Rajput Ek Aag

Rajput Ek Aag jai sri ram����� Jai rajputana ��

23/05/2026

जय महाराणा जय भवानी

13/04/2024
सिया वर राम चंद्र की जय। जय श्री राम 🚩🚩
22/01/2024

सिया वर राम चंद्र की जय। जय श्री राम 🚩🚩

बहुत ही दुखद घटना पूरे राजपूत समाज के लिए 😭🙏
05/12/2023

बहुत ही दुखद घटना पूरे राजपूत समाज के लिए 😭🙏

🚩🙏जय श्री राम🙏🚩मुगलसंहारक, सनातन धर्मरक्षक, क्षत्रिय कुलशिरोमणि, अजय योद्धा, परमप्रतापी, परमस्वाभिमानी, परमत्यागी, परमतप...
09/05/2023

🚩🙏जय श्री राम🙏🚩
मुगलसंहारक, सनातन धर्मरक्षक, क्षत्रिय कुलशिरोमणि, अजय योद्धा, परमप्रतापी, परमस्वाभिमानी, परमत्यागी, परमतपस्वी, परमबलिदानी, परमपूजनीय "श्री महाराणा प्रताप सिंह जी" आपको , कोटि कोटि नमन🙏🚩
🚩🙏जय एकलिंग जी🙏🚩
🚩🙏जय मां भवानी🙏🚩
🚩🙏जय श्री महाराणा🙏🚩
🚩🙏 जय राजपूताना🙏🚩

19/04/2023

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.

कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलोलखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।
साभार...

25/07/2022

भारत की राष्ट्रीय ध्वजा को फिर एक बार लहरा के हम सभी भारतीयों को गर्व दिलाने के लिए भाई को हार्दिक बधाई
जय हिंद 🇮🇳 भारत माता की जय 🙏

कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिर कर मरा था यह तो सब जानते हैं, लेकिन कैसे .....?यह आज हम आपको बताएंगे..वो वीर महाराणा प्रताप...
25/05/2022

कुतुबुद्दीन ऐबक घोड़े से गिर कर मरा था
यह तो सब जानते हैं,
लेकिन कैसे .....?

यह आज हम आपको बताएंगे..

वो वीर महाराणा प्रताप जी का 'चेतक' सबको याद है,
लेकिन 'शुभ्रक' नहीं!

तो मित्रो आज सुनिए
कहानी 'शुभ्रक' की......

कुतुबुद्दीन ऐबक ने राजपूताना में जम कर कहर बरपाया,

और
उदयपुर के 'राजकुंवर कर्णसिंह' को बंदी बनाकर लाहौर ले गया।

कुंवर का 'शुभ्रक' नामक एक स्वामिभक्त घोड़ा था,

जो कुतुबुद्दीन को पसंद आ गया और वो उसे भी साथ ले गया।

एक दिन कैद से भागने के प्रयास में कुँवर सा को सजा-ए-मौत सुनाई गई..

और सजा देने के लिए 'जन्नत बाग' में लाया गया।

यह तय हुआ कि
राजकुंवर का सिर काटकर उससे 'पोलो' (उस समय उस खेल का नाम और खेलने का तरीका कुछ और ही था) खेला जाएगा..
कुतुबुद्दीन ख़ुद कुँवर सा के ही घोड़े 'शुभ्रक' पर सवार होकर अपनी खिलाड़ी टोली के साथ 'जन्नत बाग' में आया।

'शुभ्रक' ने जैसे ही कैदी अवस्था में राजकुंवर को देखा,
उसकी आंखों से आंसू टपकने लगे।

जैसे ही सिर कलम करने के लिए कुँवर सा की जंजीरों को खोला गया,

तो 'शुभ्रक' से रहा नहीं गया..

उसने उछलकर कुतुबुद्दीन को घोड़े से गिरा दिया

और उसकी छाती पर अपने मजबूत पैरों से कई वार किए,

जिससे कुतुबुद्दीन के प्राण पखेरू उड़ गए!

इस्लामिक सैनिक अचंभित होकर देखते रह गए..

मौके का फायदा उठाकर कुंवर सा सैनिकों से छूटे और 'शुभ्रक' पर सवार हो गए।

'शुभ्रक' ने हवा से बाजी लगा दी..

लाहौर से उदयपुर बिना रुके दौडा और उदयपुर में महल के सामने आकर ही रुका!

राजकुंवर घोड़े से उतरे और अपने प्रिय अश्व को पुचकारने के लिए हाथ बढ़ाया,

तो पाया कि वह तो प्रतिमा बना खडा था.. उसमें प्राण नहीं बचे थे।

सिर पर हाथ रखते ही 'शुभ्रक' का निष्प्राण शरीर लुढक गया..

भारत के इतिहास में यह तथ्य कहीं नहीं पढ़ाया जाता ।

क्योंकि वामपंथी और सेक्युलर लेखक ऐसी दुर्गति वाली मौत को बताने से हिचकिचाते हैं । आज के युग में इन्हें पक्के सेक्युलर कहते है , जिन्होंने अपने गौरव पूर्ण इतिहास को बेइज्जती के साथ लिख कर देश की जनता में परोसा है ।

जबकि
फारसी की कई प्राचीन पुस्तकों में कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत इसी तरह लिखी बताई गई है। परन्तु हमारे देश के सेक्युलर कांग्रेसी और बामपंथी बरबाद कर रख दिये है ।

नमन स्वामीभक्त 'शुभ्रक' को..

पढ़कर सीना चौड़ा हुआ हो तो भेज देना सबकाे

वन्दे मातरम, मां भारती की जय 🚩 ।🙏🏻

Maharana Pratap ji ki jaynti ki bahut bahut subhkamna sbhi ko 🙏  pratap
09/05/2022

Maharana Pratap ji ki jaynti ki bahut bahut subhkamna sbhi ko 🙏 pratap

अभिनेता अनुपम खेर के तीखे सवाल सुनकर, सुप्रीम कोर्ट के "जजों" का माथा ठनका--.11 मई से, "तीन तलाक" के "मुद्दे" की, "सुनवा...
12/03/2022

अभिनेता अनुपम खेर के तीखे सवाल सुनकर, सुप्रीम कोर्ट के "जजों" का माथा ठनका--.11 मई से, "तीन तलाक" के "मुद्दे" की, "सुनवाई" के लिए, "5 जज़ों की टीम बैठी थीं".......!सुनवाई के "पहले ही दिन" "कोर्ट" नें कहा था, कि :----अगर, "तीन तलाक" का "मामला" इस्लाम धर्म" का हुआ .....तो, उसमें हम दखल नही देंगे....इसपर बॉलीवुड "अभिनेता अनुपम खेर" नें "तीखे शब्दों का इस्तेमाल" करते हुए, कहा :--ठीक है, माई लॉर्ड, अगर आप- "धर्म" के मामले में "दखल" नही देना चाहते, तो :--जलीकट्टू, दही हांड़ी, गो हत्या, राम मंदिर जैसे :--- कई "हिंदुओ" के "मामले" हैं, जिसमें "आप" "बेझिझक दखल देते हैं".....।क्या - "हिंदू धर्म" आपको "धर्म नही लगता" ????? या फिर, "आप" मुसलमानों" की "धमकियों से डरते हैं"?????अगर आप "कुरान" में लिखे होनें से,"तीन तलाक" को मानते हैं ......तो :--- "पुराण" में लिखे, "राम के अयोध्या में पैदा होनें को" क्यों नही मानते????हमें भी बताइए, यह सिर्फ मैं, नही ......"पूरा देश" जानना" चाहता है।!!"गाय का मांस खाना" या ,"ना खाना" उनकी" मर्जी" पर छोङ देना चाहिये ....लेकिन, "सुअर" का "मांस" वो नही खायेगें ....क्योंकि, ये "उनके धर्म के खिलाफ" है ????"शनि शिंगनापुर मंदिर" में, "महिलाओं" काे, "प्रवेश ना देना महिलाओं पर अत्याचार है ".....जबकि, "हाजी अली दरगाह" में "महिलाओं" को "प्रवेश देना, या ना देना, "उनके धर्म का आंतरिक मामला" है ???"पर्दा प्रथा" एक "सामाजिक बुराई" है .....लेकिन, "बुर्का उनके "धर्म का हिस्सा" है ????"जल्लीकट्टू" में, "जानवरों पर अत्याचार" होता है....लेकिन, "बकरीद" की "कुर्बानी", "इस्लाम की शान"है ????"दही हांडी" एक "खतरनाक खेल" है ....जबकि, इमाम हुसैन: की याद में, "तलवारबाजी" उनके "धर्म का मामला" है ????"शिवजी पर दूध चढाना"... "दूध की बर्बादी" है ....लेकिन मजारों" पर "चादर चढाने से मन्नतें पूरी होती है" ????"हम दो हमारे दो"... हमारा "परिवार नियोजन" है ....लेकिन, उनका- "कीङे-मकौङों" की तरह, "बच्चे पैदा करना अल्लाह की नियामत" है ???"भारत तेरे टुकङे होगें", ये कहना -"अभिव्यक्ति" की "आजादी" है ...और इस बात से "देश" को कोई "खतरा" नही है....और "वंदे मातरम" कहने से, "इस्लाम खतरे" में, आ जाता है ????सैनिकों पर "पत्थर" फैंकने वाले, "भटके हुऐ नौजवान" है .और अपने बचाव में, "एक्शन" लेने वाले "सैनिक" "मानवाधिकारों के दुश्मन" हैं????एक दरगाह पर विस्फोट से "हिन्दु आंतकवाद" शब्द गढ दिया गया और जो "रोजाना" जगह जगह बम फोङतें है, उन "आंतकवादियों" का कोई "धर्म" ही नही है ????.क्या हाल कर दिया है, "दलाल मीडिया" और "सेकुलर जजों" ने, हमारे "देश" का, .......यदि समाज से असमानता दूर करनी होतो समान भाव से देखना चाहिये । यदि आपको ये सही लगता हे तो कृपया इसे आगे पंहुचा दें अन्यथा डिलीट कर दें ।
जय हिन्द, जय भारत.........🚩🚩🚩

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