05/10/2026
🌺 संतत्व की पहचान 🌺
“क्रोध न हो, विरोध न हो और किसी के जीवन का अवरोध न हो—वही संत है।”
संत होना केवल वस्त्र बदल लेना या संसार से दूर हो जाना नहीं है।
संतत्व तो उस निर्मल अवस्था का नाम है, जहाँ मन में क्रोध समाप्त हो जाए, हृदय में किसी के प्रति विरोध न रहे और हमारे कारण किसी के जीवन की राह में कोई अवरोध उत्पन्न न हो।
जो व्यक्ति अपमान में भी शांत रहे,
विरोध मिलने पर भी प्रेम रखे,
दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्न हो,
और अपने कर्मों से किसी के जीवन में दुःख, बाधा या अशांति न पहुँचाए—
वही वास्तव में संतत्व के मार्ग पर चल रहा है।
क्रोध को करुणा में,
विरोध को स्वीकार में,
और अवरोध को सहयोग में बदल देना ही सच्ची साधना है।
जिस हृदय में सबके लिए मंगलभाव जाग जाए,
जिस वाणी से किसी को चोट न पहुँचे,
जिस कर्म से किसी का अहित न हो
और जिसके सान्निध्य से दूसरों को शांति मिले—
वहीं संतत्व का प्रकाश प्रकट होता है।
आइए, आज स्वयं से पूछें—
क्या मेरे कारण किसी के मन को पीड़ा तो नहीं?
क्या मेरे व्यवहार से किसी की राह तो नहीं रुक रही?
क्या मेरे भीतर किसी के प्रति क्रोध या विरोध तो शेष नहीं?
जब इन प्रश्नों के उत्तर भीतर से निर्मल होने लगें,
तभी समझिए कि साधना केवल पूजा तक नहीं रही—
वह हमारे जीवन का स्वभाव बनने लगी है।
🙏 नर्मदे हर। हर हर महादेव। 🙏
परम पूज्य संत पूज्य जम्मू बाले लाल बाबा जी महाराज
शिव मंदिर बापौलीधाम आश्रम, मध्य प्रदेश