02/12/2025
एक छोटे से गाँव में गोपाल नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत साधारण परिवार से था, घर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं थी, लेकिन उसका मन बचपन से ही रामभक्त हनुमान जी में लगा रहता था। रोज़ सुबह उठकर वह मंदिर जाता, हनुमान चालीसा पढ़ता और बस एक ही प्रार्थना करता – “प्रभु, बस आपकी भक्ति कभी कम न हो।”
गोपाल मेहनत से काम करता, पर जीवन में परेशानियाँ कम नहीं थीं। कभी घर में पैसों की तंगी, कभी माता-पिता की तबीयत ख़राब, कभी खुद बीमार पड़ जाता। गाँव के कुछ लोग मज़ाक उड़ाते, “इतनी पूजा करता है, फिर भी तेरी हालत नहीं सुधरती!” गोपाल शांत भाव से मुस्कुराकर कहता, “हनुमान जी मेरे दुख नहीं, मेरा मन संभालते हैं। जब तक उनका नाम साथ है, मैं अकेला नहीं हूँ।”
एक दिन गोपाल पास के कस्बे में काम से जा रहा था। लौटते समय शाम हो गई, रास्ता जंगल से होकर जाता था और धीरे-धीरे अँधेरा भी घिरने लगा था। चलते-चलते वह एक पुराना, सूखा कुआँ पहचान नहीं पाया और फिसलकर उसमें जा गिरा। कुएँ में बहुत गहराई तो नहीं थी, पर दीवारें इतनी चिकनी थीं कि ऊपर चढ़ना उसके बस की बात नहीं थी। आसपास कोई मनुष्य भी नहीं था, आवाज़ लगाने पर भी कोई उत्तर नहीं मिला।
कुछ देर तक कोशिश करके थक जाने के बाद गोपाल चुपचाप आँखें बंद करके बैठ गया। उसके होंठों पर बस एक नाम था, “जय बजरंगबली।” उसने मन ही मन कहा, “हे पवनपुत्र हनुमान, अगर आज भी आप मेरे साथ हों तो कोई राह ज़रूर निकालिए। अब आपके अलावा यहाँ किसी का सहारा नहीं है।” यह कहकर वह दीवार से टिककर बैठ गया और पूर्ण भरोसे के साथ सिर्फ हनुमान जी का स्मरण करने लगा।
थोड़ी ही देर में उसे ऊपर से कुछ खड़खड़ाहट सी सुनाई दी, जैसे कोई डाल टूट रही हो। उसने ऊपर देखा तो कुएँ के किनारे पर एक बड़ा सा वानर दिखाई दिया। वह वानर आसपास की झाड़ियों से एक मजबूत, लंबी डाल अपने दोनों हाथों से खींच-खींचकर कुएँ के अंदर की ओर धकेल रहा था। कुछ देर में वह डाल कुएँ की दीवार से टिक गई और उसका एक सिरा गोपाल के पास आ पहुँचा।
गोपाल ने पहले तो सोचा कि शायद यह संयोग है, पर तुरंत ही उसके मन में आया, “यह तो प्रभु की ही लीला है।” उसने वह डाल मजबूती से पकड़ी और बड़ी कठिनाई से ऊपर चढ़ना शुरू किया। हाथ फिसल रहे थे, कपड़े फट रहे थे, पर मन के भीतर बड़ी शक्ति महसूस हो रही थी। कई प्रयासों के बाद वह आखिरकार कुएँ के मुहाने तक पहुँच गया और ज़मीन पर गिरते-गिराते बाहर आ ही गया।
वह हाँफते हुए उठकर बैठा और ऊपर देखने लगा। वही वानर थोड़ी दूरी पर चुपचाप खड़ा उसे देख रहा था, जैसे यह सुनिश्चित कर रहा हो कि गोपाल सुरक्षित बाहर निकल आया है या नहीं। गोपाल को उसकी आँखों में एक अजीब सी करुणा और शांति दिखी। उसने हाथ जोड़कर ज़मीन छूते हुए कहा, “जो भी हो, तू मेरे प्रभु का ही दूत है। तेरा धन्यवाद।”
जैसे ही उसने सिर झुकाकर प्रणाम किया और दो पल के लिए आँखें बंद कीं, फिर ऊपर देखा तो वानर कहीं दिखाई नहीं दिया। आसपास न पत्तों की आहट, न भागने की आवाज़, जैसे वह अचानक हवा में विलीन हो गया हो। उस क्षण गोपाल के मन में जरा भी संदेह नहीं रहा कि यह कोई साधारण वानर नहीं था, स्वयं हनुमान जी ही वानर के रूप में उसकी रक्षा के लिए आए थे।
कुएँ से निकलने के बाद गोपाल सीधा गाँव के हनुमान मंदिर गया। मिट्टी में सने कपड़ों, छिले हुए हाथों और भरे हुए गले के साथ वह मूर्ति के सामने बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह बोला, “प्रभु, लोगों ने पूछा था कि इतनी भक्ति का क्या फल मिला। आज आपने बता दिया कि सच्चे मन से पुकारने पर भक्त कभी अकेला नहीं रहता। मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमाई यही है कि आप मेरे साथ हैं।”
उस दिन के बाद से गोपाल की भक्ति और गहरी हो गई। वह पहले की तरह ही कभी सुख-सुविधाओं की माँग नहीं करता था, केवल इतना कहता – “हे हनुमान जी, जब तक साँस चले, आपके चरणों में विश्वास बना रहे।” धीरे-धीरे गाँव के लोग भी उसकी कहानी सुनने लगे। जो पहले उसे देखकर हँसा करते थे, अब उससे कहते, “तू हमारे बच्चों को भी यह कथा सुनाया कर, ताकि उन्हें भी समझ आए कि संकट में भगवान को याद करना केवल रीति नहीं, सच्चा सहारा होता है।”
इस तरह उस छोटे से गाँव में यह बात फैल गई कि जो भी हनुमान जी को सच्चे मन से पुकारता है, चाहे वह कुएँ के अँधेरे में फँसा हो या जीवन की किसी मुश्किल में, हनुमान जी किसी न किसी रूप में उसकी सहायता के लिए अवश्य पहुँचते हैं।
जय वीर हनुमान 🙏🙏
जय जय श्री राम 🙏🙏