञात हुआ दौड़कर आई महर्षि को उस अवस्था में देखकर पूंछा पिताजी आप कहां जा रहे हो? ऋषि मतंग ने कहा बेटी मैं वही जा रहा हूं जहां एक दिन सबको जाना होता है ।शबरी जी ने पूंछा पिताजी आप कब लौटेंगे ?

मतंग ऋषि ने कहा वहां से लौटना कैसा वहां से लौटना नहीं होता है। शबरी जी ने कहा फिर मैं किसके सहारे रहूंगी? मेरा सहारा कौन?। मतंग ऋषि ने कहा की बेटी सबका सहारा भगवान है । सभी को उन्हीं का आश्रय लेना चाहिए ।

शबरी जी ने रोकर कहा कि मैं भगवान को ढूंढने कहां जाऊंगी? भगवान कहां मिलेंगे? मतंग ऋषि ने शबरी के माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया की बेटी मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं तुम्हें भगवान को ढूंढने कहीं नहीं जाना पड़ेगा एक दिन भगवान ही तुम्हें ढूंढते हुए यहांआएंगे यह गुरुदेव का आशीर्वाद है।

महर्षि ने देह त्याग कर दिया सारा आश्रम शोक में डूब गया।शीघ्रता में महर्षि ने भी शबरी जी को यह नहीं बताया किभगवान कब आएंगे और ना शबरीमाता पूछ सकी की भगवान कब आएंगे। शबरी माता को तो लग रहा था कि हो सकता है भगवान आज ही आ जाएं। इसके आगे अगले प्रसंग में जय श्री राम।।

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