29/11/2025
स्त्री : भावनाओं की प्रतिमूर्ति और संरक्षण की अपेक्षा — एक पारम्परिक भारतीय दृष्टि ( श्रीहित गोवर्धन : आचार्य लोकेश कृष्ण संस्कृत)
भारतीय दर्शन और साहित्य में स्त्री को भावनाओं की प्रतिमूर्ति, करुणा, सौम्यता और ममता का आधार माना गया है। उसकी कोमलता केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्तर पर भी विशिष्ट मानी गई है। इसी कारण, शास्त्रों में यह कहा गया कि स्त्री अपनी भावनाओं को किसी विश्वसनीय, संवेदनशील संग के साथ सहज रूप से अभिव्यक्त कर पाती है।
स्त्री की भावनात्मक प्रकृति
भारतीय ग्रंथों में स्त्री को हृदयप्रधान माना गया है—जो अपने भावों, संवेदनाओं और अंतःप्रेरणाओं से जीवन को सींचती है।
मनुस्मृति में स्त्री के कोमल हृदय और उसकी संरक्षण–अभिलाषा के संदर्भ में कहा गया है—
“स्त्रीणां भावो हि मृदुः”
अर्थः स्त्रियों की प्रकृति कोमल होती है।
स्त्री की यह भावनात्मक कोमलता उसे ऐसे संग की अपेक्षा कराती है जो उसके मन की अभिव्यक्ति को समझ सके—
एक मित्र, एक पति, एक संरक्षक, या कोई भी ऐसा व्यक्ति जो सत्यनिष्ठ, मर्यादित और विश्वसनीय हो। इसीलिए स्त्री की कोमल हृदय प्रकृति का कोई दुरुपयोग ना कर सके। भारतीय परम्परा में अविश्वसनीय, अमर्यादित व मिथ्याचारी ,पापाचारी लोगों से स्त्री की रक्षा हेतु सबके लिए ही सामान्य नियम कि “एकान्त में तो पिता को भी युवती पुत्री के संग नहीं रहना चाहिए” प्रचलित रहा है ।
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स्त्री की सुरक्षा का शास्त्रीय सिद्धांत
प्राचीन समाज में स्त्री की सुरक्षा को अत्यंत महत्व दिया गया। इस सुरक्षा का आशय केवल शारीरिक संरक्षण नहीं था, बल्कि उसके मनोभावों और सम्मान की रक्षा भी थी। इसीलिए धर्मग्रंथों ने कुछ कठोर नियम भी निर्धारित किए ताकि युवती स्त्री को किसी पापाचारी पुरुष से बचाया जा सके।
इसी सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत मिलता है—
युवती व एकान्त–संग का निषेध
धर्मसूत्रों और स्मृतियों ने कई बार यह उल्लेख किया है कि एकांत में पति को छोड़कर युवती का किसी भी पुरुष—चाहे वह निकट संबंधी ही क्यों न हो—के साथ रहना उचित नहीं माना गया। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार की संभावित शंका, अपवाद या अनिष्ट परिस्थिति से सुरक्षा था।
मनुस्मृति का प्रासंगिक सिद्धांत
धर्म ग्रंथों में से ऐसा वर्णन मिलता है कि इन्द्रियां इतनी बलवान है कि वह बड़े बड़े योगियों को भी भ्रष्ट करने का सामर्थ्य रखती है इसलिए सामान्य लोक सिद्धांत के अनुसार युवा पुत्री व पिता को भी एक साथ एकांत वास नहीं करना चाहिए
इस प्रकार धर्म ग्रंथों में यह स्पष्ट है—
“न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति”
(मनुस्मृति 9/3)
स्त्री को असुरक्षित परिस्थिति में स्वतंत्र न छोड़ा जाए; उसकी सुरक्षा का दायित्व परिवार व समाज का है।
यह सिद्धांत आज के संदर्भ में स्वतंत्रता को नकारने के अर्थ में नहीं लिया जाता, बल्कि सामाजिक संरचना में सुरक्षा–जवाबदेही का संकेत माना जाता है।
आपस्तंब धर्मसूत्र में स्त्री–सुरक्षा का सिद्धांत—
“स्त्रीरक्षां अह्निशः कुर्यात्”
अर्थः स्त्री की रक्षा निरन्तर की जानी चाहिए।
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शास्त्रीय उदाहरण भी दृष्टव्य हैं
1. सीता–हरण (रामायण)
वाल्मीकि रामायण में लक्ष्मण–रेखा का उल्लेख स्त्री–सुरक्षा के प्रतीक के रूप में किया जाता है। उसका संदेश यही है कि स्त्री की सुरक्षा हेतु सावधानी आवश्यक है।
2. द्रौपदी की रक्षा (महाभारत)
वस्रहरण प्रसंग दर्शाता है कि स्त्री की रक्षा को समाज में सर्वोच्च धर्म माना गया। श्रीकृष्ण ने स्वयं द्रौपदी की रक्षा करते हुए यह सिद्ध किया कि स्त्री–सम्मान की रक्षा ही धर्म है।
3. सीता का अग्निपरीक्षा प्रसंग
यद्यपि आधुनिक दृष्टि से यह कठोर प्रतीत होता है, पर यह स्त्री–चरित्र पर असत्य आरोपों से रक्षा और मर्यादा को स्थापित करने का प्रयास था।
सारांश
स्त्री की इसी भावनात्मक कोमलता और सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता के कारण शास्त्रों ने युवती स्त्री को पापाचारी पुरुषों से बचाने हेतु कुछ विशेष नियम निर्धारित किए। धर्मग्रंथों में स्त्री की निरन्तर रक्षा को अनिवार्य बताया गया है और एकान्त में पति को छोड़कर युवती का किसी भी पुरुष—यहाँ तक कि पिता—के साथ रहने को भी अनुचित माना गया, ताकि किसी प्रकार की शंका या अनिष्ट परिस्थिति न उत्पन्न हो।
रामायण, महाभारत और स्मृति–ग्रंथों में स्त्री–रक्षा के अनेक उदाहरण मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि स्त्री–सम्मान और उसकी सुरक्षा को धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंग माना गया।
आज के समय में इन सिद्धांतों का सार यही है कि स्त्री को सम्मान, सुरक्षा, समानता और संवेदनशील संग की आवश्यकता होती है, और समाज का दायित्व है कि उसे ये सभी उपलब्ध कराए जाएँ ।
॥ जय श्रीकृष्ण ॥
श्रीहित गोवर्धन
आचार्य लोकेश कृष्ण संस्कृत
श्रीवृंदावन धाम
राष्ट्रीय अध्यक्ष : वन्दे गोमातरम् परिवार (भारत)
प्रबंधक : श्रीधर्म संघाभियानम्
(श्रीशिवमन मानस संस्कृत पाठशाला )